राजसभा
वानरों के दल-बादल समुद्र-तट पर आ पहुंचे हैं, इसकी सूचना चरों ने रावण को दी। रावण ने आज्ञा प्रचारित की - सब सभासद सभा भवन में उपस्थित हों। राक्षस संदेशवाहक रावण का आदेश लंका के भवनों में, शयन-गृहों में, क्रीड़ा-स्थलों में, उद्यानों में जाकर राक्षस-सामंतों और सभासदों को सुना आए। सभासद शस्त्र और वस्त्र से सज्जित हो, राजाज्ञा पा कोई रथ पर, कुछ हाथियों पर, कुछ पालकियों पर चढ़कर राजसभा को चले। कुछ पैदल ही चल दिए। सभासदों की सवारियों से लंका के राजपथ भर गए। चहल-पहल से, लोगों की बातचीत से मुखरित हो उठे। उन्हें देखने को उत्सुक नागर जहां-तहां भीड़ बनाकर खड़े हो गए। पौर-वधुएं झरोखों से झांकने लगीं।
रक्षेन्द्र भी सोने की जाली और मणि-मूंगों से सुशोभित रथ पर आरूढ़ हो सभा-भवन को चला। ढाल-खड्ग धारण करने वाले अनेकों शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित राक्षस उसके आगे-आगे चले। अनेक बलवान् राक्षस उसे दायें-बायें और पीछे से घेरकर चले। रथवाले रथों पर, हाथीसवार हाथियों पर, घुड़सवार घोड़ों पर, हाथ में तोमर, गदा, शूल लेकर रावण के साथ चले। उस समय सहस्रों भेरियां बज रही थीं, जिनसे गम्भीर शब्द होता था। आगे-आगे बन्दीजन स्तुति गाते जा रहे थे। इस प्रकार अपनी स्तुति सुनता रावण सभा-भवन में जा पहुंचा। उसके वहां पहुंचते ही तुमुल शंखध्वनि हुई। रावण के रथ पर चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र शोभायमान था। उसके दोनों ओर स्फटिक मणि के निर्मित स्वर्ण-मंजरियों से युक्त चंवर और पंखे झले जा रहे थे। इधर-उधर प्रमुख राक्षस सुभट, सभासद सिर झुकाए खड़े थे। इस प्रकार अमिताभ रावण उस अपूर्व सभा में जा सोने की वेदी पर, जो स्फटिक मणि के फर्श पर बनी थी और जहां रत्नजटित सुनहरी काम का बिछावन बिछा था, रखे रत्नसिंहासन पर बैठ गया। इस भवन के रक्षक छ: सौ पिशाचों ने भूमि में गिर रक्षेन्द्र को प्रणाम किया। अन्य सभासद भी रक्षेन्द्र को प्रणाम कर-करके चौकी, आसन और आसन्दियों पर बैठ गए। ये सब सभासद प्रत्येक कार्य की सुगम से सुगम व्यवस्था करने में कुशल और समुचित-समयानुकूल मत देने में निपुण थे। इसी समय राक्षसेन्द्र विभीषण, कुम्भकर्ण और युवराज मेघनाद भी अपने-अपने श्रेष्ठ घोड़ों के स्वर्णरथों पर बैठ सभा में आ अपना नाम कह रक्षेन्द्र के चरणों में प्रणाम कर अपने आसन पर आ बैठे। रावण के आठों मंत्री भी अपने-अपने आसनों पर बैठ गए।
विविध-मणि-माणिक्य-हीरकजटित बहुमूल्य वस्त्रों को धारण किए, अगर, चन्दन और पुष्प-मालाओं की सुगन्ध से सभा-भवन को सुरभित करते हुए वे चतुर और सभ्य सभासद सभा की शोभा बढ़ाने लगे। उनमें न तो कोई जोर-जोर से चिल्लाकर बोलने वाला था-न असत्यवादी। सभी राक्षस अत्यन्त पराक्रमी और शूरवीर थे। वे सभी रावण का मुंह ताक रहे थे। इस प्रकार उन महाबली शस्त्रधारी मेधावी सभासदों के बीच में बैठ रावण दिव्य सुषमा धारण कर रहा था।
