संग्राम
सूर्योदय के साथ ही रणभेरी का गगनभेदी निनाद करती राम-सैन्य ने चारों ओर से लंका पर आक्रमण कर दिया। लंका में भी युद्ध के धौँसे बजने लगे। चीत्कार करते हुए राक्षस भट बड़े-बड़े शस्त्र ले-लेकर कंगूरों और बुर्जियों पर चढ़ गए। देखते-ही-देखते वानर और राक्षस परस्पर प्रहार करने लगे। उनके शस्त्रपात, हुंकार, ललकार, चीत्कार से जो कोलाहल हुआ, उससे लंका की पौरवधुएं और बालक भयभीत हो भूगर्भों में जा छिपे। बहुत स्त्री-जन ठौर-ठौर रोने लगीं। सहस्रों वानर साहस कर लंका की खाई पार कर कोट-कंगूरों पर जा चढ़े, जिन पर भयानक बाणों और शूलों की वर्षा होने लगी।
अपनी सेना को भलीभांति व्यवस्थित कर, वानरराज सुग्रीव ने अपने श्वसुर महाबली सुषेण को साथ लेकर एक बार लंका के चारों ओर घूमकर सब मोर्चों का निरीक्षण किया। लंका से समुद्र-तट तक वानर-ही-वानर दीख पड़ते थे तथा राक्षस सब लंका में घिर गए थे। परन्तु वे प्रलय-काल की भांति सब कोट-कंगूरों पर घूम रहे थे। चारों ओर शस्त्र-वर्षा हो रही थी। देखते-ही-देखते असंख्य वानर लंका के कंगूरों पर चढ़कर उन्हें ढाने तथा वहां के रक्षकों से लोहा लेने लगे। राक्षस और वानर लड़ते हुए परस्पर लिपटे हुए खाई में गिरने लगे। लंका के स्वर्णद्वार और गोपुर ढहने लगे। तीव्र गर्जना करते हुए वानर असह्य वेग से लंका पर पिल पड़े। सेनापति, वीरबाहु, सुबाहु, नल और पनस ने लंका के कोट पर चढ़ एक बुर्ज अधिकृत कर लिया। सहस्रों वानर फुर्ती से उनके चारों ओर एकत्र हो युद्ध करने लगे। महाबाहु, प्रसभ और कुमुद भी उनकी रक्षा के लिए उनकी पीठ पर पहुंच गए। शतबली ने दक्षिण द्वार पर असम विक्रम दिखाया तथा तारा के पिता सुषेण ने पश्चिम द्वार पर धसारा कर दिया। वह बलपूर्वक द्वार भंग कर नगर के मध्यभाग में जा घुसना चाह रहा था। उत्तम द्वार पर राम-लक्ष्मण थे, जिनकी पीठ पर सुग्रीव, विभीषण, धूम्र डटे थे तथा गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन ने अपने-अपने यूथों को श्री राम की अंग-रक्षा में नियुक्त किया।
दोनों ओर की जय-जयकार शंख और भेरी के तुमुल नाद तथा घायलों की चीत्कार से कानों के पर्दे फटने लगे। दुन्दभियां मेघ-गर्जन के समान गरजने लगीं। घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड़, रथों की सहस्र घंटिकाओं से पृथ्वी, आकाश और समुद्र भी ध्वनित हो उठे। धीरे-धीरे युद्ध घमासान हो चला, जैसे पहले देवासुर संग्राम हो चुका था। गदा, शक्ति, शूल, परशु हवा में उछलने लगे। पत्थर, वृक्ष आदि की मारामार चली। भिन्दिपाल और शूलों की चोटें चलने लगीं। बड़े-बड़े सेनानायक घोड़ों और हाथियों पर कवच धारण किए आगे बढ़ने लगे। उन्होंने द्वार खोल दिए और सम्मुख युद्ध करने लगे। बराबर के प्रमुख योद्धा द्वन्द्व में रत हो गए। बालि-पुत्र अंगद अमितविक्रम इन्द्रजित् से भिड़ गया। प्रजंघ के साथ सम्पाति, जम्बुमाली के साथ हनुमान्, शत्रुघ्न