सीता-साम्मुख्य

## 92. सीता-साम्मुख्य

इसी समय चन्द्रोदय हुआ। अब चन्द्रज्योत्स्ना के आलोक में हनुमान् ने शोकाभिभूता सीता को भारी बोझ से जल में झुकी हुई नौका के समान देखा। उसे घेरकर जो राक्षसियां बैठी थीं, वे बड़ी विकट, निर्दय और भयानक थीं। उनमें कोई मदिरा-पान कर मत्त हो बक रही थी, कोई क्रोध में जोर-जोर से चिल्ला रही थी। वे सब सीता से दूर-दूर, उस वृक्ष को घेरकर बड़ी सावधानी से सीता की चौकसी कर रही थीं। सीता का पातिव्रत लंका में बहुत ख्यात हो चुका था, अतः अनेक राक्षसियां इसी पर सीता की खिल्ली उड़ा रही थीं। कुछ उसकी प्रशंसा कर और मद पीकर अपने होठ चाट रही थीं।

हनुमान् बड़ी सावधानी से अब उन दुरात्मा राक्षसियों की दृष्टि बचाकर उसी वृक्ष पर छिपकर बैठ गए। धीरे-धीरे रात्रि व्यतीत होने लगी। वेदज्ञाता याज्ञिक राक्षसों की वेद-ध्वनि सुनाई देने लगी। सुदूर राजमहल से मंगल-वाद्यौं का घोष सुन पड़ने लगा। प्राची में अरुणोदय हुआ। रक्षपति रावण नियमित विधि से निवृत्त हो सीता को देखने अशोक-वन में आया। वह प्रभातकालीन आभरण देह पर धारण कर रहा था। उज्ज्वल श्वेत कौशेय में उसका वज्र-गात अत्यन्त शोभायमान प्रतीत हो रहा था। रक्षेन्द्र स्वर्ण पालकी में बैठा था, जिसे बत्तीस तरुणीयां कन्धे पर उठा रही थीं। पालकी के आगे-पीछे इधर-उधर सौ दिव्य सुन्दरियां रावण के गन्ध, ताम्बूल, छत्र, चमर और सुख-साधन लिए चल रही थीं। कोई ताड़पंखे से हवा करती चल रही थी। कोई आगे-आगे सोने की झारी में शीतल जल लिए चल रही थी। बहुत-सी स्त्रियां आगे-आगे मुरज-तुरही और शंख-ध्वनि करती चल रही थीं। उन सब तरुणी रूपसी बालाओं से घिरा हुआ रावण नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा-सा प्रतीत हो रहा था। रावण की अवाई जान सब रक्षिकाएं सावधान हो गईं। वन प्रहरी भी सजग हो गए और हनुमान भी भली-भांति अपने को वृक्षों के पत्तों में छिपाकर बैठ गए। उन्होंने भली-भांति विश्वजयी सप्तद्वीपाधिपति रावण को देखा। उस भोर के प्रकाश में भी रावण रक्षेन्द्र के साथ अनेक दीपिकाएं थीं, जिनसे उसका मुख्य देदीप्यमान हो रहा था।

सीता ने जब रक्ष्यपति रावण को अपने निकट आते देखा तो वे केले के पत्ते के समान भय से कांपने लगीं। उन्होंने अपने अंग अपने ही में सिकोड़ लिए। जांघों से पेट और भुजाओं से स्तनों को छिपा लिया। वे अश्रुपूरित नेत्रों से अधोमुखी हो जड़वत् बैठी रहीं।

रावण ने धीरे-धीरे उस शोकाकुला मलिनवेशा सीता के पास आकर उसे देखा; वह श्रेष्ठकुल में उत्पन्न होने पर भी मलिनवेशा होने से हीनकुलोत्पन्न-सी लग रही थी। वह नष्टप्राय यश, निरादृत श्रद्धा, टूटी हुई आशा, तिरस्कृत अन्धकाराच्छन्न प्रभा, विधिरहित पूजा अथवा जलरहित नदी-सी हो रही थी। उपवास, शोक और भय से वह अतिकृश हो गई थी। आहार उसका बहुत कम था। तप ही उसका जीवन था। ऐसी वह पतिप्राणा सीता उस रक्षपुरी में एक निराली ही उपमा धारण कर रही थी।

