प्रिय-निवेदन

वानरों का यूथ उत्साह और उमंग में भरपूर था। अब युद्ध की उमंग उनके रक्त में भरी थी। कार्य-साफल्य के श्रेय ने उन्हें अदम्य कर दिया था। वे अब राम को प्रिय संदेश निवेदन करने और लंका पर अभियान करने को बेचैन हो रहे थे। वे परस्पर उत्साहवर्धक बातचीत करते जा रहे थे। शीघ्र ही वे सुग्रीव के सुरक्षित मधुवन में जा पहुंचे। सुग्रीव का मामा दधिमुख वहां का रक्षक था। उसकी तनिक भी आन न मानकर वे मधुवन में उत्पात मचाने और मद्यपान करने लगे। उसके उत्पाद से क्रुद्ध हो दधिमुख ने सुग्रीव से निवेदन किया। सुग्रीव ने हंसकर कहा-“समझ गया! वे कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं। तभी उन्होंने यह साहस किया है। उन्होंने अवश्य ही भगवती सीता का पता लगा लिया है। उनके उत्पात उनके हृदय के आनन्द के द्योतक हैं। जाओ, उनसे कहो कि मैं उनपर प्रसन्न हूं। उनका अपराध क्षमा करता हूं। अब तुम हनुमान् आदि प्रमुख वानरों को शीघ्र मेरे पास भेज दो।”

दधिमुख ने स्वामी का यह भाव देखा तो मधुवन में जाकर अंगद से विनम्र भाव से कहा-“आप युवराज हैं, हमारे स्वामी हैं, हमारा अविनय क्षमा कीजिए तथा मधुवन में यथेच्छ विहार कीजिए-यथेच्छ मद्यपान कीजिए। अब आप और हनुमान् प्रमुख यूथपति महाराज सुग्रीव की सेवा में उपस्थित हों, वानर-राज प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इस पर अंगद ने कहा-“वीरो, यद्यद्यपि मैं युवराज हूं, तथापि आप लोगों पर शासन नहीं कर सकता। आप लोगों ने महान् कार्य सम्पन्न किया है। आप पर शासन करना आपका अपमान करना है।”

अंगद के ये वचन सुन जाम्बवन्त ने कहा-“युवराज, आपके समान ऐसे वचन कोई नहीं कह सकता। स्वामी होकर भी अपने अधीन जनों से कौन इस प्रकार की बातें करेगा? चलिए, अब हम श्री राम की सेवा में चलकर प्रिय संदेश निवेदन करें।”

श्री राम के निकट पहुंचकर, मारुति हनुमान् ने आगे बढ़ राम के चरणों में प्रणाम कर निवेदन किया-“हे सीतापते, आपके आशीर्वाद से मैंने भगवती सीता के दर्शन कर लिए। वे अपने प्राण त्यागने के लिए उपवास कर रही हैं। महाराज, मैं सौ योजन दुर्दर्ष समुद्र का लंघन कर लंका में पहुंचा, जो समुद्रों के बीच दक्षिण में है। वहां मैंने अशोक वन में भगवती सीता को पतिव्रत के कठोर नियमों का पालन करते हुए देखा। वे शरीर से कुशल हैं। अपने जीवन को अप्रिय समझकर भी वे जीवित हैं। भयानक राक्षसियां उन्हें हर समय घेरे रहती हैं, उन्हें डराती-धमकाती हैं। भगवती सीता उन राक्षसियों की सभी यातनाएं सहती हैं। वे एक ही चोटी करती हैं। भूमि पर सोती हैं। उपवास से उनका शरीर क्षीण हो गया है। वे अत्यन्त दयनीय दशा में जीवन के शेष दिन ज्यों-त्यों करके व्यतीत कर रही हैं। वे निरन्तर आप ही के ध्यान में मग्न रहती हैं। मैंने उन्हें आप ही के ध्यान में रत दीनावस्था में देखा है।”

