हा सीते!
मारीच को मार जब राम पीछे लौटे तो उनके सम्मुख आ एक सियार ने मुंह उठाकर विकट रोदन किया। इस अपशकुन से आतंकित-आशंकित हो राम जल्दी-जल्दी आश्रम की ओर आने लगे। राह में उन्हें भगवान् अगस्त्य के आश्रम से लौटते हुए लक्ष्मण मिले। उन्होंने कहा-“आर्य, आप भगवती सीता को अकेली छोड़ इधर कहां से आ रहे हैं?”
राम ने कहा-“मैं एक राक्षस के माया-जाल में फंस गया था। देखो, वह सियार ऊपर मुंह उठाकर कैसा विकट शब्द कर रहा है! जल्दी चलो, लक्ष्मण, कहीं अमंगल न हो गया हो।”
दोनों भाई द्रुत गति से लौट चले। आश्रम के निकट आने पर उन्होंने जटायु के आश्रम में बहुत-से तपस्वियों की भीड़ देखी। तपस्वीजनों ने उन्हें सीता-हरण का दारुण संवाद कह सुनाया। राम ने रक्त में सने हुए जटायु को देखा। जटायु ऊर्ध्व श्वास लेते हुए और मुख से रक्त-वमन करते हुए क्षीण स्वर से कहा-“आयुष्मान् तेरी सीता और मेरे प्राणों को एक बलवान् तस्कर राक्षस हर ले गया। मैंने शक्ति भर विरोध किया। मेरा पुराना पुरुषार्थ काम न आया; परन्तु मैंने अपने मित्र दशरथ का सख्य पालन किया। मेरा उस राक्षस से घनघोर युद्ध हुआ। वह देखो, उसका छत्र-धनुष टूटा पड़ा है, पर मैं निश्शस्त्र था। जब मैंने भगवती सीता का चीत्कार सुना-मैं सो रहा था। चीत्कार सुनते ही मैं भागा। शस्त्र लेने का अवकाश न मिला। उस पतित दुरात्मा ने मुझ निस्त्र की यह दुर्दशा कर दी। मैं कुछ भी न कर सका। वह-‘हा दाशरथि, हा आर्य-पुत्र, हा सौमित्र’ पुकारती हुई स्रुषा सीता को बलात् रथ में बैठाकर इसी दक्षिण दिशा को गया है। हे राम, उसके पास वायुवेगी अश्वतरी का रथ है। उसमें आठ अश्वतरी जुड़ी हैं। तुम कैसे एकाकी पांव-प्यादे उसे पा सकोगे? मैं तो अब उस लोक को चला; रामभद्र तेरा कल्याण हो!”
इतना कहकर जटायु ने रक्त-वमन कर प्राण त्याग दिए। जटायु के ये मर्म-भेदी वचन सुन और जटायु का गतप्राण शरीर देख राम आंसू बहाते हुए जटायु से लिपट गए। लक्ष्मण-सहित वे रो पड़े। वे लक्ष्मण और सब तपस्वियों से कहने लगे-“मैं ऐसा पापी हूं, जिसके कारण कोसल का राज्य नष्ट हुआ, पिता का स्वर्गवास हुआ, सीता का हरण हुआ और अब महाबली गिद्धराज जटायु के भी प्राणों का ग्राहक मैं ही बना। आज यदि मैं समुद्र में तैरने की चेष्टा करूं, तो समुद्र भी सूख जाएगा। मेरे समान भाग्यहीन पृथ्वी पर और कौन होगा जिसके कारण पितातुल्य आर्य जटायु मृतक होकर भूमि पर पड़े हैं।” इसके बाद वे जटायु के शरीर को अंक में भरकर आर्तनाद-सा करते हुए बारम्बार कहने लगे-“हे तात, मेरी सीता कहां है?” फिर वे दुःख से हतचेत हो भूमि पर गिर पड़े।
