वज्रपात
महीपति रक्षेन्द्र ने आज भोर ही में सभाभवन में आ रत्न-सिंहासन सुशोभित किया। मन्त्री, सभासद् सभी उदगमन अपने-अपने आसन पर बैठे। रक्षेन्द्र गम्भीर भाव से मौन बैठा रहा। फिर उसने कहा-“क्या वीरपुत्र का वैश्वानर-यज्ञ सम्पूर्ण हुआ? राक्षस-सैन्य क्या रणक्षेत्र को प्रस्थान कर गई? पुत्र ने राजमहिषी की तो चरण-वन्दना की, पर मेरे निकट मेरा आशीर्वाद लेने नहीं आया? मैं आशीर्वाद देता हूं-वह आज शत्रु का हनन कर लंका-कंटक दूर करे। परन्तु मैं जय-निनाद नहीं सुन रहा हूं। हाथी नहीं चिंघाड़ रहे, न घोड़े हिनहिना रहे हैं। यह मेरे हृदय में हूक-सी कैसी उठ रही है! सभासदो, मैं तो अब स्वर्णासन पर स्थिर नहीं रह सकता। मेरे प्राण अधीर हो रहे हैं। क्या सेना प्रस्थान कर गई?”
सारण ने अधोमुख हो कहा-“शृंगी-नाद तो नहीं सुनाई दे रहा है। किन्तु यह कोलाहल कैसा है?”
“यह तो बढ़ता ही जा रहा है। यह सेना का जयनाद नहीं है। अब युद्ध के धौंसे एकबारगी ही कैसे बजने बन्द हो गए? भेरी-नाद कहां सुनाई दे रहा है?”
रावण ने विकल दृष्टि से चारों ओर देखा। इसी क्षण एक चर आकर-“हे परमेश्वर, हे रक्षेस्वर, हे महिदेव” कहता, भूमि में आ गिरा।
इसके बाद दो-चार-दस-पचास-सौ।
“यह क्या? कोई बोलता क्यों नहीं?” रावण ने गरजकर कहा। परन्तु दूतों के मुख से बात नहीं फूटी। वे-‘रक्षा करो, रक्षा करो’-कहकर सिर धूनते हुए भूमि में पड़े रहे।
रावण का मन हाहाकार कर उठा। उसने कहा-“कोई भी कुछ नहीं कहता। ये सब तो अक्षत हैं, निरापद हैं, फिर इतने कातर क्यों हैं?” रक्षेन्द्र मणिपीठ त्यागकर खड़ा हो गया। उसने कहा-“अरे कहो, क्या संवाद है? क्या वीरपुत्र ने प्रस्थान कर दिया? चतुरंगिणी सेना क्या शत्रु के सम्मुख पहुंच चुकी?”
दूत सिर धुनने और विलाप करने लगे।
रावण ने कहा-“अरे कहो, तुम सब इतने शोकातुर क्यों हो? क्या तुम कोई अमंगल वार्ता करना चाहते हो। यदि अरिन्दम ने राम को मार डाला है, तो कहो, मैं सभी को राजप्रसाद दूंगा।”
एक वृद्ध दूत ने सिर उठा, मुख में तृण दाब कांपते-कांपते कहा-“हे पृथ्वीनाथ, यह अधम दास अमंगल-वार्ता कैसे कहे? हाय! वह बात कहने से पूर्व ही मेरी जीभ कटकर गिर जाए।”
“अमंगल-वार्ता! कैसी अमंगल-वार्ता? अच्छा शुभाशुभ जो हो, वही कह। शुभाशुभ तो विधि का विधान है। झटपट कह-मैं तुझे अभयदान देता हूं।”
“हे जगदीश्वर! मृत्युंजय, रथीन्द्र, इन्द्रजित् युवराज का निकुम्भला यज्ञगार में किसी अज्ञात छली ने वध कर डाला। उनका रक्तप्लुत अंग-अंग निष्प्राण शरीर यज्ञ भूमि में पड़ा है।”
यह सुनते ही रावण कटे वृक्ष की भांति भूमि पर गिर गया। सभासदों ने दौड़कर मूर्च्छित महिदेव को उठाया। सहसा सैंकड़ों-सहस्रों राक्षस भट रोते-चिल्लाते छाती कूटते सभाभवन में घुस आए।
रावण ने चैतन्य होकर अपने चारों ओर देखा। मन्त्रिवर सारण ने बद्धांजलि निवेदन किया-“हे स्वामी, इस समय आप शोकावेग को न सहेंगे तो राक्षस-कुलांगनाओं के चक्षुजल में पृथ्वी डूब जाएगी। हे त्रिलोकजयी, अभी आपको भीमास्त्र से पुत्रघाती का हनन करना है।”
रावण ने उन्मत्त की भांति कहा-“कौन है वह वीर? किसने रणजय पुत्र का वध किया?”
