तुमुल युद्ध
रावण ने गर्जना और दुन्दुभि-निनाद सुनकर कहा- “यह क्या है? यह महानाद तो मेरे मन में शंका उत्पन्न कर रहा है। वैरी राम-लक्ष्मण तो दोनों ही पुत्र-इन्द्रजित् के शराघात से मरण-शरण हुए थे। फिर अब शोक-काल में यह हर्षनाद कैसा?”
इसी समय संत्रस्त, दीनमुख, विवर्ण दूतों ने आकर निवेदन किया- “हे रक्षेन्द्र, वे मायावी मानव फिर से जी उठे हैं। वे सब गुल्मपति भी उठ-उठकर वीरदर्प से नाद कर रहे हैं। महाराज, वानरों के दल-बादल स्वर्ण-लंका पर आक्रमण करने के लिए नये उत्साह से व्यूह-बद्ध हो रहे हैं। गरुड़ ने उन्हें विशल्य किया है, उन्हें अगद किया है।”
रक्षपति रावण दूतों से यह सुनकर चिन्ता और क्रोध से विवर्ण हो गया। वह भग्नदर्प, व्यथितेन्द्रिय अभिभूत-सा स्वर्णासन पर बहुत देर तक विमूढ़ बैठा रहा। फिर उसने शोक-संतप्त होकर कहा- “यह तो बड़ी ही अद्भुत बात है कि क्षुद्र मानव भी महेन्द्र के समान युद्ध करते हैं। देव, दानव, यक्ष, नाग से अवध्य होने पर भी इस मानव से मुझे भय उपस्थित हो गया है। ऐसा तो कभी सुना ही न था। वे अग्नि के समान देदीप्यमान बाण अब व्यर्थ हो रहे हैं। अब तो लंका पर संकट का भय उपस्थित हो गया-सा दीख रहा है।”
रावण के ऐसे कातर वचन सुनकर वीरेन्द्र त्रिशिरा ने कहा- “जगदीश्वर, आप तो त्रिभुवन के स्वामी हैं। फिर क्यों ऐसा विषाद करते हैं? आप निश्चिन्त रहें, मैं रणांगण में जाता हूं। देखूंगा कि वह राम कितना बल रखता है।”
त्रिशिरा के वचन सुन रावण उदग्र होकर हुंकृति करता हुआ बोला- “जाओ, मेरे सब शक्र-पराक्रम पुत्र जाएं और उस भिखारी राम को बांधकर मेरे सम्मुख ले आएं। आज मेरे रसोइए मेरे लिए उसी वैरी का मांस पकाएं।” यह कहकर उसने रत्नाभरणों से पुत्रों को पुरस्कृत किया, आशीर्वाद दिया और वे रावण की प्रदक्षिणा कर, अभिवादन कर, रथों में बैठ रणांगण की ओर चले। मरेंगे या मारेंगे, यही उनका दृढ़ निश्चय था। वानर-सैन्य भी व्यूह-बद्ध सन्नद्ध खड़ी थी। आमना-सामना होते ही तुमुल घमासान आरम्भ हो गया। देखते ही देखते भूमि रक्त से भर गई। अभी पूरा सूर्योदय भी नहीं हुआ था।
पहले धूम्राक्ष अपने सात गुल्म लेकर समरांगण में उतरा। धूम्राक्ष अजेय योद्धा था। उसकी सेना में मंजे हुए सैनिक थे। वे सब परिघ, पट्टिश, शूल, दण्ड, धनुष, बाण, परशु, शक्ति, मुद्गर, भिन्दिपाल, पाश लेकर हाथियों, रथों पर चढ़, व्यूह बना, बरसाती नदी की वेगवती धारा के समान वानरी सैन्य में घुस गए। सबके बीच में स्वर्ण-कवच पहने, मणिमाल कण्ठ में डाले, अमितविक्रम धूम्राक्ष रथ में बैठकर चला, जिसमें छः अश्वतरी जुती थीं। दस भारवाही शकट उसके साथ बाणों से लदी चलीं। उसकी रथ-ध्वजा पर गिद्ध की मूर्ति बनी थी।