कुछ काल बाद उन्होंने चेत में आकर कहा-“हे लक्ष्मण, कैसे संताप की बात है कि आर्य जटायु सीता की रक्षा करते हुए हतप्राण हुए। सज्जनों का संसार में कहीं अभाव नहीं है। मुझे इस समय सीता-हरण का उतना दुःख नहीं, जितना जटायु-मरण का है। जाओ भाई, अब तुम विलम्ब न करो। लकड़ी एकत्र करो, मैं तब तक अग्नि निकालता हूं। मैं विधिपूर्वक बान्धवों की भांति जटायु का दाह-संस्कार करूंगा।”
उन्होंने विधिवत् जटायु का दाह-संस्कार किया। फिर मृगों को मार, पृथ्वी पर कुश बिछा, मृग-मांस कोमल घास पर रख, उससे गृध्रराज का श्राद्ध-तर्पण किया। फिर गोदावरी-तट पर जा उसे जलांजलि दी। इस प्रकार वृद्ध जटायु का ऋषि के समान सत्कार कर राम बोले-“हे भाई, अब शून्यागार में जाने से हमारा क्या प्रयोजन है? अब तो हमें सीता का अन्वेषण कर उसका उद्धार करना है।” फिर उन्होंने कहा-“हे भगवती गोदावरी, कहो, क्या तुमने सीता को देखा है? क्यों भाई, यह गोदावरी तो कुछ भी जवाब नहीं देती! कहो, अब मैं राजा जनक से मिलने पर, जब वे जानकी का कुशल पूछेंगे, तो क्या जवाब दूंगा? अरे, मेरे साथ राज्यहीन होकर, वन में जंगली फल-मूल खाकर, जो मेरे दुःख के समय मेरे सब दुःखों को हरती थी, वह जनक-दुलारी अब कहां चली गई? बन्धु-बान्धवों से तो मेरा वियोग ही हो गया था... अब सीता से भी वंचित होना पड़ा। चलो भाई, मन्दाकिनी-तट, जन-स्थान और प्रस्रवण पर्वत पर चलकर खोज करें। कहां ले गया वह राक्षस उसे? ये वन के मृग मेरी ओर आंखें उठाए क्या देख रहे हैं? क्या ये कुछ मुझसे कहना चाहते हैं? क्या ये सीता का कुछ पता जानते हैं?”
लक्ष्मण ने कहा-“आर्य, तात जटायु ने दक्षिण ही की ओर संकेत किया था। हम दक्षिण की ओर ही चलें तो ठीक होगा।”
उन्होंने तब भूमि पर गिरे हुए उन पुष्पों को देखा, जो सीता के केशों से झड़ गए थे। तब राम ने कहा-“लक्ष्मण, इन फूलों को मैं पहचान गया। ये पुष्प आज प्रातः मैंने ही उसे दिए थे। मेरे ही सामने उसने इन्हें चोटी में गुंथा था।” फिर वे पर्वतों की ओर मुख करके जोर-जोर से कहने लगे-“अरे पर्वतो, कहो, सीता कहां है? नहीं बोलोगे तो अपने अग्निबाणों से मैं तुम्हें भस्म कर दूंगा। गोदावरी का जल भी सुखा डालूंगा।”
इसी समय लक्ष्मण ने कुछ घुंघरू पृथ्वी पर से उठाकर कहा, “यह देखिए आर्य, ये घुंघरू टूटे पड़े हैं, ये फूल-मालाएं भी दली-मली पड़ी हैं। इधर-उधर भूमि पर रक्त भी बहुत पड़ा है। कहीं वह दुर्दन्त राक्षस आर्या को खा तो नहीं गया? परन्तु यह टूटा हुआ विशाल धनुष किसका है? ये बड़े-बड़े मोती, टूटा हुआ स्वर्ण कवच? अहा, यहीं तो तात जटायु का उस राक्षस से युद्ध हुआ है। यह देखिए, स्वर्ण-पंख विभूषित बाण भी यहां टूटे पड़े हैं। अवश्य ही वह राक्षस कोई सम्पन्न और बली प्रतीत होता है। वह अवश्य ही खर-दूषण का प्रतिकार लेने आया होगा। महाराज, हमने तो समझा था, जनस्थान से राक्षसों का पातक ही कट गया, परन्तु यह तो महापातक उठ खड़ा हुआ।”
राम ने कहा-“हे लक्ष्मण, सीता हरी गई, मारी गई या खा ली गई, जो कुछ भी हो, अब तो राक्षसों से मेरा वैर सौ गुणा बढ़ गया। मैं पृथ्वी से राक्षसों के वंश को ही अब निर्मूल करूंगा। अरे, देव, दैत्य, गन्धर्व, असुर, किन्नर, राक्षस जो भी वह तस्कर हो, जीवित न रहेगा। मैंने उसे देखा है, वह धूर्त तपस्वी का भेष धरकर मेरा अर्घ्य-पाद्य ग्रहण कर गया। उस वंचक ने मुझे ठग लिया। मैं वृक्षों को उखाड़कर समुद्र को पाट दूंगा। जो सीता न मिली तो त्रैलोक्य को नष्ट कर डालूंगा। सीता हरी गई या मारी गई, जो कुछ भी हो, मैं त्रैलोक्य से उसे खोज निकालूंगा।” इतना कहकर राम ने अपनी जटा खोलकर चारों ओर छितरा दीं।
इस समय तक बहुत-से जनस्थानवासी ऋषि, मुनि, तापस वहां एकत्र हो गए थे। महामुनि अगस्त्य ने जब राम को क्रोध और शोक से इस प्रकार अभिभूत देखा, तो उन्होंने आगे बढ़कर कहा-“रामभद्र, आप तो सदा ही सबकी कल्याण-कामना करते हैं; फिर आप इस समय कैसे क्रोध और शोक से अधीर हो रहे हैं? हम नहीं जानते वह अपराधी तस्कर कौन है? किसका धनुष टूटा पड़ा है? यहां अधिक पुरुषों के चरण-चिह्न भी नहीं हैं। देव और गन्धर्वों में कौन आपका अहित चाहता है? भगवती सीता अवश्य ही किसी एक पुरुष ने हरण की है। अब आप उसे ढूंढिए। भला सोचिए तो, जब आप ही अपने ऊपर आए हुए इस दुःख को धैर्यपूर्वक नहीं सहन करेंगे, तो फिर दूसरे प्राणियों की क्या सामर्थ्य हो सकती है! आपत्तियां तो प्राणियों पर आती ही हैं। ये अग्नि के समान एक क्षण में स्पर्श करती और दूसरे क्षण दूर हो जाती हैं। यह तो संसार का स्वभाव है। भगवती सीता चाहे जीवित हों या पृथ्वी को त्याग चुकी हों, आप दुःख न कीजिए। हे महाप्रज्ञ, सारा संसार आपका प्रशंसक है, अतः आप धैर्य धारण कीजिए और शत्रु के विनाश का प्रयत्न कीजिए।” इस प्रकार समझा-बुझाकर सब तपस्वियों ने अत्यन्त दुःखित हो राम-लक्ष्मण को विदा किया। बहुत जन दूर तक उनके साथ चले।
इस प्रकार राम-लक्ष्मण दक्षिण दिशा में आगे बढ़कर क्रौंच-वन में पहुंचे। यह वन बड़ा विशाल और रमणीय था। परन्तु यह वन अत्यन्त सघन था और इसमें अनेक हिंस्र जन्तु रहते थे। यहां एक अत्यन्त गहरी-गुहा थी। इस गुहा में एक अति भयानक राक्षस रहता था। वह बड़ा बलवान् था। इस वन का वही स्वामी था। उसके विकट बल और अतुल सामर्थ्य से दूर-दूर तक लोग आतंकित रहते थे। चलते-चलते एकाएक वह भयानक राक्षस दोनों