जगदीश्वर का वैकल्य

पृथ्वी पर अतुलनीय, स्फटिकग्रथित, रत्नाजटित सभा में, जहां रंग-बिरंगे रत्न-स्तम्भों पर सुनहरी छत-जैसे फणीन्द्र के असंख्य फणों पर भूभार। मोती, पन्ना और हीरक की झिलमिल झालरों के चंदोवों के नीचे हेमकूट पर श्रृंग-समान कान्तिमन्त महिदेव रावण स्वर्ण-सिंहासन पर बैठा। चारों ओर बन्धु-मन्त्री, सेनापति, सभासद। बन्दनवारों में गुंथे ताजे पुष्प, पल्लव, चम्पा, चमेली, मौलश्री, जहां की दीप्ति नयनों चकाचौंध करती थी। चारुलौचना किंकरी भुज मृणाल से चंवर हिलाती-डुलाती। छत्रधर छत्र लिए सन्नद्ध काम-रूप, अनुरूप, मनहर-शूलपाणि के अनुरूप शूल-हस्त द्वारपाल द्वार पर सन्नद्ध।

शीतल, मन्द, सुगन्ध, कोमल सामुद्र समीर विहंगों के कूजित कलरव को वहन करती, प्राणों को तृप्त करती प्रवाहित।

जगज्जयी महिदेव लंकापति अधोमुख, भग्नमन, शोकसंतत, मूक-मौन! अजस्त्र अश्रुधारा से बुझे हुए। ज्योतिज्वाल नयनों के ज्वलन्त अग्नि-स्फुलिंग शरविद्ध मेघ से झर-झर झरती जलबिन्दु धार-सी अश्रुधार।

भूलुण्ठित समरदूत, रक्तप्लुत। क्षत-विक्षत, भग्नप्राण, हतजीवन, हतौज, स्खलित-वचन, गद्गद-वाक्य, जड़-कम्पित, दीन पंकलिस।

“कह रे कह, वीरपुंगव कुम्भकर्ण के निधन का समाचार कह!”

“महाराज, राक्षसों में श्रेष्ठ कुम्भकर्ण के साथ सहस्रों योद्धा आज समर-सागर में विलीन हो गए। उस सर्वग्रासी कालरूप राम ने सबको ग्रस लिया।

“तो महातेज मृत्युंजय कुम्भकर्ण अब पृथ्वी पर नहीं रहे? अरे, जिसके भुजबल से देवता और दैत्य भी संतापत रहते थे, उसे उस भिखारी राम ने सम्मुख समर में मार डाला? तेरी यह बात तो स्वप्नवत् है। भाग्य ने शाल को फूल की पंखुड़ी से काट डाला। हा वीर-चूडामणि, हा भाई कुम्भकर्ण, किस पाप के फलस्वरूप आज मैंने तुझे खो दिया? अरे मेरा दक्षिण बाहु ही टूट गया। कैसे मैं यह शोक सहन करूंगा? यह दुरन्त शत्रु तो इस प्रकार प्रतापी रक्षकुल का नाश कर रहा है, जैसे लकड़हारा एक-एक शाखा को काटकर सारे वृक्ष को समूल ही नष्ट कर रहा हो। हाय, अब कौन मेरे विपुल कुल को बचाएगा? अरे सर्वजित्, अमित-विक्रम, राक्षस-कुल-रक्षक कुम्भकर्ण क्या सचमुच ही काल-कलित हो गए? यह तो अनहोनी-सी बात है। अरी अभागिनी सूर्पनखा, किस कुक्षण में तूने पंचवटी में इस काल-सर्प को छेड़ा था। अरी, मैं तो तेरे ही दुःख से संतप्त हो इस दाहक अग्नि-शिखा, जान की गाहक को हेम गृह में लाया था। हाय-हाय कुसुम-गुम्फिता, दीपावलि-उज्ज्वलिता मेरी यह अद्वितीय स्वर्णलंका तो जैसे श्मशान हो गई, सुनसान हो गई। अब वीरों की वाहिनी यहां कहां चलती हैं। अरे, कोकिलकण्ठी रक्षकिशोरियां वीणा, मुरज, मुरली बजाकर लंका के रमणीय उद्यानों में नृत्य क्यों नहीं करतीं? लंका की वधुएं मधुर गान के स्थान पर रुदन क्यों कर रही हैं? हा, मेरे ही पाप से!” इतना कह रावण ने दोनों हाथ से अपनी छाती पीट ली।

लंकापति के ये शोक-विदग्ध उद्गार सुन और रक्षेन्द्र को शोकाभिभूत देख मन्त्री सारण ने बद्धांजलि कहा- “हे देव, दैत्य, नर और नागपूजित जगज्जयी महाराज, दास का अविनय क्षमा हो। आप साक्षात् जगदीश्वर हैं, महाज्ञानी हैं। आपको समझा सके, ऐसा जगत् में कौन है? महाराज, यदि वज्रपात से हिमशिखर खण्डित हो जाए, तो क्या उसकी पीड़ा से हिमशैल कहीं अधीर होता है? इस भवमण्डल में सुख-दुःख प्राणी को स्पर्श करता ही है। परन्तु अज्ञानी ही इससे मोहित होते हैं।” रावण ने शोकसंतत नेत्रों से मन्त्री की ओर देखकर कहा- “सब जानता हूं, पर मेरा हृदय हाहाकार कर रहा है।” फिर दूत की ओर देखकर कहा- “अरे, विस्तार से कह। कैसे मेरे वीर अजेय भ्राता का उस दाशरथि ने हनन किया?”

