रणभेरी
असंभाव्य, अतर्कित, अकल्पित वानर-कटक द्वारा दुर्लध्य समुद्र-तरण का समाचार सुन रक्षेन्द्र रावण हतबुद्धि हो गया। उसने अपने शुक, सारण नामक दो मन्त्रियों को बुलाकर आज्ञा दी कि वे शत्रु-सैन्य में जाकर राम का बलाबल देखें। दोनों मंत्री वानर का वेश धारण करके शिविर में प्रविष्ट हुए, परन्तु वे चैतन्य-मूर्ति विभीषण से नहीं छिप सके। उसने उन्हें पहचानकर बन्दी बना लिया और राम के सम्मुख उपस्थित किया। राम के सम्मुख आ उन्होंने जीवन से निराश हो, भयभीत स्वर में कृतांजलि होकर कहा-“महाराज, हम दोनों रक्षेन्द्र महीपति के अनुगत सचिव हैं। रक्षेन्द्र की आज्ञा से आपका बलाबल देखने आए थे। सत्य बात हमने निवेदन कर दी।”
राम ने किंचित हंसकर कहा-“तो यदि तुमने हमारा सम्पूर्ण बल देख लिया है और तुम्हारा अभिप्राय पूरा हो गया है तो तुम जा सकते हो। पर यदि कुछ देखने को रह गया हो तो रक्षेन्द्र विभीषण तुम्हें सब कुछ दिखा देगा। तुम लंका जाकर लंकापति रावण से कह देना कि कल उसकी दुर्ग और तोरणों से सुरक्षित, सुप्रतिष्ठित लंका पर मेरा आक्रमण होगा। तब मैं भी राक्षसों का बल देखूंगा और उनका बाणों से सत्कार करूंगा।”
इतना कह राम ने दूतों को मुक्त कर दिया। वे राम को प्रणामकर लंका में आए। उन्होंने रावण की सेवा में उपस्थित होकर निवेदन किया-“देव, वानर-कटक का प्रधान सेनापति महासुभट नील है और उसका सहायक अमितविक्रम बालिपुत्र अंगद है। प्रबल-पराक्रमी नल जिसने दुस्तर समुद्र का सेतु-बंध किया है, पचास सहस्र योद्धाओं का अधिपति है। सरोचन पर्वत का स्वामी महाबलि कुमुद, भीमकर्मा चण्ड, साल्वेग का स्वामी शरभ, ये सब चालीस-चालीस सहस्र योद्धाओं के यूथपति हैं। पनस महासेनापति जो देव-दैत्य सभी में अजेय है और वानर-सैन्य के मध्यदेश का रक्षक है, पर्वत के समान विशालकाय है। उसके सहायक सेनानायक गव-गवय अमितविक्रम हैं। फिर महातेजस्वी हर है, जिसमें दस हाथियों का बल है। नील मेघ के समान प्रबल पराक्रमी सेनाधिप धूम्र है, जो अक्षवान् पर्वत का स्वामी है। नर्मदा के तट का स्वामी जाम्बवान् यूथपतियों का प्रधान है, जिसके समान नीतिज्ञ मन्त्री पृथ्वी पर दुर्लभ हैं। फिर दम्भ और पितामह सन्मादन हैं, जिन्होंने संसार के बड़े-बड़े संग्राम जीते हैं। देवासुर-संग्रामों में भी इन्होंने भाग लिया है। महासेनापति प्रमाथी युद्ध में अजेय है। गवाक्ष, केसरी विन्ध्य देश के अधिपति हैं। सुग्रीव के दस मन्त्री बृहस्पति के समान नीति और धर्म के ज्ञाता हैं। इस वानर-सेना में भूमण्डल के देवों, गन्धर्वों और यक्षों के नरपति सम्मिलित है। योद्धाओं के अग्रगण्य मैन्द और द्विविद हैं, जिनका साम्मुख्य पृथ्वी का कोई पुरुष नहीं कर सकता। फिर लंका को अग्नि की भेंट करनेवाला हनुमन्त मारुति है। फिर यमपुत्र कुबेर और वारुणेय भी आपसे अपना वैर चुकाने आए हैं।
