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सिंधुताई सपकाल

उन्हें अनाथों की माँ भी कहा जाता है | १० साल की उम्र में उनकी ३० साल के एक चरवाहे से शादी हो गयी और जब तक वह २० साल की हुईं वह तीन लड़कों की माँ बन चुकी थीं | उन्होनें अपने गाँव के मुखिया के खिलाफ जंग छेड़ी क्यूंकि वह बिना गांववालों को पैसा दिए सूखा गोबर बेच रहा था | इस बात से नाराज़ हो मुखिया ने उसके पति को उसे छोड़ देने के लिए कहा जबकि उसके पेट में नौ महीने का गर्भ था | १४ अक्टूबर १९७३ को उन्होनें एक गाय के तबेले में एक लड़की को जन्म दिया | घर से निकले जाने के बाद उन्होनें रेलवे प्लेटफार्म पर खाने की भीख मांगनी शुरू की | इस प्रक्रिया में उन्हें एहसास हुआ की ऐसे कई बच्चे हैं जिनके माँ बाप ने उन्हें त्याग दिया है और उन्होनें उन बच्चों को अपनाना शुरू कर दिया | इसके बाद उन्होनें निश्चय किया की वह जो भी अनाथ उन्हें मिलेगा उसकी माँ बनेंगी | उन्होनें अपनी सगी बेटी को श्रीमंत दगडू सेठ हलवाई ट्रस्ट को गोद दे दिया ताकि लोग यह न कह सकें की वह असली और अनाथों में फर्क करती हैं |