“महाराज, मैं वह अबूझ कहानी कैसे कहूं! जब मतवाले हाथी की भांति धनुर्धधर ने शत्रु-दल में प्रवेश किया, तब उसकी हुंकृति से शत्रु थर-थर कांपने लगे। वज्राग्रि की भांति उनके धनुष की टंकार सुनकर शत्रु भागने लगे। हे महाराज, उस समय वीरेन्द्र के गजयूथ और हाथी दल के पदाघात से जो घनाकार धूल उड़ी, उससे आकाश आच्छादित हो गया और देखते-ही-देखते वीरवर ने बाणों से समरांगण को छा दिया। वर्षा की बौछार के समान बाणों ने छूट-छूटकर काल-सर्प की भांति सहस्रों वानरों को ग्रस लिया। महाराज, महातेज महाराज कुम्भकर्ण ने अपने चरणों के आघात से पृथ्वी को कंपायमान करते हुए समरांगण में धनुष लेकर सात दिन विचरण किया तो वानरदल हाहाकार कर भाग चले।

“यम और वरुण से भी अवध्य महाबल कुम्भकर्ण को इस प्रकार अचल, अटल देख सातवें दिन अंगद ने सेना-नेतृत्व ले सेना को धैर्य दिया। समाश्वस्त किया। तब शत-सहस्र वानर-यूथ विविध शस्त्रास्त्र ले कुम्भकर्ण पर पिल पड़े। परन्तु दुर्मद कुम्भकर्ण ने उन सहस्रों वानरों को इस प्रकार मसल दिया, जैसे हाथी फूलों को कुचल डालता है। उनमें से बहुतों को समुद्र में फेंक दिया, बहुतों को आकाश में उछाल दिया। बहुतों के खण्ड-खण्ड कर डाले, बहुतों का हृदय विदीर्ण कर उनका रक्तपान किया। वानर प्राण ले भाग खड़े हुए। वानरों का ऐसा भयानक क्षय देख क्षोभ से हतप्रभ हो वानरेन्द्र अंगद ने ललकारा- “अरे ठहरो, ठहरो! भागते क्यों हो? चलो, आज या तो समर में शत्रु का हनन करेंगे या स्वयं क्षुद्र प्राणों को त्याग स्वर्गारोहण करेंगे। भय करने से क्या!”

“अंगद के ऐसे वचन सुन, मरने की ठान, जीवन की आशा छोड़ वानरों के यूथों ने फिर महातेज को घेर लिया। परन्तु महाराज कुम्भकर्ण ने सभी को मसल डाला और प्रबल-पराक्रम अंगद के वक्ष में शूल का प्रहार किया, जिससे अंगद मूर्च्छित हो भूमि पर गिर गया। यह देख वानरेन्द्र सुग्रीव ने भीमविक्रम से रथीन्द्र को आक्रान्त किया। मुहूर्त-भर दोनों का परम क्षोभकारी युद्ध हुआ। सुग्रीव रक्त से लथपथ हो भूमि पर गिर गया। इसी समय दाशरथि लक्ष्मण ने घोर रौद्रास्त्र वीरवर पर प्रयोग किया। उस अस्त्र से विद्ध होकर यह रक्षशिरोमणि राम के सम्मुख दौड़ा। अब महाबली लक्ष्मण ने फुर्ती से अनेक बाणों से उसके हृदय को छेद दिया। वे बाण इस प्रकार रक्षेन्द्र के वक्ष में घुस गए, जैसे सर्प बांबी में घुस जाता है। वीरेन्द्र के हाथ से गदा खिसक गई, शरीर से इस प्रकार रुधिर चूने लगा जैसे पर्वत से गेरू झरता है। तब वीरवर ने अन्तक के समान लक्ष्मण पर सहस्र भार का शूल फेंका। पर लक्ष्मण ने उसे मार्ग में ही काट डाला। यह देख कुम्भकर्ण धन्य-धन्य कहकर बोला- “अरे रामानुज, तेरा पराक्रम स्तुत्य है। पर मैं अभी दाशरथि राम से युद्ध चाहता हूँ।”

“वीरेन्द्र के ये वचन सुन राम ने कालबाण हाथ में लेकर युद्धक्षेत्र में प्रवेश किया। हाय, अब आगे क्या कहूं?”

