इन्द्र-मोचन

83. इन्द्र-मोचन

अब यहां हम फिर प्राचीन घटनाओं की चर्चा करेंगे। पाठक जानते हैं कि दैत्य, आदित्य, देव, दानव और नाग सब परस्पर दायाद-बान्धव थे। एक पिता से भिन्न-भिन्न माताओं की सन्तान थे। वे माताएं भी परस्पर सगी बहनें थीं। तब मातृ-गोत्र प्रचलित था। इसलिए माता ही के नाम पर सन्तानों का वंश-वृक्ष चलता था। इसी से इन सब देव, दैत्य, दानव, नाग आदि की-जो वास्तव में भाई और कौटुम्बिक थे-भिन्न-भिन्न जातियां बन गई थीं। फिर जब उनका विस्तार हुआ-भू-सम्पत्ति और राज्यों के बंटवारे का प्रश्न सम्मुख आया, तो आपस में लड़ाई-झगड़े और युद्ध-उत्पात हुए। इस भाईचारे के बंटवारे के प्रश्न को लेकर इन दायाद-बान्धवों में बारह देवासुर-संग्राम हुए, जो बड़े ही दारुण थे। ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होने के नाते दैत्य प्रमुख थे। पर आदित्यों का नेता सूर्य-विष्णु आदित्यों को प्रमुख बनाना चाहता था। बाद में इन्द्र ने अपने काल में विष्णु की अभिलाषा को काफी उद्दीस किया। उसने सब आदित्यों की एक नई सम्मिलित जाति देवसंज्ञक बना ली, स्वयं देवराट का पद ग्रहण किया तथा प्राचीन सुषा नगरी को अमरावती नाम दे, आस-पास के इलाके को देव-भूमि कहकर उस पर शासन करने लगा। इन्द्र ने भी निरन्तर दैत्यों और दानवों से युद्ध किए, परन्तु विजय उसकी कभी नहीं हुई। कारण कि देवों के साधन परिमित ही थे। दैत्यों और दानवों का भारी विस्तार और प्रबल बल था। उधर मनु और बुध के इलावर्त त्यागने तथा भारतवर्ष में नवीन आर्य जाति स्थापित करने एवं आर्यावर्त की स्थापना करने से इन्द्र का ध्यान भी इसी ओर गया। सूर्य-विष्णु अब वृद्ध हो चुके थे तथा उनका पुत्र मनु आर्यावर्त में आ बसा था। अतः अब उनकी विशेष प्रवृत्ति इलावर्त में नहीं रह गई थी। वारुणेय सब ऋषि-याजक हो गए थे, अतः वे लड़ाई-झगड़े से दूर ही रहते थे। वे देवों के भी मित्र थे और दैत्य-दानवों के भी। दैत्य-दानवों के याजक और कुलगुरु होने से वारुणेयों का खास प्रभाव था। फिर भी वे दोनों की यथासंभव सहायता करते ही रहते थे।

‘दायाद-बान्धव’ उसे कहते थे जो राज्य में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकारी हो। दायाद का अर्थ पुत्र, कुटुम्बी और सपिण्ड था। देवों के दायाद के हक को दैत्य-दानव अस्वीकार नहीं करते थे। पर देवता अपना विस्तार चाहते थे-प्रभुत्व चाहते थे। यही झगड़े की जड़ थी। जब हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु को मार दिया गया और प्रहलाद से वरुणदेव के सान्निध्य में देवों के कौलकरार हो गए और प्रहलाद को इन्द्रपद देना भी तय हो गया, तब एक बार देव-भूमि की राज्य-सीमाएं बंध गई थीं। परन्तु महत्त्वाकांक्षी इन्द्र इससे संतुष्ट न था और इसी से उसने सिन्धु नदी पार करके पंचसिन्धु प्रदेश पर आक्रमण किया तथा पार्थ्रद्र महासंग्राम हुआ। इन्द्र को पंचसिन्धु का सम्राट् मान लिया गया। परन्तु इन्द्र पंचसिन्धु में बसा नहीं, इलावर्त लौट गया, पंचसिन्धु में अपना प्रतिनिधि ही छोड़ गया पर त्रिशिरा का वध करने के कारण उसे इलावर्त से भागना पड़ा। सारा देवलोक ही उसका विरोधी हो उठा। उसके बाद नहुष और रजि ने देवलोक में जो उत्पात मचाए उससे देवों की शक्ति क्षीण हो गई। बाद में रजि को बृहस्पति ने चार्वाक-सिद्धान्तों का उपदेश दिया तो रजि का वंश ही वैदिक आर्य परिवार से पृथक् हो गया। इस प्रकार नहुषों से देवों का पिण्ड छूटा। पर देवराट पद्धति चल गई। देव चुनकर अपना इन्द्र नियत करते और वह देवों को अनुशासित करता था।

