वार वेशम
लंका की प्रसिद्ध कुटनी यमजिहवा ने जब दूती से यह सुना कि वह मूर्ख अक्षयकुमार मदालसा के प्रेम में भली-भांति सुलंग रहा है और यहां आने के लिए उत्सुक है, तो वह बड़ी प्रसन्न हुई। उसने उसे आने का सन्देश भेज दिया। फिर उसने पुत्री को वेश्याधर्म की दीक्षा देते हुए कहा—“ले, अब तू भी तैयार हो जा। वेश्या के लिए ऐसा नगर-नायक होना चाहिए जो गुरुजनों की बाधाओं से रहित हो, अपने मन का स्वयं मालिक हो, जिसका बाप राजधानी से दूर युद्धयोगों में निरन्तर व्यस्त रहता हो, पुत्र की चेष्टाओं पर ध्यान ही न दे सके तथा वह तन-मन से स्नेहाक्रान्त हो। ऐसा ही नागर यह मूर्ख राजकुमार है। वेश्या के लिए ऐसा ही नायक सर्वाभिलाषितार्थपूरक होता है। तू अब इसे अपने अधीन कर इससे विपुल संपत्ति हरण करने की चेष्टा कर।”
कुछ ही समय में राजपुत्र ने मदालसा के निवेश में प्रवेश किया, नट-विट-दूती और परिभ्रष्टों के सहित। उसकी चेष्टा गंवारू और वेश अद्भुत था। सिर पर खूब मोटी-लम्बी चोटी, पांच-पांच अंगुल के केश, लम्बे कानों में बड़े-बड़े सीस-पत्र, नुकीले-छीदे दांत। उंगली की पोर-पोर में अंगुलि-त्राण, कण्ठ में स्वर्ण का कण्ठ-सूत्र, सर्वांग पर कुंकुम-कस्तूरी का लेप, रंगीन वस्त्र, नाभि तक लटकती हुई पुष्पमाल, मोम से नर्म किए और शिलारस से रंगे हुए उपानत् ठौर-ठौर पर नाना रंगों के टोटका-सूत्र केशों में बंधे हुए। पान का बीड़ा ठूंसने से फूला हुआ एक गाल। सुनहरे तारों के काम की किनारी वाली शाटिका और उत्तरीय, रक्त पुनर्नवा के रस में रंगे हुए नख। किसी की नजर न लग जाए-इसके भय से सूत्रों में बांधे हुए शंख-चक्र, व्याघ्र-नख, स्वर्ण-मणित शूकर-दन्त। आगे ताम्बूल-करंड लिए एक दास। अगल-बगल श्रेष्ठ-वणिक, बिटकितव-प्रधान संग। हाथ में खड्ग। मदालसा ने देखा तो उसे हंसी आ गई, परन्तु वह लीला-विलास से अंगड़ाई-सी लेती, बाहूमूल और उपांगों की झलक दिखाती वहां से भाग गई।
यमजिहवा ने उसे बैठने को पीठिका दी, ताम्बूल दिया, पृष्ठतूल दिया। राजकुमार ठाठ से पृष्ठतूल पर शरीर का भार रख बैठ गया। संगी-साथी भी बैठे और अप्रासंगिक गप्पें मारने लगे। वे झूठी चापलूसी करने और भोंड़ी गप्पें मारने लगे।
मन की विरक्ति को छिपाकर कुटनी यमजिहवा ने कहा—“अहा, आज तो हमारे सहस्र जन्म का ही पुण्योदय हुआ, जो राजपुत्र के दर्शनों से नयन सफल हुए!”
