वध

राक्षसपुरी सात दिन तक विषाद में रोती रही। सहस्रों राक्षस-शिल्पियों ने वीरेन्द्र की चिता पर गगनस्पर्शी चैत्य स्वर्ण की ईंटों से रचा। सात दिन भी बीत गए। रावण ने सिन्धु में परिजनों-सहित स्नानकर अशौच त्यागा। अब वह अश्रुनीर को क्रोध और अमर्ष की आग में जलाता हुआ रणसाज सजने लगा। लंका में फिर दुन्दुभि गड़गड़ा उठी। शृंगी-नाद होने लगा। रावण अपने रथ पर बैठ मन्दोदरी आदि अन्तःपुर की सब स्त्रियों को पछाड़ खाती रोती-कलपती छोड़, विषधर सर्प के समान फुफकार मारता हुआ बन्दियों और योद्धाओं से परावृत समरांगण में आ पहुंचा।

सात दिन-रात अनवरत राम-रावण का अप्रतिम, अवर्ण्य संग्राम होता रहा। अन्त में रावण ने राम का साम्मुख्य किया।

राम ने देखा तो धनुष-टंकार किया। मातलि दिव्य रथ ले आया। विभीषण आदि महारथी राम को चारों ओर से घेरकर चले। राम ने कहा-“मे चिरम-भीप्सित: पराक्रमस्य कालोऽयं सम्प्राप्त:। चातकस्य कांक्षितं धर्मान्ते मेघदर्शनमिव। अस्मिन् मुहूर्ते न चिराद् अरावणमरामं वा जगद् द्रक्ष्यथा।”

इतना कहकर राम ने सारथि से कहा-“हे देवसारथि, अब चलो राक्षसराज के उस श्वेत छत्र के सम्मुख।”

रावण ने भी जब राम के रथ को देखा तो क्रोध से लाल-लाल आंखें करके धनुष उठाया।

राम ने पुकारकर अपना नाम-गोत्र उच्चारण करके कहा-“मया विरहितां दीनां वैदेहीं हत्वा शूरोऽहमिति मन्यसे! स्त्रीषु शरणविनाथासु परदाराभिमर्शनं कापुरुषकर्म कृत्वा शूरोऽहमिति मन्यसे! भिन्नमर्याद, निर्लज्ज, चारित्रेष्वनवस्थित, शूरोऽहमिति मन्यसे! तस्याद्य गर्हितस्याहितस्य कर्मण: महत्फलं प्राप्युहानीम्?

“रे दुर्मते, शूरोऽहमिति चात्मानमवगच्छसि, सीतां चौरवद् व्यपकर्षस्ते नाऽस्ति लज्जा। दिष्ट्यास, अद्य त्वां सायैकस्तीक्ष्णै: मृत्युमुखे नयामि। अद्य ते मच्छस्त्रैश्छिन्नं शिरो क्रव्यादा व्यपकर्षन्तु।”

श्री राम ने एकबारगी ही अविरल बाण वर्षा से राक्षसेन्द्र को ढांप दिया। असंख्य वानर-यूथ, यूथपति गुल्मनायक, भट-सुभटों ने रावण के रथ को चारों ओर से घेरकर उस पर विविध शस्त्रास्त्रों की वर्षाकर रथ को क्षण-मात्र में जर्जर कर डाला। इस भयानक आक्रमण से भग्नहृदय रावण विचलित हो गया। जब तक वह धनुष पर बाण-संधान करे, तब तक श्री राम ने दस पैने बाण उसके हृदय में मारे। रावण झूमता हुआ मूर्च्छित हो रथ पर गिर पड़ा। सूत ने यह देखा, तो वह रथ का रुख मोड़ युद्ध-क्षेत्र से भाग खड़ा हुआ। विजय-गर्व-मत्त वानर-सैन्य जयनाद करती हुई भागते राक्षसों का निर्दय-संहार करने लगी।

परन्तु रावण तुरन्त ही सावधान हो गया। उसने गुस्से से लाल होकर सूत से कहा-“अरे, तूने बिना ही मेरी आज्ञा के मेरा रथ शत्रु के सामने से कैसे हटा दिया? अरे अनार्थ, तूने तो मेरे कुल को ही दाग लगा दिया। मेरा चिरकालोपार्जित यश, वीर्य, तेज, प्रत्यय सभी नष्ट कर दिया। चल, चल, शीघ्र मेरा रथ शत्रु के सम्मुख ले चल-आज पृथ्वी रामरहित या रावणरहित होने वाली है।”

सूत ने कहा-“देव, मैं न भयभीत हूं, न मूढ़ हूं, न मैं शत्रु के प्रभाव में हूं, न प्रमत्त हूं, न आपकी महिमा से असावधान हूं। मैंने तो आपकी हित-कामना से, आपके यश की रक्षा करने की भावना से, प्रसन्नमन यह हितकर कार्य किया था, आपके विश्राम को विचार कर तथा रथ और अश्वों की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझकर। मैंने स्वेच्छा से रथ नहीं हटाया।”

“तो चल-चल जल्दी कर, अब मैं धीरज नहीं रख सकता।”

