Sulochana

वह बाला नूतन मुग्धा थी।

मेघरहित क्षणप्रभा विद्युत्-सी, कुमुदबन्धु चन्द्ररहित ज्योत्स्ना-सी, मन्मथ-रहित रति-सी थी वह सुलोचना, सुलक्षणा दानवनन्दिनी-मेघनाद-प्रियतमा। जैसे विधाता ने संसार की सब रचनाओं से अपने हस्तकौशल को परिष्कृत कर एक आदर्श रम्य मूर्ति रची थी, जो वसन्त की फुलवारी-सी प्रतीत होती थी। निर्दोष शुक्र नक्षत्र की भांति समुज्ज्वल, दृष्टि-मनोज्ञ, निर्वच्य वदनकमल, जितवीणाक्वणित वाणी, प्रस्फुट शरीरविन्यास, शोभनीय अवयव-संश्लेषण, पीन पयोधर, सुशोभन गमन, शरदिन्दु-सा गात्र-समुच्चय, अभिनन्दित चरण-युगल, अति विपुल जघन-जैसे काम ने सकाम हो, शरीरी हो, उसे रचा हो, जैसे अनुराग ही का समूर्त आविर्भाव हुआ हो, जैसे तत्क्षण ही उस गात्रलता में सब सात्त्विक भाव अंकुरित हुए हों अन्तर्ज्वलित मनोभाव से दह्य-सी उसके गात्र से प्रस्वेद-जल प्रिय-संदेश सुनकर ही झरने लगता था। कुसुमशरजालपतिता-सी वह तन्वी बारंबार अनिमेष दृष्टि से प्रिय को जैसे पीती थी। वह स्तब्धतनु, सोत्कम्पा, पुलकवती, स्वेदिनी, सनिःश्वासा प्रतीत होती थी, वाणी और गमन में उस भीरु का जो स्खलन होता वह उसकी चारुता में चार चांद लगता था। उस बाला की नवीन अनुरागावस्था में उच्छ्वास के साथ जो कुचयुगल का उल्लसन होता था, उसका सम्पन्न-मनोहारी मौग्ध्य नेत्रों को पुलकित कर देता था। वह प्रणयभङ्गभीतात्रीड़िता प्रिय कान्त मेघनाद को समीप पाकर भी चित्तगत मन्मथ-पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाती थी। उसकी चित्तवृत्ति को जानकर विहसित सखियां व्यंग्य से उसके सम्मुख चार प्रकार की प्रीति की बार-बार व्याख्या करके उसे खिझाती थीं। वे कहतीं-“हे दानवनन्दिनी, तू क्यों कान्त के लिए विकल है! कहीं आम्र-मंजरी भी भौरों को निमन्त्रण देती है? क्या चंद्रिका भी कहीं चकोर की अभ्यर्थना करती है? कहीं रत्न भी पारखी को ढूंढ़ते फिरते हैं?” परन्तु वह कामशरागार-भिन्ना सर्वाङ्गी, अव्यक्त-स्खलित अक्षर बड़ी ही कठिनाई से कहती-“अरी सखियो, कुछ चातुर्य करो, कुछ यत्न करो, आक्रान्त विपन्न का विपत्ति-प्रतीकार न कर उसे शुष्क उपदेश देने से क्या होगा? अरी, यह सुरभि-मास चैत्र प्रिय होने पर भी अप्रिय-सा लगता है। मृदु पवन से स्वतः शोभन है, पर विरहिणी के लिए अशोभन। अरी, हंसी तो सभी उड़ाते हैं, पर संसार में व्याकुल-मन उन्मन जन को परित्राण देने वाले थोड़े ही हैं। अब मैं किससे कहूं, आश्वासन कहां पाऊं? किसकी शरण जाऊं? मुझे तो शीतल-मन्द दक्षिण मलय समीर बहुत ही पीड़ा दे रहा है। मुझसे तो कुछ कहा ही नहीं जाता - इसी से चिर-मौनव्रत यह कोयल मुझसे वैर-निर्यातन कर रही है। यह क्षुद्र तिर्यग्योनि भी मेरी व्यथा बढ़ाने को प्रिय-विरह-जनित स्वर में कूक रही है। इन हंसों को देखो, इतराकर मेरी चाल का अनुकरण कर रहे हैं और ये भौरे मेरे उष्णोच्छ्वास से विदह्यमान होकर भी अलक-कुसुमों का लोभ संवरण नहीं कर सकते। इसी से तो कहते हैं कि विषय सभी दुस्त्याज्य हैं। अरी, मुझे तो शरीर धारण भी भारभूत हो रहा है और ये दुष्ट भौरे मेरे कर्णपूर में घुसे फूलों पर गूंज रहे हैं। इन्हें तो निवारण करो। वह हार, जो मैंने बड़े प्यार से हृदय पर धारण किया था, अब मेरे शत्रु मनोभाव से मिलकर मुझे दुःख दे रहा है। भला अब कुशल कहां है? उज्ज्वल, स्वेद-जल कपोलों से झरकर तथा कज्जल-मिश्रित अश्रुजल से मिलकर ऐसा हो गया है जैसा प्रयाग में गंगा-यमुना का संगम है। कोयल की कूक, मलय-समीर, पुरुषों की सुवास, पुष्पासुध और भौरे-ये पांच अग्नि हैं। सो मैं प्रिय-परिरम्भण की लालसा से पंचाग्नि-तप तप रही हूं।”