धूम्राक्ष की विजयवाहिनी को इस प्रकार वेग से आता देख मारुति ने मोर्चा संभाला। उन्होंने एक कोण में पीछे हटकर अपने गुल्मों को व्यूहबद्ध किया। धूम्राक्ष मार करता हुआ धंसा ही चला गया। अब अवसर पाकर एक बगल से हनुमान् तथा दूसरी ओर से नील ने उसे धर दबोचा। जैसे सरौते के बीच सुपारी कटकर दो टूक हो जाती है, उसी प्रकार धूम्राक्ष का व्यूह बीच से कट गया। दोनों खण्ड वानरों ने घेर लिए। धूम्राक्ष तनिक भी विचलित हुए बिना विकट युद्ध करने लगा। उस समरांगण में ऐसा घमासान मचा कि शत्रु-मित्र का भी ध्यान न रहा। धूम्राक्ष ने तीन दिन विकट युद्ध किया। अन्त में महावीर मारुति और धूम्राक्ष का द्वन्द्व हुआ। बहुत देर तक दोनों वीरों ने गदा युद्ध किया। अन्त में उनकी गदाएं परस्पर टकराकर टूट गईं। तब दोनों वीर गुंथ गए। अन्त में अवसर पाकर मारुति ने धूम्राक्ष का पैर पकड़कर पत्थर की शिला पर दे मारा, जिससे उसका भेजा फटकर निकल गया, सिर चकनाचूर हो गया।
धूम्राक्ष को मरा देख राक्षस भयभीत होकर भागने लगे। वानरों ने हर्ष से जय-जयकार किया। अब मायावी वज्रदंष्ट्र दस गुल्मों का अधिनायक आगे बढ़ा। युद्धोन्मत्त वज्रदंष्ट्र दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने लगा, जिससे वानरों की सेना ‘त्राहि माम्-त्राहि माम्’ करने लगी। रथ की नेमिका, धनुष की टंकार, भेरी और मृदंग का तुमुल नाद आकाश में व्याप गया। पाशधारी यम की भांति वज्रदंष्ट्र वानरों को कालरूप दीखने लगा। बड़े-बड़े धैर्यवान् वानर उसे देखकर भागने लगे। यह देख अंगद वज्रगर्जना कर उसके सम्मुख आए। दोनों वीरों में मुहूर्त भर शूल, शक्ति, मुद्गर, परशु से द्वन्द्व हुआ। उनके चारों ओर राक्षस और वानर विकट समर कर रहे थे। अन्ततः वज्रदंष्ट्र अंगद के चंगुल से छूट, दूर हट गया तथा रथ पर आरूढ़ हो बाण-वर्षा करने लगा। उसने तीन दिन निरन्तर युद्ध किया। अन्त में अंगद से उसका द्वन्द्व हुआ।
उसने काकपत्र बाणों से अंगद को जर्जर कर दिया। अंगद ने विषम पराक्रम से गदा से उसके रथ को तोड़, सारथी और घोड़ों को मार दिया। विरोध होने पर वज्रदंष्ट्र भूमि पर खड़ा हुआ। इसी समय अंगद ने उसकी छाती में गदा का प्रहार किया। इस पर वह झूमता और रक्तवमन करता हुआ अपनी वज्रमुष्टि में गदा लिए ही भूमि पर गिर गया। पर कुछ देर में उठकर उसने अंगद की छाती पर गदा-प्रहार किया, जिससे अंगद रक्तवमन करने लगे। फिर अंगद के प्रहार से उसकी गदा टूट गई। तब दोनों गुंथकर लात-घूसों से लड़ने लगे। लड़ते-लड़ते दोनों ही रक्त-वमन करने लगे। फिर दोनों ने ढाल-तलवार से असि-युद्ध किया। लड़ते-लड़ते थककर वे घुटनों के बल बैठ गए। पर दूसरे ही क्षण अंगद ने उछलकर उसका सिर काट लिया। वानर हर्ष से चिल्ला उठे। राक्षस भयभीत होकर भागने लगे।
वज्रदंष्ट्र की मृत्यु से संतप्त देवान्तक, त्रिमूर्धा, महोदर और त्रिशिरा काल-भैरव की भांति इक्कीस गुल्म सेना से आवृत्त आगे बढ़े। ये सभी राक्षस राजपुत्र महारथी योद्धा थे। इनके रथ मेघ के समान गरजते हुए चले। अब ऐसा युद्ध हुआ कि धूल से आच्छादित संग्राम-भूमि में रथ, ध्वजा-पताका, ढाल-तलवार कुछ भी न दीख पड़ी। अपने-पराए का ध्यान छोड़ युद्धमत्त वानर और राक्षस, जो सम्मुख पड़ा उसी के प्राण लेने लगे। युद्धभूमि शवों से, टूटे-फूटे रथों से, मरे-अधमरे हाथियों घोड़ों और योद्धाओं से पट गई। सहस्रों भीमकर्मा वानर परिघ घुमा-घुमाकर राक्षसों का दलन कर रहे थे। सेनापति त्रिशिरा में असीम बल था। वह