सबके यथास्थान बैठ जाने पर रावण ने कहा-“सभासदो, संसार में उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के पुरुष होते हैं। जो पुरुष मित्रों, हितैषियों और सम्बन्धियों के परामर्श से काम करते हैं वे उत्तम; जो अकेले ही सब काम करते हैं, वे मध्यम और कार्य के गुण-दोषों की विवेचना बिना किए हठपूर्वक, ‘करूंगा’ इसी तरह कहकर किसी हित-बन्धु की आन न मान, कार्य करते हैं, वे अधम कहलाते हैं…
“पुरुषों की भांति निश्चय भी तीन प्रकार के होते हैं। जिस निश्चय में नीति-शास्त्र तथा मन्त्र एकमत होता है वह उत्तम; जिसमें मतभेद हो पर अन्त में बहुमत से निश्चय हो वह मध्यम और जिसमें मन्त्र स्पर्धा करे, विरोध-भाव प्रकट करे, अन्त तक एकमत होने पर भी अविश्वस्त रहे, वह अधम है।
“इसीलिए सभासदो और मन्त्रियो, आपको ज्ञात है कि हमारा शत्रु राम लंका पर अभियान करने के विचार से आगे बढ़ रहा है। इसलिए आप लोग विचार करके सर्वसम्मत निश्चय करें। अब कोई-न-कोई निश्चय कर लेना परमावश्यक हो गया है। अब आप वही सोचें जिसमें राक्षसों का कल्याण हो तथा हमारी लंका को दुर्दिन का मुंह न देखना पड़े। धर्म, अर्थ और काम-विषययक कठिनता उपस्थित होने पर आप ही लोग प्रिय-अप्रिय, लाभ-हानि, सुख-दुख, हित-अहित का विचार करने में पूर्ण समर्थ हैं। आप लोगों की सम्मति से प्रारम्भ किया गया मेरा कोई भी काम कभी निष्फल नहीं गया। आप ही के सहयोग से मैं दुर्लभ राज्यलक्ष्मी भोग रहा हूं। मैंने जो काम किया है उसके विषय में भी मैं आप लोगों से पहले सम्मति लेना चाहता था, पर ऐसा न कर सका। अब मैं कहता हूं कि मैं दण्डकारण्य से अपने वैरी दाशरथि राम की पत्नी हर लाया हूं। राम से यद्यपि मुझे भय नहीं है, फिर भी इस सम्बन्ध में विचार तो कर लेना चाहिए। फिर आगामी कार्यक्रम की योजना बनानी चाहिए। आप ही की सहायता से मैंने पृथ्वी को जय किया है तथा देवेन्द्र को बन्दी बनाया है। आप लोग अब भी मेरे सहायक हैं। अब सीता का पता लगाकर दोनों मानवकुमार समुद्र के उस पार आ पहुंचे हैं तथा इस पार आने का उद्योग कर रहे हैं। यद्यपि उनका यह प्रयत्न हास्यास्पद है, फिर भी हमें ऐसा उपाय सोच रखना चाहिए, जिससे दोनों भाई मारे जाएं और सीता को लौटाना न पड़े। आपकी ही योजनानुसार मैं कार्य करूंगा। मैं तो यही समझता हूं कि वानरी सेना के लिए समुद्रोल्लंघन अत्यन्त दुष्कर है। फिर भी यदि वह यहां आ भी जाए तो संसार में कोई ऐसी शक्ति मैं नहीं देखता हूं, जो संग्राम में मुझे विजित कर सके।”