इस प्रकार विरह-विदग्धा नवोढ़ा सुलोचना के निकट पहुंच जब कान्त मेघनाद ने परिरम्भण दिया तो उसके सब ताप दूर हो गए। चिर विरह के बाद सुखद मिलन हुआ। मेघनाद का आवास प्रमदवन भूलोक का स्वर्ग था, जहां भांति-भांति के सुख-साधन देश-देश से संचित थे। वहां सभी ऋतुओं के अनुकूल जीवन-सामग्री थी। ऋतु के अनुकूल पुष्प, फल, विहंग, शीत, उष्ण, ताप को सम रखने के साधन, आहार-पान के विविध आयोजन अप्रतिम थे। वहां बारह सहस्र सुभट राक्षस इन्द्रजित मेघनाद के हर्म्य की रखवाली करते थे और सात सौ सुन्दरियां दानव-नन्दिनी सुलोचना की परिचर्या करती थीं, जो कुसुम-कोमल भी थीं और वज्रसम कठोर भी। सुलोचना के लिए जो पुष्पहार गुंथती थीं, उसके लिए अति ग्रहण भी कर सकती थीं। इस समय प्रमदवन वसन्त की फुलवारी हो रहा था। सुलोचना ने इन्द्रजित ऐन्द्राभिषेक-सिक्त लोकोत्तर पृथ्वीजयी वीर पति के स्वागत की भारी तैयारी की थी। अब चिर विरह के बाद वह सुलोचना पति-सान्निध्य में आनन्दविभोर हो गई। उस उत्सुकता ने प्रेमार्द नेत्रों से प्रियदर्शन प्रिय का स्वागत किया। प्रिय के दर्शनमात्र से ही उसकी संताप शान्चि हो गई इस शुभावर पर उसने सहज भाव से अवनत-शिर हो प्रियतम को प्रणाम किया। नैसर्गिक प्रीति, अप्रतिबन्ध विलास, रति रसायन वय:-तारुण्य, इन सबने मिलकर दोनों को एकीभूत कर दिया : ‘सदृशजनसमाश्रय: काम:!’ स्नेह के अतिरेक ने दोनों को धृष्ट बना दिया। वे सौकुमार्य का उल्लंघन कर निर्दय वामाचरण करने लगे, बारम्बार अभिलाषा करने पर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई। लज्जा-भाव भी विगलित हो गया। वर्द्धमान राग के कारण हृदय के एकीभूत होने से वस्त्राभरण, भूषा-सज्जा सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो गए। ऐसा उनका सुरतोत्सव हुआ। यथोचित रूप हो, यत्तथा अनुराग हो, अमन्द मन्मथ हो, अभिराम यौवन हो, तो जीवन का यथार्थ प्रातव्य मिले ही मिले, फिर मन्मथ का अमन्द वेग भी अद्भुत प्रभाव रखता था। जहां अभिनय ही शोभनीय माना जाता है-अश्लीला-चरण ही सम्मान समझा जाता है-निःशंकता ही जहां सौष्ठव और चांचल्य ही जहां गौरवाधान बन जाता है। जहां अंग का अभेद हो जाता है। स्वदेह और परदेह का विलय करने की इच्छा की तृप्ति ही नहीं होती। परिरम्भण परम सुखदाता होता है। लज्जा जहां अवगुण कहाता है। विवेक जहां मूर्खतापूर्ण बन जाता है। जो कामाग्नि आरम्भ ही में धक्-धक् जलती है, उसकी प्रद्धावस्था का वर्णन कैसे किया जाए! यहां न पाण्डित्य काम देता है, न चातुर्य। सुरत रस में निमग्न पुरुष समाधि से भी परागति को प्राप्त होता है। उसका वर्णन अकथ्य है। वहां हास-विलास, चाटु भाव सभी समाप्त हो जाते हैं। वहां तो भगवान कुसुमायुध रतिपति ही का अबाध शासन चलता है। कैसा चमत्कार है, यह मृदुगात लता-कोमलकान्त बाला दृढ़ पुरुष द्वारा आक्रान्त होने पर भी व्यथित नहीं होती-हर्षित होती है। निस्संदेह यह मनोज-मनोरथ का ही प्रभाव है, सुरत-योग में तो जैसे दोनों का देह सायुज्य-रूप अद्वैत हो जाता है। इस हृदयाद्वैत भाव ही से दोनों रमणी और रमण-भिन्न लिङ्ग और भिन्न शरीर-सम्पत्ति तथा भिन्न गुण होने पर भी तृष्णातिशय से, ऐक्याभिलाष से परस्पर अनुप्रवेश करते हैं। तब कौन रमण है, कौन रमणी है?-यह भेद अभेद हो जाता है। यह मेरा अंग-अवयव है, यह पराया-वह भेद-बोध नष्ट हो जाता है। निर्व्याजरूपेण प्रिय के अंक में अर्पित वपुषा कामिनी की मिलन-रात्रि जैसे क्षण-भर ही में व्यतीत हो जाती है।