इसके बाद तो वेश्यावृत्ति के सारे भावत्र ही यथाक्रम प्रयुक्त हुए। पहले चापलूसी फिर अनुराग, प्रणय, रूठना, मान-मनौवल, विरह-शोकोच्छ्वास आदि हाव-भावों में मदालसा ने माता की सिखाई हुई समूची विद्या का सदुपयोग किया, जिसमें यह मूर्ख राजकुमार फंसकर धन, रत्न-मणि लुटाता रहे। वेश्या और ब्रह्मज्ञानी समचित्त होते हैं। वे निःस्पृह रहकर रस ग्रहण करते हैं। वेश्या को धन देते-देते नायक चाहे कंगाल ही क्यों न हो जाए, परन्तु उसकी दृष्टि उसके वस्त्रों के उतार लेने में ही रहती है। इस प्रकार बड़े-बड़े दृढ़चित्त पुरुषों के सम्मुख भी वेश्म-विलासिनी वेश्या कामाधीन होने का अभिनय करती हुई पुरुष को असंगत कर देती है। कभी वह संजातपुलका होकर, कभी उल्वणा बनकर, कभी जातोकम्पा और कभी स्वेदार्द्रवपुः होकर बारम्बार हास्य-लास्य करके रोकर-गाकर, मौन-कोप करके, कभी पलंग पर औंधी गिरकर, कभी प्रिय नायक की गोद में पछाड़ खाकर अपनी उद्वेगावस्था का अभिनय कर नायक को पागल बना देती है।
कभी तो वह काम-संताप को दूर करने के लिए कुंकुम-कर्पूर-चन्दनादि शीतल पदार्थों का लेप करती, कभी संताप-व्यथा प्रकट करने के लिए धूलि-धूसरित रहती. कभी वह ऐसी विरह-व्याकुल व्यथा दर्शाती कि सखियां, चेटियां चन्दन-पंक और नीहार, घनसार, कदली-दल, चन्द्रकान्त मणि से भी उसका दाह शान्त नहीं कर सकती थीं। वह प्रलाप सा करती हुई कहती—“अरे, हटाओ इस घनसार को, दूर करो मणिशार को, इन कमल-दलों से क्या? अरे सखियो, बस करो-ये मृणाल मेरे दग्ध हृदय को शीतल नहीं कर सकते।” और जब नागर निकट आता तो यह उसका दृढ़ालिंगन करके रागातिशय प्रकट करती। कभी अपनी भुजाओं को मरोड़ती। कभी कहती—“यह कूकने वाली कोयल, ये गूंजने वाले भौंरे, यह कुसुमारोही पवन विधाता ने मेरे नाश के लिए ही रचा है।” फिर नायक पर कोपकर वक्र नयनों से उसे घूरती हुई कहती—“अरे निर्दय-निर्मम, मुझे अबला समझकर यह बली मकरकेतु मुझे आक्रान्त कर रहा है। इससे मेरी रक्षा कर! अरे, पूर्व जन्म के सुकृत से ही मैंने तुझे पाया है।”
इस पर यमजिहवा कुटनी रंग चढ़ाती। वह कहती—“अहा, यह मदालसा! अरे, जब अतनु ने शिव पर कुसुम-शर संधान किया था, तब जो कुसुम झड़कर गिरे उन्हीं से मेरी यह बेटी सुगात्री मदालसा विधाता ने बनाई है। गौरी के लावण्य का तो यह उपहास-सा करती है। भला लाञ्छित शशधर से इसकी मुख-छवि की क्या तुलना? अरे, कमल की शोभा तो क्षणिक है और चन्द्रद्युति विभ्रम-रहित है-फिर भला मेरी मदालसा के मुख की उपमा क्या है? इसके नेत्रों को कमल का भ्रम करके भौंरे घेर लेते हैं। वह जो स्वाभाविक अरुण अधरों को बन्धुजीव-पुष्परज से रंजित करती है तथा लाल-लाल चरणों को अलक्तक देती है, सो केवल राग-वृद्धि के लिए नहीं, वह तो उसका केवल विन्यास-विलास है। विधाता का चमत्कार तो देख कि उसके संपुट उत्तमांग को उसकी क्षीण कटि कैसे धारण किए है। तिस पर उसका मुरज-वंशीवादन...