रक्षपति रावण दयार्द्र हो सीता के पास जाकर कहने लगा- “भद्रे सीते! मुझे देख तूने अपने अंग समेट लिए। तू किसलिए अपने को नष्ट करना चाहती है? अरे सुन्दरी, तुझ शत्रु-स्त्री को मैं प्रेम करता हूं, तो तू भी मेरा आदर कर, भय त्याग। अरे रूपसी, शत्रु की स्त्रियों को हरणकर उन्हें भोगना हम राक्षसों की परिपाटी है, पर मैंने तेरी इच्छा के विपरीत तुझे छुआ भी नहीं है। इसलिए तू मुझ पर विश्वास कर, भय त्याग। इस कठिन व्रत को छोड़ और उस भिखारी राम को भूल जा। तू सब स्त्रियों में शिरोमणि है, सो लंका में मेरे मणिमहल में सब रानियों की शिरोमणि होकर रह। तेरी यह दुर्दशा देखी नहीं जाती। तेरा यौवन अकारथ जा रहा है। मेरे नेत्र तेरे जिस अंग पर पड़ जाते हैं, वहीं अटक जाते हैं। अब तू यहां से छुटकारे की आशा छोड़। राम का भी मोह छोड़ और इस रक्षपुरी के सब भोग भोगकर मेरे साथ रमण कर। तू कहे तो मेरे अधिकार से परे इस पृथ्वी पर जितने नगर-लोक हैं, वे सब जीतकर मैं तेरे पिता जनक को दे दूंगा। मेरे मणिहम्य में जितने रत्न-स्वर्ण द्रव्य हैं, तू उन सबको जैसे चाहे लुटा दे। संसार में मुझे जीतने वाला अब कोई योद्धा नहीं है। देव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, मानव, दानव, दैत्य सभी तो मेरे चरण-सेवक हैं। मैं सप्तद्वीपाधिपति, सर्वजयी महिदेव रावण तेरा दास हूं। तू हंसकर मुझे आज्ञा दे कि तेरा क्या प्रिय करूं। उस साधारण चीर धारण करने वाले राजभ्रष्ट निष्कासित दुरात्मा राम से अब तेरा क्या लेना-देना है! जीवन का सार यौवन है, यौवन का सार भोग, भोग का सार वैभव। सो वे सब तुझे यहां लोकोत्तर प्राप्त हैं। स्वच्छन्द दिव्य रसों का पान कर। मेरे अन्त:पुर में तीनों भुवनों की स्त्रियां हैं। वे सभी तेरी उसी प्रकार सेवा करेंगी, जैसे अप्सराएं लक्ष्मी की करती हैं। सम्पूर्ण लोकों का ऐश्वर्य भी मिलकर मेरे ऐश्वर्य के समान नहीं है। सो तू अब भी राम की रट रटे जाती है, जो तपस्या, बल, पराक्रम, धन, तेज, यज्ञ किसी में भी मेरी समता नहीं कर सकता! सो हे भीरु, मुझ पर प्रसन्न हो जा और जीवन का भोग भोग, जीवन सफल कर।”

तब सीता ने तृण की ओट करके कहा- “हे राक्षसेन्द्र, उच्च कुल में मेरा जन्म हुआ है तथा विवाह पवित्र कुल में हुआ है। मैं लोकनिन्दित आचरण नहीं कर सकती। तू अपनी ही स्त्रियों में मन लगा। तू मेरी याचना के योग्य नहीं है। मैं पराई स्त्री हूं, सती हूं, पतिव्रता हूं। तू सर्वज्ञ है, बहुज्ञ है, महिदेव है, धर्माधर्म का ज्ञाता है, विश्रुत है, सो तुझे उचित है कि तू स्वधर्म में दृष्टि रखकर सज्जनों के मार्ग का अनुसरण कर! तू जैसे अपनी स्त्रियों की रक्षा करता है, उसी भांति पराई स्त्रियों की रक्षा भी कर। क्या तू इतना भी नहीं जानता कि जिस पुरुष का मन पराई स्त्रियों पर चंचल होता है-उस पापात्मा का उस स्त्री द्वारा अपमान ही होता है। क्या तेरी लंका में सत्पुरुषों का निवास नहीं? या तू ही सत्पुरुषों के आचरणों का अनुसरण नहीं करता? और यदि रक्षकुल का विनाश ही निकट आ गया हो, तो संभव है इसी से तेरी बुद्धि विपरीत हो गई है। कामी और स्वेच्छाचारी राजा के हाथ में पड़कर तो बड़े-बड़े समृद्ध राज्य भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए यदि तू अविवेक करेगा तो जान ले कि धन, धान्य, वैभव से भरी-पूरी, तेरी यह स्वर्ण लंका अवश्य ही नष्ट हो जाएगी। अरे, जैसे सूर्य से प्रभा भिन्न नहीं, वैसे ही मैं राम से अभिन्न हूं। तेरा यह अपार वैभव और अपार राज्य मुझे नहीं लुभा सकता। तेरी कुशल इसी में है कि मुझे रघुपति के पास पहुंचा दे और इस दुष्कर्म की उनसे क्षमा मांग। इससे तेरा कल्याण होगा। नहीं तो एक दिन तुझे काल के समान क्रुद्ध उन दोनों भ्राताओं के कोप का भाजन होना पड़ेगा। शीघ्र ही तू इन्द्र के वज्र के समान राघव के काल बाणों से इस नगरी के राक्षसों का संहार देखेगा। अरे, उन्होंने जो जनस्थान में तेरे चौदह सहस्र राक्षसों का वध किया सो उसका बदला तूने चोर की भांति लिया? कितनी लज्जा की बात है!”

सीता के ये वचन सुन, रावण के साथ जितनी गन्धर्व और यक्ष-कन्याएं थीं, प्रसन्न मुद्रा से जनकनन्दिनी की ओर देखने लगीं। किसी ने नेत्रों से और किसी ने मुख की भावभंगिमा से सीता को धैर्य बंधाया। परन्तु रावण क्रोध से अधीर हो गया। उसने कहा- “मेरे प्रिय और मधुर व्यवहार का तूने इतना कठोर उत्तर दिया! मैंने तुझे जो अवधि धर्म-मर्यादा से दी है, उसमें दो मास और हैं। इस अवधि में तू यदि मेरा प्रस्ताव स्वीकार नहीं करती है, तो निश्चय ही मेरे सूदागार के सूद मेरे कलेवे के लिए तेरे हृत्खण्ड का पाक तैयार करेंगे। तू उस राज्य-भ्रष्ट राम की अभी रट लगा रही है, सो तू मूर्ख स्त्री है, जो न देशकाल के औचित्य को समझती है, न हिताहित को।”

इस पर धान्यमालिनी नामक यक्षिणी ने आगे बढ़कर हंसते हुए रावण से कहा- “हे रक्षेन्द्र, इस दीना, मलिना, दुरारोहिणी, विद्वेषिणी स्त्री से आपका क्या प्रयोजन है! जो स्त्री जिस पुरुष से प्रेम नहीं रखती, उसकी चाह में शरीर भस्म हो जाता है। अनुगावती स्त्री ही के प्रेम से रस-प्राप्ति होती है, सो सप्तद्वीपनाथ रक्षेन्द्र, मुझ प्रेमभाविता पर अनुग्रह करें। अन्य से आपका क्या प्रयोजन है!”

यक्ष-कन्या के ये वचन सुनकर रावण हंसकर उसके कन्धे पर हाथ रख उठ खड़ा हुआ तथा उसी भांति गन्धर्व, नाग, यक्ष-सुन्दरियों से घिरा आवास को लौट गया। उसके लौटने पर राक्षसियां सीता को सतपरामर्श देने लगीं।

एकजटा ने कहा- “बड़े आश्चर्य की बात है कि तू मूढ़, महात्मा रावण की भार्या बनना अंगीकरन नहीं करती!”

हरिजटा ने कहा- “सुन, पुलस्त्य छ: प्रमुख प्रजापतियों में चौथे हैं। उनके पुत्र विश्रवा मुनि भी प्रजापति तुल्य ही हैं। उनके पुत्र परन्तप महात्मा रावण रक्षपति सप्तद्वीपपति हैं जो लोकविश्रुत महिदेव हैं। उनकी भार्या होना तो शत सहस्र जन्मों के पुण्य से ही होता है।”

विधुष्टा ने कहा- “कैसे आश्चर्य की बात है कि देवराट इन्द्र ने जिसके चरण-चुम्बन किए, उसी का यह मानवी तिरस्कार करती है!”

विकटा ने कहा- “अरी, जिसने अनेक बार नाग, दैत्य, दानव, गन्धर्व सबको पराजित किया, वही सर्वजयी, विश्वपति, महात्मा तेरे पास आया और तूने उसका तिरस्कार किया! फिर भी उसने तेरे हृत्खण्ड को निकालने का हमें आदेश नहीं दिया!”

विशालाक्षी ने कहा- “तू हमें यह तो बता कि जिसकी आज्ञा से आज लोकपति-दिक्पति भी कांपते हैं, तू उसी की पत्नी बनने का सौभाग्य छोड़ती है, यह तेरी कैसी मति है? जिसके भय से सूर्य तपना छोड़ देता है, जिसकी आज्ञा बिना वायु नहीं बहता, जिसकी हुंकार-मात्र से वृक्ष फूल बरसाने लगते हैं, पर्वत से जल चूने लगता है, बादल सूख जाते हैं, तू उसी की पत्नी बनने के सौभाग्य से वंचित रहना चाहती है! अरी, रावण महिदेव अन्त:पुर की सभी स्त्रियों को स्वर्गीय सुख देता है। उसके अन्त:पुर में प्रचुर सुख-साधन हैं। रक्षपति विश्व की सारी ही सम्पदाओं का एकछत्र स्वामी है। उसके ऐश्वर्य की तुलना पृथ्वी पर कौन कर सकता है? उससे पराङ्मुख हो तू उस दीन भिक्षुक राम ही के नाम की रट लगाए है? अरी, वह तो स्वयं ही दीन-हीन, दुःखित है। तुझे वह क्या सुख दे सकता है? तू अब उसकी आशा छोड़ और हमारी सीख सुन! रक्षेन्द्र की अंकशायिनी हो देवदुर्लभ भोग भोग! हम भी तेरी सेवा से प्रसन्न होंगी।”

सीता ने कहा- “अरी राक्षसियो, तुम सब धर्म के विपरीत बात कहती हो। मैं तो अपने पति ही की अनुगामिनी हूं। मैं रघुवंश की वधू और विदेह वंश की कन्या हूं। मैं अपने ही में सुप्रतिष्ठ हूं। सो तुम भले ही मेरा हृत्खण्ड निकाल लो, परन्तु मैं विपथगामिनी नहीं हो सकती।”

इस पर वनिता नामक राक्षसी ने कहा- “हे सीते, तूने जो पति-प्रेम प्रकट किया है, वह ऐसी स्थिति में कष्टप्रद ही है। परन्तु तेरा पति-अनुराग प्रशंसनीय है, वह हम राक्षसियों के लिए नई वस्तु है। अरी, यहां तो स्त्रियों को विजेताओं का ही सेवन करना पड़ता है। परन्तु तेरा पति-धर्म भी अच्छा है। पर अब तेरा कल्याण तो इसी में है कि तू रक्षेन्द्र को प्रसन्न कर। वह अतुल ऐश्वर्यवान महासत्त्व है। प्रसन्न होकर वह तेरे पति का भी कुछ उपकार कर सकता है। तू उसे पति स्वीकार कर लंका में स्वच्छन्द विहार कर।”