रावण के ये वचन सुन कुम्भकर्ण ने रोषभरे स्वर में कहा-“महाराज, जब आपने सीता का हरण किया, तब हमसे सम्मति नहीं ली। यह काम अत्यन्त अनुचित हुआ। हरण से पूर्व ही आपको परामर्श करना उचित था। राजा के जिस कार्य का परिणाम-भोग प्रजा को भोगना पड़े, उसमें उसकी राय लेनी ही चाहिए। जो राजा भली-भांति मंत्रियों से विचार-विमर्श करके कार्य करता है, उसे कभी पछताना नहीं पड़ता। पर जो विपरीत कार्य मंत्रियों की सलाह के बिना किए जाते हैं, उनका परिणाम सदा दोषयुक्त होता है। जो पुरुष पहले किए जाने वाले काम को पीछे और पीछे किए जाने वाले काम को पहले करता है, वह नीतिशास्त्र से सर्वथा अनभिज्ञ है। स्थिर बुद्धिवाला पुरुष विचारशील और शक्तिशाली होता है। वह शत्रु के दोष को देखता रहता है तथा जहां शिथिलता पाता है, वहीं आक्रमण करता है तथा यज्ञ का भागी होता है। महाराज, आपने बिना ही विचार किए यह क्षुद्र कर्म कर लिया, जो महा अनिष्ट-कारक हो सकता है। राम का बल जनस्थान में देख लिया गया है। मैं तो यह समझता हूं कि आपने बलवान् शत्रु से अविचारपूर्ण दूषित छेड़छाड़ प्रारम्भ कर दी है, जिससे आपके विश्व-विश्रुत सुनाम को कलंकित होने का भय उपस्थित हो गया है। यदि आपकी इस भूल के परिणामस्वरूप हमारी सारी तपस्या, विश्व-विजय की भगीरथ प्रयत्न तथा रक्ष-संस्कृति ही खतरे में पड़ जाए, सम्पन्न लंका पर संकट आ पड़े और आनन्द में मग्न राक्षसों का सर्वनाश उपस्थित हो जाए, तो महाराज वह आप ही का दोष होगा। राजन् मैंने आपके वंश और प्रतिष्ठा के लिए प्राणान्तक युद्ध किए। आपका शत्रु चाहे कैसा ही बलवान् था, मैंने उसे मार डाला। भले ही उसकी सहायता को इन्द्र, वरुण, कुबेर, मरुत् और सब दैत्य-दानव भी आए, पर मेरे हाथ से उसकी रक्षा न सके। परन्तु इस स्वेच्छाचारितापूर्ण दुष्कर्म में मेरा आपसे कोई सहयोग नहीं है। मैं शत्रु का पक्ष नहीं लेता, परन्तु आपकी अनीति का अनुमोदन भी नहीं करता। अतः इस संभावित युद्ध में आप मुझसे कुछ भी आशा न रखना। मेरी इच्छा तो अब कुछ दिन एकान्तवास की है। मैं रत्नगुहा में जाता हूं। आपका कल्याण हो!” इतना कहकर महातेज कुम्भकर्ण स्वर्णसिंहासन त्याग उठ खड़ा हुआ। इस पर रावण ने क्रुद्ध होकर दर्प से कहा-“कुम्भकर्ण, समुद्र के समान मेरे वेग और वायु के समान मेरी गति को न जानकर ही वह दाशरथि वानर-सेना ले इस ओर बढ़ा चला आ रहा है। इस प्रकार पर्वत की गुहा में सोए हुए सिंह और सोते हुए काल के समान उसने मुझे छेड़ा है। भयंकर सर्प के समान संग्राम में छूटे हुए मेरे बाणों को राम ने कभी नहीं देखा है। इसी से उसने यह दु:साहस किया है। किन्तु मैं अपने धनुष से छूटे हुए वज्र के समान अगणित अग्निबाणों से उसे भस्म कर डालूंगा। जिस प्रकार सूर्य उदय होते ही नक्षत्रों की कान्ति नष्ट कर देता है, उसी प्रकार मैं इस वानर कटक को देखते-ही-देखते नष्ट कर डालूंगा। मुझे तेरी आवश्यकता नहीं है। मेरी ओर से तू रत्न-गुहा में शाश्वत एकान्तवास कर। मुझ सहोदर से तेरा क्या प्रयोजन है?”
