अशोक वन

लंका में परकोटे के बाहर चार योजन भूमि में अशोक वन था। इस अशोक वन में एक लाख अशोक वृक्ष थे। इस वन में बारहों मास वसन्त रहता था। अशोक के अतिरिक्त अनेक जाति के विविध वृक्ष विविध फल-फूलों से लदे थे। आम और केले की वहां अनगिनत जातियां थीं, जो सभी ऋतुओं में फल देते थे। बीच-बीच में कमनीय लताओं से आच्छादित अनेक कुंज थे। अनेक वृक्ष सुनहले और रुपहले पत्तों वाले थे। उन पर बैठे पक्षी कलरव करते बड़े भले लगते थे। अनेक मोर, कोयल, शुक, सारिका, सारस, हंस, चक्रवाक पक्षियों का समूह ठौर-ठौर पर जलाशयों और सघन कुंजों में विहार करता फिरता था। वायु से झड़-झड़कर अनेक प्रकार से रंग-बिरंगे पुष्पों ने पृथ्वी को ढांप लिया था। उनसे पृथ्वी ऐसी मालूम होती थी, मानो रंगीन गलीचा बिछा हो। वहां स्वच्छ जल से भरे अनेक तड़ाग और पुष्करिणियां थीं, जिनमें बड़े-बड़े शतदल कमल खिले थे। उनके बीच हंस और चक्रवाक निरन्तर क्रीड़ा करते रहते थे।

वन में ही एक पर्वत था। उससे एक प्रपात गिरकर मनोहर छटा दिखा रहा था। प्रपात का यह प्रवाह तिरछा-टेढ़ा ऊंची-नीची भूमि पर गिरता बड़ा मनोहर प्रतीत हो रहा था। इस जल-प्रपात के कारण लताएं भूमि पर सो गई थीं, उस पर्वत के पार्श्व ही में एक बड़ा सरोवर था तथा अनेक कृत्रिम तालाब भी थे, जिनमें बढ़िया श्वेतमर्मर की सीढ़ियां बनी थीं। स्थान-स्थान पर कृत्रिम वाटिकाएं तथा छोटे-बड़े अनेक हर्म्य भी बने थे। सघन वृक्षों के नीचे सोने की वेदियां बनी थीं। बीच-बीच में खुले मैदान भी अनेक थे। सबके बीच एक बहुत प्राचीन सुनहरा अशोक वृक्ष था जो अनेक लताओं से घिरा था, इसके चारों ओर सोने की अनेक वेदियां बनी थीं तथा अद्भुत अग्नि के समान ज्वलन्त पादप चारों ओर थे। इन अलौकिक और दुर्लभ रमणीक वृक्षों को देखकर बड़े-बड़े देव-दैत्य चकित रह जाते थे। ऐसा विराट और मनोरम वन पृथ्वी पर उस समय दूसरा न था। सरोवर के चारों ओर जो चम्पा, चमेली, चन्दन के वृक्षों की सघन छाया थी, उससे वहां की शीतल समीर सदैव ही सुरभित रहती थी।

अशोक कानन में एक ऊंची और मनोरम भूमि पर एक सुन्दर विशाल सौध था, जो कैलास पर्वत के समान सफेद था। उसमें सहस्रों मणिजटित खम्भे लगे थे। इसकी सीढ़ियां मूंगों की और वेदियां स्वर्ण की बनी थीं। वह स्वच्छ प्रासाद अपनी आभा से देदीप्यमान था। उसकी अट्टालिकाएं गगनचुम्बी थीं। इसी हर्म्य में अपहृता भगवती सीता को लाकर रावण ने रखा था। हर्म्य पर पांच सौ सशस्त्र राक्षसियों का पहरा था तथा उतनी ही राक्षसियां सीता की शुश्रूषा के लिए नियत थीं। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण अशोक वन की रखवाली दस सहस्र राक्षस सुभट कर रहे थे।

यद्यपि हर्म्य अति विशाल और भव्य तथा सुखोपभोग के सब साधनों से सुसज्जित था, परन्तु पतिवियुक्ता सीता को उस सब साज-शृंगार और सज्जा से कुछ भी प्रयोजन न था। वह हर्म्य का विलास-कक्ष छोड़, उसी विशाल अशोक वृक्ष के नीचे उदास मलिन वेश में, अधोमुखी भूमि पर एक पर्णशय्या पर बैठी आंसू बहाती हुई शोक-चिन्त्ता और कातर भाव से विपन्न जीवन के कठिन क्षण व्यतीत कर रही थी। उसके सिर पर एक वेणी थी जो पृथ्वी तक लटक रही थी। उसकी दशा कुत्तों से घिरी हुई असहाय मृगी की-सी हो रही थी। यद्यपि उसके चन्द्रमुख की कान्ति से अब भी दिशाएं आलोकित हो रही थीं। उसके बिम्बफल के समान रक्तवर्ण अधर, क्षीण कटि-भाग और कमल-से बड़े-बड़े नयन तथा लाल-लाल चरण शोभा की खान थे, वह संयमशीला तपस्विनी की भांति पृथ्वी पर बैठी राम के ध्यान में मग्न रहती। शोकातुर होने के कारण उसकी शोभा मन्द पड़ गई थी और आभूषण-विहीन उसकी देहश्री फीकी हो गई थी। जो भी आभूषण वह इस समय अंग पर धारण किए थी, वे भी सब मैले हो गए थे। उसे न अपने अंग-संस्कार का विचार था, न वस्त्रों का। फिर भी इस विपन्नावस्था में उसका माधुर्य अपूर्व दीख रहा था। वह किसी भांति अपने शरीर को धारण किए हुए थी।

जब सीता को अशोक वन में रहते कुछ समय व्यतीत हो गया, तो एक दिन भोर ही में रावण अपने स्त्री परिकर के साथ अशोक वन में पहुंचा। वह स्वर्ण-किरीट मस्तक पर धारण किए, स्वर्ण रथ पर, रथ की समस्त घंटियों को किंकिणित करता हुआ अपने हर्म्य से निकला। उसके पीछे सौ दासियों के हाथों में उसके सुख-द्रव्य थे। किसी के हाथ में ताड़ के पंखे, कोई सोने की झारी लिए सुखपाल में बैठी थी। एक स्त्री सोने के डंडेवाला प्रकाशमान छत्र लेकर रावण के पीछे हाथी पर बैठी थी। कुछ स्त्रियां जलते हुए गन्ध-द्रव्य लिए, विविध वाहनों पर सवार चल रही थीं। सवारी के आगे दुन्दुभि बजती जाती थी। रक्षेन्द्र की शरीर-रक्षिका सेवा-दासियां गन्ध-माल्य विभूषण हाथों में ले झुरमुट बना रक्षेन्द्र के रथ को घेर पांव-प्यादा ही चल रही थीं। इस प्रकार जैसे नक्षत्रों से घिरा चन्द्रमा सुशोभित होता है, उसी प्रकार रक्षेन्द्र रावण इन रूपसी सुन्दरियों के झुरमुट में दुन्दुभि, नगाड़े बजवाता हुआ अशोक वन पहुंचा। अशोक वन में पहुंचते ही भेरी और तूर्य बज उठे। सब चेरियां-प्रहरी, गुल्मपति यथास्थान चैतन्य हो गए। सभी ने जान लिया कि महाबली पृथ्वीजयी रक्षेन्द्र रावण का अशोक वन में आगमन हो रहा है। सौध हर्म्य में जाकर रावण की सवारी महल की पौर में प्रविष्ट हुई।

परंतप रक्षेन्द्र को आता देख सीता वायुवेग से कम्पित केले के पत्ते के समान कांपने लगी। उसने अपने अंगों को अपने ही में समेट लिया और अत्यन्त संकुचित हो, भय और शोकातिरेक से अभिभूत हो पृथ्वी पर बैठी रह गई।

रावण ने देखा-सीता के सब अंग मलिन हो रहे हैं। वह बहुत ही दुर्बल हो गई है। निरन्तर रोते रहने से उसके नेत्र सूजकर लाल हो गए हैं। वह मूर्तिमती दुःख की प्रतिमा सी दीख रही है। उसने सोचा-अहो, यह श्रेष्ठ कुल की महिला है, पर दुःख और शोक से निकृष्ट कुलोत्पन्न-सी दीख रही है। वह नष्टप्राय यश, निरादत श्रद्धा, टूटी हुई आशा, तिरस्कृत आभा तथा अन्धकाराच्छन्न प्रभा, विधि-रहित पूजा और जलरहित नदी के समान हो रही है। निरन्तर उपवास, शोक और भय के कारण यह अतिकृश हो गई है। यह नाममात्र का आहार करती है, तप ही इसका जीवन है। दुःख ही इसका धन है।

