सन्धि-भिक्षा
“सारण, वैरी रात-भर तो शोकातुर रहे। उनके करुण क्रन्दन से लंका की प्राचीर कांप गई, परन्तु अब यह कैसा आनन्दोल्लास आकाश को विदीर्ण कर रहा है? क्या मूढ़ सौमित्रि फिर जी उठा?” रावण ने विषण्ण-वदन हो मन्त्री सारण से हताश भाव से कहा।
सारण ने बद्धांजलि होकर कहा-“जगदीश्वर, इस माया-संसार में अदृष्ट की माया कौन समझ सकता है?”
“ठीक है, अदृष्ट प्रबल है। अरे, उस मायावी राम ने अविराम सागर को अपने कौशल से बांध डाला। जिसकी माया से जल में शिला तैरती है, जो समर में मर-मरकर बारंबार जी उठता है, उसके लिए असाध्य क्या है? पर इस बार कैसे वह पुत्रघाती जी उठा!”
सारण ने खिन्न होकर सिर नीचा करके कहा-“महिदेव, महोदय शैलकूट के गन्धमादन की विशल्या-संजीवनी औषध के प्रभाव से भिषक् सुषेण ने लक्ष्मण सहित सब वानर यूथपतियों को प्राणदान दिया है। अब उसी उल्लास में राम-कटक आनन्द नाद कर रहा है।”
“परन्तु यह तो अत्यन्त चमत्कारिक वार्ता है। सुदूर पर्वतराज के अगम शिखर से इतने अल्पकाल में कौन वीर महौषध लाया?”
“मारुति को छोड़ और कौन यह दुस्साहस कार्य कर सकता था? महाराज, जैसे हिमान्त में भुजंग तेज से पूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार दिब्यौषध के प्रभाव से सौमित्रि सहित सब वानर-कटक ओज से ओत-प्रोत हो रहा है।”
रावण ने विषाद से गहरी सांस छोड़ी। फिर कुछ देर चुप रहकर उसने कहा-“तूने ठीक कहा सारण, अदृष्ट ही प्रबल है। मैंने सम्मुख समर में देव-मनुष्य सभी को परास्त कर कल जिस-जिस रिपु का वध किया, वह फिर जी उठा! मृत्यु ने अपना धर्म भुला दिया। अब पराक्रम किस काम का? मैं समझ गया, राक्षस-कुल का सौभाग्य-सूर्य अस्त हो गया। अरे, शूलीसम भाई कुम्भकर्ण और अजेय इन्द्रजित भी जब काल-कवलित हो गए, तब अब मेरा प्राणधारण वृथा है।” इतना कह रावण शोक-सागर में डूबकर बैठा रह गया। सारण के मुंह से भी बात नहीं निकली। रावण ने फिर डूबते स्वर में कहा-“जा सारण, तू वैरी राम से जाकर कह कि जगदीश्वर रावण वैरी राम से यह भिक्षा मांगता है कि वह सात दिन तक वैर-भाव त्यागकर सैन्य-सहित विश्राम करे। राजा अपने पुत्र की अन्त्येष्टि क्रिया यथाविधि करना चाहता है। तू जाकर उससे कहना-‘हे वीर, तेरे बाहुबल से वीरयोनि लंका अब वीरशून्या हो गई है। तू वीर कुल में धन्य है, अदृष्ट तेरे अनुकूल है और रक्षकुल विपत्ति में है। सो तू वीर धर्म का पालन कर।’ जा सारण, अब तू विलम्ब न कर।”
बालिसुत अंगद ने आकर राम की सेवा में विनय की-
“देव! जगदीश्वर, जगज्जयी, महिदेव पौलस्त्य रावण का मन्त्रि-प्रवर सारण समस्त मन्त्रियों एवं प्रमुख राज-सभासदों के साथ शिविर द्वार पर उपस्थित होकर चरण-दर्शन की प्रार्थना करता है। जैसी आज्ञा हो, यह दास जाकर उसे विज्ञापित करे।”
राम ने ससम्भ्रम कहा-“युवराज, मन्त्रिप्रवर को आदर-सहित यहां ले आ।”
सारण ने सम्मुख आकर बद्धांजलि निवेदन किया-“राजपदयुगल की मैं तथा ये राज सभासद् और सचिव वन्दना करते हैं।”
राम ने आसन देकर कहा-“राक्षस-मन्त्रिवर, यह दरिद्र राम तुम्हारे स्वामी की क्या सेवा कर सकता है?”
सारण ने कहा-“देव, राक्षसकुलपति मेरे स्वामी ने आपसे यह भिक्षा मांगी है कि आज से सात दिन तक आप वैर-भाव त्यागकर सैन्य-सहित विश्राम कीजिए। राजा अपने पुत्र की सक्रिया यथाविधि करना चाहता है। वीर सदैव ही शत्रु का सत्कार किया करते हैं। महाराज, आपके बाहुबल से वीरयोनि स्वर्ण-लंका अब वीर-शून्या हो गई है। अदृष्ट आपके अनुकूल है और राक्षसकुल विपत्तिग्रस्त है। इसलिए आप शत्रु का मनोरथ पूरा कीजिए।”
“मन्त्रिवर, तुम्हारा स्वामी मेरा परम शत्रु है। फिर भी मैं उसके दुःख से दुःखी हूं। विपद में शत्रु-मित्र मेरे लिए समान हैं। तुम लंका को लौट जाओ। मैं सैन्य सहित सात दिन तक अस्त्र नहीं ग्रहण करूंगा।” राम ने शालीनता से उत्तर दिया।
मन्त्री ने कहा-“रघुमणि, आप धन्य हैं! हे महामते, आपको ऐसा ही उचित है। कुक्षण में जगज्जयी का आपसे वैर हुआ, अदृष्ट प्रबल है।”
इतना कह, राम की प्रदक्षिणा कर, राक्षस-मन्त्री सारण ने सब मन्त्रियों और सभासदों के साथ राम-लक्ष्मण की वन्दना की और चला गया। सात वानर गुल्मपतियों ने कटक-द्वार तक जाकर राक्षस-मन्त्री को ससम्मान विदा किया।
राम ने वानर गुल्मनायकों से कहा-“वीरगण, अब आप भी वीर-वेश त्याग सात दिन विश्राम कीजिए। परन्तु मित्रवर विभीषण और सुग्रीव को इस सुयोग में समस्त सेना का निरीक्षण करके उसे भली-भांति व्यूहबद्ध कर लेना चाहिए। सात दिन बाद पुत्र-शोक-दग्ध प्राणों पर खेलकर काल की भांति हम पर टूटेगा। युवराज अंगद, तू एक सहस्त्र योद्धाओं को लेकर मित्र-भाव से राक्षसराज के निकट समुद्र-तट पर जा। सावधान रह वीर, मन में शत्रु-मित्र का विचार न करना। सौमित्रि को इस भय से नहीं भेजता हूं कि कदाचित रावण को उन्हें देखते ही रोष आ जाए। इससे तू ही जा। तेरे प्रतापी पिता ने एक बार रावण को पराजित किया था, अब तू इस शिष्टाचार से उसे सन्तुष्ट कर।”
अंगद ने स्वीकार किया। सुग्रीव ने कहा-“राघव, राक्षस रावण अब हत तेज हो गया है, उसका अन्त निकट है, तथापि हम सब कटक को पूर्ण व्यवस्थित कर लेंगे।”