अस्त्रपाणि रावण
ज्वालामुखी के लावे के समान ज्वलन्त प्रवाह की भांति राक्षस-सैन्य लंका सिंहद्वार से बाहर निकली-हज़ारों दुन्दुभियां गड़गड़ाती, शंख-शृंगीनाद करती, जयध्वनि से मेदिनी को कंपाती, हय-दल के पदाघात से उड़ी धूल से सूर्यमण्डल को अन्धकारावृत्त करती हुई-प्रलयज्वाला-सी मृत्यु की कराल-जिह्वा-सी।
राम ने असंयत होकर विभीषण से कहा-“हे लंकेश्वर, यह प्रलय-मेघ के समान प्रचण्ड राक्षस सैन्य आ रही है। पुत्रशोक-दग्ध रावण इस प्रचण्ड सेना में कौन-सा है, इस वीरवाहिनी के नायक कौन-कौन हैं, सो अनुग्रह करके मुझे बताओ।”
विभीषण ने कहा-“राघव, कटक के आगे-आगे बाल रवि के समान जो तेजस्वी पुरुष स्वर्णखचित पर्वत के समान दिग्गज हाथी पर आ रहा है, वह धीर-वीर मातुलि अकम्पन है, जो लंका का प्रधान मन्त्री है। इसके पीछे सिंह की ध्वजावाले रथ पर आरूढ़ नील मेघ के समान अतिरथी महोदर है। स्वर्ण के साजों से सज्जित चपल अश्व पर जो योद्धा भारी शूल लेकर चल रहा है, वह वज्र है। इसके वाम पार्श्व पर काले अश्व पर सवार त्रिशूलधारी त्रिशिरा है। मेघ के समान स्वरूप वाला, विशाल हाथी पर धनुष-बाण लिए कुम्भ चल रहा है और उसके पीछे स्वर्णरथ पर जो सहस्रों घंटियां बजाता आ रहा है, यह अपराजेय निकुम्भ महारथ है। उसके दायें भाग में अश्व पर सवार अग्नि के समान तेजस्वी पुरुष, जो धनुष-बाण लिए है, नरान्तक है। धनुर्धरों में अग्रगण्य और भयंकर भूतों से परावृत, रत्नजटित रतारूढ़, मन्त्रियों और सेनानायकों से रक्षित, पर्वत के समान अचल, बन्दीजन-वन्दित, जिसके मुकुटमणि धूप में रविरश्मि की भांति देदीप्यमान हैं, और जिसके मस्तक पर चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र लगा है, वह रक्षपति महिदेव जगज्जयी रावण है।”
राम ने कहा-“राक्षसराज रावण का तेज तो अपरसीम है। इसकी अंग-सुषमा देवताओं से भी अधिक शोभायमान है, और इसके पार्षद भी बड़े तेजस्वी प्रतीत होते हैं। कौन कहता है कि लंका वीरों से शून्य हो गई है!”
“राघव, जिस प्रकार महातेज रावण इन भयानक आकृति वाले भूतों से घिरा है, उसी प्रकार इसकी अन्तरात्मा भी कलुषित है। यही कारण उसके प्रबल पराक्रम के भंग होने का है।”
राम ने वानर-कटक के व्यूह पर एक विहंगम दृष्टि डाली। दोनों सैन्य परस्पर निकट होने लगीं। दोनों सैन्य वीर-दर्प से गरज रही थीं। राम अविचल भाव से व्यूह में खड़े थे। उनके पीछे लक्ष्मण, हनुमान्, जाम्बवन्त और विभीषण थे। इसी क्षण सुग्रीव दुर्धर्ष वेग से उछलकर रावण के व्यूह में घुस गया और अपनी वज्रगदा घुमाते हुए रावण के निकट पहुंच, फुर्ती से धनुष की नोक से रावण के मस्तक पर से मुकुट गिरा दिया। राक्षस सैन्य ने इस हस्तलाघव को लक्ष्य नहीं किया। सुग्रीव ने ललकारकर कहा-“अरे राक्षसों के स्वामी, यह वानरों का राजा सुग्रीव तेरे मस्तक पर चरण रखकर यहां उपस्थित है। कह, क्या तू श्री राम की चरण-शरण आता है?”