रावण के ये वचन सुन कुम्भकर्ण रावण को प्रणाम कर, बिना उत्तर दिए, सभा-भवन से चला गया।
रक्षेन्द्र रावण के वचन सुन, शत्रु-बल से अपरिचित और नीतिशास्त्र से शून्य राक्षस यूथपति योद्धा हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोले-“महाराज! परिघ, शूल और पट्टिश आदि शस्त्रों से सुसज्जित विशाल अजेय सेना हमारे पास है। फिर चिन्ता किस बात की है? इसी सेना द्वारा आपने भोगपुरी के नागों को वश में किया, अलका के कुबेर को आक्रान्त किया, देवेन्द्र को बन्दी बनाया और सुरलोक को जय किया। वरप्राप्त बलवान दानव भी आपके समक्ष नहीं ठहर सके। यमलोक, देवलोक और आर्यवीर्य सभी तो आपकी विजय-दुन्दुभियों से थर्रा उठे। फिर इस हतवीर्य राम की क्या बिसात! हे महाराज, जब तक इन्द्रजयी मेघनाद और अकथविक्रम कुम्भकर्ण आपकी आज्ञा के अधीन हैं, आपको किस बात की चिन्ता है!”
अब नील मेघ के समान वर्ण वाला प्रहस्त बद्धांजलि खड़ा होकर बोला-“रक्षेन्द्र की जय हो, हम लोग तो युद्ध में देव, दैत्य, यक्ष, नाग, गन्धर्व, पिशाच किसी को भी गिनते ही नहीं। फिर इन दो एकाकी राज-भ्रष्ट मानवों की क्या बात है! हम सब बेखबर थे। शत्रु के आक्रमण का विचार न भी था-इसी से वह धूर्त वानर हमें धोखा दे गया। लंका को भस्म करके जीवित बच निकला। अब वह सब वानरों को काल के मुंह में धकेलने को ला रहा है।”
दुर्मुख, सेनानायक ने खड़े होकर कहा-“हे पृथ्वीपति, हनुमान् का यह उत्पात तो हमारा-आपका सबका अपमान है। आप आज्ञा दीजिए, मैं अकेला ही जाकर समुद्र-तट पर उस वानर-सहित सब वानरों को मृत्यु की भेंट करूं।”
अब महाबली वज्रदंष्ट्र सेनापति अपने भयंकर परिघ घुमाता हुआ बोला, “महिदेव प्रसन्न हों, मैं तो यह कहता हूं कि जिस प्रकार हो, शत्रु पर विजय पानी चाहिए। मेरा मत है कि बहुत से राक्षस, जो इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं, निर्भीक हो राम के पास मानवों के वेश में जाकर मानवी भाषा में कहें कि हमें आपकी सहायता के लिए आपके भाई ने अयोध्या से भेजा है। इस प्रकार सेना में जा मिलें। फिर अवसर पाकर शस्त्र-वर्षा कर वानरों को मार डालें।”
इसके अनन्तर रक्षकुमार निकुम्भ ने क्रोध में भरकर कहा-“अरे वीरो, आप यहीं महाराज की सेवा में उपस्थित रहें, मैं अकेला अभी जाकर उन दोनों भाइयों को मार उनका हृदय निकाल लाता हूं।”
तब भूधराकार वज्रहनु बोला-“कुमार को कष्ट देने का क्या काम है! इतना-सा काम तो मैं अकेला ही कर लाऊंगा। दो मानवों को मार लाने में मुझे कितनी देर लगेगी!”
तदनन्तर रभस, सूर्यशत्रु, सुसभ्र, यक्षकोप, महापार्श्व, महोदर, अग्निकेतु, दुर्धर्ष, रश्मिकेतु, इन्द्रशत्रु, प्रहस्त, विरूपाक्ष, वज्रदंष्ट्र, धूमाक्ष, दुर्मुख आदि राक्षस परिघ, पट्टिश, शूल, प्रास, परशु, धनुष और खड्ग लेकर अमर्ष से ओतप्रोत एकबारगी ही वज्र-गर्जना करके बोले-“रक्षेन्द्र महीपति महिदेव की जय हो! महाराज की आज्ञा से हम आज ही समुद्र-तीर पर जाकर वानरों सहित दोनों मानवों को मार डालते हैं। आप हमें आज्ञा दीजिए!”
