देवानुग्रह

रुद्र ने क्रुद्ध नि:श्वास छोड़कर कहा- “हेमवती प्रिये, तूने यह क्या दुष्कृत्य कर डाला? मेरे अनुगत किंकर रावण और प्रिय रावणि का अहित करने को दिव्यास्त्र दे दिए! अब रावण क्या समझेगा! महातेज बाण सुनेगा तो क्या समझेगा भला!”

“महादेव प्रसन्न हों, मुझे देवहित प्रिय है। देवेन्द्र ने शची-सहित कैलास में आकर मेरी स्तुति की। आपको भी तो देव प्रिय हैं। रावण और उसके पुत्र पर आपका अनुग्रह है, यह तो ठीक है, परन्तु क्या देव-कुल का पराभव आपको अभीष्ट है?”

“अरी शैलजा, तू इन देवों के पतित जीवन को देखती नहीं क्या? निरन्तर सोमपान कर मत्त हो अप्सराओं के नृत्य-गान, भोग-संभोग में व्यस्त रहते हैं। आत्मसुख ही उनका चरम ध्येय है। इनसे भला कभी नृलोक की भलाई हो सकती है?”

“रावण ही विश्व की कौन-सी भलाई कर रहा है? उनकी रक्ष-संस्कृति से आप सहमत हों, मैं नहीं हूं। क्यों भला वह देव-दैत्य, मानव-दानव सबकी संस्कृतियों को आक्रान्त करता है? रक्त की शुद्धि मुझे मान्य है। मैं वंश-परम्परा पर श्रद्धा रखती हूं। आर्यों ने जो पितृ-संज्ञा स्थापित की है, विवाह मर्यादा बांधी है, सौर-चन्द्र-मण्डल स्थापित किए हैं, यज्ञविधि वेद-विहित की है, कृषि, वाणिज्य, राज्य-स्थापना, राज्य-व्यवस्था की जो मर्यादाएं बांधी हैं-उन्हीं ने तो नृवंश में सभ्यता और नीति की मर्यादित संस्कृति स्थापित की है। क्या रावण ने ऐसा किया है? वह दुरन्त तो अपने परशु ही को सर्वोपरि समझता है। युद्ध ही से सब बातों का निर्णय करता है। विचार-भावना उसमें कहां है? जन, जनपद-रक्षण वह कहां कर रहा है? आप उस पर प्रसन्न हैं, मैं नहीं हूं। फिर वह पतित परस्त्री को बलात्-हरण करता है, यह तो अत्यन्त अमर्यादित है, असह्य है, गर्हित है। कैसे आप देव-दैत्य-कुलपूज्य देवाधिदेव उसके इस दुष्कृत्य का समर्थन करते हैं?”

“देवगण ही कौन-सा सुकृत कर रहे हैं। इस पतित देवेन्द्र को ही ले लो। इसने माता को मारा, पिता की हत्या की, यतियों को कुत्तों को खिला दिया, चोरी की, भ्रूण-हत्या की, वृत्र और विश्वरूप का छल से वध किया, इसके अनाचारों का कुछ ठिकाना है! विष्णु की शह पाकर इस दुरात्मा ने महात्मा बलि को बांध सारा दैत्य-साम्राज्य छिन्न-भिन्न कर दिया। अब ये देव कौन-सा सुकर कार्य कर रहे हैं? यह धूर्त वामदेव नारद, अरे, इलावर्त का वही भुक्कड़ ऋषि जिसे मैंने कैलास में आने की मनाही कर दी है, केवल मधु और सोम के लालच में उस पातकी इन्द्र की स्तुति की ऋचाएं रच रहा है!”

“परन्तु ब्रम्हर्षि वशिष्ठ ने भी तो इन्द्र की स्तुति की ऋचाएं रची थीं, वे भी तो उसका स्तुति-गान करते हैं?”

