सुसंवाद

सूर्य के समान देदीप्यमान ऐन्द्ररथा अपनी सहस्र स्वर्ण-घण्टिकाओं की रनकार से दिशाओं को ध्वनित करता हुआ राम-कटक में प्रविष्ट हुआ। रथ में अखण्ड ध्वज देख राम-कटक में हर्ष की लहर दौड़ गई। मातलि ने अश्वों को ललकारते हुए वीर-गर्जना करके कहा-“अरे, वीरध्वजो, जाओ, रामभद्र से निवेदन कर दो, दुरन्त दुर्जय रावणि इन्द्रजित मर गया!”

“दुरन्त रावणि मर गया!” “दुरन्त रावणि मर गया!” “दुरन्त रावणि मर गया!”

शत-सहस्र, लक्ष-लक्ष कण्ठों से ये स्वर जय-निनाद के साथ हवा में तैरते हुए वहां पहुंच गए, जहां राघवेन्द्र राम अत्यन्त विकल भाव से शिलाखण्ड पर बैठे-‘हा सौमित्रि, हा सौमित्रि’ कह रहे थे। जय-निनाद के साथ विजय-दुन्दुभि भी बज उठी। हर्षातिरेक से उदग्र हो राम ने कहा-“क्या कहा, क्या कहा! सौमित्रि आ गए? कहां हैं सौमित्रि, वे सकुशल तो हैं? अरे, वे अक्षत तो हैं?”

शत-सहस्र वानर भटों ने कहा-“रावणि दुरन्त मर गया!” “देवताओं का त्रास मर गया!!” “मृत्युञ्जय मेघनाद मर गया!”

राम ने कांपते हुए दोनों हाथ उठाकर अश्रुओं से धुंधली आंखों से सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवन्त और अंगद को देखकर कहा-“क्या यह स्वप्न है या सत्य है? दुरन्त दुर्जय इन्द्रजित्…?”

“मर गया! मर गया!!” शत-सहस्र कण्ठों ने कहा। राम ने देखा-स्वर्ण के समान तेजवान् इन्द्र का दिव्य रथ अखण्ड ध्वजा फहराता, सहस्र घंटियों को रणकारता आकर रुक गया। विभीषण और सौमित्रि रक्त में लथपथ रथ से उतरकर राघवेन्द्र की ओर चले। राम ने दोनों हाथ फैलाकर दौड़ते हुए कहा-“यह मैं क्या सुन रहा हूं? वीर, क्या अघट घटना हो गई? तेरे शरीर से झरझर रक्त झर रहा है। रक्षपति मित्र विभीषण का शूल भी टूटा हुआ है। अवश्य ही तुमने कठिन युद्ध किया।”

लक्ष्मण ने राम की परिक्रमा कर राघव के चरणों पर मेघनाद का कटा हुआ सिर रख दिया। उन्होंने कहा-“हे रघुकुलमणि, इन चरणों के प्रताप से यह दास जयी हुआ। दुर्जय मेघनाद मारा गया। विषधर फणी को कुचल दिया गया। देव अब निर्भय हुए। रघुकुल की लाज रह गई।”

राम ने रोते हुए, लज्जावनत लक्ष्मण को छाती से लगाकर बारंबार उसका सिर सूंघते और गाढ़ालिंगन करते हुए कहा-“धन्य वीर धन्य, धन्य सौमित्रि धन्य, तेरी जननी सुमित्रा धन्य, तेरे कारण मैं तेरा ज्येष्ठ भ्राता भी धन्य हुआ। तेरा यश अमर रहेगा।”

राम ने फिर विभीषण को अंक-पाश में बांधकर कहा-“साधु रक्षेन्द्र, असुकरं कर्म कीर्तिवर्धनं कृतम्। तुष्टोऽस्मि रामेर्हि विनाशेन जितमित्युपधारयामि।”

सहसा लंका सिंहनाद से हिल उठी। राम ने आतंकित होकर कहा-“अरे, यह क्या हुआ? क्या प्रलय होने वाली है? यह प्रलयनाद कैसा है? यह क्षण-क्षण में बिना अभ्र के विद्युत् कैसी चमक रही है? लंका जैसे भूकम्प से बारंबार कांप रही है। घनी धूल के बादल उड़-उड़कर सूर्य को ढांप रहे हैं।”

