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खंड 1 पृष्ठ 6

एक दिन बारिश हो रही थी। बादल घिरे थे। ऐसे में बदन पर एक सुवासित महीन चादर और जुही की माला गले में डाले महेंद्र मगन-मन अपने सोने के कमरे में पहुँचा। अचानक आशा को चौंका देने के विचार से- जूतों की आवाज न होने दी। झाँक कर देखा, पूरब की खुली खिड़की से पानी के छींटे लिए हवा के तीखे झोंके कमरे में आ रहे हैं, दीया बुझ गया है और आशा नीचे बिछावन पर पड़ी रो रही है।

महेंद्र जल्दी से उसके करीब गया और पूछा - 'क्या बात है?' वह दूने आवेग से रोने लगी। बड़ी देर के बाद महेंद्र को जवाब मिला कि 'मौसी से और बर्दाश्त न हो सका। वह अपने फुफेरे भाई के यहाँ चली गईं।'

महेंद्र के मन में आया, 'गईं तो गईं, लेकिन बदली की ऐसी सुहानी साँझ को खराब कर गईं।'

अंत में सारा गुस्सा माँ पर आया। वही तो इन सारे अनर्थों की जड़ है।

महेंद्र ने कहा - 'हम भी वहीं चले जाएँगे, जहाँ चाची गई हैं। देखते हैं, माँ किससे झगड़ती है?'

और उसने नाहक ही शोर-गुल के साथ असबाब बाँधने के लिए कुली को बुलाना शुरू कर दिया।

राजलक्ष्मी समझ गईं। धीरे-धीरे महेंद्र के पास आईं। शांत स्वर में पूछा - 'कहाँ जा रहा है?'

महेंद्र ने पहले कोई जवाब ही न दिया। दो-तीन बार पूछे जाने पर बताया- 'चाची के पास।'

राजलक्ष्मीं बोली - 'अरे तो मैं ही उन्हें यहाँ बुला देती हूँ।'

राजलक्ष्मी उसी समय पालकी पर सवार हो कर अन्नपूर्णा के घर गईं। गले में कपड़ा डाल कर हाथ जोड़ते हुए कहा - 'खुश हो मँझली बहू, मुझे माफ करो!'

अन्नपूर्णा ने जल्दी-जल्दी उनके पैरों की धूल ली। कातर स्वर में कहा - 'दीदी, मुझे दोषी क्यों बना रहीं? तुम जैसा हुक्म दोगी, वैसा ही करूँगी।'

राजलक्ष्मी ने कहा - 'तुम चली आई हो, तो मेरे बेटा-पतोहू भी घर छोड़ कर यहीं आ रहे हैं।'

कहते-कहते वह रो पड़ी।

जिठानी-देवरानी दोनों घर लौट आईं। तब भी वर्षा हो रही थी। अन्नपूर्णा जब महेंद्र के कमरे में पहुँचीं, आशा का रोना थम चुका था। महेंद्र बातों से उसे हँसाने की कोशिश कर रहा था। आसार थे कि बदलियाँ यूँ ही नहीं गुजर जाएँगी।

अन्नपूर्णा ने कहा - 'चुन्नी, तू मुझे घर में भी न रहने देगी और कहीं जाऊँ तो भी पीछे लग जाएगी। क्या मेरे लिए कहीं चैन नहीं!'

आशा चौंक पड़ी।

महेंद्र बड़ा ही खीझ कर बोला - 'क्यों चाची, चुन्नी ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?'

अन्नपूर्णा ने कहा - 'बहू की ऐसी बेहयाई बर्दाश्त न हो सकी तभी यहाँ से चली गई थी। फिर अपनी सास को रुला कर मुँहजली ने मुझे क्यों बुलवाया?'

जीवन के इस अध्याय में माँ-चाची ऐसी विघ्नकारिणी होती हैं, महेंद्र को इसका पता न था।

दूसरे दिन राजलक्ष्मी ने बिहारी को बुलवा कर कहा - 'बेटा बिहारी, तुम एक बार महेंद्र से पूछ कर देखो, जमाने से गाँव नहीं गए। मैं एक बार बारासात जाना चाहती हूँ।'

बिहारी ने कहा - 'जमाने से नहीं गईं तो क्या हुआ? खैर, मैं पूछ कर देखता हूँ। मगर वह राजी भी होगा, ऐसा नहीं लगता।'

महेंद्र ने कहा - 'जन्म-भूमि को देखने की इच्छा जरूर होती है। लेकिन माँ का वहाँ ज्यादा दिन न रहना ही अच्छा होगा। बरसात के मौसम में वह जगह अच्छी नहीं।'

महेंद्र बड़ी आसानी से राजी हो गया, इससे बिहारी कुढ़ गया। बोला - 'माँ अकेली जाएँगी, वहाँ उनकी देख-भाल कौन करेगा?'