रावण ने क्रोधावेशित होकर कहा-“अरे सुग्रीव, ठहर, तुझे अभी अग्रीव करता हूं।” इतना कह उसने झपटकर सुग्रीव को पकड़कर भुजाओं में मसल डाला। परन्तु सुग्रीव ने उसके चंगुल से निकलकर रावण को रथ से खींच लिया। फिर कूदकर उसके वक्ष पर लात मारी। रावण ने सुग्रीव का पैर पकड़ उसे सिर से ऊपर घुमाकर दूर फेंक दिया। इतने में सहस्रों राक्षस शस्त्र ले-ले सुग्रीव पर टूट पड़े। सुग्रीव पर यह महासंकट आया देख वानर-सैन्य में आतंक फैल गया। राम का संकेत पा तुरन्त ही जाम्बवान्, हनुमान्, अंगद, नल, नील, गयंद, गुल्मपति राक्षसों को चीरते हुए वानरेन्द्र के निकट जा पहुंचे और उसे घेर अपने कटक में ले आए।राम ने सुग्रीव को छाती से लगाकर कहा-“वीरशिरोमणि, तूने यह कैसा दुस्साहस किया, मुझसे बिना ही परामर्श किए? राजा को ऐसा साहस नहीं करना चाहिए। भविष्य में ऐसा न करना। तेरे विपत्ति में पड़ जाने से तो मैं सिद्धि से विमुख हो जाऊंगा। यद्यपि तेरा बल अप्रमेय है, फिर भी तुझे प्राण-संकट हो जाता तो तेरे अभाव में स्वयं मैं भी जीवित न रहता।”
सुग्रीव ने लज्जित होकर कहा-“राघव, दुरात्मा रावण को सम्मुख देख, मैं संयत न रह सका।”
इसी क्षण दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गईं। राक्षस-सैन्य ने पर्वत के समान अचल वानर-सैन्य को देखा। वानरों ने कालमेघ के समान राक्षस-सैन्य को देखा। दोनों सेनाओं के तुमुल नाद से पृथ्वी कांपने लगी। काल सर्प के समान बाण छूटने लगे। उन्होंने आकाश-मण्डल को छा लिया। दोनों ओर से भट खड्ग-शैल-शक्ति-शूल ले-लेकर एक-दूसरे पर पिल पड़े। एक मुहूर्त के भीतर ही रणभूमि रक्त से भर गई। मित्र-शत्रु का भेद भी न रहा। वीरों से वीर परस्पर गुंथकर लड़ने लगे। अंगद मृत्यु के समान वेग से गिरिश्रृंग के समान विशाल गदा लेकर नरान्तक पर पिल पड़ा। दोनों में घनघोर गदा-युद्ध हुआ। अन्त में गदा का करारा घाव खाकर रक्त-वमन करता हुआ नरान्तक भूमि पर गिर गया।
नरान्तक को मरते देख महोदर ने धनुष-टंकार करते हुए अपना रथ आगे बढ़ाया। त्रिशिरा भी शूल हाथ में ले उसके पार्श्व में चला। उसके साथ ही वज्र भी। इन तीनों महारथियों को आता देख हनुमान् हुंकार करते आगे आए। महोदर ने मारुति को बाणों से ढांप लिया, परन्तु मारुति ने हठपूर्वक आगे बढ़ गदा से उसके घोड़ों और सारथि को मार उसका सिर चूर्ण कर दिया। महोदर को रथ से गिरते देख क्रोध से फुफकारता हुआ त्रिशिरा महाकाल के समान शूल ले हनुमान् पर टूट पड़ा। मुहूर्त भर हनुमान् और त्रिशिरा में लोमहर्षक युद्ध हुआ। अन्त में मारुति ने उसे अश्व से गिराकर उसका सिर चूर्ण कर दिया। तब कुम्भकर्ण के दोनों पुत्र कुम्भ और निकुम्भ राक्षसों के गुल्मों को साथ लेकर प्रचण्ड युद्ध करने लगे। वानरेन्द्रों ने उग्र निनाद करते हुए इन राक्षस वीरों से तुमुल संग्राम किया। कालभैरव की भांति वे परस्पर एक-दूसरे को मार-मारकर भूमि पर ढेर करने लगे। वे ले-ले, दे-दे की हुंकृति कर निर्दय वार करने लगे। कुम्भ ने अमित विक्रम प्रकट किया। उसने अंगद को बाणों से बींधकर व्याकुल कर दिया। तब सुग्रीव ने कनक-भूषण तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करके उसके उदर को चीर डाला। वह घोर नाद करता हुआ भूमि पर गिरकर छटपटाने लगा। निकुम्भ ने भाई को इस प्रकार गिरता देखा तो वह क्रोध से जलता हुआ भयंकर विशाल परिघ लेकर सुग्रीव पर टूट पड़ा। उस भीम परिघ की मार