तारकामय-संग्राम में जब प्रहलाद-पुत्र विरोचन का वध हुआ और विजयी होकर दैत्यों ने विरोचन-पुत्र बलि को दैत्येन्द्र-पद पर अभिषिक्त किया, तब दैत्येन्द्र बलि की आज्ञा से दैत्यों ने बैल के चमड़े का तस्मा लेकर सारी भूमि को आपस में बांटना प्रारम्भ किया। इससे देवों में बड़ी घबराहट फैल गई। इन्द्र इस समय बड़ी ही विपन्नावस्था में था। देवों का सारा बल ही बिखर गया था। परन्तु इन्द्र विष्णु को साथ लेकर अनेक प्रमुख देवों के साथ बलि की सेवा में पहुंचा और कहा कि ‘पृथ्वी में हमारा भी भाग है। हम लोग आप ही के दायाद-बान्धव हैं। इसलिए हमारी जो देवभूमि आपने जय की है, वह हमें लौटा दीजिए। यह हम आपसे याचना करते हैं।’

उन दिनों सूर्य ने आर्यों के लिए नवीन यज्ञ-विधि की सृष्टि की थी। वही यज्ञ-विधि आदित्यों, देवों और आर्यों में प्रचलित हो गई थी। यह यज्ञ-विधि एक प्रकार से देवों का सांस्कृतिक चिह्न-सी हो गई थी तथा सूर्य का नाम इसी यज्ञ-विधि को प्रचलित करने से विष्णु प्रसिद्ध हो गया था। ‘यज्ञो वै विष्णुः’-यह देवों का एक घोषणा-वाक्य उन दिनों हो गया था।

बलि ने देवों की बात पर विचार किया। अपने कुलगुरु शुक्र और मन्त्रियों से परामर्श किया। परन्तु कवि शुक्राचार्य देवों तथा विष्णु का सारा ही षड्यन्त्र जानते थे। उन्होंने बलि को परामर्श दिया-“इस भूमि में से देवों को कुछ भी भाग नहीं मिलेगा। देव हमारी दैत्य भूमि से निकल जाएं। आर्यावर्त में या जहां चाहें चले जाएं। वे खटपटी, कुटिल और झगड़ालू हैं। उनके रहने से दैत्य भूमि निरन्तर युद्ध-स्थली बनी रहेगी।”

कवि शुक्राचार्य बड़े प्रभावशाली और तेजस्वी पुरुष थे। उनका विरोध साधारण न था। परन्तु इन्द्र भी बहुत ही कुटिल और धूर्त पुरुष था। उसने अपनी कन्या जयन्ती को शुक्र के पास भेज दिया। जयन्ती बड़ी चपला और सुन्दरी तरुणी थी। उसने अपने रूप के मायाजाल में बूढ़े को फांस लिया। बहुत वाद-विवाद और परामर्श के बाद यह तय हुआ कि जहां यज्ञविधि है-अग्न्याधान है-अग्निहोत्र है-अग्नि-स्थापना है, वहां-वहां की भूमि देवों को दे दी जाए। शुक्र यद्यपि जयन्ती के रूप-जाल में फंसे थे, फिर भी उन्होंने बलि के इस निर्णय को मूर्खतापूर्ण कहा और उसका प्रबल विरोध किया परन्तु बलि ने दैत्यगुरु का अनुरोध नहीं माना। इससे गुस्सा होकर कवि उशना शुक्राचार्य दैत्यभूमि को छोड़ नाभि-भूमि शंकद्वीप में चले आए। बलि को उन्होंने त्याग दिया।

प्राचीन काल में जिसे ‘नाभि’ या ‘भूमि’ कहते थे, उसी को आज अरब देश कहते हैं। उन दिनों इस भूमि पर वाशिष्ठों का खानदान रहता था तथा उन्हीं का यहां प्रभुत्व भी था। आजकल जिस नगर को ‘अदन’ कहते हैं, यह नगर उन दिनों वाशिष्ठों का प्रमुख नगर था तथा उसका नाम ‘आदित्य नगर’ था। संस्कृत में ‘आदित्य’ सूर्य को कहते और अरबी भाषा में ‘आद’ सूर्य को कहते हैं। यारब, एदम, एरीथस, आद-ये सब सूर्य ही के पर्यायवाची शब्द हैं। लाल सागर का नाम भी सूर्य के ही नाम पर था। सीरियन-अरबी सूर्य-उपासक थे। वास्तव में वे वशिष्ठ के वंशधर थे। अदन या आद नगर में उन्होंने आद, आदित्य का एक मन्दिर बनवाया था, जो सोने-चांदी की ईंटों से बना था। इसकी छत मोतियों तथा हीरों से बनी थी। उन दिनों यह देश पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार का माध्यम था।

