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यदुवंशका वर्णन और सहस्त्रार्जुनका चरित्र

श्रीपराशरजी बोले -

अब मैं ययातिके प्रथम पुत्र यदुके वंशका वर्णन करत हूँ, जिसमें कि मनुष्य, सिद्ध गन्धर्व, यक्ष, राक्षस गृह्याक, किंपुरुष, अप्सरा, सर्प, पक्षी, दैत्य, दानव, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्रण, देवर्षि, मुमुक्षु तथा धर्म, अर्थ , काम और मोक्षके अभिलाशी पुरुषोंद्वारा,सर्वदा स्तुति किये जानेवाले, अखिललोक - विश्राम आद्यन्तहीन भगवान् विष्णुने अपने अपरिमित महत्वशाली अंशसे अवतार लिया था । इस विषयमें यह श्‍लोक प्रसिद्ध है ॥१-३॥

' जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्मने अवतार लिया था उस यदुवंशका श्रवण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता हैं ॥४॥

यदुके सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल और नटुष नामक चार पुत्र हुए । सहस्त्राजित्‌के शतजित और शतजित्‌के हैहय, हेहय तथा वेणुहय नामक तीन पुत्र हुए ॥५-७॥

हैहयाका पुत्र धर्म, धर्मका धर्मनेत्र, धर्मनेत्रका कुन्ति, कुन्तिका सहजित तथा सहजितका पुत्र महिष्मान हुआ, जिसने माहिष्मतीपुरीको बसाया ॥८-९॥

महिष्मानके भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यके दुर्दम, दुर्दमके धनक तथा धनकके, कृतवीर्य कृताग्नि, कृतधर्म और कृतौजा नामक चार पुत्र हुए ॥१०॥

कृतवीर्यके सहस्त्र भुजाओंवाले सप्तद्वीपधिपति अर्जुनका जन्म हुआ ॥११॥

सहस्त्रार्जुनने अत्रिकुलमें उप्तन्न भगवदंशरूप श्रीदत्तात्रेयजीकी उपासना कर ' सहस्त्र भुजाएँ, अधर्माचरणका निवारण, स्वधर्मका सेवन, युद्धके द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विजय, धर्मानुसार प्रजा-पालन, शत्रुओंसे अपराजय तथा त्रिलोकप्रसिद्ध पुरुषसे मृत्यु ' ऐसे कई वर माँगे और प्राप्त किये थे ॥१२॥

अर्जुनने इस सम्पूर्ण सप्तद्वीपवती पृथिवीका पालन तथा दस हजार यज्ञॊंका अनुष्ठान किया था ॥१३-१४॥

उसके विषयमें यह श्‍लोक आजतक कहा जाता है ॥१५॥

' यज्ञ, दान, तप, विनय, और विद्यामें कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुनकी समता कोई भी राजा नहीं कर सकता' ॥१६॥

उसके राज्यमें कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता था ॥१७॥

इस प्रकार उसने बल, पराक्रम, आरोग्य, और सम्पत्तिको सर्वथा सुरक्षित रखते हुए पचासी हजार वर्ष राज्य किया ॥१८॥

एक दिन जब वह अतिशय मद्यपानसे व्याकुल हुआ नर्मदा नदीमें जल - क्रिडा कर रहा था, उसकी राजधानी माहिष्मातीपुरीपर दिग्विजयके लिये आये हुए सम्पूर्ण देव , दानव, गन्धर्व और राजाओंके विजयमदसे उन्मत्त रावणने आक्रमण किया, उस समय उसने अनायास ही रावणको पशुके समान बाँधकर अपने नगरके एक निर्जन स्थानमें रख दिया ॥१९॥

इस सहस्त्रार्जुनक पचासी हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् नारायणके अंशावतार परशुरामजीने वध किया था ॥२०॥

इसके सौ पुत्रोंमेंसे शूर, शरसेन, वृषसेन, मधु और जयध्वज - ये पाँच प्रधान थे ॥२१॥

जयध्वजका पुत्र तालजंघ हुआ और तालजंघके तालजंघ नामक सौ पुत्र हुए इनमें सबसे बड़ा वीतिहोत्र तथा दुसरा भरत था ॥२२-२४॥

भरतके वृष, वृषके मधु और मधुके वृष्णि आदि सौ पुत्र हुए ॥२५-२७॥

वृष्णिके कारण यह वंश वृष्णि कहलाया ॥२८॥

मधुके कारण इसकी मधु-संज्ञा हुई ॥२९॥

और यदुके नामानुसार इस वंशके लोग यादव कहलाये ॥३०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे एकदशोऽध्यायः ॥११॥

श्रीविष्णुपुराण

संकलित साहित्य
Chapters
अध्याय १
चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत्‌के उप्तत्ति क्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा
ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप
ब्रह्माजीकी उप्तत्ति वराहभगवानद्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक रचना
अविद्यादि विविध सर्गोका वर्णन
चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पात्तिका वर्णन
मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन
रौद्र सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन
देवता और दैत्योंका समुद्र मन्थन
भृगु, अग्नि और अग्निष्वात्तादि पितरोंकी सन्तानका वर्णन
ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट
ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान्‌का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान
राजा वेन और पृथुका चरित्र
प्राचीनबर्हिका जन्म और प्रचेताओंका भगवदाराधन
प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन
नृसिंहावतारविषयक प्रश्न
हिरण्यकशिपूका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित
प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग
प्रह्लादकृत भगवत्-गुण वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्‌का सुदर्शनचक्रको भेजना
प्रह्लादकृत भगवत् - स्तृति और भगवान्‌का आविर्भाव
कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद्गणकी उप्तत्तिका वर्णन
विष्णुभगवान्‌की विभूति और जगत्‌की व्यवस्थाका वर्णन
प्रियव्रतके वंशका वर्णन
भूगोलका विवरण
भारतादि नौ खण्डोंका विभाग
प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन
सात पाताललोकोंका वर्णन
भिन्न - भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन
भूर्भुवः आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त
सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन
ज्योतिश्चक्र और शुशुमारचक्र
द्वादश सूर्योंके नाम एवं अधिकारियोंका वर्णन
सूर्यशक्ति एवं वैष्णवी शक्तिका वर्णन
नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार
भरत-चरित्र
जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद
ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश
ऋभुकी आज्ञासे निदाघका अपने घरको लौटना
वैवस्वतमनुके वंशका विवरण
इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र
मान्धाताकी सन्तति, त्रिशुंकका स्वर्गारोहण तथा सगरकी उप्तत्ति और विजय
सगर, सौदास, खट्‍वांग और भगवान् रामके चरित्रका वर्णन
निमि-चरित्र और निमिवंशका वर्णन
सोमवंशका वर्णनः चन्द्रमा, बुध और पुरुरवाका चरित्र
जह्नुका गंगापान तथा जगदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति
काश्यवंशका वर्णन
महाराज रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र
ययातिका चरित्र
यदुवंशका वर्णन और सहस्त्रार्जुनका चरित्र
यदुपुत्र क्रोष्टुका वंश
सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा