लंका में अन्वेषण

91. लंका में अन्वेषण

दूर तक फैली हुई सुनील जलराशि और सामने स्वर्णवर्ण रजकण, ठौर-ठौर पर ताल, तमाल, हिंताल की सघन-विरस द्रुम, जिनपर कूजित विहंगवृन्द-यह सब देख मारुति का सब श्रम दूर हो गया। उनका चित्त प्रसन्न हो गया। बड़ा दुस्तर कार्य हुआ, परन्तु अब पद-पद पर साहस, सावधानी और पराक्रम का अवसर था। हनुमान् स्वर्ण-रजकण पर धीर चरण रखते, अपने चारों ओर सावधानी से देखते, वज्रमुष्टि में अपनी लौह गदा थामे आगे बढ़ त्रिकूट-शिखर पर चढ़ गए। वहां सघन वृक्षों की झुरमुट में बैठ, पुष्पभारनमित वृक्षों की आड़ में छिप उस अद्भुत स्वर्ण-लंका को निहारने लगे। उन्होंने देखा, उस लंकापुरी के बाहर अनेक बाग-बगीचे, वापी-तड़ाग हैं, जहां सब ऋतुओं के फल-फूल अमित विस्तार में लदे हैं। जहां पक्षी फुदक-फुदककर स्वच्छन्द विचरण कर रहे हैं। तालाबों में बड़े-बड़े शतदल कमल खिले हुए हैं, जहां हंस और चक्रवाक मधुर गुंजन कर रहे हैं। राक्षस छोटे-छोटे जलाशयों और उपवनों में क्रीड़ा-विनोद कर रहे हैं। उस लंका के चारों ओर अलंघ्य खाई को भी मारुति ने देखा, जो समुद्र की भांति अगम थी। उन्होंने यह भी देखा कि लंका की रक्षा-चौकी और पहरे का बहुत अच्छा बन्दोबस्त है। नगर के द्वारों पर, गवाक्षों पर, परकोटों पर, बुर्जियों पर, असंख्य धनुर्धर राक्षस भट मुस्तैदी से पहरा दे रहे हैं। कहीं जरा भी सन्धि नहीं है।

वे धीरे-धीरे पर्वत-शृंग से उतर नगर के निकट पहुंचे। तब उन्होंने धवल सौध-पंक्तियों को भली-भांति देखा, जिनके शिखर स्वर्णमण्डित थे और जिनकी शोभा शरदभ्र की भांति शुभ्र-मनोरम थी। नगर में सब ओर ऊंची सतह पर बनी सफेद सड़कें थीं। अट्टालिकाओं पर विविध रंग की ध्वजा-पताकाएं वायु में फहरा रही थीं। घरों के द्वारों पर कलापूर्ण चित्रकारी की गई थी। उस राक्षसपुरी को देख महाबली मारुति आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने मन-ही-मन कहा, अहो, इस राक्षस रावण का तो बड़ा भारी प्रताप है। यह लंकापुरी तो इन्द्र की अमरावती से स्पर्धा लेती-सी दीख रही है। वे अत्यन्त प्रच्छन्न भाव से चलकर पर्वत-शृंग के समान दुरारोह और गगनस्पर्शी उत्तर नगर-द्वार पर आए। इस समय उन्होंने एक निरीह मुनिकुमार का वेश बना लिया और वे नगर में चुपचाप इधर-उधर विचरने लगे। वहां की रक्षा-पद्धति और अजेय स्थिति को देख मारुति मन ही मन कहने लगे- “यह तो सर्वथा अजेय नगरी है। वानर और श्री राम भला कैसे इस सुदृढ़ पुरी को जीत सकते हैं! यहां इन दुर्भट राक्षसों से लड़कर जय पाना तो सम्भव ही नहीं प्रतीत हो रहा है। युद्ध के अतिरिक्त यहां तो साम-दाम से भी कार्य बनता नहीं दीख रहा है। इस लंका में अंगद, नील, सुग्रीव और मैं केवल चार ही ऐसे वानर भट हैं जो प्रवेश कर सकते हैं; सो भी छद्म-वेश में। परन्तु अभी तो मुझे अपना काम साधना है। सो मेरा काम रात में ही हो सकता है। अब मुझे ऐसा कौशल करना होगा कि मैं भगवती सीता को देख सकूं, पर कोई मुझे देख-पहचान न सके। मुझ दूत को सकुशल यहां से संदेश लेकर वापस लौटना भी तो है। इसलिए युक्तिसंगत बात यह है कि मुझे संघर्ष तथा शक्तिक्षय से बचना ही चाहिए। मुझे श्री राम के दूतत्व का निर्वाह करना है। अविवेकी दूत द्वारा देश-काल के प्रतिकूल व्यवहार करने से बहुधा बने काम बिगड़ जाते हैं।”