विभीषण ने भय से पाण्डुमुख होकर कहा-“रघुमणि, राक्षसपति रावण पुत्रशोक से भस्म हो रहा है। वह युद्ध-साज सज रहा है। वीरों के पद-भार से पृथ्वी कांप रही है। यह राक्षस सैन्य गरज रही है। अब कैसे इस विकट संकट से बन्धु लक्ष्मण और कटक की रक्षा होगी? यह देखिए-राक्षस गुल्मपति प्रलयनाद की भांति शृंगीनाद कर रहे हैं। अग्नि-वर्णवाले स्वर्ण-ध्वज रथ निर्घोष करते हुए बाहर आ रहे हैं। चतुरंगिणी सेनाओं के व्यूह सज रहे हैं। लंका के वीर इस प्रकार शस्त्रपाणि होकर लंका से निकल रहे हैं, जैसे बांबी से काला सर्प निकलता है। उग्र उदग्र रथियों का सेनानायक है। वज्रपाणि इन्द्र के समान पराक्रमी वास्कल गजसेना का नायक है। महावीर अतिलोमा अश्वारोहियों का नायक है। भीमाकृति विडालाक्ष पादातिकों का अधिपति है। महादुर्मद दुर्मद पताकावाहक है। महाराज, यह उग्रचण्डा राक्षस-सेना लंका में युद्ध-सन्नद्ध हो रही है। अब हमें भी तत्परता से तैयार हो जाना चाहिए। आज प्रलय-युद्ध में जगज्जयी जगदीश्वर राक्षसेन्द्र रावण का आपको साम्मुख्य करना है।”

राम ने चिन्ताकुल होकर कहा-“तो मित्र, शीघ्र ही सब सेनानायकों को यहां बुला लाओ। अब इस दास की रक्षा देव ही करेंगे।” विभीषण ने ज़ोर से शृंगी-नाद किया। अंगद, नील, हनुमान, जाम्बवन्त, गयंद, गवाक्ष, सुग्रीव आदि सब वानर-सैन्य-सेनानी, गुल्मपति आ-आकर राम को घेरकर बैठ गए।

राम ने कहा-“वीरगण, आज रावण पुत्र-शोक विह्वल हो काल-समर करेगा। तुम सब त्रिभुवनजयी शूर हो। युद्ध-साज सज इस विपद में राम की रक्षा करो। मित्र, अब तो लंका में एक रावण ही रथी बचा है। तुम्हीं ने अपने बाहु-बल से समुद्र को बांधा है। तुम्हीं ने अमितविक्रम कुम्भकर्ण का वध किया। तुम्हारे ही प्रताप से अजेय मेघनाद मारा गया। हाय! रघु-वधू अब भी रावण के कारागार में बन्द है। वीरो, अब रावण को मार उसका उद्धार कर मेरे कुल और मान की रक्षा करो।”

राम की आंखों में आंसू भर आए। सुग्रीव ने राम की आंखों में आंसू देखकर कहा-“रघुमणि, मैं आप ही के प्रताप से राजसुख भोग रहा हूं। सो महाराज, आज या तो मैं रावण को मारूंगा या स्वयं मरूंगा। आप चिन्ता क्यों करते हैं?”

सहस्र-सहस्र उल्कापात की भांति वज्रध्वनि सुन सारी वानर-सैन्य स्तब्ध हो गई। राम ने व्यग्र भाव से पूछा-“अब यह कौन-सी नई विपत्ति आई? अरे वीरेन्द्र, शस्त्र ले-लेकर सन्नद्ध हो जाओ!”

इस पर मातलि ने हंसकर कहा-“दाशरथि, प्रसन्न हों। आपकी सहायता के लिए स्वयं वज्रपाणि देवेन्द्र ऐरावत पर आरूढ़ हो आए हैं। उनके साथ कुमार कार्तिक, सहदेव, सब रुद्र, मरुत्, आदित्य और गरुड़ हैं।”

राम ने ससम्भ्रम कहा-“हे राक्षसराज विभीषण, हे वानरेन्द्र सुग्रीव, चलो, आगे बढ़कर देवेन्द्र की अभ्यर्थना करें। अर्घ्य-पाद्य से उन्हें सत्कृत करें।”

राम, लक्ष्मण और सब वानर-यूथपति सेनापतियों ने सुग्रीव और विभीषण को संग लेकर देवेन्द्र और कुमार कार्तिकेय का अर्घ्य-पाद्य से सत्कार कर उनकी पूजा की। फिर राम-लक्ष्मण ने बद्धांजलि हो देवेन्द्र और कुमार की परिक्रमा कर कहा- “अपने पूर्व पुरुषों के सुकृत से इस दास को इस विपत्ति में देव-पदाश्रय प्राप्त हुआ है। इससे मेरा कुल प्रतिष्ठित हुआ। मैं धन्य हुआ!”

देवेन्द्र ने हंसकर कहा-“हे रघुमणि, तुम देवप्रिय हो, अब रथ पर रणसज्जा से सजकर बैठो। आज जगज्जयी रावण काल-समर करेगा। उसमें मैं मरुतों और देव-सैन्य सहित तुम्हारे पृष्ठ की और कुमार सब रुद्रों सहित तुम्हारे अग्र भाग की रक्षा करेंगे।”

वानर-सैन्य ने जय-निनाद से गगनमण्डल को कम्पायमान कर दिया। जुझारू बाजे बजने लगे। समस्त वानर-सैन्य व्यूहबद्ध खड़ी हो गई।