महातेज कुम्भकर्ण

जैसे अंशुमाली भुवनभास्कर उदयाचल में चढ़ता है, उसी प्रकार महातेज, जगज्जयी रावण लंका के कोट कंगूरों पर चढ़कर, समर-क्षेत्र का निरीक्षण करने लगा। उसने एक विषादपूर्ण दृष्टि लंका के अपरिसंख्य स्वर्ण राजमन्दिरों पर डाली, जो अपनी मनोहरता से मन को मोह लेते थे। पुष्प-वाटिकाओं में कनक विहार-हर्म्य, कमलालयों में सरोवर की रजत-छटा तथा पुष्पित तरुराजि युवती के यौवन की भांति नेत्रों में मद दान देते थे। नगर की हाट-बाट रत्नों से भरी-पूरी थी, जैसे विधाता ने जगत् की सम्पदा सुचारु स्वर्ण-लंका के पदतल में पूजा-विधि से सजाई हो। हाय, आज यह राक्षसपुरी श्रीहीन शव की भांति हो रही है!

उन्नत, अटल, अचल, प्राचीरों पर सिंहविक्रम भट जो निर्भय सिंह की भांति घूमते थे, वे अब कहां हैं? लंका के सिंहद्वार सब बन्द हैं। उनके आस-पास असंख्य रथ, गज, अश्व और पदातिकों की रेल-पेल हो रही है। दूर तक फैली हुई बालुका में राम-सैन्य ऐसी दीख रही है, जैसे आकाश में नक्षत्र। वह देखो, पूर्व द्वार पर संग्राम में दुर्निवार वीर नल, केहरी के समान सावधान बैठा है। दक्षिण द्वार पर हाथी के समान असमबल अंगद और पश्चिम द्वार पर मारुति हनुमान सिंहनाद कर रहा है और उत्तर द्वार पर श्रीहीन राम-कौमुदीहीन चन्द्र के समान-सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण के साथ आसीन हैं। एक मास से इन्होंने तो मेरी लंका को ऐसा घेर लिया है, जैसे व्याध गहन कानन में सिंहिनी को जाल में फंसा लेता है। शृगाल, गिद्ध, शकुनि, श्वान और पिशाच निर्भय कोलाहल करते विचर रहे हैं। मृतकों की आंतों को खींच-खींचकर परस्पर लड़ रहे हैं। कोई रक्त पीकर तृप्त हो रहा है। मरे हुए हाथी कैसे भयानक प्रतीत हो रहे हैं! कितने रथ, रथी, अश्व, सादी, निषादी, शूली चकनाचूर खण्ड-खण्ड पड़े हैं। टूटे-फूटे भिन्दिपाल, वर्म, चर्म, असि, धनु, तूण, शर, मुद्गर और परशु पड़े हैं। तेजस्कर वीरों के शिरस्त्राण, मणिमय किरीट और कभी उन्हें धारण करने वाले सिर लुढ़क रहे हैं। हाय, हाय, जैसे किसान धान काटता है उसी भांति इस भिखारी राम ने मेरा सब कटक काट डाला है।

उसने आंख उठाकर दूर तक फैले हुए अनन्त सागर को देखा, सागर में बंधे सेतु को देखा, जिस पर बली वानरों का पहरा था। रावण ने दोनों हाथ फैलाकर कहा- “वाह रे, जलदलपति, क्या ही सुन्दर विजयमाल तूने कण्ठ में डाली है। अरे, अधम सागर, आज तू भी बन्धन में पड़ गया! रे जलदलपति, धिक्कार है तुझे! अब तू न अजय रहा न अलंघ्य। तू भी इस दाशरथि राम का क्रीत दास हो गया। तूने भी दासत्व की बेड़ियां पहन लीं। अरे निर्लज्ज, उठ! इस सेतु को तोड़-फोड़कर इस प्रबल रिपु को अतल तल में डुबोकर मेरे हृदय की ज्वाला को शान्त कर। अरे, तेरे ही बल पर स्वर्ण-लंका अजय कहने का गर्व करती थी।”

वीर दशानन के ऐसे कातर वचन सुनकर मन्त्रियों ने कहा- “महाराज, अब हमें राक्षसों के रक्षक महातेज कुम्भकर्ण की सहायता लेनी चाहिए। वह हमसे खिन्न और उदासीन होकर अपनी रत्नगुहा में कूटस्थ जा बैठे हैं। सो यह काल कूटस्थ होकर बैठने का नहीं है, वीर्य-प्रदर्शन करने का है। आज राक्षस-जाति के सम्मुख कुलक्षय का संकट समुपस्थित है, यह जानकर महातेज कुम्भकर्ण उदासीन नहीं रह सकते। वे हमसे क्रुद्ध होकर भी रक्षेन्द्र विभीषण की भांति वैरी राम के शरणापन्न नहीं हुए। इससे उनका हमारे प्रति प्रेम और आपके प्रति सौहार्द प्रकट है। फिर वे आपके सहोदर हैं। उन्होंने अपने प्रबल प्रताप से देव-दैत्य जय किए हैं। कौन ऐसा वीर्यवान् पुरुष संसार में है, जो सम्मुख समर में महातेज तपस्वी कुम्भकर्ण का सामना कर सके? महाराज, आप हमारे-सब राक्षसों के स्वामी हैं। आप जगदीश्वर हैं, पृथ्वीपति हैं, महातेज के ज्येष्ठ भ्राता हैं। सो मन्त्रियों सहित आप जब उनके पास पहुंचेंगे, तो उनका क्रोध विगलित हो जाएगा। वे शस्त्रपाणि होकर समर-भूमि में जाएंगे। उनके समरांगण में जाते ही हमारी पराजय जय में बदल जाएगी। उनके महत् तेजाश्रय हो, हम सब राक्षस वीर बात की बात में इन क्षुद्र वानरों को काट डालेंगे। हमारा तो यही मत है, आगे देव प्रमाण हैं!”