इस पर चण्डोदरी ने हंसकर कहा- “अरी, इसे तुम्हारी सीख नहीं सुहाती। रक्षेन्द्र की आज्ञा से हमें इसका हृत्खण्ड निकालकर उसे निवेदन करना पड़ेगा।”

“तब मध्यभाग का कोमल मांस मैं लूंगी।”

“और इसका भेजा मैं खाऊंगी।”

“अरी, बहुत दिन बाद हमें ऐसा कोमल स्वादिष्ट नर-मांस खाने को मिलेगा। तब तक लाओ, शोकनाशिनी मदिरा ले आओ, जिसे स्वच्छन्द पान कर आज हम पानगोष्ठी मनाएं। हमें रात्रि-जागरण करना पड़ा है।” इतना कह सब राक्षसियां गटागट मद्य पीकर, उन्मत्त हो-होकर नाचने और हंसने लगीं।

उन्हें इस प्रकार उन्मत्त और उत्तेजित देखकर उनकी यूथस्वामिनी त्रिजटा ने उन्हें घुड़ककर कहा- “अरी दुष्टाओ, दूर हो तुम। अपना ही मांस खाओगी तुम! यह स्त्री यदि एकव्रता है, तो इसमें बुरा क्या है? तुम क्यों इसे दुःख देती हो? दूर हो यहां से!” यह सुन सब राक्षसियां बड़बड़ाती हुई वहां से चली गईं।

त्रिजटा की यों सहानुभूति पाकर सीता रुदन करती हुई बोली- “हाय, मैं रक्षपति के अधर्म और अनीतिमूलक कठोर शब्द सुनकर भी अभी तक जीवित हूं! सत्य है, अकाल मृत्यु कभी नहीं आती। मेरा यह हृदय भी पर्वत के समान कठोर है कि इस विपत्ति में फटना नहीं है। इस दुरात्मा रावण की बन्दिनी मैं यदि आत्मघात भी कर लूं तो क्या दोष है! अन्तत: ये राक्षसियां भी तो मेरा वध करेंगी। हे माया कोशले, कौन जाने, उस माया-मृग ने उन दोनों भाइयों का वध कर डाला हो। हाय, माया-मृग के रूप में मेरे सम्मुख वह काल ही आया था। हा सत्यव्रत! हा महाबाहो! क्या आप नहीं जानते कि राक्षसियों द्वारा मैं वध की जाने वाली हूं, जिसकी अवधि दो मास रह गई है? पर इस अवधि से ही क्या। हाय, मेरी अनन्योपासना, धर्म, भूमिशयन सभी तो व्यर्थ हुआ। मेरे अब तक किए व्रत, तप सब व्यर्थ हुए। मुझ अभागिनी के जीवन को धिक्कार है। मुझे आत्मघात ही करना उचित है। परन्तु यहां मुझे शस्त्र या विष कौन देगा? अथवा मैं अनार्या हूं, जो पति से पृथक् रहकर अब तक जी रही हूं। परन्तु कामी को न दूसरों के दुःख का विचार होता है, न अपनी वंश-मर्यादा का। परन्तु वह चाहे मुझे भाले से छेद दे, खड्ग से टुकड़े-टुकड़े कर दे या आग में जला दे, पर मैं उस दुरात्मा रावण को नहीं स्वीकार कर सकती। क्या रघुकुलमणि वे दोनों भाई जीवित रहते मुझे भूल जाएंगे, जिन्होंने जनस्थान में चौदह सहस्र राक्षसों का वध कर डाला! लंका भले ही समुद्र से अलंघ्य हो, किसी अन्य का आक्रमण भले ही असम्भव हो, पर श्री रघुपति के बाण यहां के राक्षसों का रक्त अवश्य पान करेंगे। मैं समझती हूं कि मेरे यहां रहने की सूचना अभी उन्हें मिली ही नहीं है। हाय, कौन उन्हें बताएगा कि मैं इस दुरन्त रावण की कैद में हूं। आर्य जटायु को भी इस दुरन्त ने मार डाला। अरे रघुपति को बस खबर होने की देर है, फिर तो वे सारे संसार को राक्षसविहीन कर डालेंगे। वे लंका को भस्म कर देंगे, समुद्र को सुखा डालेंगे और इस चोर रक्षपति का कुल निर्वंश कर डालेंगे। आज मैं क्रन्दन कर रही हूं, परन्तु शीघ्र ही लंका के घर-घर में करुण क्रन्दन उठ खड़ा होगा। इस लंका में रक्त की धारा बह जाएगी। आज जो लंका उत्सवों से जगमगा रही है, वही लंका अपने स्वामी के नष्ट हो जाने पर विधवा के समान श्रीहीन हो जाएगी। परन्तु हाय, कहीं मेरे प्राणनाथ मुझ शोकविदग्धा के बिछोह में परलोक तो नहीं सिधार गए?

“हाय, वे महात्मा धन्य हैं, जिनका किसी वस्तु में मोह नहीं है। जो प्रिय-अप्रिय दोनों से परे हैं। अब तो मैं प्रियतम से बिछड़ ही गई हूं। अब देखना है कि इन प्राणों का क्या होगा। अथवा प्राणों को त्यागकर सब दुःखों का अन्त ही कर दूं!”

