वैदेही-वैकल्य
राहु चन्द्रमा को छोड़ देगा, जगत् सुधांशु को देखकर तृप्त होगा, इस आशा में राक्षस घर-बाहर आनन्दमत्त लंका में घूम रहे थे। उनके हर्षनाद, जय-कल्लोल, वीणा, मुरज, मुरलि-निनाद, वेदध्वनि, आह्लाद-प्रस्तार देख; हाथी-घोड़ों का, सेना का प्रचण्ड घोष, दुन्दुभि का मेघ-गर्जन, भेरी-स्वर सुन-सुनकर पिंजरबद्ध कुकरी की भांति असहाया, भयत्रस्ता, पतिव्युक्ता, रामसखी सीता-विधुमुखी-जनकनन्दिनी अशोक कानन में शोकविदग्धा बैठी भाग्य के झंझोरों में उलझी अकेली अश्रुपात कर रही थी। रक्षिका राक्षसियों का दल उत्सव-कौतुल देखने चला गया था। राम-कटक को अकंटक पारकर वामानल सहित वीरांगना प्रमिला सुन्दरी दैत्यनन्दिनी हठात् लंका में आई है। अरिन्दम दुर्जय, वीरेन्द्रधुरी इन्द्रजित् आज राम-लक्ष्मण का वधकर लंका का उद्धार करने निकुम्भला यज्ञगार में वैश्वानर की उपासना करेगा, ये सब समाचार उस तक भी कृत-विकृत हो पहुंच रहे थे। इस शत्रुपुरी में कौन उसका सहायक है, कौन उस साध्वी के दुःख को देखने वाला है? उसके लिए भगीरथ प्रयत्न कर दुर्लध्य समुद्र को शिलाओं से बांध, धीर-वीर, दृढ़प्रतिज्ञ राम वानर-कटक लेकर आए हैं। दो-दो बार महाबली दुर्जय रावणि ने उन्हें परास्त कर मृत्युबाणों से बींधा है। आज फिर वह अजेय भीमविक्रम इन्द्रजित् रुद्रासन्नधिव्य से सम्पन्न, वैश्वानर-वरलब्ध, राघवेन्द्रों के प्राणों का वैरी, सम्पूर्ण राक्षस-कटक सम्भार सम्पन्न कर रहा है। हाय, आज तो प्रलय ही हो जाएगी। कौन काल-समर में आज राघव-बन्धुओं की रक्षा करेगा? अरे, मुझ हतभागिनी के लिए आर्यपुत्र के प्राण दो-दो बार संकट में पड़ चुके हैं। अब आज क्या होगा, कौन जानता है! अरे, किसी ने भरत को हमारी इस विपदा की सूचना नहीं दी। अभी तक अयोध्या से रघुओं की अक्षौहिणी सेनाएं नहीं आईं। अरे, इस वीर मेघनाद ने तो देवेन्द्र को भी बांध लिया था। अब ऐसा कौन है जो रघुमणि की इस काल-सर्प से रक्षा करे? मैंने ही क्या कुमति की जो जीवित रही और आर्यपुत्र को यहां बुलाकर संकट में डाल दिया। हाय, अब क्या होगा? आज क्या होने वाला है? पवन से इस अशोक वन के पत्ते हिल-हिलकर मर्मर शब्द कर रहे हैं जैसे वे भी मेरे विषाद से हिल-हिलकर विलाप कर रहे हों। शाखाओं के पक्षी जैसे मेरे ही दुःख में रुदन कर रहे हैं, कुसुमराशि तरूमूल में पड़ी है, मानो वृक्षों ने मनस्ताप से तप्त होकर अपना श्रृंगार छिन्न-भिन्न कर डाला है। नदियां जैसे रोती हुई सागर-वक्ष पर पछाड़ खा रही हैं। हाय, अब इस विपत् सागर से कौन रघुकुल को उबारेगा?