राम ने जब रावण का स्वर्ण-शैलपम रथ फिर अपनी ओर आते देखा तो उन्होंने दिव्य ऐन्द्रधनु हाथ में लिया। उसकी टंकार से दसों दिशाएं गूंजने लगीं। इन्द्र ने दक्षिण पक्ष संभाला, कुमार कार्तिकेय ने वाम। पृष्ठ भाग पर लक्ष्मण, मुखाग्र पर गदापाणि विभीषण सुग्रीव, हनुमन्त, नील, नल, गय, गयन्द, जाम्बवन्त आदि सौ प्रमुख, गुल्मपति वानर सुभट। अब राम-रावण का सुप्रसिद्ध चिरस्मरणीय निर्णायक युद्ध होने लगा। दोनों रथ अचल पर्वत के समान एक-दूसरे के सामने डटे थे। दोनों ही अजेय वीर दिव्यास्त्रों का अद्भुत प्रयोग संहार कर रहे थे। इस अद्भुत युद्ध को देखने के लिए राक्षस और वानर भट भी सन्नद्ध हो गए। कालसर्प की भांति ज्वलन्त नाराच, शितिपक्ष छूट रहे थे, परस्पर टकराकर टूट रहे थे। लक्ष-लक्ष सुभट जड़वत् अचल रह यह अभूतपूर्व युद्ध देख रहे थे। अब राम ने अवसर पाकर चार कालबाणों से रावण के रथ के घोड़ों को मार गिराया। वायुवेगी अश्वों के मरने से क्रोधसंतप्त रावण ने बाणों से राम को बींध डाला। राम ने निरन्तर बाण-वर्षा करके रावण का रथ जर्जर कर दिया। वानर सुभटों ने एकबारगी ही रथ पर टूटकर रथ चूर-चूर कर डाला। इसी समय पांच बाण मार राम ने रावण के सारथि को मार गिराया। इस पर वानर-सैन्य गरज उठी। राक्षसों के हृदय हिल गए। अब रावण हाथ में अपना लोक-प्रसिद्ध विकट परशु लेकर रथ से कूद पड़ा। राम ने भी गदा संभाली। अब दोनों का अद्भुत अतुल्य तुमुल द्वन्द्व होने लगा। दोनों वीर युद्धक्रुद्ध मत्त हाथियों की भांति परस्पर गुंथ गए। शत्रु-मित्र कहने लगे-इस राम-रावण के तुमुल संग्राम की तुलना यह राम-रावण युद्ध ही है।

इसी क्षण सुअवसर जान इन्द्र के संकेत से राम ने फिर दिव्य धनुष उठाया। रथ को ग्रहण किया और सात आशीविष बाण एक साथ ही छोड़ दिए। वे बाण रावण के कण्ठ को फोड़ उसमें ही अटक गए। पर रावण मरा नहीं, गिरा नहीं।

तब राम ने देवसारथि मातलि से कहा-“यैस्तु बाणै: मया मारीचो निहत:, खरश्च सदूषणो निहत: त इमे मम सायका:। सर्वेऽपि मन्तेजस: प्रात्ययिका:।”

मातलि ने अश्वों को संभालते हुए कहा-“राघव, अजानन्निव किमनुवर्तसे, यन्महद् बाणं ब्रह्मदत्तममोघं भगवानृषिर् अगस्त्य: प्रादात् तत्तस्मै प्रहर!”

राम ने वह अमोघ कालबाण हाथ में ले, उसे अभिमन्त्रित कर फुर्ती से कान तक धनुष को खींचकर छोड़ दिया। वह ज्वलन्त अमोघ ब्रह्मशर रावण के हृदयदेश को विदीर्ण कर पार निकल गया। वज्र के समान दुर्षष उस ब्रह्मशर को वज्र-बाहु राम ने कृतान्त के समान वेग से फेंका था। वह अमोघ वज्र ब्रह्मशर रावण के मर्मस्थल को विदीर्ण कर उसके प्राण का संहार करता हुआ पृथ्वी में धंस गया। रावण का रुधिराक्त शरीर बिजली से मारे हुए शैल-शिखर की भांति भूमि में गिर गया।

महाप्राण, महावीर्य, अमिततेज, जगज्जयी, जगदीश्वर रावण को इस प्रकार भूपतित देख इन्द्र ने हर्षोन्मत्त हो हठात् शंखध्वनि की। एकबारगी ही शत-सहस्र शंख बज उठे। राक्षस अनाथों की भांति शस्त्र त्याग युद्धभूमि ही में बैठकर रुदन करने लगे। वानर-सैन्य बार-बार हर्षनाद से पृथ्वी को कम्पायमान करने लगी, सैंकड़ों दुन्दुभियां गड़गड़ा उठीं। देव, मनुज, गंधर्व, यक्ष, नर, वानरों ने राम पर पुष्पवृष्टि की। सबने राम का रथ घेर लिया। राम की आज्ञा से युद्ध तत्क्षण बन्द कर दिया गया। इन्द्र बारंबार ‘साधु-साधु’ कहने लगा। मरुद्गणों ने विजय के बाजे बजाए। तभी लक्ष्मण, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, अंगद आदि सुहृद्विशिष्टों ने राम की एकत्र विधिवत् अर्चना की।

