सीता की खोज में

89. सीता की खोज में

किष्किन्धा में सुग्रीव का राज्य हो गया और राम प्रस्त्रवण गिरिशृंग पर रहने लगे। वर्षा ऋतु आ गई थी। इसलिए अभी कुछ भी नहीं हो सकता था। प्रस्त्रवण पर्वत बड़ा ही मनोरम था। पर्वत पर सफेद और काले पत्थरों की चट्टानें थीं। अनेक प्रकार की खनिज धातुएं भी बहुत थीं। सरोवरों में बड़े-बड़े कमल खिले थे। वन-विहंग ठहर-ठहर चहचहाते थे। निर्मल जल के अनेक झरने झर रहे थे। इस समय प्रस्त्रवण पर अनेक तपस्वीजनों के आश्रम-ग्राम थे। वहां चन्दन के बहुत वृक्ष थे। उस मलय-मारुत से वह स्थान निरंतर सुरभित रहता था। किष्किन्धा वहां से निकट ही थी।

वर्षा ऋतु बीत गई। शारदीय शोभा ने दिशाओं को उज्ज्वल कर दिया। राम ने लक्ष्मण से कहा- “लक्ष्मण, सुग्रीव तो राज्य और स्त्री पाकर उन्हीं में रम रहा है तथा मेरे कार्यों को भूल गया है। मैं राज्य से भी निकाला गया और मेरी स्त्री का भी अपहरण हुआ। मार्ग दुर्गम है। न जाने कौन दुष्ट चोर वैदेही को चुरा ले गया है। वह जीवित भी है या नहीं। अब मेरा धैर्य जवाब दे रहा है। मैं कब तक प्रतीक्षा करूं? मेरे अयोध्या जाने पर जनसमुदाय उमड़ पड़ेगा, तो सीता के न रहने से मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा! ये वर्षा के चार मास मुझे सौ वर्ष के समान व्यतीत हुए हैं। मुझ राज्यभ्रष्ट को, जिसकी पत्नी हर ली गई है, सुग्रीव ने भी अनाथ के भांति भुला दिया। यह उसका विश्वासघात है। अपना काम बनाकर वह मूर्ख रनवास में आनन्द कर रहा है। क्या उसने अपना ही काम सिद्ध करने के लिए मुझसे मित्रता की थी? उसने तो वर्षा समाप्त होते ही सीता की खोज का वचन दिया था। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वह कामान्ध अब वह बात भूल गया है। वह मन्त्रियों सहित भयानक काम कर रहा है। तुम जाकर उसके कर्तव्य को स्मरण करा दो और कह दो कि कहीं उसकी भी बालि जैसी दशा न हो।”

लक्ष्मण ने किष्किन्धा पहुंचकर अपने आने की सूचना सुग्रीव को भेजी। परन्तु सुग्रीव को अन्तःपुर में सूचना पहुंचाई ही नहीं गई। तब लक्ष्मण ने धनुष पर बाण चढ़ाकर क्रोधपूर्वक अंगद से कहा- “अरे अंगद, जाकर अपने राजा सुग्रीव से कह कि सौमित्र लक्ष्मण राजद्वार पर उपस्थित हैं, इच्छा हो तो आकर भेंट करें या फिर मैं दूसरा उपाय करूं।”

लक्ष्मण के ये क्रोधपूर्ण वचन सुनकर अंगद स्वयं सुग्रीव को सूचना देने गया। पर वह मद्य पीकर बेहोश पड़ा था। तब अंगद ने अपनी माता तारा से लक्ष्मण के क्रोध होने तथा द्वार पर उपस्थित होने की बात कही।

किष्किन्धा नगरी बड़ी भव्य थी। उसमें सुग्रीव का राजभवन पर्वत जैसा ऊंचा था। उसमें बहुत-से गवाक्ष और द्वार थे, जिनमें स्वच्छन्द पवन प्रवाहित हो रही थी। लक्ष्मण धड़धड़ाते हुए महल में घुस गए। उन्हें इस प्रकार आते देख अन्तःपुर की स्त्रियां घबराकर भागने लगीं। इसी समय तारा ने सम्मुख आकर लक्ष्मण को प्रणाम किया। मद्यपान तथा रात्रि-जागरण से उसके नेत्र घूर्णित हो रहे थे। तारा को देखते ही लक्ष्मण ने धनुष नीचे कर लिया। तारा ने नम्र शब्दों में कहा- “राजकुमार, आप क्रोध को त्याग दें। सुग्रीव आपका मित्र है, हितैषी है। उसके अपराध को क्षमा कीजिए। आपके उपकार को वह भूल नहीं सकता। परन्तु आपको जानना चाहिए कि कामातुर आदमी धर्म-अर्थ की बात नहीं विचार सकता। इतने दिन दुःख पाने पर अब वह कामरत हो गया है, इसलिए आप उसे क्षमा कीजिए और मेरे साथ रनवास में पधारिए।”

रनवास में जाकर स्वर्ण-शय्या पर सोए तथा दासियों, परिचारिकाओं से सेवित सुग्रीव को मद्य के नशे में मस्त देख, लक्ष्मण ने कहा- “हे राजन्, जो राजा बली, दयालु, जितेन्द्रिय और सत्यवादी होते हैं, उन्हीं का यश संसार में फैलता है। उपकारी मित्रों से झूठी प्रतिज्ञा करनेवाले के समान अधम और दूसरा कोई नहीं है। सो राजन्, तुम झूठे, कृतघ्न और अनार्य हो। अपना काम करा लेने पर भी तुम अपना प्रण भूल गए। आर्य ने यह नहीं समझा था कि वे एक दुरात्मा को राज दे रहे हैं। अब तुम कहो कि तुम अपना वचन पूरा करते हो या रामचन्द्र अपना बाण धनुष पर चढ़ाएं!”

लक्ष्मण के वचन सुनकर भी सुग्रीव के मुंह से बात न फूटी। तब तारा ने ही कहा- “राजकुमार, वानरेन्द्र सुग्रीव न कपटी है, न विश्वासघाती। आप ऐसे कठोर वचन क्यों कहते हैं? न वह आप लोगों का उपकार ही भूला है। परन्तु हां, काम-पीड़ित है। उसने बहुत कष्ट भोगे हैं, अतः कामोपभोग में उसे समय का ध्यान नहीं रहा। विश्वामित्र ने घृताची के प्रेम में दस वर्ष बीतने पर एक ही की गणना की थी। वही दशा सुग्रीव की है। रूपा और मैं आप ही की कृपा से उसे प्राप्त हुई हैं। वह आपके लिए राजपाट और मुझे तथा अंगद को भी त्याग सकता है। फिर, आप भी इस समय विपन्नावस्था में हैं। आपको मित्रों की सहायता की बहुत आवश्यकता है। आपका काम बिना सुग्रीव की सहायता के नहीं हो सकता। सो सुग्रीव आपकी सहायता के लिए उपस्थित है।”

इसी बीच सुग्रीव को भी चैतन्य लाभ हुआ। वह पलंग से कूदकर खड़ा हो गया। लक्ष्मण और तारा की बातें उसने सुन लीं। कामदेव की प्रतीक पुष्पमाला तोड़कर फेंक दी। फिर उसने कहा- “राजकुमार, श्रीराम ने मेरी गई हुई राज्यश्री मुझे लौटाई है। मैं भला कैसे उसका उपकार भूल सकता हूं?” उसने उसी समय हनुमान् को बुलाकर आज्ञा दी कि सब राज्यों-उपराज्यों के वानर और ऋक्षपति अपने-अपने यूथों सहित दस दिन के भीतर यहां राजधानी में उपस्थित हों। इस आज्ञा का जो उल्लंघन करेगा उसका वध होगा। इसके बाद वह मंत्रियों और लक्ष्मण सहित पालकियों में बैठ शंखध्वनि के बीच तथा बन्दीजनों द्वारा गुणगान सुनता हुआ राम की सेवा में चला।

देखते-ही-देखते चारों से दल-बादल वानरों के यूथ प्रस्त्रवण पर आकर एकत्रित होने लगे। सुग्रीव ने सेनापति विनत को पूर्व दिशा में, हनुमान् और अंगद को दक्षिण में और अपने श्वसुर सुषेण को पश्चिम में भेजा तथा शतबली को उत्तर दिशा में रवाना किया। सबके साथ हजारों वानरों के यूथ भी गए। इस प्रकार सारी ही पृथ्वी पर सीता की खोज होने लगी।