“सुग्रीव को श्री राम ने बालि को मारकर वानरपति बनाया है। पर आपके सिंहासन पर विराजमान रहते ही राम ने कुलद्रोही विभीषण को लंकाधिपति-पद पर अभिषिक्त कर दिया है। अब वह गदापाणि विभीषण सारे ही वानर-कटक में रक्षपति कहाता है। इन सब अमितबल पराक्रमशील यूथपतियों, यूथों और सेनापतियों तथा असंख्य योद्धाओं के अतिरिक्त दिव्यास्त्रों के प्रयोक्ता राघवेन्द्र हैं, जिनके जैसा हस्त-लाघव, अस्त्र-सिद्धि और रण-धैर्य पृथ्वी पर दूसरे नर-पुङ्गव का नहीं है।
“सुग्रीव ने बड़े ही चातुर्य से अपने सेनानायकों के साहचर्य से गरुड़-व्यूह बनाया है, जिसके वाम पक्ष पर गद्र का पुत्र जाम्बवान् और उसका भ्राता ऋक्षराज धूम्र है। महावीर सुषेण और चन्द्रपुत्र दधिमुख दक्षिण पक्ष पर हैं। मैन्द और द्विविद पृष्ठरक्षक हैं। गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन ये पांच यमपुत्र चच्चु भाग में अवस्थित हैं। उदरस्थली में सुग्रीव और विभीषण-सहित हनुमन्त-रक्षित महातेज राम हैं। इस प्रकार राम समुद्र के दक्षिण तीर पर पड़ाव डालकर अवस्थित हैं।”
शुक, सारण के सारगर्भित वचन सुनकर रावण ने गरजकर कहा-“को हि नाम सपत:, सर्वलोकभयादपि न सीतामहं दद्याम्। यदि देव-गन्धर्व-दानवा अपि मामभियुञ्जीरन्न मां सतरे जेतुमर्हन्ति।”
उसने अपनी समूची राक्षस सैन्य को सन्नद्ध होने की आज्ञा दे दी। समस्त मंत्रियों और सेनापतियों को सभाभवन में बुला भेजा। लंका के प्रत्येक दुर्ग, कोट, कंगूरों पर रखे धौंसे बज उठे, सहस्र तूणीर गगनभेदी निनाद करने लगे। भयानक भेरी-नाद से गगन मण्डल थर्रा उठा। हाथी सजने लगे, घोड़ों पर कवच और वज्र चढ़ाए जाने लगे। सहस्रों अश्वारोही अस्त्र-शस्त्रास्त्रों को चमकाते लंका के राजपथ पर चारों ओर से सिमट-सिमटकर आकर जुटने लगे। सारे ही राजपथ सैनिकों से भर गए। लंका में भीति, व्याकुलता और आशंका व्याप गई। चारों ओर उस वानर की चर्चा होने लगी, जिसने लंका जलाई है। अब तो अनगिनत वानरों की सेना आई है। अब क्या होगा? लंका के सब रास-रंग, पानगोष्ठी, कारोबार, व्यापार बन्द हो गए। धनपति अपने धन-रत्न भूमि में छिपाने लगे। कुलवधुएं अपने प्रिय पतियों को युद्ध का बाना सजा रणस्थली में जाता देख पछाड़ खाकर गिर पड़ीं। माताओं ने पुत्रों को खड्गहस्त युद्ध में जाते देख अश्रुविमोचन किया। सभी कहने लगे-“कैसी यह दुर्भाग्यी सीता है, जो सम्पूर्ण लंका के प्राणों का संकट आ बनी है। कैसी इस महामति महिदेव की दुर्मति हुई है कि इसने असंख्य देवांगना सुन्दरियों के रहते इस स्त्री के लिए सारी ही राक्षस जाति पर संकट और मृत्यु की छाया ला दी है।”
इसी समय वानरी सैन्य में रण-भेरी बज उठी। हजारों शंखों, दुन्दुभियों तथा भेरियों के भीषण रव से लंका हिल उठी। रक्षपति जगज्जयी रावण किसी भय से क्षण-भर को अवसन्न हो गया।