से सुग्रीव झूमकर धरती सूंघने लगा। तब बली मारुति भयंकर सिंहनाद कर अपनी गदा घुमाते निकुम्भ पर झपटे। दोनों ने एक ही काल में एक-दूसरे की छाती पर गदा का प्रहार किया। निकुम्भ का वर्म फट गया और उसकी छाती से खून की धार बह चली। तब मारुति ने उसे पृथ्वी पर गिराकर पैरों से रौंद डाला। इस प्रकार निकुम्भ को मरते देख अकम्पन ने रथ आगे बढ़ाया। ऋक्षराज जाम्बवन्त ने अकम्पन से विकट समर किया। दोनों महारथियों के द्वन्द्व को दोनों सेनाओं के भट चकित होकर देखने लगे। सहसा ऋक्षराज ने अकम्पन का सिर शिरस्त्राण सहित काट डाला। यह देख वानर गर्जना करने लगे। राम-कटक में दुन्दुभि बज उठी। इस हर्षनाद से अधीर रावण उदग्र हो समरांगण में आगे बढ़ा।
अपने महारथियों का इस प्रकार विनाश होते देख रावण ने अमर्ष में भरकर सारथि से कहा-“अरे, आज पुत्र इन्द्रजित् के हत हो जाने पर इन्द्र लंका में आया है! तनिक देख तो, वह किधर है? हमारा रथ वहां ले चला।”
सारथि ने वायुवेगी रथ आगे बढ़ाया। रावण मायास्त्रों को चलाता, इन्द्र के व्यूह को छिन्न-भिन्न करता हुआ देवेन्द्र की ओर बढ़ता चला गया। हठात् कुमार कार्तिकेय ने अग्निरथ में बैठकर रावण का मार्ग रोक लिया। कुमार को सम्मुख देख रावण रथ रोक, हाथ जोड़कर बोला-“देवकुमार, यह दास तो भगवान् रुद्र का किंकर है। देवाधिदेव ने मुझे रौद्र तेज से सम्पन्न किया है। आपको मैं कैसे वैरी-दल के साथ देख रहा हूं? नराधम राम पर आपका इतना अनुग्रह क्यों है? छली सौमित्रि ने अधर्मपूर्वक मेरे पुत्र का निरस्त्र वध कर अपने ही कुल को कलंकित किया है। आज मैं उसी कपटी योद्धा का वध करूंगा। कृपा कर राह छोड़ दीजिए।”
कुमार ने हंसकर कहा-“रक्षपति, आज मैं देवकार्यरत हूं। तू मुझे युद्ध करके आक्रान्त कर।”
तब रावण ने हुंकार कर, कुमार पर आग्नेयास्त्र छोड़ा। कुमार कार्तिक शरजाल में छिप गए।
इन्द्र ने पुकारकर कहा-“हे शक्तिधर, रावण रौद्र तेज से परिपूर्ण है। देखो, मैं अभी उसका दर्प दलन करता हूं।” इतना कह देवेन्द्र ने सहस्रों गन्धर्वों को रावण पर आग्नेयास्त्र वर्षा करने की आज्ञा दी। रावण ने दुर्धर्ष वेग से दिव्यास्त्र का निवारण कर ऐरावत के मस्तक पर तोमर का प्रहार करते हुए कहा-“अरे निर्लज्ज, तेरी ही कुटिलता से मेरे पुत्र का वध हुआ। अब तूने पुत्र के वध होने पर लंका में आने का साहस किया। पर आज तू मेरे हाथ से लक्ष्मण की रक्षा नहीं कर सकता।”
इतना कहकर क्रोध से अधीर हो अपना विकराल परशु ले रावण रथ से कूद पड़ा और उसने ऐरावत को परशु की मार से व्यथित कर दिया। ऐरावत भूमि पर गिर गया। तब इन्द्र ने हाथी से कूदकर रावण पर वज्र का प्रहार किया। इसी समय मातलि इन्द्र का रथ ले आया। रावण भी रथ पर आरूढ़ हुआ। दोनों भयानक महास्त्रों को धनुष पर चढ़ाकर छोड़ने लगे।
इसी क्षण रावण की दृष्टि दूर क्षेत्र में युद्धरत सौमित्रि लक्ष्मण पर पड़ी। वे कभी रथ पर चढ़कर और कभी रथ से उतरकर युद्ध कर रहे थे। लक्ष्मण को देखते ही रावण ने गर्जना की। उसने कहा-“अरे पुरन्दर, देवकुल कलंक, दास, आज मैं तुझसे अब और युद्ध नहीं करूंगा। आज उस कपटी पामर सौमित्रि को मारूंगा। तू इस पृथ्वी पर एक दिन और निर्विघ्न जीवित रह।”
वह भैरव-नाद करता हुआ आगे बढ़ा। यह देख विडालाक्ष का वक्ष चीर मारुति हनुमान् रावण के सम्मुख आ गदा घुमाने लगे।
रावण ने अनवरत बाण मारुति पर छोड़कर कहा-“हट रे बर्बर, मार्ग छोड़कर दूर हट!”