के साथ विभीषण भिड़ गए। तपन के साथ गज, निकुम्भ के साथ नील, प्रघंस के साथ सुग्रीव और विरूपाक्ष के साथ लक्ष्मण का द्वन्द्व होने लगा। अग्रिकेतु, रश्मिकेतु, मित्रघ्न और यक्षकोप ने सम्मिलित हो श्री राम को घेर लिया। मैन्द के साथ वज्रमुष्टि, द्विविद के साथ अशनिप्रभ, सुषेण के साथ विद्युन्मणि युद्ध करने लगे। इस प्रकार चारों ओर महारथियों का ऐसा द्वन्द्व मचा कि भूलोक थर्रा गया।
इन्द्रजित् ने क्रुद्ध हो अपनी गदा का प्रहार अंगद पर किया। अंगद ने वार बचा अपनी गदा से एक ही प्रहार से इन्द्रजित् का रथ भंग कर दिया और सारथी-सहित घोड़ों को मार डाला। प्रजंघ ने सम्पाति को बाणों से बींध डाला। इस पर व्याकुल हो सम्पाति ने प्रजंघ को हाथों में उठाकर भूमि पर दे मारा। जम्बुमाली ने रथ पर आरूढ़ हो हनुमान् पर शक्ति फेंकी। शक्ति मारुति के वक्ष में लगी। मारुति ने प्रबल वेग से रथ पर चढ़ उसे उसी क्षण मार डाला। प्रतापन भीषण गर्जना करता हुआ नल पर झपटा और उसने बाणों के प्रहार से नल के शरीर को छेद डाला। नल ने तत्क्षण उसकी आंखें फोड़कर उसे अन्धा कर दिया। प्रघंस को इसी समय सुग्रीव ने मार डाला। विरूपाक्ष और लक्ष्मण का तुमुल बाण-युद्ध हुआ। अन्त में लक्ष्मण के बाणों से विद्ध हो उसने प्राण त्यागे। अग्रिकेतु, रश्मिकेतु, मित्रघ्न और यक्षकोप ने बाणों की मार से श्री राम को घेर लिया, परन्तु राम ने एक ही वार में चार अग्निबाणों के प्रहार से उन्हें मार डाला। मैन्द ने वज्रमुष्टि के रथ पर चढ़ उसे मुक्कों ही से मार डाला। निकुम्भ ने नील पर सौ बाणों की वर्षा की और हंसने लगा। नील ने उसका रथ तोड़ सारथी को मार डाला। अशनिप्रभ ने द्विविद को अपने तीखे बाणों से वेध दिया। द्विविद ने उसे आटे की भांति गूंध डाला। विद्युन्माली और सुषेण का भीषण गदायुद्ध एक मुहूर्त तक होता रहा। अन्त में विद्युन्माली मुंह से खून थूकता हुआ भाग खड़ा हुआ। इस समय बारह योजन विस्तार में लंका के चारों और घनघोर युद्ध हो रहा था, जिसमें शक्ति, गदा, तोमर, बाण, खड्ग और शिलाओं का खुला प्रयोग हो रहा था। मरे हुए योद्धाओं, घोड़ों, हाथियों की लोथें रक्त-सागर में तैर रही थीं। सूर्यास्त हो गया, परन्तु दोनों ही ओर के योद्धा उसी प्रकार लड़ते रहे। संग्राम-भूमि बीभत्स हो उठी।
उस दुष्पार अन्धकार में क्रोधोन्मत्त राक्षस वानरों का वक्ष चीर-चीर कर वहीं उन्हें खाने लगे। वानर भी भयंकर कोप कर हाथियों, घोड़ों, रथों, ध्वजाओं को विदीर्ण करने लगे। इससे लोमहर्षक समरांगण में रक्त की नदी बह चली। वह रात्रि काल-रात्रि के समान दुरतिक्रमा हो गई। अंगद ने भीम विक्रम से इन्द्रजित् का रथ तोड़ डाला, घोड़े मार डाले, सारथी को भी मार डाला। इस पर मायावी इन्द्रजित् रथ से कूद अंतर्धान हो गया। यह देख वानर हर्ष से चिल्ला उठे। सुग्रीव ने अंगद को हर्ष-गदगद हो कण्ठ से लगा लिया। परन्तु इसी समय अकस्मात् अदृश्य रहकर मायावी