इन सब बातों को विचार मारुति दिन छिपने तक किसी एकान्त स्थान में छिपकर बैठ गए। जब रात्रि का अन्धकार चारों ओर व्याप्त हो गया तो घरों की छाया में अपने को छिपाते, पद-शब्द को बचाते, राक्षसों की दृष्टि को चुराते, वे एक घर से दूसरे में और दूसरे से तीसरे में जाने लगे। उन्होंने अनेक अट्टालिकाएं और स्तम्भों में सुशोभित अलिन्द देखे। अनेक सतमहले सुन्दर विशाल महल देखे, जिनके फर्श स्फटिक-शिलाओं के समान थे, जहां स्वर्ण के समान भवन और बैठकें बनी हुई थीं, जिनमें सोने के गवाक्ष और कपाट थे। परन्तु कहीं भी उन्हें सीता की झलक न दीख पड़ी। इससे वे उदास होने लगे। नगर के सभी महल मायाकार बने थे; नगर में स्वस्थ समुद्री वायु चल रही थी। बहुत-सी अट्टालिकाओं में से घंटियों की रणन-ध्वनि आ रही थी। वह नगरी रत्नजटित वस्त्रों से सुशोभित रमणी-सी दीख रही थी। उसमें बने श्वेत भवन उसके कर्णाभूषण के समान लग रहे थे। चारदीवारी पर बने शस्त्रागार उसके स्तन-से प्रतीत होते थे। देदीप्यमान दीपावलियों से अन्धकार का नाश हो जाने से नगरी जगमग कर रही थी। अभी हनुमान् मारुति यह सब देख ही रहे थे कि द्वारपालिनी राक्षसी लंका ने उनके सम्मुख आ और खड्ग उनके कंठ पर रखकर कहा- “अरे दुरात्मा, तू कौन है जो चोर की भांति रक्षेन्द्र-रक्षित लंकापुरी में प्रच्छन्न भाव से विचर रहा है? मरने से पूर्व अपना परिचय दे और यह बता कि तूने यहां आने का साहस कैसे किया?”

उस राक्षसी की यह भयानक बात सुनकर मारुति ने धीर स्वर में कहा- “महाभागे, इस भयानक और स्त्रीजन-अशोभित वेश में तू कौन है और किसलिए मुनिकुमार से ऐसे अभद्र वचन कह रही है?”

लंका ने कहा- “मैं लंका नामक राक्षसी लंका की नगर-रक्षिका हूं। लंका पर रात में मेरी ही चौकी रहती है। कोई देव, दैत्य मेरी दृष्टि बचाकर लंका में प्रविष्ट नहीं हो सकता। जो ऐसा करता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो तू भी अब अपने को मृत्यु-मुख में ही समझ।”

यह सुन मारुति ने कोमल कंठ से कहा- “महाभागे, मैं मुनिकुमार तेरी सुशोभिता नगरी लंका को देखकर प्रसन्न होने आया हूं। बस, देख-भालकर लौट जाऊंगा। अब तू मुझ पर प्रसन्न हो।” इस पर वह राक्षसी एकदम क्रुद्ध हो उठी और उसने मारुति की नाक पर एक घूंसा मारा।

मुक्का खाते ही मारुति ने भी उसके मुंह पर एक चपेटा मारा। चपेटा खाकर वह घूमकर भूमि पर गिर गई। तब मारुति ने उसके कंठ पर चरण रखकर कहा- “अब तू मर!”

इस पर करबद्ध प्रार्थना कर वह राक्षसी बोली- “हे मुनिकुमार, मेरे प्राणों की तू रक्षा कर। मेरे प्राण हरण मत कर, मैं तेरी शरणागत हूं!”

हनुमान् यह सुन उसका कंठ छोड़ तुरन्त ही अन्तर्धान हो गए तथा इधर-उधर भवनों में पैठ-पैठकर उन्हें देखने लगे। उन्होंने देखा कि कहीं कलकण्ठी रमणियों के गाने की आवाज आ रही है, कहीं राक्षस वेदमन्त्र-पाठ कर रहे हैं, कहीं सैनिक अपने शस्त्र संवार रहे हैं। अनेक राक्षस सुन्दरियों के बीच रमण कर रहे थे। अनेक सुन्दरियां अपने पतियों के साथ रमण कर रही थीं। बहुत-से स्थानों पर राक्षस मद्य पी-पीकर प्रलाप कर रहे थे। वे एक-दूसरे पर आक्षेप कर उन्मत्तों की भांति आपस में झगड़ रहे थे। बहुत-से राक्षस मद्य पिए अपनी स्त्रियों के अंकपाश में मद-मूर्च्छित पड़े थे। अनेक स्थानों पर राक्षस अपने मित्रों से मधुरालाप तथा हास-विलास कर पान-गोष्ठी का आनन्द ले रहे थे। अनेक राक्षस सुथे-अनेक कदरूप; बहुतों के नाम कर्णसुखद थे, बहुतों के कुत्सित। कुछ राक्षस पवित्रचरणी भी थे। राक्षस-स्त्रियां भांति-भांति के सुन्दर वस्त्राभरण धारण किए कहीं हास-विलास कर रही थीं, कहीं मंगलगान और कहीं मद्यपान कर अट्टहास कर रही थीं। प्रियतम और मद्यपान में उनका परम अनुराग था। उनकी अमित ज्योति थी, असाधारण रूप था, अप्रतिम तेज था। बहुत-सी रमणियां अपने दर्मों की छतों पर अपने प्रियतमों की गोद में बैठी पान-विलास का आनन्द ले रही थीं। इस प्रकार मारुति ने अनगिनत स्त्रियों को देखा पर उन्हें अयोनिजा सुकुमारी जनकन्दिनी सीता के कहीं भी दर्शन नहीं हुए।

तब वे रावण के अन्त:पुर की ओर चले। वहां जाकर उन्होंने देखा-वह अन्त:पुर चारों ओर गहरी खाई से घिरा हुआ था। वह निर्मल और अलौकिक सुन्दर भवन धवल रश्मि-प्रभा बिखेर रहा था। उसकी रक्षा के लिए सहस्रों महाबल सुभट राक्षस भली-भांति शस्त्रसज्जित नियत थे। उसकी चारदीवारी स्वर्णखचित थी। भूमि मणिमयी थी। चन्दन आदि के सुगन्ध-द्रव्यों के जलने से वह महल महक रहा था। मारुति ने युक्तिपूर्वक उस दुर्गम महल में प्रवेश किया। उन्होंने देखा-जैसे गायों के यूथ में वृषभ घूमता है, उसी भांति रावण रमणीय रमणियों से सम्पन्न इस अन्त:पुर में विचरण करता है। जिस प्रकार तारागणों के बीच चन्द्रमा की शोभा होती है, वैसी ही शोभा उस समय रावण की हो रही थी। वह राजमहल स्वर्णद्वारों, चांदी से मढ़े चित्रों तथा अद्भुत अन्तर्द्वारों से सुशोभित था। रत्नजड़ित रथ, अश्व, गजवाहन, इधर-उधर घूम रहे थे। ठौर-ठौर पर कोमल बिछौने बिछे थे। अन्त:पुर की विश्वस्त रक्षिका राकिसयां खड्ग, शूल लिए मुस्तैद पहरा दे रही थीं। स्त्रियां नाच-रंग में मस्त थीं। उनके आभूषणों की चमक और ध्वनि से वहां का वातावरण मुखरित हो रहा था। मारुति ने रत्नजटित पर्यंक पर रावण को देखा। कुछ सुदासियां मणिपात्र में भर-भर उसे मद्य दे रही थीं, कुछ चंवर झल रही थीं। कुछ वीणा-मुरज बजा रही थीं, कुछ गान कर रही थीं। महल के चारों ओर तरह-तरह की पालकियां, लतागृह, चित्रशालाएं, क्रीड़ापर्वत, विलास-गृह और दिन में विहार करने के घर भी थे। वह भवन रत्नाभरणों तथा रावण के तेज से देदीप्यमान था। वहां पलंग, चौकी, उपधान, उपरक्षिकाएं आदि सभी कुछ दिव्य थीं। चारों ओर नूपुर की ध्वनि, करधनियों की खनखनाहट तथा मधुर वाद्यौं से वह हम्य मुखरित हो रहा था। हनुमान् घूम-घूमकर महल, अलिंद, पाश्र्व, उपान्त सभी को देखने लगे। वहीं उन्होंने वह अद्भुत पुष्पक विमान देखा जो रत्नखचित था। विमान की भूमि मरकतमाण की बनी थी। उसका प्रकोष्ठ श्वेत वर्ण का था। उसमें रत्नों की पच्चीकारी करके सर्प, पशु, पक्षी, फूल, वृन्त आदि ऐसे बनाए गए थे कि जिनसे वास्तविक होने का भ्रम होता था। उस विमान में मूंगे, वैदूर्य और चांदी के पक्षी बनाए गए थे। सुंडों वाले हाथी भी विचित्र थे। उस विमान में ऐसी कोई रचना न थी, जो रत्नों से रहित हो। उस वायुवेगी, दुर्धर्ष, दुर्लभ विमान पर आरूढ हो चक्रवर्ती, महिदेव, सप्तद्वीपापति सर्वजयी रावण अबाध आकाश-विचरण करता था।

विमान का भली भांति अवलोकन कर मारुति बहुत-से कक्षों को देखते-भालते एक विशाल कक्ष में घुस गए, जो रावण का खास गुप्त कक्ष था। उसमें मणियों की सीढ़ियां और सोने की जालियां लगी थीं। फर्श के जोड़ों में जो स्फटिक मणि लगी थी। उसके जोड़ों में हाथीदांत की पच्चीकारी थी। उसमें विशाल मणिस्तम्भ थे तथा छत में हीरे, मोती, माणिक और मूंगे के जाल की चादर तनी थी। दीवारों पर सोने के तारों का काम था। कक्ष में स्वर्णतार-ग्रथित कोमल बिछौना बिछा था। वहां की रक्षिका सुन्दरियां मद्य पी-पीकर आपस में चुहल कर रही थीं। उसके कारण वह कक्ष शरतकालीन शोभा धारण कर रहा था। अब अर्धरात्रि व्यतीत हो चली थी। वे अब रावण के शयन-कक्ष में जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां एक अद्भुत पलंग था, जिस पर अनेक वेदियां बनी थीं। उस पर अनेक बहुमूल्य उत्तम वस्त्र बिछे थे। उस पर चन्द्रमा के समान एक छत्र लगा था। अनेक स्त्रियां खड़ी पंखियां ले-ले रावण को हवा कर रही थीं। रावण सो रहा था। वहां अनेक प्रकार की सुगन्धित सामग्री जल रही थी। शयन-कक्ष उनकी सुगन्ध और सौरभ से सुरभित हो रहा था। सोता हुआ रावण जल से भरे हुए वर्षोन्मुख बादल की शोभा धारण कर रहा था। उसके शरीर पर सुगन्धित चन्दन का लेप चढ़ा था। उसके नेत्र लाल और भुजाएं विशाल थीं, वे पलंग पर फैली हुई इन्द्रध्वजा-सी लग रही थीं। उनमें स्वर्ण के बाजूबन्द बंधे थे। वह कामरूप रावण उस समय बड़ा ही शोभनीय प्रतीत हो रहा था। उस समय वह पीत अधोवस्त्र धारण किए था। उसका वृषभस्कन्ध बड़ा गठीला था। अंगुलियों में रत्नमुद्रिकाएं जड़ी थीं। वह मद्य के नशे में मस्त हो रहा था तथा वेग से सांस ले रहा था। उसकी सांस के साथ पान, पूग, केसर, कस्तूरी की गन्ध आ रही थी। उसका सूर्य के समान देदीप्यमान किरीट वहीं एक ओर रखा था। उसके कान में जो हीरे के कुण्डल थे उनके कारण उसका मुख और भी प्रदीप हो रहा था। उस समय वह सोता हुआ रावण ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे गंगा में गजराज पड़ा सो रहा हो।