“अरे पामर, परदारारत, लोभी, चोर, तनिक ठहर तो!” हनुमान् ने गदा घुमाकर रथ पर प्रहार किया। रथचक्र भंग हो गया। इसी समय सुग्रीव भी उदग्र का वध कर वहां आ पहुंचे।
रावण ने घृणा से हंसकर कहा-“अरे, तू अभी अपनी भ्रातृवधू तारा को फिर से विधवा करने इसी क्षण में मरने को यहां आ पहुंचा! ठहर, अथवा तुझे छोड़ता हूं, हट, मार्ग छोड़ दे। अभी मैं उस पतित सौमित्रि को मारूंगा।”
“अरे अधर्मी, मैं अभी तुझे मारकर मित्र-वधू का उद्धार करता हूं।” सुग्रीव ने वेग से शूल फेंका, साथ ही हनुमान् ने गदा का वज्र-प्रहार किया। रावण का रथ भंग हो गया, परन्तु सारथि तुरन्त दूसरा रथ ले आया। रथ पर चढ़कर रावण ने अनेकविध मन्त्रसिद्ध बाणों से सुग्रीव और हनुमान् को वेध डाला। सुग्रीव और हनुमान् मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर गए। रावण गर्जन-तर्जन करता हुआ लक्ष्मण के सम्मुख चला। लक्ष्मण को दूर से ही देखकर रावण ने कहा-“अरे अधम सौमित्रि, इतनी देर में तू मुझे मिला! कह कहां है तेरा रक्षक राम, इन्द्र और कार्तिकेय, भ्रातृहन्ता सुग्रीव, कुल-कलंक विभीषण? बुला उन सबको अपनी रक्षा करने के लिए। अपनी जननी सुमित्रा को स्मरण कर ले। आज मेरे रसोइए तेरे ही मांस से मेरा भोजन बनायेंगे। आज मैं तेरा हृदय बहिन सूर्पनखा को खाने को दूंगा।”
लक्ष्मण ने धनुष टंकारते हुए कहा-“राक्षसराज, तू पुत्रशोक से अधीर हो रहा है। आ, तुझे अभी तेरे पुत्र के पास पहुंचाकर शोकरहित करता हूं।”
इतना कह लक्ष्मण ने तीक्ष्ण शरों से रावण का शिरस्त्राण उड़ा दिया। रावण ने भी रणमत्त हो बाण छोड़े। दोनों दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने लगे। दोनों एक-दूसरे के शस्त्रों को काटते रहे। दोनों युद्ध-विशारद, दोनों महाप्राण, दोनों महास्त्रों के प्रयोक्ता, दोनों महारथ क्रुद्ध काल की भांति समरांगण पर छा गए।
अब लक्ष्मण ने सात बाण धनुष पर चढ़ाकर रावण की ध्वजा काट डाली। इसी समय रावण की दृष्टि विभीषण पर पड़ी। उसने तत्काल बिजली की भांति दीप्तिमती महाशक्ति उस पर फेंकी। परन्तु लक्ष्मण ने उसे बीच में ही तीन बाणों से काट डाला। इस प्रकार लक्ष्मण के हाथों विभीषण की रक्षा होते देख रावण क्रोध से सर्प की भांति फुफकारने लगा। उसने कहा-“अरे सौमित्रि, तेरे हस्तलाघव की प्रशंसा करता हूं। तुझमें शक्तिधर कार्तिकेय से भी अधिक सामर्थ्य है। पर आज तू जीवित नहीं बच सकता। ले रे पुत्र-घाती, मर!”
इतना कह, उसने रौद्र तेज से आपूरित जाज्वल्यमान अष्टघंट भैरव-रव ज्वलन्त रौद्र शक्ति को क्रोध से कांपते हुए लक्ष्मण पर फेंका। वह शक्ति बिजली की भांति लक्ष्मण की मूर्द्धा में जा लगी। उसके लगते ही लक्ष्मण कटे हुए वृक्ष की भांति झूमते हुए रथ से भूमि पर जा गिरे। वानर-सैन्य हाहाकार करने लगी। यूथ के यूथ वानर योद्धाओं ने लक्ष्मण के शरीर को घेर लिया। राम ने दूर से लक्ष्मण को गिरते देखा तो धनुष फेंक, ‘हा सौमित्रि’ कहते हुए दौड़ पड़े। रावण बादलों की भांति गर्जना करता हुआ, विजय दुन्दुभि से देवों और दिशाओं को कम्पायमान करता हुआ लंका को लौट गया।