विश्ववन्दित देवदैत्यजित बड़े भाई को निहत, निर्जित रण में सोते देख शोक-संतप्त विभीषण विलाप करने लगा-“हा हा, वीरविक्रान्त, प्रवीण, नयकोविद महार्शयोनोपेेत किं निहतो भुवि शेषे? यन्मया पूर्वमीरितं तत्काम-मोहपरीतस्य तव न रुचिमत्। आदित्यो भूमौ पतित:, चन्द्रमा तमसि मग्न:, प्रशान्तोऽग्नि:, निरुद्यमो व्यवसाय:!”

राम ने विभीषण को आकर सान्त्वना दी। उन्होंने कहा-“नैव विनष्टा: शोच्यन्ते, ये निपतन्ति रणाजिरे ते वृद्धिमाशंसमाना:।”

विभीषण ने शोकोद्गार छोड़ते हुए भी कहा-“एष महातपा वेदान्तपारगश्चाग्रशूर एतस्य प्रेतस्य यत्कृत्यं तत्ते प्रसादात् कर्तुमिच्छामि।”

राम ने बाष्पपूरित नेत्रों से विभीषण को देखा, फिर कहा-“मरणान्तानि वैराणि, एष यथा तव ममाऽपि तथा। क्रियतामस्य संस्कार:!”

और इसी क्षण रावण की अन्तः पुरवासिनी, मृगलोचनी, मृदलगात्रा, सुवामा शत-सहस्र अनिन्द्य सुन्दरियां, जो पृथ्वी भर के देव, दैत्य, दानव, यक्ष, ऋक्ष, गन्धर्व, नर, नागराजों की सुकुमारी कुमारियां, राजपुत्रियां रावण की अंकशायिनी स्वयंबरा थीं, वे सब राज-महिषी मन्दोदरी और चित्रांगदा को आगे कर शोक-विह्वला, बारंबार भूमि पर पछाड़ खातीं ‘हा आर्यपुत्र, हा नाथ’ का आर्तनाद करती हुई रणस्थली की रक्त-मज्जामिश्रित पंक को अपने सिरों पर उड़ातीं, मुक्तकेशिनी, मलिनाङ्गी वहां आ, जगज्जयी, परमेश्वर, सप्तद्वीपपति, राक्षसराज रावण को भूमि पर रक्तप्लुत निष्प्राण पड़ा देख छिन्न लता की भांति उसके अंग पर गिर गईं।

बहुतोंने तो उसे उठाकर अंक में रख लिया। बहुत रोती हुई उसके चरणों पर सिर धुनने लगीं। बहुत उसके कण्ठ में लिपट गईं। किसी ने उसकी क्षतविक्षत भुजा को हृदय से लगाया, बहुत-सी उसे मृतक देखकर मूर्च्छित ही हो गईं। कितनी ही उसका मुख देख-देखकर रोते-रोते बेहोश हो गईं। मन्दोदरी ने वििलाप करते हुए कहा-“त्रैलोक्यमाक्रम्य श्रिया वीर्यण चान्वितमविषह्यं त्वां कथं वनगोचरो मानुषो जघान?”

चित्रांगदा ने कहा-“अथवा रामरूपेण कृतान्त: स्वयमागत:!”

“हा, मे संत्राप्ता पश्चिमा दशा वैधव्यदायिनी। या मया मन्दया न कदाचिदपि सम्बुद्धा। अरे, पिता मे दानवराज, भर्ता मे जगज्जयी जगदीश्वर:, पुत्रो मे शकविजेता, इत्यहं गर्विता। यदा में तनय इन्द्रजिधुधि लक्ष्मणेन शस्त:, तदा तु अभिहता तीव्र, अद्य तु निपातिताऽस्मि। नय मामपि, न वर्तिष्ये त्वया विना। अरे कस्मात्त्वं मां विहाय कृतां गत:। मैथिलीमाहतां दृष्ट्वा स देवरो मे यदब्रवीत्सत्यवाक्-अयं राक्षसमुख्यानां विनाश: समुस्थित:। तद्वचनं न श्रुतं त्वया, नविभीषणेनाभिहितं च कृतं त्वया। मारीचकुम्भकर्णाभ्यां वाक्यं, मम पितुस्तथा न कृतं वीर्यमत्तेन त्वया, तस्येदं फलम्। धिगस्तु यदिदं मम हृदयं त्वयि पञ्चत्वमापन्ने न सहस्रधा भिद्यते।”

मन्दोदरी इस प्रकार विलाप करती हुई मूर्च्छित हो छिन्नलता-सी रावण के वक्ष पर गिर गई। उस समय ऐसा प्रतीत हुआ कि सन्ध्या के लाल जलद में बिजली कौंध गई।

राम ने आदेश दिया-“संस्कार: क्रियताम्, स्त्रीगण: परिसान्त्व्यताम् !” और राम ने धनुष रख दिया।