रावण ने उसके सम्मुख पहुंचकर कहा-“प्रसीद! प्रसीद! भगवति सीते! इतना शोक न कर, अतीत की चिन्ता से क्या लाभ होगा अब? मैं तेरा अनुगत रक्षपति रावण तेरी प्रसन्नता और अनुकूलता चाहता हूं। पर तू इस तरह अपने अंगों को समेटे क्यों बैठी है? क्या तू अपने को नष्ट कर देना चाहती है? हे जनकनन्दिनी, मैं भी तेरे ही समान वरिष्ठ कुल का हूं। तुझे वैरी की पत्नी जानकर भी मैंने तुझ पर बलात्कार नहीं किया। मैं तुझे अपने पर प्रसन्न देखना चाहता हूं। तनिक नेत्र उघाड़कर देख-यह स्वर्णलंका, इसका सब वैभव और यह लंकापति रावण, जिसके नाम से देव, दैत्य, नाग, यक्ष कांपते हैं, तेरी कृपा-कोर का भिक्षुक यहां उपस्थित है। अब उस भिखारी राम से तेरा क्या प्रयोजन है? वह राज्यभ्रष्ट तो प्रथम ही हो चुका। अब विनष्टगृह हतभाग्य मारा-मारा वन में फिरता होगा। फिर तुझे भय क्या है? वैरियों की पराई स्त्रियों को हरण कर लाना और उनके सहवास का सुख भोगना हम राक्षसों की परिपाटी है। पर तेरे साथ मैं बलात्कार तो दूर, तेरा अंग-स्पर्श भी तेरी अनुमति बिना नहीं करूंगा। इसलिए शोक त्याग दे, मुझ पर प्रसन्न हो और यहां लंका में सब देव-दुर्लभ भोगों को भोगती हुई, मेरे सम्पूर्ण अवरोध की शीर्षस्थानीय होकर। लोक-लोकान्तर से जो दुर्लभ रत्न मैंने प्राप्त किए हैं, वे सब और यह लंका का राज्य मैं तुझे ही सौंपता हूं। मेरे अधिकार से परे इस पृथ्वी पर जितने नगर हैं, उन सबको मैं अपने पराक्रम से जीतकर तेरे पिता जनक को दे दूंगा। हे सुन्दरी, मेरे समान योद्धा अब इस पृथ्वी पर कौन है? देव, गन्धर्व, यक्ष, नाग, दैत्य, मानुष कोई भी तो मेरे सम्मुख खड़े रहने में समर्थ नहीं है। इसलिए उस एक चीर धारण करने वाले राज्यभ्रष्ट तापस राम को तू भूल जा। अब उसके तुझे दर्शन भी नहीं हो सकते। मेरे भवन में तीनों लोकों की उत्तम स्त्रियां हैं, वे सब तेरी सेवा करेंगी। स्वर्ग-लोक में, नरलोक में और पृथ्वी पर जहां जितना धनरत्न है, जितना ऐश्वर्य है, उस सबका तू मेरे साथ रहकर भोग कर। वह बेचारा भिखारी राम न तो बल में, न ही धन और पराक्रम में मेरी समता कर सकता है, इसलिए तू यह जानकर-कि यह यौवन क्षणभंगुर है, इसका उपभोग मेरे साथ कर और जीवन के लोकोत्तर भोग भोग!”

रावण के ऐसे वचन सुनकर सीता ने अपने और रावण के बीच एक तिनके की ओट करके कहा-“महाराज लंकापति, आपकी जय हो। आप त्रिलोक के स्वामी और सब विद्याओं के भण्डार हैं। आपको ज्ञात है कि मैं वरिष्ठ कुल की कन्या और वधू हूं। उच्च कुल में मेरा जन्म हुआ है और उच्च कुल ही में ब्याही गई हूं। मैं आर्य कुलवधू हूं। फिर भला मैं लोकनिन्दित आचरण कैसे कर सकती हूं। आप सद्धर्म का विचार कीजिए और सज्जनों के मार्ग का अनुसरण कीजिए। आप रक्षपति हैं। ‘वयं रक्षाम:’ आपका व्रत है। आपको सर्वप्रथम स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। आपके अवरोध में त्रैलोक्य से लाई हुई बहुत सुन्दरियां हैं, आपको उन्हीं पर सन्तुष्ट रहना चाहिए। हे रथीन्द्र, जिन पुरुषों का मन चंचल रहता है उनका अपमान-पराभव भी उसी के द्वारा होता है। क्या आपको सतपरामर्श देने वाले सतपुरुष मंत्री नहीं हैं अथवा आपकी विपरीत बुद्धि ही उनका सतपरामर्श नहीं ग्रहण करती? कहीं ऐसा न हो कि आपके इस अपराध से धन-धान्य से परिपूर्ण लंकापुरी नष्ट हो जाए। हे रक्षेन्द्र, जैसे सूर्य से उसकी प्रभा भिन्न नहीं है, उसी प्रकार मैं भी राम से भिन्न नहीं हूं। मैं उन्हीं की भार्या हूं, आपके सर्वथा अयोग्य हूं। आपका श्रेय इसी में है कि आप मुझे उनके पास पहुंचा दें और उनकी मित्रता-लाभ कर लें-शत्रुता से मित्रता अधिक लाभदायक है।”

