जनरव
कनक-लंका में आनन्दोत्सव होने लगे। दुन्दुभियां गड़गड़ाने लगीं। वीर वाहिनियां सज-सजकर चतुष्पदों पर एकत्र होने लगीं। घर-घर बाजे बजने लगे, नर्तकियां नाचने लगीं। गन्धर्वियां गान करतीं चतुष्पदों को पादाघात से मुखरित करने लगीं। आज का प्रभात लंका में आशा और आनन्द के प्रवाह को लेकर आया था। नागरिक परस्पर प्रसन्न मुद्रा में बातें कर रहे थे। गृहस्थों ने अपने गृहद्वार फूलों से सजा दिए, खिड़कियों में मंगल-दीप रख दिए। गृहाग्र में रंग-बिरंगी ध्वजाएं फहराने लगीं। अपने सौरभ से पुरी को आपूर्यमाण कर मलय-मारुत पुष्पगन्ध आमोद में व्याप्त हो गया। रात-भर लंका ने जागरण किया, यज्ञानुष्ठान किए, वेदध्वनि की। वीरेन्द्र कल राम को मारेगा, लक्ष्मण का भी वध करेगा। राक्षस-दल वानर-कटक को मार-मारकर समुद्र के अतल तल में डुबो देगा। लंका के नागरिक आशा के झकोरों में झूम रहे थे। राज-प्रासाद के प्रांगण में सैन्य सज्जित हो रही थी। धौंसे गड़गड़ा रहे थे। हाथी, घोड़े, पैदल पंक्ति बांधे खड़े थे। सेनानायक तालजंघ गुल्मों का व्यूह रच रहा था। विरूपाक्ष नगर-रक्षा का विधान रच रहा था। खिड़कियों से पौरवधुएं पुष्प और लाजा-वर्षा कर रही थीं। हाथी चिंघाड़ रहे थे। घोड़े हिनहिना रहे थे। मन्दिरों में वेदगान हो रहा था। तोरण पर प्रभात-राग अलाप ले रहा था। पुरजन इधर-उधर आते-जाते बातें कर रहे थे। एक ने कहा-“जल्दी कर मित्र, प्राचीर पर चढ़ा जाए, जिससे आज का युद्ध देखने को मिल जाए। फिर स्थान नहीं मिलेगा।”
दूसरे ने कहा-“अरे, अभी ठहर, अरिन्दम इन्द्रजित् अभी भगवान वैश्वानर की उपासना कर रहा है। वह अभी आकर सम्पूर्ण राक्षस-व्यूह का निरीक्षण करेगा। देखता नहीं, तालजंघ महानायक कैसी तत्परता से व्यूह-रचना कर रहा है!”
तीसरे ने कहा-“आज भिक्षुक राम का निस्तार नहीं है। कुलद्रोही महाराज विभीषण भी आज अपने कर्म-फल भोगेंगे।”
चौथे ने कहा-“अरे, वह मायावी राम तो मर-मरकर भी जी उठता है। देवगण उसके पक्ष में हैं।”
“तो क्या हुआ, देवराज इन्द्र के वज्र को व्यर्थ करने वाले अरिन्दम रक्षराजपुत्र आज काल-पुरुष की भांति सब देवताओं के प्रयत्न व्यर्थ करेंगे। चलो, प्राचीर पर चढ़कर देखें।”
“प्राचीर पर चढ़कर क्या होगा! अरिन्दम इन्द्रजित तो पल-भर ही में राम को मार डालेगा।”
“सच कहते हो। जैसे अग्नि सूखी घास को भस्म करती है, वैसे ही युवराज शत्रु-संहार करता है। उस-सा योद्धा पृथ्वी पर और नहीं है।”
“अरे, देखते रहो, अभी एक मुहूर्त में वह उन दोनों वनवासियों को मार, अधम विभीषण को बांधकर ले आता है। धन्य है महेन्द्र, महिवेन्द्र, रक्षपति, पौलस्त्य, जगदीश्वर रावण रक्षेन्द्र, वह जगत् में महिमा का समुद्र है।” कहो भला, पृथ्वीतल पर और किसका ऐसा वैभव है? परन्तु इस भिखारी राम ने उस रत्नमयी लंका को विधवा बना दिया। देखा, समुद्र-तीर पर पर्वत के समान कुम्भकर्ण महाराज समर-भूमि में पड़े हैं। भला इस बात की भी कोई कल्पना कर सकता था?”
“अरे, तभी तो लंका के हेमकूट के समान गगनचुम्बी प्रासादों की हाथी-दांतजड़ी खिड़कियों और स्वर्णद्वारों से, निहत वीरों की म्लानवदना राक्षस-वधुएं साश्रुनयन समर-क्षेत्र की ओर देख रही हैं।”
“हां भाई, सच है। लंका की भांति वैभव इस लोक में भला कहां था? पर जगत् में स्थिर कौन है? सागर-तरंग की भांति एक वस्तु आती और दूसरी जाती है। चलो भाई, चलो देखें; अब तो प्राचीर पर नरमुण्ड दीखने लगे।”