वाणिज्य के बाहुल्य के कारण तब यह देश मालामाल रहता था। उस काल में यहां के निवासी ‘असुर’ और ‘फणीश’ बड़े प्रसिद्ध नाविक थे। मिश्र, अरब और भारत को उन दिनों एक व्यापार, शृंखला ने जोड़ रखा था। यही कारण है कि भारत से अरब या मिश्र के जो जल-थल-मार्ग थे-वहीं इस भूमि पर विशेष आबादी हुई। शेष भाग जन-शून्य रहा। उन दिनों के बाद भी अरब बहुत काल तक सांसारिक व्यापार भण्डार रहा। अरब की इस व्यापार-श्री की स्तुति बहुत ख्यातनामा इतिहासकारों ने की है। इस देश में चन्दन, अगर आदि के सुगन्धित ईंधनों से खाना पकता था तथा धन खर्च करने और शान-शौकत में अरब के धनीजन संसार-भर के राजा-महाराजाओं को मात करते थे। उनके प्रासादों के किवाड़ हाथीदांत, सुवर्ण व मणिजड़ित होते थे। अरब में उन दिनों स्वर्ण की इतनी बहुतयात थी कि उसका मूल्य लोहे से केवल दूना और पीतल से तिगुना था। वाशिष्ठों ने अपनी यज्ञ-विधि से सारे प्रदेश को व्याप्त कर रखा था। प्रसिद्ध है कि अरब के काबा आदि धर्मक्षेत्रों की यज्ञ-होम की सुगन्धित वायु मिश्र देश तक पहुंचती थी। इसीलिए एलेग्जेन्डर ने बेबीलोनिया अपनी राजधानी स्थापित करनी चाही थी तथा मिल्टन ने अपने काव्य में अरब की सुगन्धित वायु से सागरों के महकने का उल्लेख किया। वाणिज्य और राजनीति का केन्द्रस्थल होने से यहां भी कई बड़े देवासुर-संग्राम हुए। वाशिष्ठों ने इसे महिदेवों का उपनिवेश बना दिया था। अरब में प्राचीन किंवदन्ती है कि लाहसा एवं बहरियन प्रान्तों में पहले दानव वीर वास करते थे। इस प्रान्त को अरब लोग अब भी ‘रोबालखेत’ कहते हैं। आज भी अरब में शहसवार और वीर प्रसिद्ध हैं।

पाठकों को स्मरण होगा कि वशिष्ठ भी सूर्य के ही पुत्र थे। इससे वे आगे चलकर सूर्यवंशियों के, अथच सभी आदित्यों के, कुलगुरु और राजमन्त्री बन गए थे। यहां गाद में उन्होंने जिस सूर्य-मन्दिर की स्थापना की थी, उसके पुजारी भी वाशिष्ठ लोग ही थे। वशिष्ठ स्वयं थोड़े ही दिन यहां रहे, नारद से विग्रह कर वे देवलोक से चले आए-फिर यहां शुक्राचार्य के आ बसने पर भारत में सुदास के यहां आ गए। परन्तु उनके वंशधर और जायदाद-भूमि-सम्पत्ति सब अरब ही में रही। ‘रब’, ‘रू’ सूर्य ही के नाम थे और उसके पुरोहित मग, वाशिष्ठ थे। योम-आह, रविवार, रवि-आह एक व रवि-आह दो, सूर्य ही के दिन व मास हैं। रमजान मास का नाम पहले ‘रमादान’ था। यह मुसलमानों का बनाया महीना है। मग, मिहिर, मूक, मौनी, मुनि ये वशिष्ठ ही के वंशधर थे। अरब के मूक, मोखा, महरा, मक्का, मकरनियत, मैरवा आदि प्रदेशों और नगरों के नाम भी उसी आधार पर हैं। वशिष्ठ को कामधेनुपति भी कहा जाता है। कामधेनु की भूमि उनकी जन्मभूमि और पैतृक सम्पत्ति थी। मगों के यज्ञों की सुगन्ध से समुद्र की वायु सुगन्धित रहती थी। अरब के यमन प्रदेश में मुनियों के अनगिनत आश्रम, जनपद और उपनिवेश थे और वहां के हाहाहामियारी सूर्य-उपासक थे।

परन्तु दैत्य-भूमि छोड़कर जब कवि उशना शुक्राचार्य अरब में आए तो उन्होंने कुरिशि प्रान्त में अपना निवास बनाया। कुरिशि, कुरैशी संभवतः, कवि शुक्राचार्य के ही वंशधर हैं। कुरैशी भाषा ही कुरान की भाषा है। यह भाषा हामियारी भाषा से भिन्न है। शुक्र का नाम काव्यपुरुष था ही। अरब में शुक्र का नाम पूज्य देवों की भांति ‘अल उजाह’ प्रसिद्ध है। कुरैशी देश में, मक्का में बाद में शुक्र का मन्दिर स्थापित हुआ, जो ‘काव्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आजकल का मक्का का प्रसिद्ध ‘काबा’ यही काव्यपुरुष शुक्र का मन्दिर है।