मन्त्रियों के ऐसे, हितकर, सारगर्भित, समयोपयोगी वचन सुनकर रावण महातेज कुम्भकर्ण के पास जाने को राज़ी हो गया। उसने आज्ञा दी- “ऐसा ही हो, सब कोई कुम्भकर्ण के पास चलें। बहुमूल्य उपानय साथ ले लो।” सौ स्वर्ण-कलश सुगन्धित मदिरा, सौ महिष, बहुत-से स्वर्णखचित वस्त्र और मणि ले महिदेव रावण, भाई कुम्भकर्ण को मनाने मन्त्रियों सहित उनकी रत्नगुहा पहुंचा। भेरी, शंख और मृदंगों का महानाद सुन कुम्भकर्ण रत्नगुहा से बाहर आया। उसने रक्षेन्द्र की प्रदक्षिणा कर उसका पूजन किया, चरणवन्दना की, फिर कहा- “राजन्, किस अभिप्राय से आपने मेरी एकान्त शान्ति भंग की? ऐसा क्या विषम संकट आप पर आया? आप तो स्वयं जगज्जयी, सर्वेश्वर हैं, मुझ मन्दकाम से आपका क्या प्रयोजन है?”

रावण ने भाई का आलिंगन किया, फिर लज्जित-सा होकर कहा- “भ्राता, यह कुलक्षय का संकट रक्ष जाति पर आ उपस्थित हुआ है। सीताहरण से संतप्त राम ने सब प्रमुख राक्षस धनुर्धरों को मार डाला है। एक मास से वह इस प्रकार रक्षकुल को भस्म कर रहा है जैसे दावानल वन को भस्म करता है। अब यह तेरे क्रुद्ध होने का काल नहीं है वीर। तू ही रक्षकुल का रक्षक और मेरी दक्षिण भुजा है। तेरे ही बल से मैं जगज्जयी कहाता हूं। तेरे बल से मैं लंका पर अबाध शासन करता हूं। कुलद्रोही विभीषण ने वैरी का आश्रय ले रक्षकुल को कलुषित किया। अब तू प्रसन्न हो, महातेज कुम्भकर्ण, राक्षसों की डूबती नैया को उबार ले। उस भिखारी दाशरथि से लंका को महाभय उत्पन्न हो गया है। हे वीरबाहु, अब तू ही उस भय से लंका की रक्षा कर सकता है।”

रक्षपति जगज्जयी रावण से ऐसे कातर वचन सुन महातेज कुम्भकर्ण शोक और क्रोध से अभिभूत हो अश्रुपूरित नयनों से हततेज रक्षेन्द्र को देख दुःखी होता हुआ बोला- “राजन्, मैंने तो पहले ही आपसे निवेदन किया था कि शत्रु-पत्नी सीता को लौटा दें। एक स्त्री के लिए राक्षसों के कुल को संकट में मत डालें। पर उस समय आपने अपने हितैषियों की बात पर कान नहीं दिया। आपने परम धर्मज्ञ आज्ञाकारी विभीषण को अपमानित कर शत्रु की गोद में धकेल दिया और मेरी भी अवमानना की। आज उसी का दुष्परिणाम आपके सामने आ रहा है। अपने हित की बात न मानकर अपने बल के घमण्ड पर आपने यह कुकर्म कर डाला, जो आप जैसे प्रतापी जगज्जयी के लिए अशोभनीय था। आप महाप्रज्ञ, सब शास्त्रों के ज्ञाता, वेदोपदेष्टा जगदीश्वर हैं, पर आपने परिणाम पर विचार ही नहीं किया। महाराज, जो काम देश-काल के विपरीत किए जाते हैं उनसे तो दुःख होता ही है। जो राजा नीतिशास्त्र के विपरीत आचरण करता तथा अपने मन्त्रियों की शुभ सम्मति की अवहेलना करता है, वह सदा ऐसे ही दुःख भोगता है। परन्तु जो राजा मन्त्रियों की उचित राय को स्वीकार कर लेता है तथा अपने सुहृज्जन को ठीक-ठीक पहचानता है, वह कर्तव्याकर्तव्य का ठीक-ठीक निर्णय कर सकता है। नीतिनिपुण पुरुष धर्म, अर्थ, काम इन तीनों का यथासमय उपभोग करता है। जो नृपति अपने बुद्धिमान् हितैषी मन्त्रियों से परामर्श करके समयानुसार साम, दाम, दण्ड, भेद और पराक्रम इन पांच प्रकार के योग का, नीति-अनीति का, धर्म, अर्थ, काम का यथावत् सेवन करता है, उसे कभी भी ऐसे संकट का सामना नहीं करना पड़ता। इसलिए राजा को तो अर्थशास्त्री मन्त्री की सम्मति पर ही चलना चाहिए, परन्तु जो मन्त्री अहित की बात को हित का रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही आपके और समूची रक्ष जाति के शत्रु हैं। खेद है कि लंका में ऐसे ही मन्त्रियों की प्रधानता है। यही देख मैंने राजसभा से किनारा किया। अब मुझसे आपका क्या प्रयोजन है?”