हाथ फैलाए इन दोनों भाइयों के सम्मुख आ खड़ा हुआ और कहने लगा-“धनुष-बाण धारण करने वाले इन दोनों कौन हो और बिना मेरी अनुमति मेरे इस वन में कैसे आए हो? तुम सुन्दर हो, तुम्हारे कन्धे बैल के समान हैं, तुम अवश्य ही मानुष प्रतीत होते हो। मैं मानुषों को मार शिश्वदेव को बलि देकर नरबलि का मांस खाता हूं। सो तुम भले मिले। आज मैं तुम्हारी बलि दे तुम्हारा ही स्वादिष्ट मांस खाऊंगा।”
उस क्रूर और विकट राक्षस को देख शोक-जर्जरित और भूख-थकान से क्लान्त राम-लक्ष्मण अत्यन्त भयभीत हो गए। परन्तु लक्ष्मण ने साहस करके खड्ग का प्रहार उसकी फैली हुई भुजाओं पर किया। प्रहार से उसकी एक भुजा कटकर दूर जा गिरी। उस प्रहार से विकल होकर वह लक्ष्मण को पकड़ने दौड़ा। तब अवसर पाकर राम ने उसे सात बाणों से बींध डाला। फिर जब वह पीड़ा से व्याकुल हो राम की ओर मुड़ा तो राम ने फुर्ती से पांच बाण उसके खुले मुख में ठूंस दिए, जो उसके तालु को फोड़कर निकल गए, जिससे वह कराहता हुआ भूमि पर गिर गया और दीन भाव से बोला-“हे वीर, तुम कौन हो?”
राम-लक्ष्मण ने जब अपना संक्षिप्त परिचय दिया तो वह कहने लगा-“मैंने तुम्हारा प्रताप और नाम जनस्थान में सुना था। मैं दनु दानव हूं तथा देवराट इन्द्र के वज्र-प्रहार से पंगु होकर यहां वन में रहता था। सो आज तुम्हारे हाथ से मेरा अन्त हुआ। किन्तु अब वैर-भाव से क्या प्रयोजन है? कहो, मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं?”
राक्षस के ये वचन सुनकर राम ने कहा-“मेरी भार्या को कोई तस्कर हर ले गया है, क्या तू उसका कुछ पता बता सकता है?”
तब राक्षस ने कहा-“हे राम, मेरी सुन! राजा छ: प्रकार की सन्धि-विग्रह युक्तियों से अपना मनोरथ पूरा करता है। पुरुष जब कालचक्र से आक्रान्त होता है, तब उसे बुरी दशाएं भी सहनी पड़ती है। इसी के फलस्वरूप तू कान्तिहीन हो गया है, सो जब तक तू किसी पुरुष को मित्र न बनाएगा, तेरा मनोरथ पूरा न होगा। सो मेरा कहना माने तो तू सुग्रीव वानर से मित्रता कर ले। उसके भाई बालि ने उसे घर से बहिष्कृत कर दिया है और वह इस समय ऋष्यमूक पर्वत पर पम्पा सरोवर के निकट अपने वानर परिजनों के साथ रहता है। ये दोनों भाई बालि और सुग्रीव, बड़े बली और तेजस्वी हैं। सुग्रीव विशेषकर पराक्रमी, मित्रता की आन रखने वाला तथा बुद्धिमान पुरुष है। मित्र बनकर वह तेरी भार्या को खोज निकालने में बहुत सहायक होगा। तू अग्नि जलाकर उसकी साक्षी से उसे मित्र बना ले, जिससे भविष्य में वह तुझसे विद्रोह न कर सके। तू स्वयं भी कभी सुग्रीव का अनादर न करना, क्योंकि वह कृतज्ञ है तथा इस समय वह स्वयं एक सहायक ढूंढ़ रहा