सीता के मिलने की संभावना दक्षिण दिशा में ही थी। इसलिए दक्षिण में जो दल युवराज अंगद की अध्यक्षता में भेजा गया, उसमें महापराक्रमी हनुमान्, नील, अग्निपुत्र, जाम्बवान्, सुहोत्र, शरारित, शरगुल्म, गज, गवाक्ष, गवय, वृषभ, द्विविद, उल्कामुख तथा अन्य वीर वानर थे। वे अधोमुख मलय पर्वत होते हुए ताम्रपर्णी नदी को पारकर, समुद्र-तट पर पहुंचे। वहां से महेन्द्र पर्वत पर चढ़े। वहां से पुष्पितक द्वीप में गए। फिर सूर्यवान्, वैद्युत और कंजर पर्वत को पार किया। अन्त में वे नागों की राजधानी भोगपुरी में पहुंचे। उन्होंने बहुविध सीता की खोज की, परन्तु सीता का कुछ भी पता न चला। सभी वानर बहुत हताश हुए। सुग्रीव जो अवधि दी थी, वह भी बीत चली।

अंगद ने कहा- “सुग्रीव का कार्य बिना किए लौट जाने से हमारे प्राण नहीं बचेंगे। हमारे पितृव्य सुग्रीव का स्वभाव बहुत ही कठोर है। वह अपराधी को कभी क्षमा नहीं करता। फिर मेरा तो वह पहले ही विरोधी है। श्रीराम के आग्रह ही से उसने मुझे युवराज का पद दिया है। वह सबसे प्रथम मेरे ही प्राण लेगा।”

हनुमान् ने कहा- “युवराज, तुम तो अपने पिता के समान ही वीर हो और वानरराज के अधिपति भी हो। परन्तु इस समय हम सब सुग्रीव ही के अनुगत हैं। सुग्रीव हम पर दयालु हैं, वे धर्मज्ञ हैं। इसलिए हमें यत्न से, जिस कार्य के लिए हम आए हैं, उसे करना चाहिए।”

अंगद ने कहा- “सुग्रीव, कहां का धर्मात्मा है भला? जिसने अपने बड़े भाई की स्त्री को घर में डाल लिया, भाई का वध करवाया और अपना काम राम से कराकर भी प्रमाद किया, उसे ही तुम धर्मात्मा कहते हो? मैं तो कभी उस कुटिल के सामने न जाऊंगा। वह निश्चय ही मेरा और तुम्हारा सबका वध करेगा। और मैं तो पहले ही से हताश हूं। मैं किष्किन्धा कदापि नहीं जाऊंगा, यहां अनशन करके प्राण त्यागूंगा। आप सुग्रीव से मेरा प्रणाम कहना और माता रूपा तथा तारा से भी कुशल-प्रणाम कहना। माता तारा को धैर्य बंधाना। वह बेचारी मेरे बिना जीवित ही न रहेगी। जो हो, मैंने तो अब प्राण त्यागने का प्रण कर लिया है।” यह कह अंगद कुशा बिछा भूमि पर मौन होकर बैठ गया। वानरों का एक भी अनुनय-विनय उसने नहीं माना। तब दुःखी होकर सभी वानर हनुमान् सहित अंगद के साथ प्राण देने के विचार से कुशा बिछा-बिछाकर भूमि पर बैठ गए।

वानर इस प्रकार मरण की ठान-ठानकर भूमि पर बैठे ही थे कि उन्होंने देखा-एक विशालकाय गृध्र धीरे-धीरे पर्वत से उतर रहा है। वानरों को वहां इस प्रकार बैठे तथा मरण ठान ठानते सुन वह प्रसन्न हुआ। उसने कहा- “बहुत उत्तम सुयोग है, जो-जो व्यक्ति मरता जाएगा, उसका भक्षण मैं करता जाऊंगा। बहुत दिन तक भोजन की चिन्ता मिटी।”

उसे देख वानरों ने कहा- “हाय-हाय, यह कौन कृतान्त हम जीवितों ही का प्राण लेने यहां उपस्थित हुआ? हम न सीता का ही पता लगा सके, न स्वामी की ही आज्ञा का पालन कर सके। हमसे तो अधिक भाग्यवान् गृधराज जटायु है जिन्होंने सीता की प्राणरक्षा के लिए राक्षस के हाथ से प्राण दिए।”