मारुति के ये वचन सुन राम ने उठकर मारुति को हृदय से लगाया। तब हनुमान् ने कौए का वृत्तान्त सुनाकर सीता की दी हुई मणि राम को दी, जिससे राम को पूरी प्रतीति हो गई। तब हनुमान् ने कहा-“अब भगवती की जीवन-अवधि में केवल एक मास ही शेष है।”

राम ने मणि को छाती से लगाकर आंखों से अश्रुजल गिराते हुए सुग्रीव से कहा-“हे मित्र, इस मणि को देखकर आज मैं शोक-सागर में डूबा जा रहा हूं। यह मणि समुद्र से निकली हुई है। मेरे श्वसुर को प्रसन्न होकर देवताओं ने दी थी। उन्होंने मेरे विवाह के अवसर पर अपनी पुत्री सीता को दी। सीता इसे सदा मस्तक पर धारण करती थी। अब पवनकुमार ने मुझ मृत व्यक्ति को अमृत के समान यह मणि देकर मेरी निराशा दूर की है। पर सीता के बिना यह मणि देखकर मैं धैर्य कैसे रख सकता हूं? हे मित्र, अब विलम्ब का क्या काम है? चलो, दुरात्मा रावण के चंगुल में फंसी हुई विदेह-नन्दिनी का हम उद्धार करें। हनुमान् ने बड़े साहस का काम किया है। ऐसा काम संसार में और किसी वीर ने नहीं किया।। हे वीर मारुति, तुम धन्य हो? भला तुम्हारे सिवा देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नागों से भी अजेय रावण से रक्षित लंकापुरी में अपने बल के भरोसे जाकर कौन जीता लौट सकता था? तुमने जनकनन्दिनी का संदेश देकर मेरी और रघुवंश की रक्षा की है। मेरे पास तुम्हारे योग्य कोई पुरस्कार भी तो नहीं है।” यह कहते-कहते प्रेम-विभोर हो राम ने हनुमान् को छाती से लगा लिया। फिर उन्होंने शोकसंतप्त हो सुग्रीव से कहा-“हे मित्र, सीता का पता लग गया, पर बीच में समुद्र बाधक है। उसे पार करना दुस्तर है। कहो, कैसे यह दुस्तर कार्य पूरा होगा? कैसे यह वानर-दल इसे पारकर लंका पहुंच सकेगा?”

सुग्रीव ने कहा-“हे मित्र, जब सीता की खोज मिल गई और शत्रु के निवास का पता लग गया तो फिर अब शोक का क्या काम! हम लोग अनायास ही इस सागर को पारकर लंका को छार कर डालेंगे। आप शोक त्याग दीजिए। हे राम, शोकाकुल और उत्साहहीन पुरुष के सभी काम नष्ट हो जाते हैं। इसी से वह आपदग्रस्त हो जाता है। ये वानर-यूथपति सब प्रकार समर्थ और महाशूर-वीर हैं। आपके प्रिय के लिए ये आग में भी कूद सकते हैं। बस, अब हमें समुद्र पर पुल बांधने का प्रयत्न करना चाहिए। समुद्र पर पुल बंधे बिना तो देवराट इन्द्र सहित समस्त देव, दैत्य, किन्नर, मानव, दानव भी लंका का कुछ अनिष्ट नहीं कर सकते। परन्तु पूल बंधने पर बस एक बार लंका हमारी आंखों में चढ़े तो उसे नष्ट हुआ और रावण को मरा ही समझिए। हमारे योद्धा स्थिर और अजेय हैं। विजय निश्चय हमारी ही होगी। अब आप शोक त्याग दीजिए। शोक सब कामों को बिगाड़ देता है। जिस काम के लिए बल-विक्रम की आवश्यकता है, उसमें शोक बाधक है। अतः आप शोक को त्याग विक्रम को हृदय में स्थान दीजिए। आप सब शास्त्रों के ज्ञाता तथा महास्त्रों के अधिपति हैं। अतः हम अपने योग्य मन्त्रियों की सहायता से अवश्य शत्रु पर विजय प्राप्त करेंगे।”

सुग्रीव से ऐसी युक्तिसंगत वार्ता सुन राम ने साभिप्राय हनुमान् की ओर देखकर कहा-“हे सौम्य, सुना जाता है कि लंका पर विजय पाना तथा उसमें प्रवेश करना अत्यन्त दुष्कर है। इसलिए मैं जानना चाहता हूं कि लंका में कितने दुर्ग हैं? अपने नेत्रों से देखे हुए के समान ही उसका विवरण स्पष्ट सुनना चाहता हूं। हे वीर, तूने समूची लंका का युद्ध की दृष्टि से गहन अध्ययन किया है। इसलिए कह कि रावण की सेना कितनी है और लंका की रक्षा के लिए उसने क्या उपाय कर रखे हैं?”