रति-तृप्त प्रेम-विभोर हो युगल मिथुन सुलोचना और इन्द्रजयी मेघनाद ने जैसे अपने को जाना-दोनों ने प्रिय कान्त भाव से एक-दूसरे को देखा। मेघनाद ने कहा-“प्रिये, प्रियतमे, मैंने देवाधिदेव का चरम सान्निध्य प्राप्त किया, इन्द्र को दुर्धर्ष शक्ति से बन्धन में बांधा। कठिन दुदारोह, दुराचार, गुह्य विद्याएं और सिद्धि प्राप्त की, जिससे सम्पन्न होकर आज यह तुम्हारा दास मेघनाद पृथ्वी पर अजेय, अजर-अमर हो गया है। परन्तु यह सारी ऋद्धि, सिद्धि, सम्पदा, श्री जो मैंने अर्जित की और यह मेरा अमोघ व्यक्तित्व सभी तेरे सान्निध्य-सुख के सामने एक तिनके के समान नगण्य, तुच्छ, अपदार्थ हो गया। अरी प्राणवल्लभे, आज तुझे अपना यह देहभार अर्पण कर जैसे मैं कृतकृत्य हो गया। कह, इस तेरे अनुग्रह के बदले तुझे क्या दूं? अथवा कौन-सा तेरा प्रिय करूं? मुझ इन्द्र-दमन के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। कुछ भी तो अदेय नहीं है। अथवा अधिक प्रलाप से क्या? तू कहे तो मैं अपना प्राण ही तुझे अर्पण करूं।”

प्रिय पति के ये कोमलकान्त वचन सुन अश्रुमती सुलोचना ने कहा-“हे प्राणवल्लभे, अब मेरे लिए विश्व में मांगने को और क्या रह गया, जब मैंने अपने अंक में तुम्हें पा लिया? अरे प्राण, तुमने तो मेरे रक्त के प्रत्येक कण को नया प्राण दे मेरे जीवन के प्रत्येक क्षण को आप्राणमान कर दिया। तुम्हारे एक क्षण के सान्निध्य का मूल्य तो मेरा यह सारा जीवन भी नहीं है। तुमने जो मुझ दासी को सब भांति आज कृतार्थ किया, सो उसका वर्णन क्या वाणी से हो सकता है! पर मैं तो इसी भय से मरी जाती हूं कि कहीं अन्तरिक्ष के देवता-पितर मेरे सुख से ईर्ष्या न करने लगें। हे कान्त, अब तो यह मुझसे कदापि न सहा जाएगा। हमारे हृदय एक हैं पर शरीर भिन्न हैं। क्या कोई ऐसा उपाय है कि मैं अपने इस शरीर को तुम्हारे अंग में लय करके अपना अस्तित्व खो दूं? अरे, अब मैं तेरा-मेरा तो सहन ही नहीं कर सकती। हे जगज्जयी, तूने मुझे भी जय कर लिया, अब मुझे इतना दूर क्यों रखा है, अपने में समा ले।”

सुलोचना के ऐसे आवेश और प्रेमोन्माद-भरे वचन सुनकर मेघनाद ने हंसते-हंसते उसे अंक में उठाकर वक्ष से लगा लिया। उसने कहा-“प्राणसखी, अब भला हम-तुम दो कहां हैं? यह मेरा अंग तेरा और तेरा अंग मेरा है। हमारा हृदय एक है, प्राण एक है, केवल शरीर दो हैं, इसलिए कि हम इनके द्वारा एक-दूसरे को सहवास-सुख से आप्यायित करते रहें। फिर मेरी-तेरी आंखें हैं, इसलिए कि मैं तुझे देखूं, तू मुझे। मेरे-तेरे कान हैं, जिससे मैं तेरी बीणा-झंकृत वाणी सुनूं, तू मेरा वचन सुने। मेरे-तेरे अन्य अंग-उपांग हैं जिनका लय-विलय कर हम योगानन्द का चरम सुख अनुभव करें। अरी भोली, ये अंग ही सुखोपभोग का साधन है-यन्त्र है। यह न तेरा पृथक् अंग है, न यह मेरा पृथक्। हमारा दोनों का अंग अपूर्ण है। दोनों, दोनों के पूरक हैं जब दोनों एक होते हैं, हमारे प्राणों को चरम सुख देते हैं।”

सुलोचना ने नयन मूंद लिए। वह प्रियतम के वक्ष पर झुल गई। न कुछ कहने को रहा, न सुनने को। वह सब कुछ पा चुकी थी। सब कुछ समझ चुकी थी। विश्वजयी मेघनाद जैसे अपनी समूची अर्जित सम्पत्ति को किसी अव्यक्त दैवी प्रभाव से सजीवावस्था में अपने अंक में धारण किए अपने को और विश्व को भूल चुका था।