है। सो तुम दोनों भाई पहले उसका अभीष्ट कार्य पूरा कर देना, जिससे वह कृतज्ञता के भार से उऋण होने को तुम्हारा कार्य अवश्य करेगा। उसके वानर पृथ्वी के सब देश-देशान्तरों को जानते हैं। उनके द्वारा वह दुर्ग, वन, पर्वत, नदी, द्वीप सभी जगह, जहां से भी संभव होगा, तेरी पत्नी को ढूंढ लाएगा। मेरु, पाताल कुछ भी उसके चरों के लिए अगम्य नहीं है। सो हे राम, तू मेरी मृत्यु तक यहां ठहरकर मेरी और्ध्वदैहिक क्रिया कर। फिर यहां से पश्चिम की ओर जा। वह मार्ग वृक्ष-वनस्पतियों से सुशोभित और सुगम है, वहां ऋष्यमूक पर्वत के अंचल में तू पम्पा-सरोवर पर पहुंचेगा। वहां की भूमि कंकरीली नहीं है, घाट समतल है, उस सरोवर में नील कमल बहुत हैं। उस सरोवर में विचरने वाले कुरंड, हंस, कुस और क्रौंच आदि पक्षी निरन्तर मधुर शब्द करते हैं। वहीं तू वानरों के यूथ देखेगा। वे प्रकृत वीर हैं। उनमें सिंहविक्रम हैं। वहीं निकट तेजस्वी मतंग ऋषि का आश्रम है। मतंग ऋषि अब जीवित नहीं हैं; परन्तु उनकी सेविका तपस्विनी शबरी वहां आश्रम की स्वामिनी है। वहां का वन मातंग नाम से ही प्रसिद्ध है। उस वन में बड़े-बड़े हाथी हैं, जिनका मदगन्ध योजन-योजन विस्तार से सुरभित रहता है। पम्पा के शीर्षस्थल पर ही ऋष्यमूक है। वहां की चढ़ाई बड़ी विकट है। वहां स्पर्शमणि तथा दिव्यौषधियां बहुत हैं। इस समय उसी पर्वत की गुहाओं में विपद्ग्रस्त धर्मात्मा सुग्रीव रहता है।”
इस प्रकार हितकारी वचन कहकर दनु ने ब्रह्मरन्ध्र द्वारा अपने प्राण त्याग दिए। राम-लक्ष्मण ने विधिवत् उसकी और्ध्वदैहिक क्रिया की, फिर वे सुग्रीव से मिलने को ऋष्यमूक की ओर चले। राह में विकट वन-पर्वत-उपत्यकाएं पारकर अत्यन्त धैर्यपूर्वक वे ऋष्यमूक के निकट मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे। वहां शबरी ने उनका विधिवत् आतिथ्य कर उन्हें आश्रम में ठहराकर उनका श्रम दूर किया।
ये मतंग ऋषि अन्त्यज जाति के थे। शबरी भी उन्हीं की जाति की थी। परन्तु दोनों ही का धर्म-प्रभाव दूर-दूर तक व्याप्त था। मतंग ऋषि की बहुत ख्याति थी। वे वेदर्षि थे। राम ने शबरी से कहा-“माता, दनु से तेरे आश्रम की महिमा सुन चुका हूं। अब उसे प्रत्यक्ष देखने की अभिलाषा रखता हूं।”
शबरी ने कहा-“हे राम, मेरे गुरुपद के नाम पर इस वन का नाम ही मातंग वन है। मतंग ऋषि ने यहां बहुत यज्ञ किए तथा सप्ततीर्थ बनवाए। यहीं पर उन्होंने देवराट का प्रत्यक्ष सत्कार किया था तथा देवराट इन्द्र स्वयं यहां आकर ऋषिवर को देवलोक ले गए थे। अब मेरा भी समय आ उपस्थित हुआ है। राम, तुम्हें देखकर और तुम्हारा आतिथ्य करके मैं कृतकृत्य हो गई। अब मेरी इच्छा अग्नि-प्रवेश कर अपना शरीर त्यागने की है।” इतना कहकर शबरी ने सब तापसजनों को एकत्र कर अग्न्याधान किया और विधिवत् हवन करके सबके देखते-देखते अग्नि-प्रवेश किया।