इस पर धैर्य और राजनीति के परम ज्ञानी, राजमर्यादा के ज्ञाता विभीषण ने उठकर रावण के सम्मुख आ प्रणाम करके कहा-“हे परन्तप, आज्ञा पाऊं तो निवेदन करूं! जब से आप लंका में दाशरथि राम की पत्नी को लाए हैं, मैं अनेक-विध अपशकुन देख रहा हूं। मन्त्रों द्वारा यथाविधि आहुतियां देने पर भी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती। उसमें चिनगारियां निकलने लगती हैं। उसकी ज्वाला धूमिल हो जाती है। प्रज्वलित अग्नि भी धुएं के कारण काली पड़ जाती है। अग्निहोत्रशाला और वेदभवनों में सांप दिखाई देते हैं। यज्ञ-सामग्री में चींटियां दीख पड़ती हैं। गजराजों का मद सूख गया है। घोड़े दीन-दुर्बल हो गए हैं। गायों का दूध सूख गया है। गधों, खच्चरों और ऊंटों के शरीरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और उनकी आंखों में आंसुओं की धार बह चलती है। कौओं के झुण्ड मिलकर ठौर-ठौर कर्कश शब्द करते हुए भवनों पर आ बैठते हैं। गिद्ध भी नगर पर मंडराते हैं। सन्ध्याकाल में सियार नगर के निकट आ अमंगल शब्द बोलते हैं। ये सब अत्यन्त विपज्जनक अपशकुन मैं लंका में नित्य देखता हूं। सारी प्रजा देखती है, पर आपके मंत्री आपसे इन बातों को कहने में संकोच करते हैं। हे तात, जहां साम, दान और भेद इन तीनों उपायों से काम सिद्ध न हो सके, वहीं दण्ड-नीति का उपयोग करना चाहिए। जो असावधान हो, दैवी प्रकोप से पीड़ित हो, ऐसे ही पुरुष पर विचारपूर्वक किया गया बल-प्रयोग उपयोगी सिद्ध होता है। परन्तु राम असावधान नहीं है। वह विजय की कामना से आ रहा है। उसके पास सेना भी यथेष्ट है। वह स्वयं अजेय और पराक्रमी है। विशाल दुर्लध्य समुद्र को लांघने वाले रामदूत हनुमान् ही के पौरुष पर आप विचार कीजिए। ऐसे-ese न जाने कितने असम साहसी वीर उसकी सेवा में हैं। इसलिए महाराज, हमें राम के बल की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और विशालकाय महा-उत्पात करने वाले वानर जब तक लंका से दूर हैं, तब तक आप इस विशाल नागिन सीता को लौटा दीजिए। इसी में राक्षस कुल की भलाई है। आप अकारण की रार को टाल दीजिए।”
विभीषण के ये वचन सुन मेघनाद ने वीरदर्प से कहा-“हे पितृव्य, भीरु पुरुषों के समान यह आप क्या कह रहे हैं? नीच-कुलोत्पन्न प्राणी भी ऐसे भीरु वचन नहीं कहता-आप तो प्रतापी पौलस्त्य हैं, जिनका वीर्य जग-विख्यात है। भला कहीं मानव और पशु भी हम राक्षसों की समता कर सकते हैं! मैंने त्रिलोकपति इन्द्र को बन्दी बनाया, ऐरावत को दांत पकड़कर पृथ्वी पर पछाड़ दिया। सो हमें देवता और दानव किसी का भय नहीं है। इस राज्य-भ्रष्ट भिखारी राम की भला क्या बिसात है?”