सीता के वचन सुनकर रावण ने कहा-“भद्रे सीता, मैंने तेरे साथ कोई अधर्माचरण नहीं किया। राक्षस-धर्म की मर्यादा के अनुसार ही तेरा हरण किया है, क्योंकि तेरा पति मेरा वैरी है। उसने अकारण मेरी बहन सूर्पनखा का अंग-भंग किया और उसकी रति-याचना की अवज्ञा की, इससे मैंने उसकी स्त्री का हरण कर लिया। इसमें दोष कहां है? फिर मैं तो तुझ पर अधिक सदय हूं। मैंने तुझसे बलात्कार नहीं किया, तुझसे दासी-कर्म नहीं कराया, तेरा वध भी नहीं किया, न तुझे विक्रय किया, अपितु इस महाहर्म्य में सादर-सयत्न रानी की भांति रखा है और स्वयं मैं विजयी रावण तुझसे प्रणय याचना करता हूं। क्या तू यह भी नहीं सोचती?”

सीता ने कहा-“क्या आपने मेरे पति को युद्ध में जीतकर मेरा हरण किया है? आपने तो छल करके, भिक्षुक बनकर, चोर की भांति मुझे चुराया है। आपने पुरुष-सिंह राम-लक्ष्मण की अनुपस्थिति में मेरा हरण किया, आपका यह कार्य कितना कलंकित था! आपका यह कार्य न धर्म-सम्मत है, न वीरोचित। फिर मैं तो आपको स्वीकार करती ही नहीं। मेरे यशस्वी पति राज्य-भ्रष्ट नहीं हैं। उन्होंने तो स्वेच्छा से राज्य त्यागा है, अभी भी वे अवध के स्वामी हैं। अभी भी वे सात अक्षौहिणी सेना के अधिनायक हैं। परन्तु इससे भी क्या? आर्यपुत्र का बल उनकी सेना में नहीं, उनकी भुजाओं में है। दण्डकारण्य में आपकी बहन ने वह भुजबल देखा है। अब रक्षेन्द्र यदि आपकी सुमति न जगी तो आप देखेंगे कि शत्रु-संहारी मेरे पति मेरे लिए लंका में अवश्य आएंगे। तब आप भले ही कुबेर की अलका में जाकर छिपें, चाहे और कहीं, कोई भी देव, दैत्य, नाग, यक्ष आपको उनके हाथों से बचा न सकेगा। आपकी निश्चय ही मृत्यु होगी।”

भगवती सीता से ऐसे कठोर वचन सुनकर रक्षेन्द्र रावण क्रुद्ध हो गया। उसके नेत्र लाल हो गए, नथुनों से बैल की भांति गर्म निःश्वास छोड़ते हुए उसने कहा-“भद्रे सीते, तू शत्रु-भार्या है, मेरी हरण की हुई सम्पत्ति है, तूने मेरा ही तिरस्कार किया है। मैंने जो तुझ एक स्त्री को इतना मान दिया, इस पर तूने विचार नहीं किया। इस अपराध में तेरा तुरन्त वध होना चाहिए। परन्तु मैं तुझे एक मास की अवधि देता हूं। इस बीच यदि तू अपना हठ त्याग मेरे अधीन न होगी तो मेरे रसोइए मेरे कलेवे के लिए तेरा वध करेंगे।” इतना कह और लाल-लाल आंखों से सीता को देखता हुआ रावण अपने मणि-हर्म्य में जा देव, गन्धर्व, दानव और यक्ष-कुमारियों के बीच बैठ मद्यपान और विलास करने लगा।

