Koot Yog
उषा का उदय हो रहा था। राम-कटक सज रहा था। पर राम सब सेनानियों सहित व्याकुल भाव से बैठे परामर्श में मग्न थे। विभीषण, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवन्त, नल, नील, गय, द्विपद, ऋक्ष, वृषभ सभी सेनानायक, गुल्मपति राघवेन्द्र को घेरे, आज होनेवाले काल-समर के सम्बन्ध में परामर्श कर रहे थे। लंका में युद्ध के नगाड़े गड़गड़ा रहे थे। राक्षसों के जयनिनाद और हर्षोल्लास सुन-सुनकर वानर-सैन्य के मन में शंका का भूत बैठ रहा था। राम ने कहा-“मित्र रक्षेन्द्र, यह तो असाध्य साधन है। भला यह कैसे सम्भव हो सकता है कि दुर्जय मेघनाद का निरस्त्र वध किया जाए? ऐसा सुयोग हम पा ही कैसे सकते हैं? हाय, यह हमारा दुर्भाग्य ही समझना चाहिए कि सुरेन्द्र का अनुग्रह और उमा, हेमवती का प्रसाद पाकर भी हम उससे लाभान्वित नहीं हो रहे। रक्षेन्द्र, कहो, अब तुम्हीं रघुवंश की डूबती नाव को पार लगा सकते हो।” गदापाणि विभीषण गम्भीर सोच में निमग्न हो गए। इसी समय वानर-सैन्य को विस्मित करते हुए मारुति सरमा को राम के सम्मुख ले आए। उन्होंने कहा-“यह राक्षसबाला आपके पादपद्म में कुछ कूट निवेदन करना चाहती है।” राम ने कहा-“कह भद्रे, मैं तेरा क्या प्रिय कर सकता हूं!”
सरमा ने प्रथम राम-लक्ष्मण को, फिर विभीषण को प्रणाम करके कहा-“धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण मुझे पहचानते हैं, पहले ये साक्षी दें तो मैं कूट निवेदन करूं।”
विभीषण ने कहा-“मैं तुझे पहचानता हूं, तू सरमा किंकरी है। मुझे स्मरण होता है, तू अशोक वन की रक्षिका राक्षसी सैन्य की अधिष्ठात्री है।”
“और वैदेही की किंकरी भी।”
“यह भी मैंने सुना था, भगवती से सौहार्द रखने के कारण राक्षसेन्द्र की धर्षणा भी पा चुकी है।”
“तो राघवेन्द्र प्रसन्न हों और किंकरी के वचन पर विश्वास करें। क्या मैं यहां सबके समक्ष कूट निवेदन करूं?”
“कह भद्रे, ये सब हमारे विश्वस्त सेनापति हैं।”
“तो रथीन्द्र मेघनाद इस क्षण एकाकी निकुम्भला यज्ञगार में वैश्वानर की पूजा कर रहा है। राघवेन्द्र साहस करें तो इसी क्षण उसका निरस्त्र वध कर सकते हैं। बस यह क्षण चूके तो चूके।”
यह सुनते ही सौमित्र उछलकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा-“हे कल्याणी, क्या तू निकुम्भला यज्ञगार का मार्ग जानती है? क्या तू मार्ग बताकर अपना अनुग्रह शतगुण कर सकती है?”