यह विचार कर सीता ने अपनी वेणी खोल, उसी के द्वारा फांसी लगाने के लिए दृष्टि उठाकर उस अशोक-वृक्ष की ओर देखा तो उसे वृक्ष के पत्तों में छिपे हनुमान् जी दीख पड़े। उन्हें देख सीता भय और आश्चर्य से जड़ हो गई। उसने सोचा, श्वेत वसन धारण किए, तपाए स्वर्ण नेत्रों वाला यह तेजस्वी पुरुष कौन यहां छिपा बैठा है?

अशोक वृक्ष पर बैठे हुए मारुति ने रावण की बातचीत एवं राक्षसियों की डांट-डपट तथा सीता का अनुताप सभी सुना था। अब उन्हें इस बात में तनिक भी सन्देह न रहा कि यही राम-पत्नी वैदेही सीता है। यह वह सीता है, जिसकी तलाश में असंख्य वानर पृथ्वी पर दिशा-दिशा में घूम रहे हैं। आज मैंने इन्हें पा लिया। मैंने शत्रु के बल का भी पता लगा लिया और राक्षसराज रावण का प्रभाव, वैभव और उसका पुर भी देख लिया। भगवती साध्वी सीता के मन की पवित्रता भी देख ली। वे कैसी पति के लिए आतुर-आकुल हो रही हैं! अब मैं कैसे इनके सम्मुख अपने को प्रकट करूं, कैसे इन्हें धैर्य बंधाऊं, कैसे इनके प्राणों की रक्षा हो? इन राक्षसियों के सामने कैसे मैं सीता से बात करूं! मैं यदि अपने को प्रकट कर इन्हें ढाढ़स न दूंगा तो ये अवश्य प्राण दे देंगी। फिर मैं जब वापस श्री राम की सेवा में जाऊंगा तो किस प्रकार सीता का सन्देश सुनाऊंगा? इन राक्षसियों का ध्यान दूसरी ओर लग जाए तो मैं कुछ कहूं। पर यदि मैं संस्कृत में बातचीत करूं तो वे मुझे रावण का दूत समझकर डर जाएंगी। अतः मुझे अर्थयुक्त मानवी भाषा में बात करनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ये डरकर चिल्ला उठें और अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली वे कालरूपिणी राक्षसियां यहां आ धमकें और चिल्ला-चिल्लाकर राक्षस प्रहरियों को सजग कर दें तथा वे उद्विग्न होकर शूल-बाण लेकर यहां पिल पड़ें। फिर तो बड़ा विघ्न उपस्थित हो जाएगा। और यदि मैं पकड़ा गया तो फिर राम का काम करने वाला साधक पृथ्वी पर दूसरा नहीं है। मैं दूत हूं, मुझे देश-काल का विचार कर सावधानी से काम करना चाहिए। असावधानी से सब काम बिगड़ जाते हैं तथा अपने को बहुत बुद्धिमान समझने वाले दूत भी काम को बिगाड़ देते हैं। मेरा सबसे मुख्य काम यह है कि मैं अपने को यथावत् भगवती सीता पर प्रकट करूं और उनका विश्वासभाजन बनूं।

हनुमान् मन में यह सोच ही रहे थे कि राक्षसियां मदोन्मत हो तथा त्रिजटा की डांट खाकर दूर चली गईं। इसी समय सीता ने भी उन्हें देखा। अब उन्होंने सुअवसर पा मृदु-मन्द स्वर में मानवी भाषा में कहा- “इक्ष्वाकुवंश में महातेजस्वी धर्मज्ञ राजा दशरथ हुए, जो भूमण्डल में सत्यप्रतिज्ञ प्रसिद्ध हैं। उनके पुत्र श्री राम पृथ्वी के सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हैं। वे पिता की आज्ञा से उनके वचन की रक्षा के लिए पत्नी और भाई सहित वन आए थे। उन्होंने जनस्थान में चौदह सहस्र राक्षसों का वध किया। तब खर-दूषण के मर जाने पर रावण उनसे द्वेष करके मारीच की सहायता से उनकी पत्नी सीता को हर ले गया। श्री राम ने उस सीता का पता लगाने के लिए हमारे स्वामी वानरों के राजा सुग्रीव से मित्रता कर ली और उसके भाई बालि को मार उन्हें राज्य का स्वामी बनाया। सुग्रीव ने अपने सहस्रों वानरों को सीता की खोज में पृथ्वी के सब देशों में भेजा है। इधर गृधराज आर्य सम्पाति के कहने से मैंने सौ योजन समुद्र पारकर इस लंका में प्रवेश किया और अब जैसा श्री राम ने वर्णन किया, उसी के अनुरूप भगवती सीता को यहां देख रहा हूं।”

हनुमान् के अमृत के समान प्रिय वचन सुन, सीता ने मुख पर के केश हटाकर मुंह ऊपर कर भली-भांति हनुमान् को देखा। उदयाचल के निकलते हुए सूर्य के समान उनका तेज था। क्षण-भर को वे अवाक् रह गईं। उनकी आंखों से अश्रुधारा बह चली। यह देख हनुमान् उनके और भी निकट आ गए। तब सीता ने कहा- “जो कुछ मैंने सुना, यह यदि स्वप्न नहीं है, सत्य है तो मैं वाणी के स्वामी बृहस्पति को, वज्रधारी इन्द्र को, वाणी के अधिष्ठाता अग्नि को नमस्कार करती हूं।”