वानरों की यह कातरोज्ति सुनकर उस पुरुष ने कहा- “अरे, यह किसने मेरे भाई जटायु का नाम लिया? किसने मेरे भाई जटायु का हनन किया? कहो, मैं जटायु का बड़ा भाई सम्पाति हूं। मैं बहुत वृद्ध हूं। देवासुर-संग्राम में सूर्य से युद्ध करते मेरे दोनों पंख नष्ट हो गए थे। मैं पंखों से रहित, वृद्धावस्था से जर्जर, अपंग, अशक्त यहां अपने पुत्र पार्श्व के आश्रम में रहता हूं। अब तुम कहो, कौन हो और किस अभिप्राय से यहां प्राण त्यागने का व्रत ठान बैठे हो? तुम मेरे छोटे भाई जटायु के सम्बन्ध में कुछ कह रहे थे! अब मेरे भाई का प्रिय-अप्रिय जैसा भी संदेश हो, कहो। किसने मेरे भाई जटायु के मरण की बात कही है? उसे सुनकर तो मेरे प्राण ही कांप गए हैं। दीर्घकाल से मैंने अपने भाई का समाचार ही नहीं सुना है। भाई जटायु मुझसे छोटा, गुणज्ञ और पराक्रमी था। वह प्रसिद्ध पुरुष था, उसका नाम सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है। परन्तु तुमने कहा कि जनस्थान में किसी दुष्ट ने उसका नाश कर डाला है। यह दारुण घटना कैसे हुई, इसका सविस्तार वर्णन मुझसे मित्र की भांति करो।”

सम्पाति के ये वचन सुन वानरों का भय दूर हुआ। उन्होंने सम्पाति को पर्वत से उतारकर पास बैठाया। तब युवराज अंगद ने कहा- “हे गृधराज, वानरों के राजा अत्यन्त प्रतापी ऋक्षराज मेरे पितामह थे। उनके दो पुत्र बालि और सुग्रीव हुए। मैं परम तेजस्वी राजा बालि का पुत्र अंगद हूं। कुछ वर्ष पूर्व परम वीर दशरथात्मज श्री राम अपने पिता के आदेश से धर्म-मार्ग का आश्रय ले दण्डकारण्य में आए। उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी थी, जनस्थान से कोई दुर्दान्त राक्षस उनकी पत्नी को बलपूर्वक हरण कर ले गया है। उस आततायी को महात्मा दशरथ के मित्र आपके भ्राता जटायु ने रोका था। उन्होंने निःशस्त्र ही उस दुष्ट को रोका, उसका रथ नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और सीता को भूमि पर लाकर सुरक्षित रख दिया। परन्तु वृद्ध जटायु निरस्त्र होने के कारण उस पतित के हाथों मारे गए। तब लौटकर और सब वृत्तान्त जानकर श्री राम ने अपने हाथों से आर्य जटायु का संस्कार-तर्पण ऋषिंवत् किया। तदनन्तर उन्होंने महाराज सुग्रीव से मित्रता की तथा मेरे पिता बालि को मार सुग्रीव को वानरों का राजा बनाया। अब श्री राम की सहायतार्थ हम सब वानर देश-देशान्तरों में सीता की खोज में भटक रहे हैं। परन्तु अभी कुछ भी खोज नहीं हो पाई है। खोज की अवधि भी समाप्त हो चुकी है। अब हम निराश हो प्राण देने पर सन्नद्ध हैं, क्योंकि वहां जाने पर भी हमारे प्राण नहीं बचेंगे। इसी से हमने मरण-यज्ञ करने का विचार है और उपवास-व्रत ले यहां समुद्र-तट पर बैठे हैं।”

वानरों के ऐसे शोकपूर्ण वचन सुन सम्पाति साश्रुलोचन हो कहने लगे- “वत्स अंगद, उस चोर को मैं जानता हूं और मेरे भाई का वध करने के कारण अब वह मेरा भी वैरी है। परन्तु वह दुष्ट चोर साधारण पुरुष नहीं है। मैं दुःखित तथा अपंग हूं। अशक्त हूं। इस अभियान में मैं वृद्ध तुम्हारी अधिक सहायता करने में असमर्थ हूं। हां, तुम्हें उस चोर का पता बता सकता हूं। सुनो, मैं वरुणलोक से परिचित हूं। पहले वहीं हमारा निवास था। बलिबन्धन और वृत्र-वध सम्मुख ही हुआ था। देवासुर-युद्ध में हम दोनों भाई-मैं और जटायु, युद्ध करते हुए सूर्य देव के निकट पहुंच गए थे। तब सूर्य के आक्रमण से भाई जटायु की रक्षा करते हुए मेरे दोनों पंख टूट गए थे। तभी से मैं अपने पुत्र के आश्रम में रहता हूं। अब मैं तुम्हें एक घटना सुनाता हूं।