रावण के संकेत से राक्षस-कुमारियों ने सीता को बहुत समझाया, प्रलोभन दिए। धान्यमालिनी एक मुखरा तरुणी थी। वह आंख बचाकर बोली-“कल्याणि सीते, मैं तेरे ही भले के लिए कहती हूं, महात्मा रावण कुल में वरिष्ठ हैं। महर्षि पुलस्त्य छ: प्रजापतियों में चौथे थे, उनके पुत्र विश्रवा मुनि भी प्रजापति-तुल्य ही हैं, रक्षेन्द्र रावण उन्हीं के पुत्र हैं। उनकी भार्या बनने से बढ़कर सौभाग्य पृथ्वी की किसी स्त्री का क्या हो सकता है? त्रैलोक्य के अधिपतियों ने अपनी-अपनी पुत्रियां उन्हें दे अपने को धन्य माना है। फिर रक्षेन्द्र तुझ पर तो बहुत प्रसन्न हैं। अब तेरा उस तपस्वी राम से क्या प्रयोजन रहा?”

हरजटा ने कहा-“समय को देखकर ही अनुराग-विराग होता है। फिर जिसके अनुराग की याचना देव-दैत्य-विजयी रक्षेन्द्र स्वयं करते हैं, उस स्त्री के सौभाग्य की तुलना क्या है? अरे, इन्द्र को जिसने बन्दी बनाया, जब वह हजारों देव-दैत्य-दुर्लभ रमणियों से भरे अन्तःपुर को छोड़ तेरे पास आता है तो फिर तेरी समता पृथ्वी पर कौन स्त्री कर सकती है?”

दुर्मुखी ने कहा-“अरी, जिनके प्रताप के आगे सूर्य भी अपना तपना त्याग देता है, उन्हीं रक्षेन्द्र का तू तिरस्कार करती है! तू सौभाग्य को लात मार दुर्भाग्य का वरण करती है! यह भला तेरी कैसी बुद्धि है?”

एकजटा ने कहा-“संसार का ऐसा कौन-सा सुख-साधन है, जो रावण के हर्म्य में नहीं। अरे, वह तो त्रिलोकपति है, उसके ऐश्वर्य की तुलना पृथ्वी पर भला कौन कर सकता है? तू भिक्षुक राम के पुराने अनुराग का विचार कर राक्षसराज का तिरस्कार कर रही है! अरी, राम तो स्वयं ही दुखी है। वह तुझे कैसे सुखी रखेगा? अब तो उसकी आशा ही छोड़। त्रैलोक्य में आज ऐसा कौन है, जो दुर्लंघ्य समुद्र-मेखला को लांघकर यहां आकर तेरी सुध ले?”

एक राक्षसी ने कहा-“मैं तो यही नहीं समझ सकती कि उस कृपण राम के साथ रहकर तू क्या करेगी! फिर वह समुद्र-पार आने का साहस भी भला कैसे करेगा?”

चण्डोदरी ने कहा-“अरी, क्यों इस कुरूपा के साथ माथा खपाती हो! ऐसी स्त्रियों का तो अन्त में वध ही होता है। इसके शरीर का मध्य भाग मुझे ही मिलेगा।”

“और कलेजा मुझे।”

“तो जाओ, एक भाण्ड मद्य उठा लाओ। हम इसे काट-काटकर खा जाएं और मद्य पीकर आनन्द करें।”

“अभी नहीं, रक्षेन्द्र ने इसे अवधि दी है। उसे पूरा होने दो, फिर तो हमीं इसका स्वादिष्ट मांस खाएंगी।”