तब मारुति ने उन्हें प्रणाम करके कहा- “देवि, मलिन पीताम्बर धारण करने वाली आप कौन हैं? आपके नेत्र क्यों शोकाश्रु बहा रहे हैं? देव, असुर, नाग, यक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर के किस कुल को आपने अपने जन्म से धन्य किया है? आप किनकी कन्या अथवा पत्नी हैं? हे मात:, आप बारम्बार किस महाभाग का नाम रट रही हैं? जैसा आपका अलौकिक रूप, तेज है तथा जैसा वेश है उससे तो आप कोई राजकन्या जान पड़ती हैं। दुःख से आपमें दीनता आ गई है। कहीं आप श्री राम दाशरथि की पत्नी सीता तो नहीं हैं?”

मारुति के ये वचन सुनकर सीता ने कहा- “भद्र, मैं भूमण्डल के राजाओं में श्रेष्ठ दशरथ की पुत्र-वधू तथा विदेहराज जनक की पुत्री हूं। मेरा नाम सीता है। मैं परम तेजस्वी श्री रामचन्द्र की पत्नी हूं। विवाहोपरान्त बारह वर्ष मैंने राज्यसुख भोगा; तेरहवां वर्ष आते ही सत्यप्रतिज्ञ राजा दशरथ ने अपने पुत्र श्री रामचन्द्र का राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु उनकी रानी कैकेयी ने श्री राम का वनवास चाहा। सत्यव्रत राजा वचनबद्ध थे। फलतः श्री राम ने पिता का यह आदेश उस राज्याभिषेक से भी बढ़कर माना तथा उसे पूर्णतया स्वीकार कर लिया और तुरन्त राजसी वस्त्र उतार तथा राज्य का चिन्तन छोड़ मुझे अपनी माता को सौंप दिया। परन्तु मैं उनके बिना कैसे रह सकती थी! इससे मैं उनसे पूर्व ही वन जाने को तैयार हो गई। सौमित्र लक्ष्मण भी कुश-वलकल धारण कर भाई के साथ जाने को तैयार हो गए। इस प्रकार हम तीनों ही महाराज को सम्मानित करते हुए तथा दृढ़ता से उत्तम व्रत-पालन करते हुए वन में आ पहुंचे। हम दण्डकारण्य में रहते थे, वहीं से दुरात्मा रावण मुझे हर लाया। अब उसने मेरे जीवन की अवधि नियत कर दी है, जिसमें दो मास शेष रहे हैं।”

जब हनुमान् को भली-भांति विश्वास हो गया तो उन्होंने कहा- “देवि, मैं श्री राम का दूत हूं और आपकी सेवा में उनका संदेश लेकर आया हूं। श्री रामचन्द्र लक्ष्मण सहित सकुलश हैं और मेरे द्वारा आपकी कुशल पूछी है। वेदज्ञ और धर्मज्ञ राम आपकी कुशल जानना चाहते हैं।”

हनुमान् के ये वचन सुनकर सीता ने हर्षित होकर कहा- “हे वीर, मनुष्य जीवित है तो उसे सौ वर्ष बाद भी आनन्द प्राप्त होता है।”

यह कहकर वे वहीं भूमि पर बैठ गईं। आत्मघात का विचार त्याग दिया। महाबाहु हनुमान् ने अब उनके निकट आ विधिवत् उनके चरणों में प्रणाम किया। तब सीता ने कुछ सन्देह, कुछ भय से कहा- “तुम यदि रावण ही के दूत हो और कपट-वेश धारण कर मुझे छलने आए हो तो यह अनुचित है। परन्तु यदि तुम सचमुच श्री राम के दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो! तुम राम का गुणगान करो। सम्भव है मेरे मनोरथ पूरे होने का समय निकट आ गया हो।”

यह कहकर जनककुमारी सीता गहरे सोच में डूब गईं। कभी वे सोचतीं, ‘कहीं यह मेरा मनोविकार ही न हो। पर यह तो स्पष्ट बोल रहा है। सम्भव है कि यह रावण ही का चर हो।’

सीता को इस प्रकार सोच-विचार करते देख मारुति ने कहा- “देवि, मैं निश्चय ही पृथ्वी के अद्वितीय पराक्रमशील सत्यव्रती श्रीराम का दूत हूं। श्री राम तो रात-दिन आपकी रट लगाए रहते हैं। अब आप शोक त्यागिए। शीघ्र ही श्री राम अमिततेज सुग्रीव सहित आपको लेने आएंगे। मैं वानरपति सुग्रीव का मन्त्री हनुमान् हूं, सौ योजन समुद्र को लांघकर और दुरन्त रावण के मस्तक पर अपना चरण रख आपका दर्शन करने इस नगरी में आया हूं। जिसकी शंका आपके हृदय में है, वह मैं नहीं हूं। आप शंका और शोक त्याग दीजिए।”

तब सीता ने कुछ आशंका, कुछ भय, कुछ हर्ष के भाव से अभिभूत हो कहा- “वत्स, तुम्हारी वाणी तो प्रिय है, परन्तु तुम राघवेंद्र राम और लक्ष्मण की आकृति वर्णन करो, जिससे मेरी शंका मिटे। उनके रूप, अंग-प्रत्यंग का भी तो कुछ बखान करो, जिससे मुझे प्रतीति हो।”