“एक दिन मैं बहुत भूखा था। मेरा पुत्र मेरे लिए आखेट ढूंढने गया था। प्रातःकाल से सायंकाल तक मैं बाट देखता रहा, परन्तु वह नहीं लौटा। और जब लौटा तो खाली हाथ। उसको इस प्रकार देख, मैं भूख और क्रोध से व्याकुल हो खाली हाथ लौटने का कारण पूछने लगा। तब उसने मुझे बताया कि मैं आपके लिए आहार पाने के विचार से महेन्द्र पर्वत के मार्ग को रोककर बैठ गया था। मैं समुद्र के जीवों को रोकने की चेष्टा में सिर नीचा किये बैठा था कि मैंने देखा-एक कृष्णवर्णी पुरुष एक सुन्दर बाला को बलात् लिए जा रहा है। मैंने उन दोनों को आपके आहार के लिए पकड़ लाने का निश्चय किया। किन्तु वह कृष्णवर्णी पुरुष मेरे मार्ग रोकने पर हाथ जोड़कर कहने लगा- ‘गृध्रपति, मैं मुनि-कुमार हूं। तुम कृपाकर मेरी राह छोड़ दो।’ उसकी प्रार्थना पर मैंने उसे मार्ग दे दिया, क्योंकि विनय करने वाले पुरुष को मैं नहीं मारता। इसके बाद वह पुरुष अपने तेज से आकाश-मार्ग को प्रकाशित करता हुआ चला गया। वह चमत्कार मैं देखता ही रह गया। वह स्त्री अलंकार-विहीना, पीत वस्त्रधारिणी, अति व्याकुल हा-हा राघव, हा दाशरथि राम, हा सौमित्र-कह-कहकर बिलख रही थी। उसके केश खुले थे और वह भय से पीली पड़ रही थी। फिर भी उसके सौन्दर्य से दिशाएं प्रकाशमान हो रही थीं।

“पुत्र से यह सन्देश सुन मैंने कहा- ‘यदि वह स्त्री दाशरथि नाम को पुकार रही थी तो अवश्य ही वह हमारे मित्र दशरथ की कुलस्त्री होगी, तूने उस हरणकर्ता को पकड़ा क्यों नहीं?’ पुत्र ने कहा- ‘हन्त, मैं नृपेन्द्र दशरथ की मैत्री की बात नहीं जानता था। इसी कारण उसमें मेरी रुचि नहीं हुई।’ सो अब मैं भली-भांति समझ गया कि तुम उस स्त्री की खोज में निकले हो और उस पतित चोर को भी मैं भली-भांति जानता हूं। उसका पता मुझे आकाशचारियों और सिद्धों से पीछे लगा, जिन्होंने उस हरण की हुई स्त्री को ले जाते हुए मेरे पुत्र की भांति देखा था।”

सम्पाति के ये वचन सुनकर अंगद ने कहा, “आर्य, अधिक का प्रयोजन नहीं है। आप केवल हमें उस चोर का पता बता दीजिए। फिर हम उससे निबट लेंगे।”

सम्पाति ने कहा- “सुनो, तुम्हारा वह चोर और मेरे भाई का हत्यारा पुरुष विश्रवा मुनि का पुत्र पौलस्त्य रावण है। वह धनपति कुबेर का भाई और सप्तद्वीपों का स्वामी है। उसका बल-वीर्य अपार है और त्रैलोक्य को जय करके वह अब महिदेव बन गया है। उसने रक्ष-संस्कृति स्थापित की है। वह जैसा महारथी अजेय योद्धा है, वैसा ही विश्रुत वेदज्ञ है। वह धर्म, नीति, विज्ञान, कला और अर्थशास्त्र का महाज्ञाता है। यहां से सौ योजन की दूरी पर समुद्र में एक द्वीप है, जिसमें त्रिकूट-शिखर पर स्वर्ण लंकापुरी बसी है। उस नगरी के द्वार, चतुष्पथ, दीवार, भवन स्वर्णमण्डित हैं, जो सूर्य के प्रकाश में सूर्य के ही समान देदीप्यमान रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है है जैसे शत-सहस्त्र सूर्य वहां उदय हो रहे हैं। यह राक्षसपुरी लंका दुर्लघ्य, दुर्धर्ष, दुर्गम्य और दुष्प्रवेश है। एक लाख राक्षस योद्धा रात-दिन नगर-द्वारों पर पहरा देते हैं। उनका बल अमोघ है। तभी तो रावण ने देवराट इन्द्र को बन्दी बनाया था। उसने उससे दास्य-कर्म कराकर मुक्त किया। अरे, जिन देवों को पृथ्वी का नृवंश पूजता है, वे उसकी ड्योढ़ी पर दासभाव से रहते हैं। उसका भाई कुम्भकर्ण पर्वत-शृंग के समान विशालकाय, महाभक्ष, महोदर, महाप्राण है। उसके सम्मुख काल भी नहीं ठहर सकता। फिर उसका पुत्र इन्द्रजित मेघनाद है, जिसके सम्बन्ध में सुना है कि उसे सब दिव्य माया-शक्तियां प्राप्त हैं। यह परिवार भूतभावन भगवान् रुद्र द्वारा रक्षित है। फिर उसकी सेवा में अनगिनत राक्षस भट हैं। सो हे वानरो, तुम कैसे उस शत्रु से पार पाओगे?”