उस काल में बृहस्पति, मंगल आदि अनेक ग्रहों और देवों की पूजा भी अरब लोग करते थे-उनकी मूर्तियां भी ‘काव्य-मन्दिर’ में रखी गई थीं तथा एक प्राचीन शिवलिंग भी वहां था जिसकी पूजा होती थी और जिसका नाम ‘मुन्नाह’ था। यह एक काले पत्थर का चार फीट ऊंचा और दो फीट चौड़ा लिंग था जो सोने की जलहरी पर रखा रहता था। इनके अतिरिक्त सूर्य के मित्र गरुड़ की, उच्चैःश्रवा घोड़े या सूर्यपुत्र अश्विनीकुमारों की, मनुपुत्र नृसिंह की मूर्तियां भी वहां थीं। सूर्य की भी एक मूर्ति रखी गई थी जिसका एक हाथ सोने का था। इसके अतिरिक्त और भी मूर्तियां थीं। मुन्नाह के उपासक खोजा थे। अल उजाह कुरैशियों का प्रधान देव था। इन सब मूर्तियों को बाद में मुसलमानों के पैगम्बर मुहम्मद ने दूर करके केवल प्राचीन शिवलिंग ही की पूजा कायम रखी थी। ‘काव्य’ के नाम पर मन्दिर का नाम ‘काबा’ प्रसिद्ध है तथा शुक्रवार को सभी अरब-निवासी जुम्मा, महान् और पवित्र दिन मानते हैं तथा काव्य-कविता में अरब के लोग संसार के सभी देशों के प्रमुख प्रमाणित हैं।

पुराणों से ऐसा भी प्रमाणित है कि दैत्येन्द्र बलि ने काश्यप सागर-तट से अपनी राजधानी हटाकर अरब के निकट एक नया नगर-‘बलासुरा’ नाम का बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया था तथा यहीं पर उसका ऐन्द्राभिषेक हुआ था और यहीं पर विष्णु और इन्द्र उसके पास भूमि-याचना करने आए थे तथा यहीं से बलि की नीति से असन्तुष्ट होकर शुक्र अरब में चले गए थे। बलि की यही प्राचीन राजधानी बलासुरा आजकल का विख्यात ‘बसरा’ नगर है। यहीं बलि को बन्दी बनाया गया था। दमिश्क-वशिष्ठ-दमी लोगों का प्राचीन नगर है। शाका, मनना, शोमार आदि भी प्राचीन वाशिष्ठों के नगर हैं।

वर्तमान बसरा नगर अति प्राचीन बलि के बलासुरा नगर के ध्वंस पर मुसलमानों के खलीफा उमर ने ई. सन् 640 के लगभग बसाया था। बहुत सम्भव है कि तब वह कोई साधारण उजाड़ बस्ती के रूप में रहा हो। वर्तमान बसरा मेसोपोटामिया या इराक का खास नगर तथा बड़ा बन्दरगाह है। यह नगर समुद्र-तट से काफी दूर ‘शत्तुल-अरब’ नामक नदी के निकट ‘अल-अशार’ के तट पर बसा है। शत्तुल-अरब इतनी गहरी नदी है कि चलने वाले छोटे-बड़े सभी जहाज उसमें आ-जा सकते हैं। आरम्भ में खलीफा उमर की आज्ञा से यहां केवल मुसलमानी सेनाओं की छावनी ‘अतवा’ नामक सरदार ने-जब वह ईरानियों से लड़ रहा था-डाली थी। यह स्थान तब दजला नदी से दस मील के अन्तर पर वर्तमान नगर से उत्तर-पश्चिमी दिशा में था। कहते हैं, कभी इस नगर की आबादी बहुत घनी थी तथा नगर में बीस हजार नहरें थीं, जिनमें नौकाएं चलती थीं। यहां एक प्रसिद्ध पुस्तकालय भी था तथा प्राचीनकाल में यह नगर विद्या और व्यापार का केन्द्र था। मुस्लिम काल में यह नगर राजनीति का भी वैसा ही केन्द्र था जैसा विद्या का, तथा यहां बड़े-बड़े प्रसिद्ध विद्वान् रहते थे।

कालचक्र अनेक रूप प्रकट करता है। यह बलासुरा नगर भी अनेक वैभव देख चुका। जो हो, जब विश्व में नृवंश के पुरखा और नेता यहां के बड़े दैत्य सम्राट् की सेवा में एकत्र हुए थे तथा पृथ्वी-विभाजन किया गया था, जिसे सहस्रों वर्षों से उनके वंशधर उपभोग कर रहे हैं तब से अब तक जाने कितने महापुरुषों ने अपने उस प्राचीन अधिकार की रक्षा के लिए कहां-कहां रक्त बहाया है, इसका ठीक-ठीक हिसाब तो इतिहास के पुराने पृष्ठ भी नहीं बता सकते।