स्वर्ण दीपाधारों पर सुगन्धित तेल के दीप जल रहे थे। पलंग के निचले भाग में इधर-उधर रावण की विधुवदनी स्त्रियां सो रही थीं, जिनके मणि-माणिक्यों की आभा से वह कक्ष जगमग हो रहा था। उनके कानों के कुण्डल ऐसे चमक रहे थे जैसे आकाश में तारामण्डल चमकता है। वे स्त्रियां खूब मद्य पी-पीकर, जो जहां थीं, वहीं लीला-विलास करती हुई सो गई थीं। उनके गहने, वाद्ययन्त्र, वीणा, मुरज, मृदंग उनके पास ही इधर-उधर बिखरे पड़े थे। वीणा बजानेवाली वीणा ही को अंग में लपेटे सो गई थीं। कोई रमणीय रमणी स्वर्ण-कलश के समान अपने ही स्तनों को पकड़े पड़ी थीं। बहुत स्त्रियां अपनी-अपनी सहेलियों को आलिंगन किए पड़ी थीं। उनकी रूपराशि से वह शयनकक्ष देदीप्यमान हो रहा था। इन स्त्रियों में देश-देशान्तरों से हरण की गई राजकन्याएं भी थीं, जिनकी आज रात रावण के शयन-कक्ष में सेवा की बारी थी। बहुत-से ऐसे भी महर्षियों, दैत्यों, गन्धर्वों और नागों की स्त्रियां थीं, जो स्वतः ही कामासक्त हो रावण की स्त्रियां बन गई थीं। पर उस कक्ष में ऐसी एक भी स्त्री न थी जो रावण से प्रेम न करती हो। वे सब रूपवती, कुलीना रमणियां उत्तम वस्त्राभरणों से सज्जिता थीं, जो अपने विलास और क्रीड़ा से देखने वालों को उन्मत्त कर देती थीं।

इन सब रूपसी षोडशियों से पृथक् एक अतीव सुन्दर मणि-खचित पलंग पर एक असाधारण सुन्दरी सो रही थी। यह रमणी अपनी रूपनिष्ठा तथा गौरवर्ण के कारण सबसे पृथक् सर्वोपरि परिलक्षित हो रही थी। उस स्त्री का रूप-लावण्य अति मनोहर था। उसकी वेश-भूषा भी उसके अन्त:पुर के स्वामित्व की सूचक थी। उसे देख हनुमान् ने सोचा, कदाचित् यही तो भगवती सीता नहीं है। परन्तु वह प्रेम-वियोगिनी विदग्ध-हृदय सीता यहां रावण के विलास-गृह में कैसे मद्यपान मत्त हो सकती है! निसंदेह यह सीता नहीं है। मेधावी मारुति ने समझ लिया कि यह रक्षराज-महिषी मन्दोदरी है। तब भगवती अयोनिजा सीता कहां हैं?

हनुमान् चिन्तित होकर अन्त:पुर में इधर-उधर विचरण करने लगे। महलसा, निद्रासक्त स्त्रियां सूदागार में विविध मांस-पकवान तैयार करने में लग रही थीं। कोई गोरी, कोई सांवले रंग की थी। वे स्वर्ण-पात्रों में पृथक्-पृथक् उत्तम प्रकार के मद्य, भोज्य, चर्व्य, चूर्ष्य, पेय पदार्थ, शूकर, महिष, लाव, तित्तिर, हरिण, मनुष्य का मांस पाक कर-कर रख रही थीं। सहस्रों स्वर्ण-कलश मदिरा से भरे वहां धरे थे। वहां की वायु भी मदगन्धा हो रही थी। उनमें बहुतरी तो काम करती करती वहीं सोकर झपकी ले रही थीं।