“गदापाणि राक्षसशिरोमणि धर्मात्मा विभीषण को आपका वर सान्निध्य प्राप्त है। ये चाहें तो आपको गुप्त रूप से अगम्य यज्ञगार में सशस्त्र, निरस्त्र एकाकी रावणि के सम्मुख, एक मुहूर्त में ही ले जाकर खड़ा कर सकते हैं।”
“तो आर्य, अब विलम्ब मत कीजिए, अनुमति दीजिए, उषा का उदय हो रहा है।”
राम ने आर्द्रनयन होकर कहा-“भाई, जिसे देखकर देव, दैत्य सभी भयभीत होते हैं, जिसने देखते ही वानर-कटक से रक्षित हमें बात की बात में शरविद्ध कर दो-दो बार भूपतित किया, उसके सम्मुख तुम्हें कैसे जाने दूं? जिस विषधर के विष से देव-नर तुरन्त भस्म हो जाते हैं, कैसे मैं उसकी बांबी में तुम्हें अकेला भेजूं? अरे सौमित्र, सीता के उद्धार का अब कुछ प्रयोजन नहीं है। मैंने व्यर्थ ही समुद्र पर सेतु बांध शत्रु-मित्र के रक्त से पृथ्वी को रंगा। भाग्य-दोष से मैंने राज्यपाट, माता-पिता, बन्धु-बान्धव सभी को खोया। इस मेरे अन्धकारावृत्त जीवन में एक जनकसुता सीता ही दीपशिखा थी, सो अदृष्ट ने उसे भी बुझा दिया। अब एक तुम्हीं मेरी आशा के आधार हो, तुम्हें मैं नहीं खोऊंगा। चलो सौमित्र, वन को लौट चलें।”
लक्ष्मण ने कहा-“आर्य, ये कैसे वचन मैं आपके मुंह से सुन रहा हूं! लंका का सौभाग्य सूर्य डूब गया। लंका के जगज्जयी सुभटों के शवों को गिद्ध और श्रृगाल खा रहे हैं। लाइए देवास्त्र, मैं अभी-इसी क्षण नराधम रावणि का हनन करता हूं।”
विभीषण ने अब धीर स्वर में कहा-“राघव, सौमित्र ठीक कहते हैं, मैं उनके साथ हूं, आप चिन्ता न करें। सरमा का कूट निवेदन बहुमूल्य है। यह भगवती की शुभचिन्तिका किंकरी है, इस पर सन्देह का कोई कारण नहीं है। यह कूट योग हमें चूकना नहीं चाहिए।”
“मित्र,”-राम ने संतस स्वर में कहा-“जब मैंने पिता की आज्ञा से वनगमन किया तो वीरवर लक्ष्मण तरुण यौवन में सब सुखों को तिलांजलि दे, स्वेच्छा से मेरे पीछे वन को चल दिए। तब माता सुमित्रा ने नयनाश्रुपात कर कहा था- ‘राम, मेरे इस नयन-मणि को, मेरे हृदय-धन को यत्न से रखना!’ सो मैं अब इस भ्रातृव्रत को कैसे संकट में डालूं, अथवा परिणाम जो हो सो हो, मैं भी तुम्हारे साथ चलूं?”
विभीषण ने कहा-“महाराज, आप कातर न हों। धैर्य के कुछ क्षण ही आते हैं, जब धैर्यवान की परीक्षा होती है। सरमा का कूट योग बहुमूल्य है, अब आप हमें आज्ञा दीजिए। ये क्षण व्यर्थ ही जा रहे हैं।”
राम ने मस्तक नवा आंखों से अश्रु गिराए और कहा-“लाओ देवास्त्र, मैं अपने हाथों सौमित्र का वीर-शृंगार करूंगा।” उन्होंने दिव्य कवच धारण कराकर, कमर में कृपाण, पीठ पर उमादत्त ढाल, हाथ में नागसिद्ध दिव्य धनुष, पीठ पर अक्षय तूणीर कस दिया। मस्तक पर लौह त्राण सजा दिया। सौमित्र ने राघवेन्द्र की प्रदक्षिणा करके साष्टांग दण्डवत् किया और कहा-“आर्य, आशीर्वाद दीजिए, मैं आज दुर्धर शत्रु का संहार करूं!”
“भाई, जैसे पीठ दिखाते हो, वैसे ही मुंह दिखाना। मित्र रक्षेन्द्र विभीषण मेरे जीवन और मृत्यु तुम्हारे ही हाथ हैं। मैं अपना रत्न तुम्हें सौंपता हूं। अब और क्या कहूं? मातलि, सौमित्र को तुम ले जाओ और ऐसे ही ले आओ, देव!”
इतना कह राम विकल भाव ले उद्विग्न मन खड़े रहे। सौमित्र और विभीषण दिव्य देवरथ में बैठ द्रुतगति से, निकुम्भला यज्ञगार में नीलपद्म की मन्त्रपूत आहुति देते हुए यज्ञदीक्षित, रावणि का निरस्त्र वध करने चल पड़े।