अस्तु, अब हम फिर उसी मूल घटना-चक्र पर आते हैं। जब देवराट इन्द्र और विष्णु प्रमुख देवगणों को संग ले बलि की राजधानी बलासुरा में पहुंचे तो नगर की सम्पन्नता देख दंग रह गए। सारा नगर परकोटे के घेरे में बसा था। सब प्रकार के रत्नों से सजे हुए ऊंचे-ऊंचे महल उस पुरी की शोभा बढ़ा रहे थे। नगर के राजपथ बड़े ही प्रशस्त थे। वहां अनेक प्रकार के शिल्पी अपना-अपना कौशल दिखा रहे थे। अपनी इस बलासुरा नाम की नवीन राजधानी में बैठ दैत्यराट बलि अपने समूचे दैत्य-साम्राज्य का शासन करता था। इस समय उसने त्रिलोकीपति की उपाधि धारण की थी, क्योंकि पृथ्वी पर कोई दूसरा राजा इस काल में उसकी समता का न था। वह धर्म का ज्ञाता, कृतज्ञ, सत्यवादी और जितेन्द्रिय था। सब कोई उससे मिल सकते थे। वह न्याय का बहुत विचार रखता था। वह शरणागतों का रक्षक और दुष्टों का दमन करता था। वह मन्त्रशक्ति, प्रभुशक्ति और उत्साहशक्ति तीनों से सम्पन्न था। सन्धि-विग्रह, यान-आसन, द्वैधीभाव और सामाश्रय इन छः प्रकार की रणनीतियों को वह भली-भांति जानता था। वेद उसने पढ़ा था। वह उदार, सुशील, संयमी, अहिंसक, शुद्धहृदय, पूज्यों का पूजन करनेवाला, सब विषयों में पारंगत, दुर्दमनीय, भाग्यवान् और अत्यन्त कमनीय था। अन्न, रत्न, स्वर्ण का उसका भण्डार अटूट था। धर्म-अर्थ-काम की वह साधना करता था। वह महादानी था। संयम में दैत्येन्द्र बलि त्रिलोकी में सर्वश्रेष्ठ पुरुष था। उसके राज्य में न कहीं अधर्म होता था-न कोई दीन, दुःखी, रोगी, अल्पायु, मूर्ख और कुरूप पुरुष था।

जब उसने सुना कि देवराट इन्द्र और विष्णु-जो उसके पितामह प्रहलाद के मित्र थे-देव पुरुषों सहित उसके नगर में उसकी सेवा में आए हैं तो उसने अपने मन्त्रियों को आदेश दिया कि देवराज और भगवान् विष्णु हमारे पूजनीय अतिथि हैं, उन्हें आदर के साथ ले आओ। इस प्रकार मन्त्रियों और प्रमुख दैत्य सरदारों को भेजकर बलि स्वयं अपने हर्म्य से अकेला ही निकल पड़ा और अपने समृद्ध नगर की सातवीं ड्योढ़ी पर जा पहुंचा। उसने विष्णु का सांगोपांग पूजन किया और इन्द्र तथा देवों की अभ्यर्थना कर कहा-“आपकी अभ्यर्थना करके मैं कृतार्थ हुआ।” उसने बारम्बार इन्द्र का आलिंगन किया और अपने राजभवन के भीतर ले जाकर अर्घ्य-पाद्य से विधिवत् पूजन किया। फिर कहा-“इन्द्र, आज मैं आपको अपने घर पर आया देखता हूं, इससे मेरा जन्म सफल हो गया। मेरे सभी मनोरथ पूरे हो गए। आपके साथ मेरे पितामह के श्रद्धेय मित्र विष्णु भी हैं जो मेरे पितृचरण से भी बढ़कर पूज्य हैं। अब कहें, किस प्रयोजन से आना हुआ है। मुझे सारी बात बताइए। आप लोगों ने इन सब देवों के साथ यहां आने का कष्ट उठाया है, इससे मुझे अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है।”

देवराट इन्द्र ने कहा-“दैत्यराज, आज आप त्रिलोकपति हैं और आपसे श्रेष्ठ पुरुष विश्व में दूसरा नहीं है। आपके दान और महत्ता की चर्चा सर्वत्र है। आपके सम्मुख आकर कोई याचक निराश नहीं लौटता। आप याचकों के लिए कल्पवृक्ष हैं आपके समान दाता पृथ्वी में कौन है? आपने मेरा त्रिलोकी का राज्य छीन लिया है। अब मैं निराधार और निर्धन हूं। इसलिए हमारे और आपके पूज्य पुरुष इन विष्णु तथा देवप्रमुखों सहित मैं आपके पास याचक के रूप में आया हूं कि अधिक नहीं तो यज्ञभूमि-वेदिका-ही हम लोगों को दे दीजिए, जिससे हम देवों का भी कोई ठौर-ठिकाना हो तथा हमारी यज्ञ-विधि कायम रहे।”