“महाराज, रामानुज लक्ष्मण ने छद्मवेश में यज्ञगार में प्रविष्ट होकर यह दुष्कृत्य किया। रथीन्द्र जब भगवान वैश्वानर को वेद-मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर नील कमल की आहुति अर्पण कर रहा था, तभी सौमित्र ने हठात् प्रविष्ट होकर निरस्त्र महारथी का वध कर डाला।”
रावण ने वज्रगर्जना करके कहा-“अरे वीरो, युद्ध-साज सज लो। आज मैं इस शोक-ज्वाला से विश्व को भस्म करूंगा।”
सहसा प्रलय-गर्जन की भांति शत-सहस्र दुन्दुभियां बज उठीं।
महिदेव मत्त गजेन्द्र की भांति लड़खड़ाता हुआ अन्तःपुर में पहुंचा। मन्दोदरी रोते-रोते चित्रांगदा और सखियों-सहित आकर उसके पैरों में लोट गई।
रावण ने आहत पशु की भांति कराहकर कहा-“प्रिये, धैर्य धारण करो। अभी तुम शून्यगृह में बैठो। मैं इस समय रण-यात्री हूं। अभी तो मुझे पुत्र की मृत्यु का बदला लेना है। देवियों, अभी तो मुझे रण-साज सजाकर विदा करो, विलाप के लिए तुम्हें बहुत समय मिलेगा। मैं तनिक उस कपटी, चोर सौमित्र का हृदय विदीर्ण कर उसका हतखण्ड निकाल लाऊं। फिर इस निरर्थक राज्य-सुख को तिलांजलि दे, एकान्त में बैठकर तुम्हारे पुत्र का स्मरण करूंगा। अरे महिषियो, रोती क्यों हो? यह रोषाग्नि क्या तुम्हारे अश्रु-जल से बुझ जाएगी? आज तो गिरिशृंग ही चूर्ण हो गया। चन्द्रमा के खण्ड-खण्ड हो गए। रविमण्डल का तेज ही बुझ गया।”
मन्दोदरी ने कहा-“देव, राक्षसकुल के अन्तिम नक्षत्र आप ही तो शेष हैं। भला हम कैसे आपको उस मायावी राम के सम्मुख जाने दें? हे महाराज, कैसे हम धैर्य धारण करें?”
राजमहिषियों के विलाप से विचलित हो रावण ने कहा-“जिसके पराक्रम से देवलोक और नरलोक मैंने जय किया, जिसके भय से अतलतल में नाग भयभीत रहते थे, देवेन्द्र सुख की नींद नहीं सोता था, जिसके मस्तक पर नृवंश के छत्रपतियों के सम्मुख दास की भांति कंधे पर तीर्थोदक का कलश रख देवराट् ने अभिषेक किया, उस राक्षस-कुलदीप का चोर सौमित्र ने अन्यायपूर्वक पशु की भांति वध कर डाला! हाय, वीरमणि निरस्त्र ही मारा गया! मैंने व्यर्थ ही देव, दैत्य, नर-कुल को जय किया! झूठ ही जगज्जयी नाम धराया! पर अब विलाप से क्या? इससे क्या पुत्र फिर से जी जाएगा? मैं आज अधर्मी सौमित्रि का वध करूंगा, नहीं तो लंका में नहीं लौटूंगा। अरे, मेघनाद का वध हो गया, यह सुनकर कौन राक्षस जीता रहना चाहेगा? सब कोई चलो, सम्मुख समर में पुत्र का शत्रु के रक्त से तर्पण करें।”
रावण ने अश्रुमोचन किए। मन्त्रगणों ने सिर झुका लिए। सेना ने सिंहनाद किया।
दानवनन्दिनी सुलोचना प्रमिला ने स्नानादि से निवृत्त हो अलंकार धारण किए। दासियों ने प्रसाधन किया। एक-एक कर उसके अंगों से अलंकार खिसकने लगे। उसने कहा-“अरी सखियो, यह क्या हुआ? मणिमय भुजबन्ध पहनने से मेरा हाथ क्यों दुखने लगा? अंग से अलंकार क्यों खिसकने लगे? यह मेरा दाहिना नेत्र फड़का! अरी वासन्ती, वीरेन्द्र चूड़ामणि यज्ञगार में वैश्वानर की पूजा कर रहे हैं। तू अभी जाकर उनकी सेवा में मुझ दासी का निवेदन कर कि आज वे रणांगण में न जाएं। आज न जाने क्या हो, मेरा मन तो डूबा जा रहा है।”
वासन्ती ने कहा-“देवि, तनिक सुनो तो, यह आर्तनाद कैसा है? कौन रो रहा है? अरे, शत-सहस्र कण्ठ रो रहे हैं?”
“सुन रही हूं। सेना का हुंकार बन्द हो गया, दुन्दुभि की गर्जना विलीन हो गई, शृंगी-नाद नहीं सुनाई दे रहा। हाहाकार और रोदन-ध्वनि बढ़ती जा रही है। अरे, ये सब पुरवासी क्यों रो रहे हैं? रथीन्द्र के रहते लंका पर अब यह कौन-सी विपत्ति आई है। चलूं, देखूं तो महिषी के मन्दिर में क्या हो रहा है।”
अधीर हो वह अर्धवस्त्रालंकार पहने ही सखियों सहित, महिषी सदन की ओर गिरती-पड़ती चली, पीछे-पीछे सब सखियां, जहां वातावरण घोर क्रन्दन से कम्पित हो रहा था, जहां रथीन्द्र के निधन-समाचार शत-सहस्र मुखों के हाहाकार के साथ निकल रहे थे। पतिप्राणा साध्वी प्रमिला सुन्दरी, दानवराज-नन्दिनी प्राणाधिक पति का निधन सुन छिन्न लता की भांति मूर्च्छित हो भूमि पर गिर गई।