सीता ने इस पर नेत्रों में जल भरकर कहा-“सखियो, अवधि की इसमें क्या बात है, तुम अनुग्रह करके अभी क्यों न मेरा भक्षण करके इस दुःख से मेरा परित्राण कर दो। हाय, मैं बड़ी ही अनार्या और असती हूं। मुझे धिक्कार है, जो मैं आर्यपुत्र से पृथक् होकर भी अभी तक जीवित हूं। जाओ-जाओ, रक्षेन्द्र को तो मैं बाएं पैर के अंगूठे से भी नहीं छू सकती। समुद्र से घिरी होने से क्या? आर्यपुत्र का मेरी टोह लगाने यहां तक न पहुंचेंगे? क्या गृध्रराज जटायु ने उन्हें मेरी सूचना न दी होगी? क्या वे वीर सूचना देने से पूर्व ही गतप्राण हो गए होंगे? यदि आर्यपुत्र को मेरे यहां रहने का पता लग गया तो वे समुद्र को भस्म कर देंगे। संसार को राक्षसों से विहीन कर देंगे। आज जैसे मैं क्रन्दन करती हूं, उसी प्रकार लंका में एक दिन घर-घर यही करुण क्रन्दन सुनाई पड़ेगा। लंका में रक्त की धारा बह जाएगी तथा यह पुरी श्मशान बन जाएगी। आज तुम सब यहां विजयोत्सव मना रही हो, पर वह दिन भी आएगा जब इस नगरी की श्री विधवा के समान हो जाएगी और जो मेरे शोक में उन्होंने प्राण ही दे दिए हों, तो फिर अब मुझे जीवन से क्या प्रयोजन है! हाय, वे वीतराग जन ही धन्य हैं, जिनका संसार की किसी भी वस्तु पर मोह नहीं है, जिनका कोई प्रिय-अप्रिय नहीं है। मैं अपने प्रियतम से बिछड़ गई हूं और लंकापति रक्षेन्द्र के पल्ले पड़ गई हूं। सो अब मेरे जीवन से क्या? मैं तो अब प्राण ही दूंगी।”

सीता के ऐसे पति-प्रेम-पगे वचन सुनकर त्रिजटा राक्षसी ने कहा-“यह तो अत्यन्त आश्चर्यजनक और अद्भुत बात मैं देख रही हूं। जो यह स्त्री एक पुरुष पर ऐसा उत्कट मोह और आसक्ति प्रकट कर रही है। ऐसी तो देव, दैत्य, मानुष, आर्य, राक्षस कहीं भी मर्यादा नहीं है। दैत्य, दानव, देव, नाग और मरुतों में तो पति-परम्परा ही कुछ ऐसी नहीं है। स्त्री स्वतन्त्र है, आत्मोन्मुख है, पति से उसका क्या प्रयोजन है! वह तो उससे तनिक भी अनुबन्धित नहीं है, वह जिस भी प्रिय पुरुष को चाहे, उसे ही अपने लिए वर सकती है। ऐसा ही कुछ हम राक्षसों में, गन्धर्वों में और यक्षों में भी है। हम लोग पति-पत्नी में सम सखाभाव मानते हैं सही, परन्तु ऐसा नहीं, जैसा यह स्त्री एक पुरुष के लिए ऐसी उन्मुख है। फिर आर्यों में तो ऐसी स्त्री दासी है, अवरोधिता है, अनुगता-अनुगामिनी है। पुरुष उसका स्वामी है। फिर यह आर्या किस प्रकार उस स्वामी को इस प्रकार चाहती है; जो हो, इसका प्रेम तो स्तुत्य है। क्यों न एक स्त्री एक पुरुष को ही प्यार करे? क्यों न एक स्त्री और एक पुरुष एकीभूत होकर न रहें? क्यों न दोनों का प्राणों से प्राणों का विलय हो। अहा-“समापो हृदयानिनौ,’ मुझे यही प्रिय है। इस मानुषी की मैं अभ्यर्थना करती हूं, वन्दना करती हूं, इसका पुरुष-प्रेम धन्य है, श्लाघ्य है, हमें इस पर क्रोध, इससे विराग न करना चाहिए। हम इसकी रक्षिकाएं हैं, इसे डराने-धमकाने से हमारा क्या प्रयोजन है? रक्षेन्द्र से निवेदन करूंगी। इस स्त्री से भी मैं कहती हूं-“आर्ये, तू निश्चिन्त रह, अपनी शक्ति भर हम सब तेरा प्रिय करेंगी, तेरा कल्याण हो! तू अपना प्रिय हमसे कह!”

त्रिजटा राक्षसी के ये वचन सुन सीता आश्वस्त हुई। उसने कहा-“भद्रे, मैं तेरा अनुग्रह स्वीकार करती हूं। इस रक्षपुरी में तू ही मेरी प्राणसखी है। मैं आज विपन्न हूं, परन्तु दैव-विधि से यदि सम्पन्न हुई तो तेरे इन शब्दों को याद रखूंगी।” इतना कह सीता नीचे मुखकर मौन हो बैठी।