'भाभी को भी साथ भेज दो न?'

कह कर बिहारी हँसा।

बिहारी के इस गहरे व्यंग्य से कुंठित हो कर महेंद्र ने कहा - 'मेरे लिए यह कोई मुश्किल है क्या?'

मगर बात इससे आगे न बढ़ी।

बिहारी इसी तरह आशा के मन को विमुख कर दिया करता और यह जान कर कि आशा इससे कुढ़ती है, उसे मजा आता।

कहना बेकार होगा, राजलक्ष्मी जन्म-भूमि के दर्शन के लिए उतनी बेताब न थी। गर्मी के दिनों में जब नदी का पानी सूख जाता है, तो मल्लाह कदम-कदम पर लग्गी से थाह लेता है कि कहाँ कितना पानी है। राजलक्ष्मी ने सोचा न था कि उनके बरसात जाने का प्रस्ताव इतनी जल्दी मंजूर हो जाएगा। सोचा, 'अन्नपूर्णा और मेरे दोनों के घर से बाहर जाने में फर्क है।'

अन्नपूर्णा भीतरी मतलब समझ गई। कहने लगी, 'दीदी जाएँगी, तो मैं भी न रह सकूँगी।'

महेंद्र ने माँ से कहा - 'सुन लिया तुमने? तुम जाओगी तो चाची भी जाएँगी। अपनी गृहस्थी का क्या होगा फिर?'

राजलक्ष्मी विद्वेष के जहर से जर्जर हो कर बोलीं- 'तुम भी जा रही हो मँझली? तुम्हारे जाने से काम कैसे चलेगा? नहीं, तुम्हें रहना ही पड़ेगा।'

राजलक्ष्मी उतावली हो गईं। दूसरे दिन दोपहर को ही तैयार हो गई। महेंद्र ही उन्हें पहुँचाने जाएगा, इसमें किसी को भी शुबहा न था। लेकिन रवाना होते वक्त मालूम पड़ा महेंद्र ने माँ के साथ जाने के लिए प्यादे और दरबान तक कर रखे हैं।

बिहारी ने पूछा - 'तुम अभी तक तैयार नहीं हुए क्या, भैया?'

महेंद्र ने लजा कर कहा - 'मेरे कॉलेज की...'

बिहारी ने कहा - 'खैर, तुम छोड़ दो! माँ को मैं वहाँ छोड़ आता हूँ।'

महेंद्र मन-ही-मन नाराज हुआ। अकेले में आशा से बोला, 'सचमुच, बिहारी ने ज्यादती शुरू कर दी है। वह यह दिखाना चाहता है कि वह माँ का खयाल मुझसे ज्यादा रखता है।'

अन्न्पूर्णा को रह जाना पड़ा। परंतु लाज, कुढ़न और खीझने से वह सिमटी-सी रहीं। चाची में यह दुराव देख कर महेंद्र नाराज हुआ और आशा भी रूठी रही।

आँख की किरकिरी

रवीन्द्रनाथ ठाकुर
Chapters
खंड 1 पृष्ठ 5
खंड 1 पृष्ठ 4
खंड 1 पृष्ठ 3
खंड 1 पृष्ठ 2
खंड 1 पृष्ठ 1
खंड 1 पृष्ठ 6
खंड 1 पृष्ठ 7
खंड 1 पृष्ठ 8
खंड 1 पृष्ठ 9
खंड 1 पृष्ठ 10
खंड 1 पृष्ठ 11
खंड 1 पृष्ठ 12
खंड 2 पृष्ठ 1
खंड 2 पृष्ठ 2
खंड 2 पृष्ठ 3
खंड 2 पृष्ठ 4
खंड 2 पृष्ठ 5
खंड 2 पृष्ठ 6
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खंड 2 पृष्ठ 8
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खंड 2 पृष्ठ 10
खंड 2 पृष्ठ 11
खंड 2 पृष्ठ 12
खंड 3 पृष्ठ 1
खंड 3 पृष्ठ 2
खंड 3 पृष्ठ 3
खंड 3 पृष्ठ 4
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खंड 3 पृष्ठ 6
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खंड 3 पृष्ठ 9
खंड 3 पृष्ठ 10
खंड 3 पृष्ठ 11
खंड 3 पृष्ठ 12
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खंड 4 पृष्ठ 2
खंड 4 पृष्ठ 3
खंड 4 पृष्ठ 4
खंड 4 पृष्ठ 5
खंड 4 पृष्ठ 6
खंड 4 पृष्ठ 7
खंड 4 पृष्ठ 8
खंड 4 पृष्ठ 9
खंड 4 पृष्ठ 10
खंड 4 पृष्ठ 11
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खंड 4 पृष्ठ 19