“दासों के आश्रित हैं ना, इसी से। दिवोदास और सुदास पर देवेन्द्र और देवों का अनुग्रह हो, यही तो उनका ध्येय था। सो पूरा हुआ तो उसे छोड़-छाड़ आर्यावर्त में चले आए। मित्रावरुण है, यह जान सूर्यवंशियों ने उसे पुरोहित बना लिया, परन्तु मैं देवेन्द्र की चर्चा कर रहा हूं।”

“वह तो देवाधिदेव की स्तुति करता अघाता नहीं है।”

“तो इससे क्या मैं उसके पातकों पर दृष्टि नहीं दूंगा? विष्णु ही को लो, वह दासों का मित्र था, पर जब इन्द्र ने दासों के नेता वृत्र पर पंचसिन्धु में आक्रमण कर उनके दोनों अवध्य नगर, हरिपायु और महेन्द्रद्वार ध्वस्त किए, तब विष्णु ने क्या दासों की मदद की? वह देखता रहा। सो केवल इसी इन्द्र के कहने से। उसने स्पष्ट कह दिया-‘वृत्रमिन्द्रो हनिष्यत्सखे विष्णो वितरं विक्रमस्व।’ उस समय इलावर्त और सुषा प्रान्तों में आदित्यों का प्राबल्य होने से विष्णु की ही चलती थी। दासों का पराभव कर, उनकी उच्च संस्कृति का विध्वंस कर, उनसे चालीस वर्ष तक संग्राम कर, इस पतित चोर ने जब उनका ध्वंस किया और अपने परम हितैषी वज्रनिर्माता त्वष्टा के पुत्र त्रिशीर्ष विश्वरूप को विश्वासघात करके मार डाला, तब उस ब्रह्मा का किसी ने क्या कर लिया? उल्टे त्रसदस्यु, पुरुकुत्स ने सहायता देकर इन्द्र का सार्वभम राज्य स्थापित करा दिया। यदि मैं महातेज बाण को सहायता नहीं देता, तो दैत्यों का तो वंश ही नष्ट हो जाता।”

“सो देव-सान्निध्य में महातेज बाण सम्पन्न तो है!”

“इसी प्रकार रावण भी सम्पन्न रहे। अब ये ही तो दो समर्थ वंश रह गए, जो प्राचीन नृवंशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी से मैं उन पर सदय हूं। रावण जो आर्य-अनार्य का भेद मिटाकर समूचे नृवंश की एक वैदिक संस्कृति स्थापित करना चाहता है, सो बुरा क्या है? पृथ्वी के स्वामी ये आदित्य ही रहेंगे? दैत्य-दानवों का, नागों का, प्राचीन वंश ही नष्ट हो जाएगा? मैं कदापि ऐसा न होने दूंगा। आदित्यों ने इलावर्त में देवलोक स्थापित कर लिया और भारतवर्ष में आर्यावर्त। अब वे समूचे भारतवर्ष ही को आर्यावर्त बनाना चाहते हैं। जानती हो, अगस्त्य ने दण्डकारण्य में उपनिवेश स्थापित किया है। आर्यावर्त के बहिष्कृत आर्य वहां आ-आकर उसे सम्पन्न कर रहे हैं।”

“तो देव, इसमें हानि क्या है? आर्यों की संस्कृति व्यवस्थित है, मर्यादित है।”

“पर वही वैदिक संस्कृति नहीं कही जा सकती। वेद की ऋचाएं केवल आर्यों ही ने नहीं रची हैं। उसमें दासों और एलों का भी उतना ही भाग है, जितना आर्यों का। इन्द्र ने दासों पर आधिपत्य जमाकर उनकी महिदेव की परम्परा भंग कर दी। दासों के राज्य में शासन और यजन महिदेव करते थे। इन्द्र ने इस व्यवस्था को भंग कर दिया। यतियों ने उसका विरोध किया तो उन्हें मरवाकर उनका मांस कुत्तों को खिला दिया और सर्वत्र अपनी पूजा प्रचलित की।”

“परन्तु राक्षसों की संस्कृति में तो नरमांस-भक्षण का प्रचलन है!”

“यज्ञ-बलि का प्रचलन तो इसी इन्द्र ने दास-पराभव के बाद किया था। नर-बलि का भी दायित्व उसी पर है। रावण ने तो बाह्य परम्पराओं को सम्मिलित कर सबका समन्वय किया है। उसने कोई नई परम्परा तो नहीं स्थापित की!”

“आप देवाधिदेव हैं। देव-दैत्यपूजित हैं, फिर आप देवराट् पर सदय क्यों नहीं हैं? देवों का हित-अहित क्यों नहीं विचारते हैं?”

“मैं तो सभी पर सम-भाव रखता हूं। कहो, क्या देवेन्द्र की भांति रावण अथवा मेरे प्रिय शिष्य रावणि ने भी कोई दुष्कर्म किया है?”