विभीषण ने कहा-“पुत्र, तू, शस्त्रधारियों में मूर्धन्य है। हमारे कुल का शिरोमणि है। अमितविक्रम है, परन्तु तेरी आयु के समान तेरी बुद्धि भी अभी परिपक्व नहीं है। तू हिताहित और कर्तव्याकर्तव्य पर विचार नहीं कर सकता। जो वचन तूने कहे हैं-इनसे रक्षकुल का अनिष्ट ही होगा। तू बाल-बुद्धि से यह कह रहा है और कालरूप, यमदण्ड के समान भयंकर उस दाशरथि के पराक्रम से अपरिचित है। मेरी यह निश्चित सम्मति है कि दाशरथि राम की पत्नी सीता को धन-रत्न, आभूषण-वस्त्र और विभिन्न मणियों सहित राम को भेंट कर रक्षेन्द्र इस आसन्न संकट को टाल दें तथा आनन्द से निर्भय लंका का साम्राज्य भोगें।”
विभीषण के इन वचनों से रावण क्रुद्ध हो गया। उसने कहा-“अरे भ्राता, शत्रु और सर्प के साथ रहना तो फिर भी निरापद है, परन्तु शत्रु पक्षपाती बन्धु के साथ रहना अत्यन्त भयानक है। मैं जानता हूं कि हमारे विमलयश रक्षकुल में कुछ ऐसे कुल-कलंक हैं जो रक्षकुल पर विपत्ति आने पर प्रसन्न हो सकते हैं। वे अपने ही कुल का तिरस्कार करते हैं। ऐसे ही दुरात्मा तुम भी हो। तुम जैसे कुलद्रोही से तो भय ही है। तुम शत्रु के प्रशंसक और कुल के निन्दक हो। यह जातिभय सब भयों से भयानक है। आज जो अखिल विश्व में मेरी विजय-वैजयन्ती फहरा रही है, मेरे नाम का डंका बज रहा है, मैंने जो विश्व के कुलीनों और ऐश्वर्यवानों के सम्मुख समर में पराभव करके जगज्जयी की पदवी प्राप्त की है, वह सब तुझे नहीं सुहाती। तू ईर्ष्यालु और दुरात्मा है। जैसे हाथी स्नान के बाद धूल उछालकर अपने शरीर को मैला कर लेता है, वैसे ही तू भी कुल-कलंक है। तुझ कुल-निन्दक को मृत्युदण्ड देना उचित है। परन्तु तू मेरा सहोदर भाई है, मैं तुझे केवल धिक्कार सहित त्याज्य घोषित करता हूं। तू राक्षसों की लंका तथा यशस्वी रक्षकुल को त्यागकर अभी यहां से निकल, यही तेरे लिए राजाज्ञा है।”
विभीषण ने शान्त वाणी से कहा-“रक्षेन्द्र, आप पितृतुल्य मेरे ज्येष्ठ भ्राता और रक्षपति हैं, इससे मैं आपकी आज्ञा मानकर अभी लंका को त्यागता हूं। अधर्म-प्रवृत्ति होने से आपने मुझे कठोर वचन कहे हैं। हतभाग्य पुरुष हितकारी वचन नहीं सुनते। अप्रिय और हितकारी बात कहने और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ हैं। शोक है कि आप विनाशक कालपाश में बंध चुके हैं। हतायु पुरुष पथ्य को नहीं देखता। ऐसा होता ही है। काल के वशीभूत होने पर बड़े-बड़े यशस्वी जगज्जयी प्रतापी शस्त्र-शास्त्रों के ज्ञाता भी मूढ़वत आचरण करते हैं। आपकी आज्ञा मानकर मैं जाता हूं। आप अपने इन हितैषी राक्षसों सहित लंका की रक्षा कीजिए। आपका कल्याण हो!”
इतना कहकर विभीषण तुरंत उठकर अपनी भीम गदा हाथ में ले सभा-भवन से चल दिए। उनके पीछे ही उनके चारों मंत्री भी उठकर सभा-भवन से बाहर हो गए।