राम-व्यूह
राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण, अंगद, हनुमान् और जाम्बवन्त सहित शरभ, सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल, नील आदि यूथपों और सेनानायकों की युद्ध-समिति बैठी।
राम ने कहा-“प्रथम गदापाणि रक्षेन्द्र विभीषण अपना मत कहें।”
“महाराज, मेरी आज्ञा से मेरे चारों मंत्री, अनल, पनस; सम्पाति और प्रमति वेश परिवर्तित कर लंका में जा, वहां की सब गतिविधि और व्यवस्था देख आए हैं। लंका के पूर्व द्वार का रक्षक प्रहस्त है और दक्षिण के महाबली महापार्श्व और महोदर हैं। पश्चिम द्वार पर इन्द्रजित् मेघनाद नियुक्त है और उत्तर द्वार शुक, सारण आदि राक्षस सेनाधिपतियों और मन्त्रियों-सहित स्वयं राक्षसराज रावण ने अपने अधिकार में लिया है। नगर के मध्य भाग में शूल, मुद्गर, धनुष आदि शस्त्रों से सज्जित महासेनापति विरूपाक्ष नियुक्त हुआ है। रावण की सेना में दस सहस्र हाथी, दस सहस्र घोड़े और अनगिनत योद्धा हैं। वे सभी अमित पराक्रमी हैं। वे रावण से प्रेम करते हैं। रावण भी उनका विश्वास करता है। इन्हीं योद्धाओं के बल पर रावण ने त्रिलोक जय किया था। मैं आपको भयभीत करने को यह निवेदन नहीं कर रहा हूं। वस्तुस्थिति निवेदन कर रहा हूं। अतः अब आप समुचित व्यूह रच अपने पराक्रम को प्रकट कीजिए।”
विभीषण के उपयुक्त वचन सुन राम ने क्षण-भर विचार कर कहा-“पूर्व द्वार पर सेनापति नील अपने यूथपतियों को लेकर आक्रमण करें, बालिपुत्र युवराज अंगद दक्षिण द्वार पर और मारुति हनुमान् पश्चिम द्वार को आक्रान्त करें। उत्तर द्वार पर मैं लक्ष्मण-सहित लंकापति रावण का अपने बाणों से सत्कार करूंगा। नगर के मध्य भाग पर तेजस्वी सुग्रीव, जाम्बवान् और राक्षसेन्द्र विभीषण आक्रमण करेंगे। कोई भी वानर मानवरूप न धारण करेगा। ‘वानर’ रूप ही हमारा आज का गुप्त संकेत शब्द होगा। मैं, लक्ष्मण और अपने चार मन्त्रियों सहित राक्षसेश्वर विभीषण, बस ये सात पुरुष मानववेष में युद्ध करेंगे।”
यह व्यवस्था कर राम-लक्ष्मण अपने मन्त्रियों तथा सेनापतियों सहित सुबेल पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ गए। वहां पहुंचकर उन्होंने लंका की गतिविधि पर दृष्टि डाली। लंका पर विहंगम-दृष्टि डालकर राम ने कहा-“यह दुरात्मा रावण अपने अहं के सामने न अपने कुलशील का विचार करता है, न धर्माधर्म ही का। उसने कामवश हो अपनी मर्यादा के विपरीत यह निन्दित कर्म कर डाला है, जिस पर उसे पश्चात्ताप भी नहीं है। परन्तु अधर्म और इन्द्रिय-दासता ही मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाकर उसकी बुद्धि को कुण्ठित कर देती है। अस्तु, कल सूर्योदय के साथ ही यह सुन्दर-सम्पन्न लंका दुर्दशाक्रान्त हो जाएगी, जिसका सम्पूर्ण दायित्व लंकापति रावण पर ही होगा।”
श्री राम इतना कह मौन हो गए। उन्होंने सीता के दुःख और अवश अवस्था का ध्यान किया। फिर उन्होंने मन्द स्वर में कहा-“देखो लक्ष्मण, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं और गगनचुम्बी हर्म्यों के स्वर्ण-कलश इस अस्तंगत सूर्य की रक्तिम धूप में कैसे चमक रहे हैं। बीच में अनेक विशाल वाटिकाएं भी बहुत हैं, जिनमें चम्पा, अशोक, मौलसिरी, साख, तमाल, ताड़, कटहल, नागकेसर, हिंताल, अर्जुन, कदम्ब, तिलक, कर्णिकार आदि के पुष्पित वृक्ष, लताओं से आच्छादित अपनी मनोहरता से इन्द्रपुरी अमरावती की शोभा को भी लज्जित कर रहे हैं। कुबेर का रथ और इन्द्र का नन्दन वन भी उद्यानों की समता नहीं कर सकता। पपीहा, कोयल आदि इन उद्यानों को मुखरित कर रहे हैं। नगर-द्वार श्वेतवर्ण मेघों के समान दीख रहे हैं तथा राज-भवन और देव-मन्दिरों के भव्य गुम्बज अपनी शोभा की समता नहीं रखते।”
विभीषण ने कहा-“वह सहस्र खम्भोंवाला रावण का सभाभवन है, जो अपनी ऊंचाई के कारण कैलास-सा दीख पड़ रहा है। सहस्र महाबली राक्षस इस सभाभवन की रात-दिन रखवाली करते हैं। यह दैत्यों और राक्षसों की स्वर्णमयी लंका नाना वैभवों से परिपूर्ण है। धन-धान्य, स्वर्ण-रत्न, सुरा-सुन्दरी, आनन्द-विलास ऐसा पृथ्वी पर और कहीं नहीं है।”
अकस्मात् उसकी दृष्टि रावण पर पड़ी, जो स्वर्ण-कंगूरों पर चढ़कर राम-सैन्य का निरीक्षण कर रहा था। उसने रावण की ओर इंगित करके कहा-“यही दुर्जय रावण है, जिसके दोनों ओर चंवर डुलाए जा रहे हैं, जिसके सिर पर विजय-छत्र सुशोभित है। शरीर पर रक्तचन्दन का लेप है, जो स्वर्णतार-खचित वस्त्र ओढ़े जलद के समान दीख रहा है।”
विभीषण के ये वचन सुन सुग्रीव आदि वानर-नायक कौतूहल से राक्षसपति को देखने लगे।
राम ने कहा-“वीरो, शीघ्र ही यह रावण द्वारा पालित, दुर्लध्य लंकापुरी राक्षसों के रुधिर से लाल हो जाएगी। आओ, हम उपयुक्त स्थल पर चलकर सेना को व्यूह-बद्ध करें।”
इतना कहकर श्री राम सब सेनापतियों और यूथपतियों सहित शीघ्रता के साथ अपने कटक की ओर लौट पड़े।