सीता के ये वचन सुनकर मारुति ने कहा- “भगवती, सुनिए! श्री राम का मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मनोहर है। उनके विशाल नेत्र पद्म-पत्र के समान हैं। वे जैसे रूपवान् हैं, वैसे उदार भी हैं। सूर्य के समान तेजस्वी, पृथ्वी के समान क्षमाशील और बृहस्पति के समान प्रतिभाशाली हैं। उनका यश इन्द्र से भी बढ़कर है। धनुर्वेद-सहित वेद के ज्ञाता हैं। उनके कन्धे मोटे, भुजा विशाल और कण्ठ शंख के समान है। गले की हड्डी मांस से ढकी है। नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा है, दुन्दुभि के समान उनका कण्ठ-स्वर है। शरीर सुन्दर और चिकना है, वे बड़े प्रतापी हैं। उनके सभी अंग सुडौल हैं, सुदृढ़ हैं। वे श्याम वर्ण के हैं। उनके नख, तलवे लाल रंग के हैं। वे मधुरभाषी हैं। उनके कण्ठ और उदर में तीन रेखाएं हैं। वे चार हाथ ऊंचे हैं। शरीर में दो-दो की संख्या में चौदह अंग होते हैं, जो सभी परस्पर सम हैं। उनकी चारों दाढ़ें शास्त्रीय लक्षणों से युक्त हैं। वे सिंह, बाघ, हाथी, सांड़ के समान चार प्रकार की चाल चलते हैं। उनके होंठ, थोड़ी और नासिका सभी प्रशस्त हैं। उनके माता-पिता दोनों ही उत्तम कुल के हैं। उनके शरीर में नौ शुभ चिह्न हैं। वे धर्म, अर्थ और काम का उचित रीति से सेवन करने वाले हैं। वे सदा प्रेमपूर्ण वाणी बोलते हैं।

“उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी बड़े तेजस्वी हैं। अनुराग, गुण और रूप में वे श्री राम जैसे ही हैं। उनका रंग स्वर्ण के समान आभायुक्त है। ऐसे ही वे राम-लक्ष्मण दाशरथि हैं, जिनसे हमारे स्वामी सुग्रीव ने अग्नि की साक्षी में मित्रता की है। मैं उन्हीं दशरथ-कुमार राम का दूत तथा सुग्रीव का मन्त्री हूं। वायु-पुत्र हनुमान् हूं। आपके दर्शनों का सर्वप्रथम फल मुझे ही प्राप्त हुआ, यह मेरा सौभाग्य है। अब आप शीघ्र ही लक्ष्मण सहित राघवेन्द्र राम से मिलेंगी। आप शंका और शोक को त्याग दीजिए।”

हनुमान् के वचन सुनकर सीता को बहुत सान्त्वना मिली। वे आनन्द के आंसू बहाने लगीं। तब हनुमान् ने स्निग्ध स्वर में कहा- “मात:, यह मेरे पास श्रीराम के नाम की अंकित मुद्रिका है। इसे देखिए, आपकी प्रतीति के लिए उन्होंने मुझे दी थी।”

मुद्रिका को देख और पहचानकर सीता आनन्दविभोर हो उठीं। उन्होंने कहा- “अरे सौम्य, तेरी जय हो, तेरा पराक्रम श्लाघ्य है, शक्ति अपार है, तू परम मेधावी और चतुर है। तेरा साहस अद्भुत है कि राक्षसों से भरी हुई इस लंका में अकेला ही घुस आया है। तूने असीम सागर को पार करके मुझे जीवनदान दिया है। हे निर्भय, सत्यप्रतिज्ञ, तेरी जय हो! तेरी बात से मुझे ढाढ़स मिला। भला, भाई लक्ष्मण-सहित श्री राघवेन्द्र कुशल से तो हैं? अब वे कब प्रलयाग्नि के समान क्रोध करके इस पुरी को भस्म करेंगे? कह वत्स मारुति राघवेन्द्र अपने में दुःखी तो नहीं रहते? वे मुझे भूल तो नहीं गए? कब तक इस दुर्दशा से मेरी मुक्ति होगी? क्या भरत उनकी सहायता के लिए अपनी अक्षौहिणी भेजेंगे? वानरेन्द्र सुग्रीव क्या अपने बलिष्ठ वानरों सहित उनकी सहायता को आएंगे? अरे मैं उनके कालरूप बाणों से इस लंका को राक्षसों सहित शीघ्र नष्ट होता देखना चाहती हूं। जब महावीर राघव ने अनायास ही राज्य त्याग मेरे साथ वनगमन किया था, तब उन्हें तनिक भी दुःख नहीं हुआ था। अब क्या मेरे न रहने पर भी वे उसी प्रकार धैर्य धारण किए हुए हैं? मैं तो तभी तक जीवित हूं, जब तक उनके दर्शनों की आशा है।”