श्री राम के ये वचन सुनकर हनुमान् ने कहा-“हे रघुवंशमणि, लंकावासी राक्षस अति सम्पन्न हैं। वहां बड़े-बड़े मस्त हाथी हैं, विशाल रथ हैं। राक्षस भट बड़े शूर हैं। वे यत्न से लंका की रक्षा रात-दिन करते हैं। लंका में चार विशाल द्वार हैं। उनमें अत्यन्त दृढ़ फाटक लगे हैं, जिनमें मोटी-मोटी अर्गलाएं लगी हैं। उन अर्गलाओं पर बड़े विशाल उपल अस्त्र लगे हैं, जो शत्रु-सेना को रोकने के लिए हैं। लंका के चारों ओर स्वर्णिम चहारदीवारी है, जिसमें बीच-बीच में मणि, मूंगा और मोती लगे हैं, चहारदीवारी की चारों ओर ठण्डे जल की बड़ी भयानक गहरी खाई है, जिसमें बड़े-बड़े मगरमच्छ भरे पड़े हैं। उस खाई के पार द्वार तक पहुंचने के लिए बड़े-बड़े विस्तृत मार्ग हैं, जिनमें यन्त्र लगे हैं। उन यन्त्रों द्वारा शत्रु-सेना को खाई में गिरा दिया जाता है। इन संक्रमों में एक तो बड़ा ही दुर्भेद्य है। वह सोने के बने खम्भों और वेदिकाओं से सुशोभित है। वहां बहुत-सी सेना रहती है, जिसकी देख-भाल सेनापति करते हैं।

“रावण स्वयं सावधानी से सेना का निरीक्षण करता रहता है। लंका पर आक्रमण देवों के लिए भी दुरूह है। उसके चारों ओर तो दुर्लध्य समुद्र, खाई, वन, पर्वत और दुर्भेद्य चहारदीवारी हैं, जिसने उसे अजेय बना दिया है। वहां नौका भी नहीं जा सकती। ऐसी ही यह दुर्गम लंका है, जो त्रिकूट-शिखर पर बसी है। दस-दस हजार भयंकर राक्षस सुभट हाथों में शूल लेकर प्रत्येक द्वार की रखवाली करते हैं, जिनकी सहायता के लिए चतुरंगिणी चमू सदा तैयार रहती है। किन्तु मैंने संक्रमों को तोड़ दिया, लंका को जला डाला, वहां की व्यवस्था भंग कर दी और भय एवं आतंक का राज्य स्थापित कर आया हूं। अब तो हमें समुद्र पार करने ही का प्रयास करना है, फिर तो लंका विनष्ट ही समझिए। अंगद, द्विविद, मैन्द, जाम्बवान्, पनरु, नल, नील, आदि महारथ वानर-यूथपति तथा वानरराज, सुग्रीव, इस दुर्जय दुर्ष लंका के सब कोट, परकोट, खाई को नष्ट कर सीता का उद्धार करेंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं।”

मारुति के ये वचन सुन राम कुछ देर विचारमग्न रहे। फिर खड़े होकर उन्होंने जल्द-गम्भीर स्वर में कहा-“हे वानरेन्द्र, हम सब राक्षसों सहित लंका का विध्वंस करेंगे। सूर्यदेव अब मध्याकाश में पहुंच चुके, आज उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है। कल चन्द्रमा क्षीण नक्षत्र पर होगा। इसलिए हमें आज ही विजय-यात्रा करनी है। तो अभी सेना को प्रस्थान की आज्ञा हो!”