इस पर बलि ने प्रसन्न होकर कहा-“देवेन्द्र, आप भले पधारे, आपका कल्याण हो। मेरे समान धन्य दूसरा कौन है कि मैं त्रिभुवन की राजलक्ष्मी से सम्पन्न होकर देवराट इन्द्र और भगवान् विष्णु को याचक के रूप में अपने घर आया देखता हूं। घर पर आए हुए इन्द्र को तो मैं अपनी स्त्री, पुत्र, महल तथा अपने को भी दे डालूंगा। आप धर्म और न्याय से जो मांगें-मैं दूंगा।”

इस पर इन्द्र ने विनयावनत होकर कहा-“हे दैत्यपति, इस समय तो आप ही देवों की रक्षा और पोषण कर सकते हैं। अन्ततः वे भी तो आपके दायाद बान्धव ही हैं। बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, अश्विनीकुमार और पितृजन सभी आपके बाहुबल का आश्रय चाह रहे हैं। आप सर्वसमर्थ हैं-सो जैसे दैत्यों-दानवों का आप धर्मपूर्वक शासन करते हैं, वैसे ही देवों का भी कीजिए। केवल जितने स्थान में हमारी यज्ञभूमि है, जहां-जहां हम अग्निस्थापन करें, वहीं भूमि दे दें। आप इतना ही अनुग्रह हम पर कीजिए, जिससे सब लोग कहें कि घर पर आए हुए, देवराट इन्द्र और पितामह के मित्र विष्णु का आपने सत्कार कर लिया।” तब दैत्येन्द्र ने उसी क्षण अंजलि में जल लेकर कहा-“जहां-जहां यज्ञ-वेदी है, जहां-जहां अग्निस्थापना है, जहां-जहां यज्ञ होता है, वह भूमि मैंने देवों को दी।” दैत्येन्द्र का वचन सुन दैत्यगुरु शुक्र उशना ने क्रुद्ध होकर कहा-“महाराज यह अनुचित है। मन्त्रियों से भली भांति विचार-विमर्श करके युक्तायुक्त का विचार किए बिना आप वचन मत दीजिए। ये देव दैत्यवंश-उच्छेदकर्ता हैं।” इस पर दैत्येन्द्र ने कहा-“मैंने धर्म के विचार से, न्याय के विचार से देवों को वचन दे दिया। मेरे दान से देव समृद्ध हों तो मैं धन्य हूं। मेरा वचन सत्य हो!”

इस पर क्रुद्ध हो दैत्यगुरु शुक्र ने तत्क्षण दैत्यलोक त्याग दिया और देवराट तथा देवगण दैत्येन्द्र से वचन ले, विष्णु को आगे कर वन, नगर, जनपद में आग लगाने तथा ‘यही हमारी यज्ञ-भूमि है’ कहकर आगे बढ़ने लगे। वे दल बांधकर आग लगाते जाते और-“विष्णुस्त्वा वसतामिति, यज्ञो वै विष्णुः, स देवेभ्य इमा विक्रान्ति विचक्रमे। येषामियं विक्रान्तिरिमेव प्रथमेन पदेन यस्याधस्तादिदमन्तविक्रान्ति विचक्रमे। येषामियं विक्रान्तिरिमेव प्रथमेन पदेन यस्याधस्तादिदम्न्तरिक्षं द्वितीयेन दिवमुत्तमेन वैवैष एतस्मै विष्णुर्यज्ञो विक्रान्तिं विक्रमते।”

इस प्रकार मन्त्रपाठ करते जाते थे। देवों के इस कार्य से दैत्य परेशान और भयभीत हो गए। विष्णु ने बलि से यह याचना की थी कि-“अग्नि-रक्षायाम्’, अर्थात् अग्निगृहों की रक्षा के लिए भूमि चाहिए। इसलिए उन्होंने समस्त वनों, नगरों और जनपदों को जलाकर खाक करना आरम्भ कर दिया। ज्यों-ज्यों अग्नि बढ़ती जाती, दैत्य पीछे हटते जाते थे और देव उस भूमि पर अपना अधिकार जमाते जाते थे, उस भूमि पर कृषि करते तथा बस्ती बसाते जाते थे। शुक्र के दैत्यलोक त्याग देने तथा देवों का ऐसा उत्पात मचाने से वचनबद्ध बलि भारी धर्म-संकट में पड़ा। अन्त में देवों ने उसे बन्दी बना लिया और दैत्यों का साम्राज्य छिन्न-भिन्न कर डाला। बलि के वंशज ही सम्भवतः: वाह्लिक, सीरिया, बलख के राजा थे। इसी वंश में मद्रपति शल्य अतिरथी हुए, जो महाभारत युद्ध के प्रसिद्ध योद्धा हैं तथा जिन्हें पाश्चात्य जन सोलोमन या सुलेमान के नाम से जानते हैं। यह भूमि, जिसे जलाकर देवों ने प्राप्त किया, वही भूमि है जिसे पोर्शिया के नक्शे में ‘पर्शियन साल्ट-डेजर्ट’, कहते हैं। इसी प्रदेश का नाम लट, लूट या कबीर है। पर्शिया के प्राचीन इतिहास में लिखा है कि वहां पहले बड़े-बड़े नगर थे, जिन्हें देवों ने जला दिया। पुराणों में इसी स्थान का नाम ‘नन्दन वन’ है। आजकल जो जाति वहां रहती है, वह दाहे कहलाती है तथा उस प्रान्त को दाहिस्तान भी कहते हैं। यह स्थान काश्यप सागर व ओक्सस व आधुनिक पारदिया के ऊपर है।