मेघनाद ने राम-लक्ष्मण को घेरकर चौमुखी बाण-वर्षा से उन्हें ढांप लिया। दोनों राघव दिव्यास्त्रों से युद्ध करने लगे, पर इन्द्रजित् अदृश्य रहकर बाण-वर्षा कर रहा था। किसी अज्ञात दिशा से बाण आ-आकर उन्हें बींध रहे थे। इस प्रकार राम और लक्ष्मण का संकट सन्निकट देख अपने दोनों पुत्रों सहित सुषेण, अंगद, शरभ, मारुति, हनुमान्, द्विविद, मैन्द, नील और ऋषभस्कन्ध, ये दस यूथपति दोनों भाइयों को चारों ओर से घेर उनकी रक्षा करने लगे। पर महाबली इन्द्रजित् ने नौ बाणों से नील को, तीन-तीन बाणों से मैन्द और द्विविद को आहत कर दिया तथा पराक्रमी शरभ के हृदय में एक बाण मारा। वेगवान् हनुमान् को विद्ध कर अत्यन्त पराक्रमी ऋषभस्कन्ध और सुषेण तथा उनके पुत्रों को दो-दो बाण मारे तथा अंगद को अनेक बाणों से छेद डाला। वानर सैन्य में कोलाहल मच गया। चारों ओर से सिमट-सिमटकर वानर वानर-यूथपतियों और राम-लक्ष्मण के चारों ओर आ जुटे। चारों ओर से बाणों का चक्र, वर्षा की बौछार की तरह वानर भटों को बींधने लगा। परन्तु बाण कौन कहां से बरस रहा है, यह पता नहीं लगता था। राम ने दस यूथपतियों को ललकार कर शत्रु का पता लगाने का आदेश दिया। परन्तु वे सभी समर्थ यूथपति वानर बाणों से विद्ध क्षत-विक्षत हो झूम-झूमकर पृथ्वी पर गिरने लगे। राम-लक्ष्मण के भी सर्व देह में बाण बिंध गए। उनके शरीर से झर-झर रक्त झरने लगा। बाण निरन्तर आ-आकर बिंध रहे थे। अब चारों ओर से नागशरों ने राम-लक्ष्मण को फांस लिया। वे अद्भुत नागबाण पाश की भांति हर ओर से उन्हें जकड़ने लगे। मार्मिक आघातों से जर्जर हो, नागपाश से बद्ध, अवश, रक्त और बाणों से भरे, दोनों राघव सिंह भारी-भारी श्वास लेते हुए मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।
यह देख विभीषण सहित सब वानर हाहाकार करने लगे। राम-लक्ष्मण को दस यूथपतियों सहित मृतक मान, हर्षोन्मत्त मेघनाद ने जोर से सिंहगर्जना की, जिससे राक्षस जय-जयकार करने लगे। मेघ के समान गरजकर मेघनाद ने अदृश्य रहते हुए कहा- "ये महाबली खरदूषण के हन्ता दोनों मानुष भ्राता यहां मेरे बाणों से मरे पड़े हैं।" इतना कह, महाबाहु रावणि अट्टहास करके हंसने लगा : "अरे राक्षस वीरो, देखो-देखो, हमारे शस्त्र से शरविद्ध दोनों भाई मर गए। अब तुम आनन्द करो।" कूटयोद्धा रावणि से ऐसे वचन सुन हर्षोन्मत्त राक्षसों ने महानाद किया। राम मर गया-यह जानकर रावणि की रणक्षेत्र में पूजा की। इन्द्रजित् अरिंदम दोनों भाइयों को निःस्पंद भूमि में पड़ा देख, उन्हें मरा समझ हर्ष से फूला हुआ लंका में चला गया। हर्षोल्लास से लंका झूम उठी। घर-घर बधाइयां बजने लगीं। वीरेन्द्र की बड़ाई शत-सहस्र मुख से हुई। पौरवधुओं ने उसपर लाजा-विसर्जन किया। सूत बन्दियों ने विरद गाई। रक्षेन्द्र लंकापति ने वीर पुत्र को हृदय से लगाया, आनन्दाश्रु से उसका शिर सिक्त किया। उस पुत्र से पुत्रवान् होने से अपने को सराहा।