वैदेही वैकल्य-भाव में मग्न, अकेली बैठी अश्रुपात कर रही थी। एक ही मलिन वस्त्र उसके अंग पर था। उसने घुटनों को वक्ष में छिपा लिया था। सिर झुककर वक्ष पर मिल गया था। शोकशीर्ण उसका क्षीण कलेवर, ग्रीष्म-शुष्क पार्वत्य नदी-सा हो रहा था। इसी समय सरमा राक्षसी आकर रोती हुई सीता के चरणतल में बैठ गई। उन निर्दय राक्षसियों के वृन्द में यही एक उसकी सदय सखी थी। उसने कहा- “महाभागे, सब दुष्ट चेटियां तुम्हें छोड़कर आज महोत्सव देखने चली गईं। वे सब मद्य पी-पीकर मत्त हो नृत्य-गान कर रही हैं। इसी से सुयोग पा, मैं तुम्हारी चरण-वन्दना करने आई हूं।”
सीता ने अश्रुपूरित दृष्टि से सरमा को देखकर कहा- “हे सखी, इस राक्षसपुरी में तू ही मुझ पर सदय है। हाय, मैंने तो कभी स्वप्न में भी किसी प्राणी का अहित-चिंतन नहीं किया। पिता की आज्ञा से जब आर्यपुत्र राज्य त्याग चुपचाप वन चल दिए, तो छाया की भांति मैं भी उनके पीछे चल दी। हम गोदावरी के तट पर उसी प्रकार रहते थे, जैसे ऊंचे वृक्ष पर कबूतर-कबूती घोंसला बनाकर रहते हैं। बिना किसी को दुःख दिए हम कन्द, मूल, फल खाकर रहते थे, दुःखार्तों की सेवा करते थे। आर्यपुत्र के सान्निध्य में तो मैं राजसुख को भूल ही गई थी। हमारी पर्णकुटी के फूलों का सौरभ वहां के पवन को सुखद बनाता था। मोर-मोरनी हमारी कुटी के द्वार पर नृत्य करते थे। वन के हाथी-हथिनी और मृग-शावक निर्भय मेरे निकट आते थे। पक्षी विविध कलरव कर हमारा मनोरंजन करते थे। मैं फूलों की, फलों की, पक्षियों की, वृक्षों की, पशुओं की, मृगशावकों की समभाव से प्रीति-सहित सेवा करती थी, आदर और यत्न से। सरोवर का निर्मल सलिल मेरा आरसी था। आर्यपुत्र नित्य ताजे शतदल कमल सरोवर से लाते थे और मेरी वेणी में अपने हाथों से गूंथते थे। हाय! किस दुर्भाग्य से मेरे वे सुदिन लुप्त हो गए! अब क्या मेरे ये दग्ध चक्षु इस जीवन में उन पादपद्मों को देख सकेंगे?”
इतना कहकर वैदेही शराघात से विद्ध पक्षी की भांति सरमा की गोद में गिरकर रोने और छटपटाने लगी।
सरमा ने कहा- “विधुमुखी, इस प्रकार हताश और कातर न हो! मेरी बात सुनो, शिलाएं सागर की लहरों पर तैर रही हैं। महातेज, दुरंत, दुर्जय, सर्वजयी, देव, दैत्य-नर-त्रास कुम्भकर्ण का छिन्न-भिन्न शरीर सागर-तट पर पड़ा है। रावण के सब पुत्र, परिजन, सुभट, गुल्मपति, अजेय योद्धा मरण-शरण हो गए। त्रिभुवन विजयी योद्धाओं की लाशें सागर-तट पर गिद्ध और श्रृगाल खा रहे हैं। लंका अब वीरशून्य हो गई। रक्षेन्द्र रावण शोकदग्ध, भग्न-मन ठंडी सांसें लेता है। मणिमहालय के सब रास-रंग मौन हैं। लंका पर चीलों और गिद्धों के मंडराने से अशुभ छाया छा रही है। अब लंका की विधुमुखी युवतियां मंगल-गान नहीं करतीं, वे अपने नव वैधव्य के दुर्भाग्य में मग्न विलाप करती हैं। लंका के घर-घर शोक मूर्तरूप घूम रहा है। यह अब वह लोक-विश्रुत लंका नहीं रह गई है। हे रघुवधू, रक्षेन्द्र की आशा का आधार अब केवल यही दुरन्त, सर्वजित् मेघनाद है। यह रौद्र तेज से सम्पन्न, दिव्यास्त्रों से सज्जित, अमित वीर्यवन्त पुरुष है। इसके मरते ही रक्षेन्द्र को तुम मृतक ही समझो और लंका का यह आज का हर्षोल्लास तो बुझते हुए दीपक की लौ है।”
सरमा के ये वचन सुन सीता आश्वस्त होकर बोली- “किन्तु सखी, यह दुरन्त रिपु दो-दो बार दोनों रघुमारों को जय कर चुका है। आज ही सुना है, वह पूर्ण रौद्र तेज से अभिभूत हो, साक्षात् कालरूप समरांगण में जा रहा है। आज कैसे इस दुरन्त शत्रु से आर्यपुत्र की रक्षा होगी?”