इस प्रकार मारुति ने रावण का सारा ही अन्त:पुर छान डाला, परन्तु कहीं भी सीता का पता न लगा। तब हनुमान् खिन्न मन अन्त:पुर से बाहर आ दूसरी ओर चले। अब वे लतागृहों, चित्रगृहों, निशागृहों में सीता की खोज करने लगे, पर सीता जब उन्हें वहां भी न मिली तो उन्हें सन्देह हुआ कि कदाचित् सीता जीवित नहीं है। राक्षसों ने उसे मारकर खा डाला है। ये राक्षस सदैव से आर्यों के वैरी हैं। अब सीता का यदि पता ही न लगा तो मेरा लंका आना व्यर्थ हुआ। दुर्लघ्य समुद्र को लांघना ही अकारथ गया। अब लौटकर मैं अपने साथियों को क्या संदेश दूंगा? सुग्रीव की दी हुई अवधि भी अब बीत चली है। परन्तु मुझे निराश न होना चाहिए। निराशा ही असफलता का चिह्न है। उत्साह ही से पुरुष को सफलता मिलती है। इससे मुझे अब अन्यत्र भी यत्न से सीता की खोज करनी चाहिए। यह सोच अब वे गुप्त और दुर्गम स्थानों में सीता को खोजने लगे। तहखाने, भूगर्भ हम्य, मण्डप, एकान्त कुटी आदि में उन्होंने खोज की। वे रुक-रुककर घरों के ऊपर-नीचे, भीतर-बाहर जाकर आहट ले-लेकर सीता को खोजने लगे। उन्होंने तड़ाग, उपवन, वन, वीथिकाएं भी देख डालीं। विद्याधरों नागों की स्त्रियों में भी देखा-पर सीता कहीं भी न मिली। तब वे शोक और निराशा से व्यथित हो भूख और थकान से शिथिल एक ठौर पर गिर पड़े।

वे सोचने लगे कि सीता शोक में मर गई हों अथवा लाते हुए छटपटाकर समुद्र में गिर गई हों अथवा रावण क्रुद्ध होकर उन्हें खा ही गया हो अथवा दुष्टा राक्षसियों द्वारा रावण की पत्तियों ने ही ईर्ष्यावश उन्हें मरवा डाला हो अथवा कहीं उन्हें छिपाकर तो नहीं रखा गया है! साध्वी सीता रावण के वश में तो आ ही नहीं सकतीं। वे या तो मार डाली गई या स्वयं मर गईं। परन्तु अब मैं क्या करूं? किससे पूछूं? किससे सम्मति लूं? भला शत्रुपुरी में मेरा कौन सहायक है? परन्तु यदि सीता मुझे न मिली तो मैं यहां से जीवित पीछे नहीं लौटूंगा। समुद्र में जल-समाधि लूंगा या अन्न-जल ही मैं तभी ग्रहण करूंगा जब सीता को खोज लूंगा। भले ही मेरे प्राण चले जाएं। सीता की खोज किए बिना यदि मैं लौटूंगा तो मेरी कीर्ति का ही नाश हो जाएगा। फिर जीवन किस काम आएगा? परन्तु अभी तो मैं और भी उद्योग करूंगा। यह तर्क-वितर्क कर हनुमान फिर साहस करके उठे। वे क्रोध में सोचने लगे कि सीता न मिली तो मैं इस महाबली रावण को मारकर ही उसका बदला लूंगा। परन्तु सम्पाति ने कहा है कि सीता लंका में है अवश्य।

इस प्रकार विचार करते-करते वे अशोक वाटिका के द्वार पर आ पहुंचे तथा वायुवेग से उसकी प्राचीर पर चढ़कर भीतर कूद गए। वहां वसन्त के सघन वृक्ष विकसित और पुष्पित हो रहे थे। लताओं ने आम्र कानन को आच्छादित कर रखा था। ऋतु-ऋतु के फल वृक्षों से लदे पड़े थे। उन्हें देख तथा उनकी मधुर गन्ध-सुगन्ध से उनकी भूख जाग्रत हो गई। वे वाटिका में इधर-उधर घूमने लगे। उनकी आहट पा वृक्षों पर सोए पक्षी जाग उठे और उड़-उड़कर इधर से उधर पंख फड़फड़ाने लगे। उन्होंने देखा-अशोक वाटिका में विकट राक्षसों का पहरा लगा है। वे इधर-उधर अपने को छिपाते सरोवरों-पुष्करिणियों के तटों का आश्रय लेते हुए आगे बढ़ते चले गए। वहां अशोक वृक्ष पुष्पित हो ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो वे स्वर्णमणि से निर्मित हों। उनके नीचे सोने की वेदियां बनी थीं और वे ठौर-ठौर पर निर्झर जल से सिंचित थे।