राम-लक्ष्मण ने शबरी की औध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न कर, सप्ततीर्थों में स्नान कर पितरों का तर्पण किया और फिर ऋष्यमूक की ओर चले। शीघ्र ही वे पम्पा-सरोवर के तट पर जा पहुंचे। वहां वन की शोभा अकथनीय थी। वृक्ष जैसे फल-फूलों की वर्षा कर रहे थे। वायु के साथ-साथ भ्रमरावलीयां गूंज रही थीं। पवन चन्दन के वृक्षों से शीतल और सुरभित था। पक्षी मस्त हो चहक रहे थे। सर्वत्र ऋतुराज का राज्य था। राम वहां के मनोरम वातावरण को देख विरह-दुःख से दुःखित हो कहने लगे-“देखो, इस मधुर ऋतु में सीता के बिना मेरी कैसी दशा है! सीता के बिना यह सुखद वातावरण मुझे कितना कष्टकर प्रतीत हो रहा है! अब न जाने वह साध्वी कहां होगी?”
राम के इस प्रकार विलाप को सुनकर लक्ष्मण ने कहा-“आर्य, आप धैर्य धारण कीजिए। वह चोर चाहे भूलोक में हो या पाताल में, हम उसे ढूंढ निकालेंगे। अब हमें सरोवर में स्नानकर ऋष्यमूक पर पहुंचना चाहिए। किंकर्तव्यविमूढ़ होकर शोकसंतप्त होने से भला क्या लाभ है!”
इस प्रकार पम्पा सरोवर में स्नान कर जब राम ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे, तो दो नवीन शस्त्रधारी पुरुषों को देख सुग्रीव के मंत्री चौकन्ने हो गए। उन्होंने सुग्रीव को इसकी सूचना दी। ‘हो सकता है, इन पुरुषों को बालि ने ही हमें मारने को भेजा हो,’ इस विचार से उसने सोच-विचारकर अपने पार्षद हनुमान् को राम के पास सच्चे समाचार जानने के लिए भेजा। हनुमान् ने ऋषिवेश बना राम के पास आ उनका नाम-धाम-गोत्र तथा उनके उधर आने का कारण पूछा। उसने कहा-“तपस्वी का वेश धारण करने वाले तथा धनुष-बाण लिए वन में विचरण करने वाले, आप कौन हैं? क्या आप कोई राज्याधिकारी हैं या देव-पुरुष हैं? सो कृपाकर कहिए। इस स्थान पर अपने भाई बालि से प्रताड़ित वानर-राज सुग्रीव रहते हैं। वे हमारे स्वामी हैं। मेरा नाम हनुमान् है। मैं उन्हीं की आज्ञा से आपकी सेवा में आया हूं।”
हनुमान् के ऐसे वचन सुन, राम का संकेत पा, लक्ष्मण ने कहा-“हम महात्मा सुग्रीव के गुणों से अवगत हैं और उन्हीं से मिलने के लिए इस स्थान पर आए हैं। सुग्रीव यदि हमसे मित्रता करना चाहें तो हमें भी वह स्वीकार है। हम कोसलेश दशरथ के पुत्र हैं। ये आर्य राम हैं, मैं इनका अनुज लक्ष्मण हूं। पिता की आज्ञा से आर्य राम पत्नी सीता-सहित वन में आए थे, यहां जनस्थान में किसी दुष्ट ने इनकी स्त्री का अपहरण किया है। उसी को खोजते हम घूम रहे हैं। हमें राह में राक्षस दनु ने महात्मा सुग्रीव का परिचय दिया था। तभी से हम उनसे मिलने के लिए उत्सुक हैं।”