सरमा ने कहा- “देवि, मेरी बात सुनो, दिव्यास्त्रों के रहते रौद्र तेज सम्पन्न इस दुरन्त मायावी का वध असम्भव है। पृथ्वी का कोई, देव, दैत्य, दानव इस अजेय का वध नहीं कर सकता।”
फिर उसने सीता के कान के पास मुख लाकर मन्द स्वर में कहा- “अभी कुछ क्षणों में यह दुरन्त रावणि शस्त्ररहित निकुम्भला यज्ञगार में एकाकी जाएगा। यही समय है कि राघवेन्द्र किसी तरह वहां पहुंचकर उसका वध कर डालें। अभी सूर्योदय नहीं हुआ है, परन्तु प्रभात होने में देर नहीं है। मणि-महालय की दुन्दुभियां बज रही हैं। अभी वीरेन्द्र मातृपद-वन्दना करने जाएगा। पीछे वह निकुम्भला यज्ञगार में एकाकी निरस्त्र बैठ वैश्वानर को आहुति देगा। इसमें उसे आधा याम समय लगेगा। अभी भी यदि राघवेन्द्र को कोई यह सूचना दे दे और राघवेन्द्र यह दुस्सह साहस कर सकें तो निश्चय ही यह मृत्युंजय मरण-शरण हो सकता है।”
सरमा के ये वचन सुन भय से थर-थर कांपती हुई रघुवधू सीता ने धड़कते कलेजे पर हाथ रखकर कहा- “किन्तु सखी, कौन वीर लंका में ऐसा है जो मेरा प्रिय करे? यह गुप्त संदेश रघुमणि को दे? फिर रघुमणि निकुम्भला यज्ञगार तक पहुंचेंगे कैसे? कहां है वह यज्ञगार? वहां तक पहुंचना सुकर होगा भी या नहीं?”
सरमा ने उसी भांति मैथिली के कान में मुंह सटाकर कहा- “रघुवधू, लंका के उत्तर कोण में एक विकट वन है, वहीं एक मनोरम सरोवर है। उसी के मध्यभाग में यह स्वर्णलय निकुम्भला यज्ञगार है। उस सरोवर में दुर्लभ नीलोत्पल खिले हैं। रथीन्द्र भगवान वैश्वानर को वेद-मंत्रों से अभिमन्त्रित करके उन्हीं उत्पलों की एक सहस्र आहुतियां देगा। उस भयंकर दुर्गम वन में एक सहस्र शूलपाणि राक्षस भट सयत्न चौकसी करते हैं। यदि श्री राम उस वन में साहसपूर्वक प्रविष्ट हो सकें तो मनोरथ पूरा हो सकता है। यह अवसर चूका सो चूका।”
सीता ने विकल भाव से सरमा का हाथ पकड़ लिया। उन्होंने कहा- “सखी, यह सत्य है कि यह अवसर चूका सो चूका। सो सखि, तू ही यह प्राणान्त उद्योग मेरे लिए करे तो हो सकता है, नहीं तो नहीं।”
“मैं ही करूंगी वैदेही, तुम निश्चिन्त रहो। मैं तुम्हारा दुःख नहीं देख सकती। तुम्हारे भाग्य से रघुमित्र गदापाणि धीर विभीषण राम की सेवा में हैं। चाहें तो अनायास ही गुप्त रूप से निरापद राघवेन्द्र को या उनके भ्राता को निकुम्भला यज्ञगार के अगम क्षेत्र में ले सकते हैं। जो सहस्र भट-रक्षित है और जहां बिना अनुमति वायु का भी प्रवेश नहीं हो सकता।”
“तो अरी, मेरी प्राणदात्री सखी, एक-एक क्षण बहुमूल्य है, तू अभी जा! हे दिव्या, तू रघुवंश की लाज रख। तुझे वीरमणि मारुति मिलें, सौभद्र लक्ष्मण मिलें या आर्यपुत्र दीखें, उनसे तेरा साक्षात्कार हो, तो तू अपना गुह्य निवेदन उन्हीं से कर आ!”
इतना सुन सरमा तुरन्त वहां से अदृश्य हो गई। रह गई वैकल्य-विकल, भाग्यदग्धा, एकाकिनी, प्रिय-वियोगिनी वैदेही-आशा-निराशा के झूलते-सी।