Abhiyan (The Expedition)
सुग्रीव ने कूच के नगाड़े बजवा दिए। सबसे आगे सेनापति नील अपने अग्रगामी दल को लेकर चला। सुग्रीव ने कहा-“सौम्य, तुम पथ-प्रदर्शन करो, पथपरिष्कार करो, दुर्गम स्थल को गम्य बनाते चलो। ऐसे मार्ग का परिशोध करो, जिसमें यथेष्ट जल-फल-मूल आहार प्राप्त होता जाए। सन्निवेश की सुविधाएं हों। शीतल जल और मधु यथेष्ट मिल सके। शत्रु मार्ग में आहार को दूषित न कर सके। आसपास की दिशाओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखो। मार्ग के गड्ढे, गह्वर, दुर्ग, वन सभी का परिष्कार करो। स्थान-स्थान पर चौकियां स्थापित करो। पथ-प्रदर्शकों के यूथ बनाओ। सावधान रहो कि आगे चलने पर पीछे से शत्रु के आक्रमण की आशंका न हो।” नील के यूथ शत-सहस्र दल बनाकर अपने-अपने कार्य करते आगे चले और उनके पीछे समुद्र के समान वेगशाली वानरों की अथाह सैन्य चली। पर्वताकार गव, गवय और गवाक्ष अपने यूथ ले आगे बढ़े। सेनानायक ऋषभ वानर-सैन्य के दक्षिण पक्ष की रक्षा करते चले। मत्त गजराज के समान दुर्जय गन्धमादन सेना के वाम पार्श्वरक्षक बनकर चले। सेना के मध्य भाग में ऐरावत के समान हाथी पर श्री राम चले। उनके आगे-पीछे अंगरक्षक, दायें-बायें हनुमान्, लक्ष्मण तथा युवराज अंगद चले-उनके पीछे वानरराज सुग्रीव मन्त्रियों और सेनापतियों सहित। सबके अन्त में सेना के पृष्ठ भाग की रक्षा करते महा-विक्रम ऋक्षराज जाम्बवान्, सुषेण और वेणदर्शी वानर-यूथपति अपने यूथों सहित चले। सम्पूर्ण सेना का अधिनायक सुग्रीव सेनापतियों, गुल्मनायकों को आज्ञा देता चला। प्रतापी नील अपने साथ प्रजंघ, वलीमुख, जम्भ और रक्षक को लिए बड़े संयम और चातुर्य से आगे-आगे राह बताते तथा पथ-प्रदर्शन करते जा रहे थे। सुग्रीव की कठोर आज्ञा थी कि मार्ग में नगर, उपवन, सरोवर और ग्रामों की हानि न होने पाए।
इस प्रकार वानरी सेना सारी पृथ्वी को ढकती चलकर सह्याद्रि गिरि पर जा पहुंची। उस समय सुग्रीव ने राम के समक्ष आ निवेदन किया-“राघवेन्द्र, आपकी जय हो! मुझे पृथ्वी और आकाश में शुभ शकुन दीख रहे हैं, जो आपकी मनोरथ-सिद्धि के सूचक हैं। देखिए, सेना के पीछे अनुकूल सुखद समीर बह रहा है। विहंग मधुर स्वर से कलरव कर रहे हैं, दिशाएं प्रसन्न हैं, सूर्य निर्मल है, शुक्र आपके पृष्ठ भाग में चमक रहा है, ब्रह्म राशि निर्मल है। सप्तर्षि-मण्डल प्रकाश-युक्त है। त्रिशंकु देदीप्यमान है। विशाखा नक्षत्र देदीप्यमान है। जल शीतल और मधुर हो गया है, वायु सुगंधित हो मन्द-मन्द बह रही है। ऋतु के अनुकूल पुष्पों से दिशाएं सुशोभित हैं और सम्पूर्ण वानरी सैन्य व्यूहबद्ध आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही है।”
श्री राम ने प्रसन्नमन समस्त कटक को सह्याद्रि गिरि पर विश्राम करने का आदेश दिया। आदेश पा वानर प्रसन्न हो-होकर शिलाखण्डों पर बैठ चन्दन की सुगन्ध से सुवासित वायु का आनन्द लेने लगे। पर्वत-शिलाओं पर उत्पन्न केतकी, माधवी, वासन्ती, कुन्द, चिरु, बिल्व, मधूक, आम, पाटल, अर्जुन, शिंशपा आदि समस्त लताद्रुमों को देख वानरों का यूथ आनन्द से कोलाहल करने लगा। कुछ चक्रवाक, जलकुक्कुट, क्रौंच आदि पक्षियों से युक्त सरोवरों में जलक्रीड़ा करने लगे। इस प्रकार श्रम कर वानर सैन्य आगे चलकर महेन्द्रगिरि पर जा पहुंची। वहां से उसने प्रथम बार उस अथाह समुद्र के दर्शन किए। फिर पर्वत से उतर, समुद्र-तटीय वन में आ, वानरी कटक ने सन्निवेश स्थापित किया। समुद्र-तट पर पड़ाव डाले यह विशाल सेना दूसरे समुद्र के समान जान पड़ती थी। उसके कोलाहल ने समुद्र-गर्जन की गम्भीर ध्वनि को भी अपने में लीन कर लिया था। योग्यतम सेनापति सुग्रीव की अध्यक्षता में वानरी सेना तीन विभागों में विभक्त करके ठहराई गई। समुद्र-तट पर आकर वायु की प्रेरणा से उठी हुई उन उत्ताल तरंगों को देखकर वानर बड़े प्रसन्न हो रहे थे। जहां तक दृष्टि जाती थी, जल-ही-जल दीख पड़ता था। समुद्र के बीच में कहीं भी भूमि नहीं दीख पड़ती थी। विशालकाय जल-जीवों से भरा यह समुद्र फेन के कारण हंसता तथा उत्ताल तरंगों के कारण नाचता-सा दीख रहा था। उसमें प्रदीप्त फनों वाले सर्प, विशालकाय तिमिंगिल आदि जलचर और स्थान-स्थान पर पाषाण-शिलाएं दिखाई दे रही थीं। वह अगाध जलधि सर्वथा दुर्गम था। दूसरा तट न दीखने के कारण समुद्र और आकाश परस्पर मिले हुए जान पड़ते थे। असंख्य रत्नों से युक्त समुद्र और असंख्य तारागणों से व्याप्त आकाश में कोई अन्तर नहीं रह गया था। समुद्र में उठनेवाली भयंकर लहरें आपस में टकराकर जो गम्भीर शब्द करती थी, वह आकाश में बजते हुए नगाड़ों की-सी ध्वनि मालूम पड़ रहा था। वायुवेग के कारण उस समुद्र में इस समय बड़ा कोलाहल मचा हुआ था। बड़ी-बड़ी लहरें उठकर परस्पर टकरा रही थीं। इन लहरों के कारण चंचल और उद्वेगलायमान होते हुए समुद्र का वह दृश्य देख वानर-दल चकित हो रहा था।
अपनी रक्षा में भली-भांति सावधान वानर-सेना को नील ने बड़े कौशल के साथ समुद्र के उत्तर तट पर ठहरा दिया। उसकी रक्षा के लिए द्विविद और मैन्द वीर यूथपतियों को उनके यूथसहित नियुक्त किया। यूथपतियों को कठिन आदेश दिया कि वे अपने यूथ से पृथक न हों। संदिग्ध पुरुष को शिविर में प्रविष्ट न होने दें। अपने-अपने यूथ की सजग होकर रक्षा करें।