“कह-कह, मैं सुन रहा हूं, तू वैरी राम का पराक्रम बखान कर।”

“कैसे कहूं? ज्यों ही राम ने अपना कुल-गोत्र कहकर धनुष-टंकार की और वीरेन्द्र ने लाल-लाल आंखें कर, काल की भांति छलांग मारी, त्यों ही उस वैरी राम ने बाणों से वीरेन्द्र को ढांप लिया। दाशरथि का हस्ताघव देख रक्षेन्द्र विस्मित हो गया। क्षतविक्षत हो, वानरों को मारकर वहीं भक्षण करने लगा। इस बीभत्स-व्यवहार से संत्रस्त हो वानर ‘त्राहि माम्, त्राहि माम्’ करने और भागने लगे। फिर तो ऐसा युद्ध हुआ कि देव-दैत्य स्तम्भित हो गए। अब राम-लक्ष्मण ने फुर्ती से शत-सहस्र बाणों से महातेज के दोनों हाथ काट डाले। तब वेदना और कष्ट से मुंह फैलाकर कुम्भकर्ण दोनों को खाने दौड़ा। इस पर लक्ष्मण ने उसका मुंह बाणों से भर दिया। पैर भी काट डाले। इसी समय दाशरथि ने ब्रह्मास्त्र धनुष पर रखकर फेंका जिससे रथीन्द्र का सिर कटकर चार धनुष दूर पृथ्वी पर जा गिरा। इसके बाद मुहूर्त-भर कबंध ने युद्ध किया। अन्त में समरांगण में उसका भूपात हुआ। हे राक्षस-कुलपति, रक्षेन्द्र, महातेज कुम्भकर्ण के साथ सभी राक्षस-तिल-तिल करके कट मरे। भाग्यदोष से अकेला मैं ही स्वामी को यह दारुण संदेश देने को जीवित बच गया हूं। मैं महातेज मृत्युंजय महाराज कुम्भकर्ण को असंख्य योद्धाओं के साथ शर-शय्या पर सोता छोड़ यहां आया हूं। हे महाराज, मेरा वध कराइए।”

रावण ने गहरी सांस खींचकर कहा- “धन्य है वीरधारी लंका! हे वीर भ्राता, आज तू जिस वीर-शय्या पर सो रहा है, उस पर सोने की कौन महाभाग इच्छा न करेगा! किन्तु हे वीरेन्द्र, तेरे बिना मैं जीवित कैसे रहूंगा? अरे वीर, एक बार उठकर शत्रुदल को अतल जल में डुबा दे। देखो, यह वीरधात्री कनकपुरी वीरशून्य हो गई, जैसे ग्रीष्म में वनस्पति पुष्पशून्य और नदी जलरहित हो जाती है!”

कुछ देर आंसू बहाकर रावण ने फणीन्द्र की भांति सांस भरते हुए कहा- “हे भ्राता, तेरे पराक्रम से मेरा वंश उज्ज्वल हो गया। अब इस काल-समर में मैं किसे भेजूं? कौन राक्षस-कुल का मान रखेगा? अब मैं ही जाऊंगा। अरे लंका के विभूषणों, आओ, युद्ध-साज सज लो। देखूंगा उस राघव को, उसमें कितना बल-वैभव है। अब पृथ्वी रावण या राम से रहित होने वाली है। उठो रे राक्षस वीरो, उठो, देव-दैत्य विजेताओं, उठो! जगज्जयी राक्षसकुमारो, आज मैं काल का सामुख्य करूंगा। इतना कहकर रावण ने स्वर्णसिंहासन त्याग दिया।

मेघ-गर्जन की भांति दुन्दुभि बज उठी, जिसके भैरव रव से देव, दानव, नर, नाग त्रस्त हो गए। योद्धा अंग पर शस्त्र धारण करने लगे। वक्रग्रीव घोड़े अश्वशाला से निकलने पर हिनहिनाने लगे। सुनहरी छत्रों से सुशोभित सहस्रों रथ घंटियों की झंकार करते हुए बढ़ चले। वीर सिरों पर लौहावरण पहन, बड़ी-बड़ी अमोघ ढालें हाथों में लिए, सुनहरी म्यानों वाली तलवारें कमर में बांध, शरीर को लौहकवच से आवृत्त कर श्रेणीबद्ध होने लगे। हाथों में अंकुश लिए, भीमकाय मदमत्त हाथियों को वश में करते हुए महावत साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र की भांति प्रतीत होने लगे। बड़े-बड़े डील के सुभट अपना विकराल परशु कन्धे पर उठाए, मृत्यु को चुनौती देते-से आगे आए। रणवाद्यों के गम्भीर निनाद से लंका हिल उठी। अश्व-व्यूह उल्लास से हिनहिनाने तथा गजसमूह चिंघाड़ने लगा। शंखों का भैरवनाद, धनुषों की कर्णकटु टंकार, तलवारों की झनझनाहट ने कानों को बहरा कर दिया। वीरों के पद-भार से कनक-लंका धरती में धंसने लगी।