ये बातें सुनकर हनुमान् ने विनम्र वाणी से कहा-“आपके वचनों से मेरे कान तृप्त हो गए। महात्मा सुग्रीव के अग्रज बालि ने उनकी स्त्री रूपा का अपहरण कर राज्य भी छीन लिया है तथा उन्हें नगर से निकाल दिया है, जिससे वे दुःखित हो इस पर्वत पर बस रहे हैं। वे आपकी मित्रता-लाभ कर अवश्य प्रसन्न होंगे। अब आप यहां क्षण-भर विश्राम कीजिए, तब तक मैं जाकर उनसे निवेदन करता हूं।”
यह कहकर हनुमान् चले गए। उन्होंने सुग्रीव को राम-लक्ष्मण का परिचय दिया। वहां आने का कारण भी बताया। सुनकर सुग्रीव ने राम के पास जाकर भेंट की और अग्नि-स्थापना करके उनसे मैत्री स्थापित कर कहा-“आज से हम एक हैं, मेरा-आपका सुख-दुःख एक है।” फिर दोनों चन्दन की लताओं पर बैठ वार्तालाप करने लगे।
सुग्रीव की वार्ता सुनकर राम ने कहा-“मित्र, तू चिन्ता न कर। मैं दुरात्मा बालि का वध कर तेरी पत्नी और राज्य तुझे दिलाऊंगा।”
सुग्रीव ने कहा-“मित्र, मैं भी जैसे, जहां से बन पड़ेगा, सीता का पता लगाकर आपको ला दूंगा।”
इस प्रकार दोनों वचनबद्ध हो आगे की योजनाएं बनाने लगे। तब अकस्मात स्मरण करके हनुमान् गुफा में जाकर वे वस्त्र-आभूषण ले आए जो सीता ने हरण के समय जाते हुए वहां फेंके थे। आभूषण और वस्त्र देख राम व्याकुल हो गए। उन्होंने लक्ष्मण से कहा-“देखो सौमित्र, ये कुण्डल, ये नूपुर क्या सीता ही के हैं?”
सौमित्र ने कहा-“आर्य, मैं इन कुण्डलों को नहीं जानता, क्योंकि मैंने कभी आर्या के मुख की ओर नहीं देखा, मैं तो इन नूपुरों को पहचानता हूं। जब मैं नित्य आर्या की पद-वंदना करता था, तब इन्हें देखता था।”
तदनन्तर सुग्रीव ने सारी घटना कह सुनाई।
राम ने कहा-“मित्र सुग्रीव, क्या तुम अनुमान कर सकते हो कि वह दुष्ट चोर कौन है?”
“नहीं कह सकता, न मैं उसका स्थान जानता हूं। परन्तु वह कहीं निकट नहीं रहता है, ऐसा मेरा अनुमान है। फिर भी मैं शीघ्र ही उसका पता लगा लूंगा। आप चिन्ता न करें। शोक त्याग दें। महात्माओं का दुःखी होना उचित नहीं है। मुझे भी पत्नी-वियोग है, परन्तु मैं शोक नहीं करता आप भी इस संकट-काल में धैर्य धारण कीजिए। शोक से व्याकुल होकर जो धैर्य छोड़ देता है, वह मूर्ख है। शोक से मनुष्य बुद्धिहीन होकर संशय में पड़ जाता है। इसलिए आप शोक त्याग पुरुषार्थ दिखाइए।”
सुग्रीव के ये सारगर्भित वाक्य सुनकर राम ने कहा-“मित्र, तू सच्चे मित्र की भांति बात कही है। निस्संदेह तेरे जैसा मित्र मिलना दुर्लभ है। तू विश्वास रख कि मैंने जो वचन दिया है, वह पूरा करूंगा।”