सीता के ये वचन सुनकर हनुमान ने कहा- “देवि, अब तक उन्हें आपका पता ज्ञात नहीं था। अब वे मुझसे आपके यहां रहने का समाचार पाते ही वानरों की सेनासहित वहां से कूच कर देंगे और अपने बाणों से इस अगाध समुद्र को बांध, लंका को राक्षस-रहित कर देंगे। श्री राम आपके वियोग में महादुःखी हैं। उनका मन आप ही में लगा है। वे रात को भी ‘सीते, सीते,’ कहकर उठ बैठते हैं। जब कभी भी वे कोई ऐसी वस्तु देखते हैं, जो आपको प्रिय थी, तभी वे आपको पुकारने लगते हैं। वे आठों पहर आपको पाने में यत्नशील हैं।”

मारुति के ये वचन सुन सीता ने कहा- “हे पवनपुत्र, भाग्य ही प्रबल है। अब तुम जाकर उनसे कहो कि वे यहां आने में शीघ्रता करें। मेरे जीवित रहने की अवधि में अब केवल दो मास ही रह गए हैं। यहां एक धर्मात्मा पुरुष भी लंका में रहता है। वह रावण का छोटा भाई विभीषण है। उसने रक्षेन्द्र को बहुत समझाया कि वह मुझे लौटा दे। उसकी कन्या कल अपनी माता की प्रेरणा से मेरे पास आ यह सब बात कह गई है। सो तुम विभीषण से मैत्री साधना। एक और वृद्ध सुशील राक्षस बुद्धिमान् और विद्वान् है। उसका नाम अविन्धय है। वह रावण रक्षेन्द्र का विश्वस्त मन्त्री तथा प्रियजन है। उसने भी रक्षेन्द्र को समझाया है। सो तुम इन हितैषी राक्षसों से लाभ उठाना।”

तब हनुमान् ने कहा- “देवि, श्री राम इस समय प्रस्त्रवण पर्वत पर निवास कर रहे हैं। आप कहें तो मैं आपको इसी क्षण वहां ले चलूं। मैं आपको श्री राम के निकट उसी भांति ले जा सकता हूं, जैसे वायु यज्ञहवि को ले जाती है। परन्तु आपको मेरी पीठ पर दुर्लघ्य सागर तैरना होगा। राक्षसों से मुठभेड़ की भी आशंका है। परन्तु आप साहस करें, तो मुझे भय नहीं है।”

सीता ने सोच-विचारकर कहा- “पुत्र, यह संगत न होगा। तुझे मुझे लेकर जाते देख राक्षस अवश्य तेरा पीछा करेंगे और तुझ निरस्त्र को घेर लेंगे। फिर कैसे तू युद्ध में मेरी और अपनी रक्षा करेगा? यह भी संभव है कि युद्ध करने के समय मैं तेरी पीठ से गिर जाऊं अथवा आतंक से मूर्च्छित हो जाऊं। फिर मैं स्वेच्छा से किसी पुरुष का स्पर्श भी नहीं कर सकती हूं। रावण के शरीर का स्पर्श तो उसके बलात्कार ही से हुआ है। इसलिए सौम्य, तू जाकर उन देव-दैत्यजयी पराक्रमी राघवेन्द्र को सेना-सहित यहां ले आ। मैं तेरी चिरकृतज्ञ रहूंगी।”

इस पर हनुमान् ने कहा- “आपकी बात युक्तिसंगत है, स्त्री-स्वभाव और धर्म के भी अनुकूल है। यदि मैं पीठ पर आपको ले भी चलूं तो यह भी संभव है कि सौ योजन समुद्र लांघ ही न सकूं। फिर आप तो पीठ पर सौ योजन समुद्र के पार नहीं जा सकतीं। परपुरुष-स्पर्श की बात भी धर्मसम्मत है। आपकी शोचनीय दशा देखकर मैं व्याकुल हो गया था, इसी से मैंने यह निवेदन किया था। अब आप अपना कोई चिह्न मुझे दीजिए, जिसे देखकर श्री राम यह समझ लें कि मुझे आपके दर्शन हो गए।”

हनुमान के ये सारगर्भित वचन सुन सीता हर्ष-गद्गद होकर कहने लगी- “हे वीर, मैं तुझे एक गुप्त बात बताती हूं, उसे सुनकर ही राघवेन्द्र को प्रतीत हो जाएगा। सुन, चित्रकूट के उत्तर-पूर्व वाले भाग में जो मन्दाकिनी नदी बहती है, वहां तपस्वियों के आश्रम के निकट जब मैं निवास करती थी, तब एक कौवे ने मुझे चोंच मार दी थी, जिससे खिन्न होकर मैं रोने लगी। इस पर क्रुद्ध होकर उन्होंने कुश से उस कौवे की दाहिनी आंख नष्ट कर दी थी। बस तुम यही वृत्तान्त उन्हें सुना देना और मेरी बातें उनसे इस प्रकार कहना कि वे शीघ्र ही मेरे कष्टों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील हो जाएं।” इसके बाद उन्होंने कपड़े में बंधी चूड़ामणि खोलकर हनुमान को देते हुए कहा- “इसे राघवेन्द्र भली-भांति पहचानते हैं। इसे देखकर उन्हें तीन व्यक्तियों की सुधि आएगी-माता, पिता और मेरी।”

तब अच्छी तरह सीता को आश्वासन दे मारुति ने उस चूड़ामणि को अपनी उंगली में धारणकर तथा सीता की प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम कर उत्तर दिशा में प्रस्थान किया।