हनुमान् ने सोचा-सम्भव है यहीं सीता को रखा गया हो। प्रिय-वियोग में वनवास में तो उनकी रुचि होना स्वाभाविक ही है। वे यहां होंगे तो सायंकालिक और प्रभातकालीन नित्यकर्म के लिए अवश्य ही यहां पुष्करिणी पर आती होंगी। यहां राक्षसों की सतर्कता से भी मुझे अनुमान होता है कि सीता का अवश्य ही यहां निवास होगा। इन सब बातों को भली-भांति विचार, वे एक बड़े वृक्ष पर चढ़कर चारों ओर खूब ध्यान से देखने लगे। तब अचानक ही उनकी दृष्टि एक धवल प्रासाद पर पड़ी जो गोलाकार और बहुत ऊंचा था। उन्होंने देखा-वहां च्यूटी दल की भांति बहुत-सी राक्षस मूर्तियां इस निशांत काल में भी सजग हैं।

वे वृक्ष से उतर वृक्षों की सघन छाया में अपना शरीर छिपाते हुए पद-शब्द को बचाते उस दर्म के निकट आए। वह दर्म बहुत ऊंचा था और सहस्रों खम्भों पर टिका था। उसकी सीढ़ियां मूंगों की बनी थीं और वेदियां चन्दन की थीं। वह स्वच्छ प्रासाद स्निग्ध चन्द्र-ज्योत्स्ना का मूर्त प्रतिविम्ब-सा दीख रहा था।

धीरे-धीरे अपने को छिपाते हुए हनुमान् फिर वृक्ष पर चढ़ वृक्षों-ही-वृक्षों में दर्म के निकट आ गए। अब उन्होंने देखा-एक मलिनवसना सुन्दरी, पीतप्रभा, कृशकाया, क्लान्तवदना उपवास-शोक-व्यथाव्यथिता दिव्यांगना-सी रूपप्रभा बाला दर्म से बाहर एक अशोक वृक्ष के नीचे अधोमुखी बैठी लम्बी-लम्बी सांसें खींच रही है। उसके अंग पर एक ही पीला वस्त्र है। निरलंकारा होने पर भी वह मलिनवस्त्रा राख में ढके अंगार की भांति प्रतीत हो रही है। उनका मुख वर्षोन्मुख बादल के समान गम्भीर तथा आंखें भादों के मेघों के समान झर-झर वर्षा करती हुई हैं। वह शोक और चिन्ता से कातर हैं। उनके सिर पर काले नाग के समान ही वेणी है जो कमर तक लटक रही है। उसको चारों ओर से घेरकर सजग शस्त्राधारिणी राक्षसियां बैठी हैं, जो बड़ी, विकालवदना हैं। उनसे घिरी हुई वह मृगनयनी बाला कुत्तों से घिरी हुई असहाय मृगी-सी प्रतीत हो रही थी। इस शोक-मूर्ति को देखते ही मारुति ने समझ लिया-अयोनिजा, अमोघ-शुल्का, जनक-तनया, राम-वधू भगवती सीता यही है। श्रीराम ने जैसा रूप सीता का वर्णन किया है, वैसा ही इसका रूप है। वैसा ही कोमलकान्त मुख है। इसकी दीप्ति से इस दशा में भी दसों दिशाएं प्रदीप हो रही हैं। इन्द्रमणि कण्ठ में पहनने से इसका कण्ठ नीलवर्ण दीख रहा है, होंठ अब भी बिम्बाफल के समान लाल हैं। इसका कटिभाग और चरण मनोरम हैं। कमल के समान नेत्रों में शील, संकोच और वेदना परिलक्षित है। यह तो पूर्ण चन्द्र के समान संसार को ही प्रियदर्शना प्रतीत होगी। यह संयमशीला तपस्विनी के समान खुली भूमि पर बैठी है। शोकातुर होने के कारण इसकी शोभा नष्ट हो गई है। मारुति ने बारीकी से सीता के वस्त्राभरण और आकृति का निरीक्षण कर तथा श्रीराम के वर्णन से उसे मिलाकर देख लिया और तब उन्होंने निर्णय किया कि यही वास्तव में श्रीराम की प्रिय पत्नी जनकजा सीता हैं।