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नादिर शाह

बाद में बाबर का ये हीरा अगले दो सदियों तक मुग़ल शासकों को मिलता रहा जब तक की वह मोहम्मद शाह के हाथ नहीं लगा |उसी समय पर्शिया के नादिर शाह की नज़र दिल्ली पर पड़ी और उसने दिल्ली को हासिल करने की ठानी | करनाल  के १७३८ के एतिहासिक युद्ध के बाद नादिर शाह ने मुग़ल राजधानी में प्रवेश किया | 

१७३९ में नादिर शाह ने मोहम्मद शाह को हरा दिल्ली पर कब्ज़ा किया और उसके सारे जवाहरात अपने कब्ज़े में ले लिए | लेकिन ढूँढने पर भी उसे कोहिनूर हीरा नहीं मिला | कई दिनों बाद एक दासी ने उसे बताया की मोहम्मद शाह कोहिनूर को अपनी पगड़ी में छुपा के रखते हैं | ये सुन नादिर शाह ने एक योजना बनायीं | उसने मोहम्मद शाह को एक जश्न के लिए बुलाया और खाने के दौरान दोस्ती के तौर पर पगड़ियाँ बदलने की गुज़ारिश की | मोहामद शाह को मजबूरन कोहिनूर हीरा नादिर शाह को देना पड़ा |उसे देखते ही नादिर शाह ने कहा कोहिनूर यानी रौशनी का पर्वत | इस तरह से इसका नाम कोहिनूर पड़ गया |