अस्तु! जब बलि को बन्दी बना लिया गया और दैत्यलोक पर फिर देवों ने अधिकार कर लिया, तो देवों ने जहां-जहां दैत्यों का बल देखा, वहीं उनका विनाश कर दिया। इस प्रकार बहुत दैत्य दैत्यलोक से पलायन कर गए। पीछे जब बाण महातेज ने होश संभाला तो उसने फिर दैत्यों का संगठन किया। बाण महातेजवान् पुरुष था। देवलोक में उसके सम्मुख किसी में सामर्थ्य न थी। उसने प्रारम्भ में छोटे-छोटे युद्ध करके अपने दैत्य-साम्राज्य को फिर से व्यवस्थित किया। देवों ने भी उसे नहीं छोड़ा। इस प्रकार देव, दानव, दैत्य, नाग, वरुण एक प्रकार से मिल-जुलकर ही भूमि पर रहने लगे। इस बीच चार दिक्पाल नियुक्त कर देवों ने अपनी स्थिति और दृढ़ कर ली। अब देवों का संगठन दैत्यों की अपेक्षा कहीं उत्कृष्ट था।

परन्तु रावण के अभियान ने इस बार देवों के संगठन को ध्वस्त कर दिया। वरुण की मृत्यु के बाद देवलोक में इन्द्र ही की सत्ता सार्वभौम हो गई थी। ऋषि आर्य और देव इनकी उपजातियां, जो भी सिन्धु और सतलज की घाटियों में फैल गई थीं, सभी इन्द्र के प्रभाव में थीं। प्रत्येक आर्य सम्राट् को इन्द्र और देवों को यज्ञभाग की बलि देने पर ही सम्राट् या महाराज की पदवी मिल सकती थी। यह वास्तव में एक भारी टैक्स था जो इस पदवी के लिए लिया दिया जाता था। उन दिनों विवाह तथा विशेष यज्ञों में गाय-बैलों का वध होता था। यह परिपाटी आर्यों और देवों में समान भाव से थी। इस समय आर्यों की अनेक शाखाएं भारत आर्यावर्त तथा उसके बाहरी कोणों में फैली हुई थीं, जिसमें सबसे अधिक प्रमुखता ययाति के पांच पुत्रों यदु, तुर्वशु, अनु, द्रुह्य और पुरु की थी। इनके अतिरिक्त अन्य जातियों में गान्धार, मूज-वन्त, मत्स्य, भरत, भृगु, उशीनर, चेदि, क्रिवि, पाञ्चाल, कुरु, सृञ्जय, परावत आदि शाखाएं भी प्रधान थीं। तृत्सु रावी के पूर्वी किनारे पर थे। भरत मध्य भारत में थे। पुरुवंशी दुष्यन्त के वंशज भारत तथा स्वायंभुव भरत के वंशज मुनभरत कहलाते थे। आगे भारतों को कौरव भी कहा गया। उशीनर, चेदि, मत्स्य, सृञ्जय का वंश बहुत पीछे तक चलता रहा। मत्स्य वंश अत्यन्त प्राचीन है। इसका संकेत हमें मत्स्यपुराण से मिलता है। इस बात के अत्यंत पुष्ट प्रमाण हैं कि अत्यन्त प्राचीनकाल में बेबीलोन में मत्स्य नाम की एक जाति रहती थी, जिसने जल-प्रलय के समय मनु के परिवार की रक्षा की थी। भारत में मत्स्य लोग पूर्वी राजपूताना में आ बसे थे। उशीनर उत्तरीय भारत में रहते थे। बलिबन्धन के बाद आर्यों के राज्य मगध तक फैल गए थे।

