Harsa-Vishad

शरविद्ध राम-लक्ष्मण को निःस्पन्द, निश्चेष्ट, मृतवत् रण-भूमि में निपतित देख, वानरेन्द्र सुग्रीव भय और शोक से भर गया। दोनों नर-शार्दूलों के अङ्गोपाङ्ग बाणों से छिदे पड़े थे। वे अत्यन्त मन्द वेग से धीरे-धीरे श्वास ले रहे थे। वानरेन्द्र सुग्रीव को भयभीत, वाष्पलोचन, दीन, क्रोध से व्याकुल देख राक्षसमणि विभीषण ने कहा- "अलं त्रासेन सुग्रीव, निगृह्यतां बाष्पवेगः, एतौ महाबली महात्मानौ मूर्च्छितौ हि नाम, मृत्युकृतं भयं नास्ति, न कालोऽयं क्लैव्यमवलम्बितुम्। तस्मात् वानरेन्द्र, आत्मानं पर्यवस्थापयतु, सर्वकार्यविनाशनं क्लैव्यमुत्सृज्य, रामपुरोगाणां च सैन्यानां हितमनुचिन्तयअथवा रक्ष्यतां रामो यावतसंज्ञाविपर्ययः। आत्मानम्श्वासव, स्वकं बलं चाश्वासय, अहं च सैन्यानि सर्वाणि पुनः संस्थापयामि।"

इस प्रकार सुग्रीव को आश्वासन दे, गदापाणि विभीषण द्रुतगति से सेना में घूम-फिरकर वानरों को प्रबोध देने और वानर-सैन्य को व्यवस्थित करने लगे। वानरों के यूथ चारों ओर से आ-आकर राम को घेर उनकी यत्न से रक्षा करने लगे। वे बड़े चौकन्ने हो इधर-उधर, ऊपर-नीचे बड़ी सावधानी से राक्षसों को जांचने लगे। इसी समय वीर्यवान स्थिरसत्व राम की मूर्च्छा खुली। उन्होंने पास ही भूमि पर, निःस्पन्द, निश्चल, बाणविद्ध, रक्तप्लुत, लक्ष्मण को पड़े देखकर कातर होकर कहा- "अब सीता को लेकर और जीवित रहकर मैं क्या करूंगा! इन नेत्रों से मैं आज अजेय लक्ष्मण को इस प्रकार भूमि में सोता देख रहा हूं! मैं अब माता कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा से क्या कहूंगा, जो पुत्र-दर्शन की लालसा से ही जी रही हैं? भरत शत्रुघ्न को ही मैं क्या उत्तर दूंगा! अरे, ये तो आग्रहपूर्वक मेरे साथ वन में आए थे। अब इनके बिना मैं अयोध्या कैसे जा सकता हूं? अरे लक्ष्मण तू तो अवसाद करने पर मुझे आश्वासन देता था। आज मुझे आर्तनाद करता देख बोलता भी नहीं है! अरे, जैसे तू मेरे साथ-ही-साथ वन में आया था, अब वैसे ही मैं तेरे साथ मृत्यु की शरण जाऊंगा। मित्र सुग्रीव, तू अंगद और सब सैन्य को लेकर किष्किन्धा लौट जा। अरे मित्र, तूने खूब मित्रता निभाई। मित्र को जो करना चाहिए, वह सब तूने किया। मित्र का धर्म तूने पूरा कर दिया। अब मेरी अनुमति से तू सैन्य-सहित घर लौट जा!"

इसी समय विभीषण सब सैन्य को व्यवस्थित कर वहां लौटे। उन्होंने राम को शरविद्ध और लक्ष्मण को भूलुण्ठित देख व्यथित हो जल हाथ में लेकर उनके नेत्रों का मार्जन किया।

इसी समय ज्वलन्त अग्नि के समान वैनतेयगरुड़ वहां पहुंचे। उन्होंने दोनों भाइयों को विशल्य किया, अगद किया। सुपर्ण वैनतेय के स्पर्श करते ही उनके घाव भर गए। राम ने लक्ष्मण को अंक में भर लिया। वानर यूथपतियों को भी गरुड़ ने विशल्य किया, अगद किया। राम और लक्ष्मण सहित सब यूथपतियों को विशल्य, नीरुज देख वानर हर्ष-गर्जना और जय-जयकार करने लगे। हर्षाश्रुपूर्ण लोचनों से राघवेन्द्र विभीषण और सुग्रीव से गले मिले। फिर गरुड़देव को अंक में भर कहा- "मायावी इन्द्रजित् ने अदृश्य रहकर अपूर्व कौशल से हमें शरविद्ध कर दिया, हम महान् संकट में पड़ गए थे। आपकी महती कृपा से हमें पुनर्जीवन मिला। हमारे प्राण आपके कृतज्ञ हैं।" यह कह राघव ने उनका आलिंगन किया।

गरुड़ ने कहा- "अच्छा हुआ, रावण के मनोरथ पूरे होने से पूर्व ही मैं आ पहुंचा। अब आपकी जय हो रामभद्र? मैं चला।"

गरुड़ ने राम की प्रदक्षिणा की और चला गया। राम-कटक में इसी क्षण दुन्दुभि बज उठी। वानरों के जयनाद से लंकापति जड़ हो गए।