भाई कुम्भकर्ण के ऐसे नीति वाक्य सुन रावण चुपचाप पृथ्वी की ओर देखता रहा। उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। कुम्भकर्ण ने फिर कहना आरम्भ किया- “महाराज, जो राजा अपनी चंचल बुद्धि के कारण हितैषी पुरुषों को नहीं पहचानते, वही राजा शत्रुओं के अधीन होते हैं और जो राजा शत्रु की उपेक्षा कर अपनी रक्षा का प्रबन्ध नहीं करते, वे ही विपत्ति में पड़ते हैं। आपकी राजमहिषी भगवती मन्दोदरी ने भी यही उचित राय दी थी। भाई विभीषण ने भी यही कहा था और मेरी सम्मति भी उन्हीं के अनुकूल थी, पर आपने कुछ भी विचार नहीं किया। अपने हठ पर अड़े रहना ही आपने ठीक समझा।

“महिदेव, सोचिए तो, कहां आपकी कनक लंका और कहां अयोध्यापुरी! कहिए भाई, किस लोभ और किस कारण राम यहां आया है? मैंने तो सुना है-यह क्षुद्र नर सरयू-तीर बसता था, पर क्या वह आपका स्वर्ण-सिंहासन पाने के लिए यहां आकर युद्ध कर रहा है? हे वीर, उसे आप शत्रु कहते हैं, पर विचार तो कीजिए, इस कालरूप समराग्नि को किसने लंका में प्रज्वलित किया है, रक्षेन्द्र, आप तो स्वयं ही अपने कर्म-दोष से लंका को डुबोकर स्वयं भी डूब रहे हैं।”

रावण ने खिन्न-मन होकर कहा- “कुम्भकर्ण, तू मेरा इस प्रकार तिरस्कार क्यों करता है? भाग्यदोष से दोषी की निन्दा कोई नहीं करता।” इतना कह रावण शोक-निमग्न हो बैठ गया।

यह देख कुम्भकर्ण ने खड़े हो ऊर्ध्वबाहु होकर कहा- “अथवा इन बातों से अब क्या? मैं रक्षेन्द्र का अनुगत हूं। अन्नभुक्त हूं, आश्रित हूं। लंका का संकट मेरा भी संकट है। राक्षसों का क्षय मेरा भी क्षय है। मैं जगज्जयी रक्षेन्द्र का सहोदर हूं। जो आपका शत्रु है, मेरा भी है। मैं जब तक जीवित हूं, रक्षेन्द्र को क्या चिन्ता है! मैं पृथ्वी के किसी वीर की आन नहीं मानता। अब आप अपने भवन में निश्चिन्त आनन्द कीजिए। मैं समरांगण में जाता हूं। मैं आज ही राम-लक्ष्मण सहित सम्पूर्ण वानर सेना को रण में जय करके ही रक्षेन्द्र का मुख देखूंगा। वानरों के रक्त-मांस से राक्षसों का तर्पण करके राम-लक्ष्मण का गर्म रक्त स्वयं पान करूं, तभी मैं महातेज कुम्भकर्ण, विश्ववा का पुत्र कहाऊं। हे राक्षसेन्द्र, अब सन्ताप छोड़ दें, रोष को त्याग दें, स्वस्थ हों, मैं आपका सब ताप हरूंगा। आपके वैरी का समूल नाश कर डालूंगा। जो हित वचन मैंने कहे, वे तो बन्धु-भाव से, भ्रातृस्नेह से कहे थे। अब आप शीघ्र शत्रु का क्रन्दन सुनेंगे। राम-लक्ष्मण को अब मरा ही समझिए। राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमान को तो मैं भक्षण ही करूंगा।”

इतना कह महातेज, अमितविक्रम कुम्भकर्ण ने रक्षेन्द्र की प्रदक्षिणा की और सिर नवाकर प्रणाम किया। रावण ने आलिंगन कर रथिश्रेष्ठ, यम, वरुण से भी अवध्य महाबल कुम्भकर्ण को अश्व, गज, रथ तथा महारथ के सहस्र गुल्म दिए।

विजय की दुन्दुभि और भेरीनाद से दिशाओं को प्रकम्पित करता हुआ अजय गिरिकूट के समान महाकाय कुम्भकर्ण समरांगण में प्रविष्ट हुआ।