“यह जानकी-हरण क्या दुष्कर्म नहीं?”

“और सूर्पनखा के राज्य में रहकर उसी का बर्बरतापूर्वक अंगच्छेद करना दुष्कर्म नहीं है? कहो तौ, सूर्पनखा ने कौन-सा अपराध किया था? उसने तो वैध स्वयंवर का प्रस्ताव किया था।”

“परन्तु एकस्त्रीव्रती राम ने उस कामचारिणी को स्वीकार नहीं किया।”

“तो उस महाप्रतिष्ठ वंश की राजपुत्री के प्रस्ताव का उपहास क्यों किया? लक्ष्मण के पास जाने का संकेत क्यों किया? प्रस्ताव करने पर लक्ष्मण ने उस राक्षसबाला का अंग-भंग क्यों किया? यह सब तो अत्यन्त गर्हित हुआ।”

“पर इसमें सीता का क्या अपराध था? सीता का हरण क्यों हुआ?”

“मैं तो उसका अनुमोदन नहीं करता। पर रावण को इसके लिए दोषी भी नहीं मानता।”

“तो देव दाशरथी राम भी महावंशोद्भव है, वह मानवेन्द्र है। सीता के लिए उसका लक्षा पर अभियान न्याय्य ही है।”

“सो वह और रावण परस्पर निबटें। देवी ने क्यों उस पर अनुग्रह किया?”

“केवल देवेन्द्र के अनुरोध से और सीता का दुःख समझकर।”

“जिसके वह कपटी देवेन्द्र अकंटक हो देवों सहित आनन्द से सोमपान करे, यौवनोन्मत्त अप्सराओं के नृत्य-गीत में मस्त रहे, आर्यों के यज्ञभाग का भोग करे और मनमाने दुष्कर्म करे!”

“देव, प्रसन्न हों, सोमपान तो देवाधिदेव भी करते हैं। वह विजया सोम ला रही है, स्वर्णकलश में भरे, ऊनी छन्नों में छानकर।”

रुद्र ने हंसकर उमा की ओर देखा। विजया ने सोम-पात्र उनके सम्मुख रखा। उमा ने पात्र में सोम लेकर धूर्जटि को देते हुए कहा-“उस दास सोमपायी देवेन्द्र पर अब तो देवाधिदेव का अनुग्रह होना ही चाहिए।”

धूर्जटि ने सोमपान करते हुए कहा-“प्रिये, जिसे तेरा अनुग्रह प्राप्त है, उसे किसका भय है? तू देवेन्द्र और दाशरथि पर सदय है तो रह। पर मैं रावण पर कृपा करूंगा। मैं अभी लंका जाऊंगा।”

इतना कह, और एक पात्र सोमपान कर, वृषभध्वज कैलासी अपना विकट शूल उठाकर चल दिए।

उमा क्षण-भर स्तब्ध रहीं, फिर उन्होंने कुमार कार्तिक को बुलाकर कहा-“पुत्र, तू मेरी आज्ञा से देवकार्य कर। देवेन्द्र के अनुरोध से मैं उस पर सदय हुई थी। मैंने दाशरथि राम को दिव्यास्त्र दे दिए थे, जिनसे वह महाबली दुर्जय रावण का हनन कर सके। अब कैलासी स्वयं रावण पर अनुग्रह कर शूलपाणि हो लंका गए हैं। वत्स, तू अभी देवलोक जाकर इन्द्र को इस देवाश्रय से सावधान कर दे। देवेन्द्र से कह कि पुत्र के मरने पर रावण रुद्र का आश्रय पाकर, पुत्र-शोक-विदग्ध, समर में प्रलयाग्नि प्रज्वलित कर देगा। देवेन्द्र स्वयं रुद्र, मरुत्, यक्ष और आदित्यों को साथ ले समर-भूमि में दाशरथी की सहायता करे। यदि देवेन्द्र अनुरोध करे, तो पुत्र, तू भी उसके साथ जा। मैं दाशरथी राम की विजय की इच्छुक हूं।”

कुमार ने हंसकर उमा को प्रणाम किया और कहा-“अम्ब, यह दास आपकी आज्ञा के अधीन है। जैसा आपका आदेश है, मैं वही करूंगा। मैं दाशरथी राम और देवेन्द्र पुरन्दर की प्रीति के लिए अभी सुरलोक जाता हूं। आप प्रसन्न हों!”