मेघनाद अभिषेक

रथीन्द्र मेघनाद के अविरत धनुष-टंकार से लंका कांप उठी। समुद्र उथल-पुथल हो गया। रक्षेन्द्र रण-साज सज रहा था। रण-वाद्य बज रहे थे। हाथी चिंघाड़ रहे थे, घोड़े हिनहिना रहे थे। रथी लौहवर्म पहने हुंकार भर रहे थे। रथों पर रंग-बिरंगी ध्वजाएं उड़ रही थीं। रथ द्रुतगति से इधर से उधर जा रहे थे कि मेघनाद सिर पर कनकटोप पहने, विकराल खड्ग-शूल धारण किए, पीठ पर अभेद्य ढाल लिए द्रुतगति से वहां जा पहुंचा। राक्षस दल में जय-जयकार होने लगा। रथीन्द्र ने जगदीश्वर के चरणों में साष्टांग दण्डवत् किया। रावण ने पुत्र को उठाकर छाती से लगाया। वीरेन्द्र ने कहा, “पिता, यह क्या? मैंने सुना है, मायावी राम मर कर भी जी उठा। यह तो अद्भुत बात है! अब आप मुझे अनुमति दीजिए कि उस पतित को शरानल से भस्म कर, भस्म को वायु में उड़ा दूं या उसे बांधकर आपके पाद-पद्म में अर्पित करूं?”

रक्षेन्द्र ने पुत्र का बारम्बार आलिंगन करके कहा- “अरे पुत्र, अब तू ही तो रक्षकुल का एकमात्र आधार बच रहा है। इस काल-समर में तुझे कैसे भेज दूं? अरे, भाग्य मेरे प्रतिकूल है। भला किसी ने सुना था कि जल में शिला तैरती है, मनुष्य मरकर भी जी उठता है?”

“राजेश्वर, राम तो एक तुच्छ नर है। आप उससे भयभीत क्यों हैं? मुझ दास के रहते आप समरांगण में जाएं, भला यह कभी संभव हो सकता है! हे पिता, यह सुनकर देवेन्द्र हमारा उपहास करेगा। पृथ्वी के वीर हंसेंगे। मैंने तो राम को परास्त कर छोड़ दिया। अब आप एक बार मुझे और आज्ञा दीजिए। मैं देखूं, इस बार वह कैसे मेरे हाथों से बचता है।”

“अरे पुत्र, मैंने महातेज, अमितविक्रम कुम्भकर्ण को युद्धार्थ भेजा था। देख, उसका निर्जीव शरीर सिन्धु-तीर पर पड़ा है, जैसे वज्राघात से गिरि-श्रृंग खण्डित हो गया हो। फिर भी पुत्र, समय ही जब उपस्थित है तो तू जा! मैं तुझे सम्पूर्ण राक्षस चमू का सेनापति नियुक्त कर रहा हूं।”

इतना कह राक्षस-राज ने समुद्र-जल ले यथाविधि पुत्र का अभिषेक कर दिया। बन्दीजन गुणगान करने लगे। वीणा बजने लगी। राक्षसपुरी में आनन्द और उत्साह की लहर व्याप्त हो गई।

रावण ने भुजा ऊंची कर कहा- “राज-सुन्दरी लंके, शोक दूर कर? देख राक्षस-कुल-सूर्य उदय हुआ है। दुःख-रात्रि बीत रही है। सुप्रभात होनेवाला है। वीरेन्द्र के कोदण्ड टंकार से सुरपति कांप रहा है। उसके तूणीर में पाशुपत महास्त्र भरे हैं। प्रिये मन्दोदरी, देखो-देखो यह कौतूहल। अरिन्दम इन्द्रजित् युद्ध-साज सज रहा है। अब राक्षस-कुल-कलंक विभीषण, दण्डकारण्य का वह निष्कासित मानव राम और तुच्छ वानर जीवित न रहेंगे। अरे, बाजे बजाओ, उत्साह मनाओ और जय-जयकार करो!”

कनक लंका एक बार फिर वाद्यों की ध्वनि और जय-जयकारों से परिपूर्ण हो उठी।