विशल्यसंजीवनी
उस दिन काल-समर में राम के अतिरिक्त किसी भांति सुग्रीव, कपिध्वज हनुमन्त और रक्षपति विभीषण, देवकुमार कार्तिकेय और वज्रपाणि इन्द्र; ये ही पांच अक्षत बचे थे। विभीषण ने भगीरथ प्रयत्न से घूम-घूमकर सान्त्वना देकर वानरों को एकत्रित किया। वे सब राम के चारों ओर बैठकर विलाप करने लगे।
अंगद, नील, द्विविद, शरभ, जाम्बवान्, सुषेण, मैन्द, नील, ज्योतिर्मुख आदि वीर शिरोमणि शरबद्ध, क्षत-विक्षत भूमि पर अचेत पड़े थे। विभीषण ने पराक्रमी वीर शिरोमणि सुषेण को सैकड़ों बाणों से विद्ध पड़े सर्प की भांति भारी-भारी सांस लेते देखा। उन्हें चेताकर कहा-“बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आपका जीवन बच गया।”
“हनुमान तो जीवित हैं?” “हनुमान् अक्षत हैं।” “बड़ी बात है। यदि हनुमान् जीवित हैं, तो सारी ही वानर-सैन्य बच गई समझिए।”
“किन्तु सौमित्रि...” विभीषण के नेत्रों में जल भर आया, कण्ठ अवरुद्ध हो गया। “क्या, नहीं रहे?” “अभी जीवित हैं, परन्तु मुमूर्षु-”
“तो मुझे आप सौमित्रि के निकट ले चलिए।” सुषेण बड़े कष्ट से उठकर विभीषण के सहारे चलकर वहां आए, जहां रणांगण में सौमित्रि बेसुध पड़े थे। श्री राम लक्ष्मण के निश्चल, रक्तप्लुत शरीर को बाहुओं में समेटे बैठे थे। उन्होंने अश्रूपूरित नेत्रों से विभीषण को देखकर विलाप करते हुए कहा-“अयं मे भ्राता समरश्लाघी शुभलक्षणो लक्ष्मणः। इमं प्राणैः प्रियतरं वीरं शोणितार्द्रं पश्यतः। पर्याकुलो मे मनः। यदि भ्राता मे पंचत्वमापन्नः, किं मे प्राणैः सुखेन वा! हा, लज्जतीव मे वीर्य, भ्रश्यतीव धनुः। व्यवसीदन्ति सायकाः। देशे-देशे कलत्राणि, देशे च बान्धवाः। तं देश नैव पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरः। हा, किन्तु राज्येन लक्ष्मण बिना? कथ वक्ष्याम्यहं त्वां सुमित्रां? हा! हा!”
सुषेण ने ध्यान से सौमित्रि को देखकर कहा- “न-न लक्ष्मीवर्धनो लक्ष्मणः पंचत्वमापन्नः। नास्य वक्त्रं विकृतम्, न च श्यामत्वमागतम्। नरशार्दूल! इमां वैक्लव्यकारिणीं बुद्धिं त्यज!”
इतना कह उन्होंने हनुमान् की ओर देखा और कहा- “हे वीर, यह तेरे पराक्रम का काल उपस्थित है। तू पराक्रम कर, महोदय पर्वत पर जा। उसके गन्धमादन नामक दक्षिण देवशृंग पर विशल्य संजीवनी महौषध है। वह रात को प्रज्वलित रहती है। औषध की प्रदीप्ति के कारण वहां कभी रात्रि नहीं होती। वहीं भगवान् अत्रि का पुनीत धाम है। उसे तू ला और सौमित्रि सहित वानर यूथपतियों को प्राणदान दे!”
हनुमान् ने नेत्रों में जल भरकर राम के चरण छुए, परिक्रमा की।
पवनकुमार हनुमान् तुरन्त ही वेग से संजीवनी बूटी लाने को चल दिए और सुग्रीव सहित विभीषण लक्ष्मण तथा अन्य क्षत वानरों की यत्न से रक्षा करने लगे। पीड़ित और व्यथित वानर विभीषण के धैर्य-वचन और संजीवनी बूटी का माहात्म्य सुन आशा और आशंका से अभिभूत हो हनुमन्त का आसरा ताकने लगे।
विभीषण चिन्ता करके क्षितिज की ओर निहारने लगे। इसी समय हनुमान् संजीवनी बूटी लेकर आ गए। राक्षसेन्द्र ने उन्हें कण्ठ से लगा लिया। सुषेण की यत्न-विधि से विशल्य संजीवनी द्वारा लक्ष्मण सहित सभी वानर विशल्य होकर नीरुज हो गए। एक बार फिर आशा और आनन्द की लहर वानर-सैन्य में व्याप गई। राम ने हनुमान् को हृदय से लगाकर अश्रुपात किया। वानरेन्द्रों को ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे सब सोकर जगे हों।
अब सब वानर चैतन्य हो क्रोध और हर्ष में भरकर ज़ोर-ज़ोर से हर्षनाद करने और राक्षसों से बदला लेने की विकट चेष्टाएं करने लगे। सुग्रीव और विभीषण ने भगीरथ प्रयत्न से सब कटक को व्यवस्थित किया। सब राम को घेर भावी युद्ध की योजनाओं पर विचार करने बैठे। वानर-सैन्य में युद्ध के धौंसे बज उठे। उन्होंने फिर लंका के चारों ओर अपने सुदृढ़ मोर्चे बांध लिए।