जिस समय रावण ने देवराट इन्द्र पर अभियान किया, उस समय फारस से उत्तर-पूर्व अफगानिस्तान और पामीर तक इन्द्र का राज्य था तथा सम्पूर्ण आर्यावर्त उन्हें देव कहकर उनकी पूजा करता और उन्हें यज्ञ-भाग देता थे। उन दिनों यज्ञ कोरे धर्मानुष्ठान न होते थे। वे बड़ा भारी राजनीतिक महत्त्व रखते थे। यज्ञ तभी किए जाते थे जब कोई बड़ी विजय होती थी या कोई बड़ी घटना होती थी। उस यज्ञ में सब समागत समर्थकों, मित्रों तथा आसजनों को विनय में प्राप्त धन बांटा जाता था। इसी को यज्ञभाग कहते थे।

सुदास इन्द्र के गहरे मित्र थे। दाशराज-संग्राम में सुदास की जय इन्द्र की सहायता से हुई थी तथा वृत्र-संग्राम में विजय का सेहरा इन्द्र के सिर सुदास की सहायता से बंधा था। ये तृत्सु वंश के थे तथा इनका राज्य रावी नदी के दोनों तटों पर था। इनके पिता विजवन महान् युद्धकर्ता थे पर राजा न थे। सुदास इन्द्र ही की कृपा से राजा हुए थे। बाद में उन्होंने दश राजाओं के युद्ध में जय प्राप्त कर भारी कीर्ति पाई। प्रसिद्ध नरपति त्रसदस्यु को भी सुदास ने पराजित किया था। वशिष्ठ और उनके पुत्र पराशर तथा सत्ययात उनके आश्रित ऋषि थे। वशिष्ठ की ही सहायता से सुदास ने माथुर-यादव, आनव-शिवि, गान्धार-द्रुह्य, शूरसेन के मत्स्य, रीवा के तुर्वशु अनार्य-वर्जिन, वैकर्ण-भेद आदि सम्मिलित दस राजाओं को युद्ध में पराजित किया था। पीछे वशिष्ठ ही के षड्यन्त्र से कुरुपति सवंत ने सुदास को पराजित करके मार डाला। इस प्रकार सुदास के मरने पर भारत में इन्द्र का प्रभाव बहुत कम हो गया तथा सुदास का राज्य और वंश ही नष्ट हो हो गया। दिवोदास, जिन्होंने सुदास को गोद लिया था, संभवतः उस समय तक मर चुके थे। वे दशरथ के मित्र और सहायक थे और संभवतः उन्हीं के कारण दशरथ की इन्द्र से भी मैत्री हुई थी। इन्हीं दिवोदास की बहन अहल्या थी जो गौतम के पुत्र शरद्वत को ब्याही थी तथा जिसे इन्द्र से व्यभिचार करने के अपराध में गौतम शरद्वत ने त्याग दिया था और राम ने जिसका उद्धार किया था। इसी अहल्या के पुत्र शतानन्द थे जो जनक सीरध्वज के पुरोहित थे। काशी में इस समय प्रतर्दन राज्य कर रहा था जिसके आश्रित भरद्वाज रहे थे तथा जिसने हैहय वीतिहव्य को पराजित किया था। बाद में पराजित होने पर वीतिहव्य भरद्वाज ही के आश्रम में प्रयाग में रहने लगे थे। प्रतर्दन के पौत्र अलर्क पर अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा की कृपा थी।

इस प्रकार जिस समय रावण ने देवलोक पर आक्रमण करके देवराट को पराजित कर बन्दी बनाया, उस समय इन्द्र का राज्य-विस्तार तो अवश्य ही बहुत था, परन्तु उसकी शक्ति खोखली हो गई थी। यही कारण था कि इन्द्र को पराभूत होना पड़ा और इन्द्रजित मेघनाद उसे बांधकर लंका ले गया। इससे देवलोक में बड़ी गड़बड़ी फैल गई। उस समय सब प्रमुख वारुणेय और आदित्य, वसु, रुद्र मिलकर लंका में पहुंचे और रावण से इन्द्र की मुक्ति-याचना की। रावण ने देवों के साथ यह शर्त रखी कि देव लोग राक्षसों को भी देवता समझें, उन्हें अमरत्व दें तथा रक्ष-संस्कृति स्वीकार करें, जिससे सब देव, दैत्य, दानव और राक्षस आर्यों से मिलकर एक ही महाजाति हो जाएं और उनके विग्रह शान्त हो जाएं। परन्तु बहुत वाद-विवाद के बाद भी यह सम्भव नहीं हुआ। अन्त में यह तय हुआ कि राक्षस भी यज्ञ के अधिकारी मान लिए जाएं। जब इन्द्रजित मेघनाद युद्ध में आए तो देवराट उसको अपना रथ भेजकर उसकी अभ्यर्थना करें तथा कभी भी राक्षसों के विरुद्ध शस्त्र न उठाएं। निरुपाय देवों ने रावण की शर्तें स्वीकार कर लीं। शर्तों की स्वीकृति की साक्षी के लिए लंका में देवों, दैत्यों, दानवों और नागों के प्रतिनिधियों को बुलाया गया और इन्द्र-मोचन की तैयारियां होने लगीं।