सम्पाति के ये वचन सुन सब वानर सन्न रह गए। तब अंगद ने धीर वाणी से कहा- “आर्य, ऐसे धीर, वीर, प्रतापी, विद्वान् महिदेव और सप्त-द्वीपाधिपति ने कैसे यह निन्दनीय चौर कर्म किया? यह तो बड़े ही आश्चर्य की बात है। परन्तु जो हो, हम प्राण देकर भी लंका जाएंगे और प्रभु-कार्य करेंगे। आप हमें वहां जाने का उपाय बताइए।”

“बताता हूं-ध्यान से सुनो! प्रथम आकाश-मार्ग है। आकाश-मार्ग के सात स्तर हैं। प्रथम स्तर पर गौरैया, कबूतर आदि अन्नभक्षी पक्षी उड़ते हैं। उसके ऊपर दूसरा स्तर है, जहां वृक्षों के फल खानेवाले तोता, कौआ आदि पक्षी उड़ते हैं। उससे ऊपर तीसरे स्तर पर चील, क्रौंच, कुरा उड़ते हैं। बाज, गिद्ध क्रमशः चौथे-पांचवें स्तर तक पहुंचते हैं। अत्यन्त सुन्दर पक्षी हंस उनसे भी ऊपर छठे स्तर पर उड़ता है। परन्तु सबसे ऊंची और वेगशाली जाति गरुड़ों की है, जो सातवें स्तर पर आकाशगमन करते हैं। मेरा जन्म भी गरुड़-कुल में हुआ है और हम मांसभुक् जाति के पुरुष हैं। हमारी दृष्टि सौ योजन तक जाती है। यदि मैं आज साधनसम्पन्न होता तो आकाश-मार्ग से जाकर अनायास ही तुम्हें लंका का सन्देश ला देता। परन्तु अब तो यह दुस्तर है। फिर भी रावण से मुझे अपने भाई का बदला लेना है। सो यदि तुममें से कोई वानर भट विकट साहसिक हो तो मैं उसे समुद्र-उल्लंघन करने की सहज विधि बता दूंगा। समुद्र पार होने पर लंका में जा वह सुभट कृतकृत्य हो सकता है।”

अंगद ने कहा- “आर्य सम्पाति, आप हमें वह विधि बताइए जिससे यह दुर्लघ्य सागर पारकर हम लंका में पहुंच सकें।”

सम्पाति ने कहा- “अच्छा, यह रहस्य, जिसे लंकाधिपति रावण भी नहीं जानता है, मैं बताता हूं। देखो-समुद्र-तट से धनुष्कोटि के अन्तर पर गृध्रकूट गिरिशृंखला त्रिकूट तक समुद्र-गर्भ में जलमग्न चली गई है। स्थान-स्थान पर वहां विश्राम करने की सुविधा है। जो कोई साहसी वीर सौ योजन समुद्र को इस भांति तैरकर उल्लंघन करने की शक्ति रखता हो उसे इस गिरि-शृंखला से बहुत सहारा मिलेगा और वह अवश्य ही अपने विक्रम से समुद्र के पार पहुंच जाएगा।”

सम्पाति के ये गूढ़ वचन सुन सब वानर उसे प्रणाम कर समुद्र-तट की ओर सीता की खोज के लिए उत्साहित हो चल दिए।