अप्रतिहत गति से वानरी सैन्य को चीरता बढ़ा आ रहा था। बढ़ते हुए वह वहां आ पहुंचा, जहां कुमुद, नल और मैन्द राक्षसों का दलन कर रहे थे। उसने कहा- “अरे सारथी, हमारा रथ तनिक यहां रोका। मैं पहले इन दुर्मद वानरों का हनन करूं।” इतना कह उसने इन तीनों यूथपतियों को बाणों से छलनी कर दिया। अपने तीन गुल्मपतियों पर संकट देख हनुमान् हुंकार भरकर आगे बढ़े और उन्होंने त्रिशिरा के रथ को हठात् रोक वज्रगदा से तत्काल ही घोड़ों को मार डाला। त्रिशिरा रथ से कूद पड़ा। दोनों वीरों में प्रथम गदा-युद्ध, फिर असि-युद्ध हुआ। अन्त में त्रिशिरा क्षत-विक्षत हो रक्त वमन करता हुआ भूमि पर गिर गया। अमित पराक्रमी हनुमन्त को वानरों ने हर्षोल्लास से अभिनन्दित किया। उसने पांच दिन युद्ध किया।
अब क्रोधान्ध हो दुराधर्ष देवान्तक और नरान्तक अचिष्मती नाम की लौह गदा ले वेग से वानरों की सेना में घुस पड़े। उनकी गदा की मार से वज्राहत शैल की भांति अनगिनत वानर मर-मरकर भूमि पर गिरने लगे। भय से वानरों की आंखें फट गई, शरीर कांपने लगा, साहस टूट गया। इसी समय देव-दानव-दर्प-भंजक, महातेज अतिकाय सूर्य के समान देदीप्यमान रथ पर चढ़ आगे आया, उसे देखते ही वानर चीत्कार करके भागने लगे। इस अतिकाय को कालमेघ के समान रथ पर बैठे, गर्जन करते हुए काकुत्स्थ राम ने दूर से देखा। उन्होंने आश्चर्य से विभीषण से पूछा- “कोसौ धनुष्मान् हयशतेन युक्ते स्यन्दने स्थित: पर्वतकाश:?”
विभीषण ने कहा- “एषोऽतिकायो रावणानुज-सुतः देवदानवदर्पहा।”
अतिकाय ने वानरों से युद्ध नहीं किया। वह रथ को आगे बढ़ाया वहां पहुंचा, जहां राम-लक्ष्मण थे। उसने पुकारकर कहा- “रथस्थितोऽहम्, न प्राकृत कश्चन योधयामि। यस्यास्ति शक्तिर्दातु मेद्य युद्धम्!”
इस पर क्रुद्ध होकर सौमित्र लक्ष्मण तुरन्त उसके सम्मुख आ अपना नाम कह धनुष-टंकार करने लगे। सौमित्र के धनुष की टंकार सुन उन्हें आगे बढ़ते देख, महाबली अतिकाय ने धनुष पर बाण चढ़ाते हुए कहा- “रे सौमित्रे, बालस्त्वमसि, गच्छ-गच्छ, किं कालसंकाशं मां योधयितुमिच्छसि?”
सौमित्र ने हंसकर कहा- “आत्मानं कर्मणा सूचय, न विकत्थितुमर्हसि। यो पौरुषेण युक्तस्स तु शूर इति।”
सौमित्र के वचन सुन अतिकाय ने क्रुद्ध हो लक्ष्मण पर आशीविष बाणों की अविरल वर्षा कर उन्हें ढांप लिया, परन्तु लक्ष्मण ने उन्हें अर्धचन्द्र से काट डाला। अब अतिकाय ने खीझकर पांच बाण एक ही साथ मारे। लक्ष्मण ने उन्हें काटकर घोर ज्वलित ब्रह्मास्त्र को मन्त्रपूत कर अतिकाय पर छोड़ा। वह महाग्नि-दीस महास्त्र कालदण्ड के समान अतिकाय के आयुधों को छिन्न-भिन्न कर उसके किरीटजुष्ट सिर में जा लगा, जिससे उसका सिर शिरस्त्राण-सहित हिमवंत श्रृंग की भांति सहसा भूमि पर आ गिरा। दुर्जय महाकाय को इस प्रकार छिन्नमस्तक भूमि पर गिरते देख, राक्षस हाहाकार करते चारों ओर भाग चले। उन भागते हुओं को उदग्रवीर्य वानरों ने उछल-उछलकर और दबोचकर पीस डाला। जो जीवित बच रहे, लंका पहुंच रक्षराज के सम्मुख आ, भूपतित हो रुदन करने लगे। इस प्रकार सोलह दिन राक्षस सेनानायकों ने घोर युद्ध किया।