नृत्य-गीत-कौशल तो भोगीन्द्र शेष भी वर्णन नहीं कर सकता। ऐसी मेरी मदालसा है, जो न तो कुलीनों की आन मानती है, न वेदवादी ही को कुछ समझती है, पर तेरे लिए वह सूखकर कांटा हो गई। इस अनुराग की भी भला कुछ हद है!” इस प्रकार विविध भांत उत्तेजित करके राजपुत्र को भरमाया गया और बार-बार उससे धन ग्रहण किया गया। उसके आने पर मदालसा दूर ही से अभ्युत्थान देती, तिरछी नजर से देख मन्द-मन्द मुस्काती, आंचल में लपेटकर उंगलियों को ऐंठती। फिर झट अपने उपांगों की छटा दिखाती वहां से भाग जाती। इसके बाद दीपोज्वल-कुसुमधूप, गन्धाढ्य वासकागार, कोमल पर्यंक, वितत वितान, अभिनन्दनीय मृदु भाषण और सस्नेह-सत्रीड- ससाध्वस अविरल परिहास, पेशलालाप-परिपूर्ण-पुलकदन्तशरीरा स्विद्यत्पसकलावयवा नायिका।
यों कुछ काल रस-कस ग्रहण होने पर अब कुटनी और नायिका में इस तरह मिथ्या वचन-कलह आरम्भ हुआ कि जिसमें राजपुत्र उसे अज्ञान में किसी तरह सुन ले—“अरी अभागिनी, तूने इस राजकुमार के पीछे अपरिमित धनवान्, विनयी और प्रेमी मन्त्री-पुत्र को भी कुछ न गिना और मन्दारक रत्न-पारखी प्रभृत धनदाता को तूने मेरे कहने पर भी दुत्कार दिया! अरी मूढ़, तूने अनेक राजवर्गीय जनों की ओर, जो बात की बात में मेरा घर भर दे सकते थे, आंख उठाकर भी न देखा! ऐसी तू इस राजकुमार पर अन्धी हो अनुरक्त हो गई। तुझ विपरीत बुद्धि ने महाधनदाता शौल्किकाध्यक्ष को भी अपमानित करके लौटा दिया। उस रोगी मृतप्राय बूढ़े का अतिसमृद्ध पुत्र भी तूने हाथ से खो दिया, जो अपना सर्वस्व तुझ पर वार रहा था। इस प्रकार तूने घर में आई लक्ष्मी को लात मारी। अरी पापिन, यह सब तेरी ही मूर्खता का परिणाम है कि हम इस राज-पुत्र के पीछे लुट बैठे। देख, उस दन्तवक्र के पुत्र ने मालिनी को कैसे जड़ाऊ अलंकार दिए हैं-तुझे उन्हें देखकर भी लाज नहीं आती! उस धवल गृह को ही देख, जो अनंगदा के लिए उस आपणिक ने बनवा दिया है। क्या तू इतना भी नहीं समझती कि गणिका के लिए यही आयु कमाई करने की है! अब यदि इस धनार्जन-अनुकूल समय में वेश्या की बेटी एक पुरुष को लेकर प्रेम के वशभूत हो बैठे, तो वृद्धावस्था में उसे भिक्षा ही मांगनी होगी। क्या तूने वह नीति-वाक्य नहीं सुना- ‘द्वितीयै नार्जितं धनं-चतुर्थे किं करिष्यति?’ क्या तू नहीं जानते- ‘सद्भावजाऽनु रक्तिर्हि पथ्यं पयनारीणाम्।’ सो मैंने अपना देह बेचकर जो कमाया है, वह द्रव्यभाण्ड ला दे, मैं तो अब तीर्थयात्रा को जाती हूं। तू अपने यार को लेकर रह!”
बुड्ढी कुटनी के इस प्रकार मिथ्या कलह का उपसंहार होने पर मदालसा ने रोष-भरे स्वर में कहा—“अरी मातः, धनलाभ ही संसार में बड़ा लाभ नहीं है, प्रिय-संयोग ही बड़ा लाभ है। धन तो आता-जाता ही रहता है। उससे क्या मन की तृप्ति होती है? अनुराग से सिक्त तारुण्य को भला विभ्वार्जन की क्या चिंता हो सकती है? प्रिय-सहवास में ताम्बूलयाचन ही सबसे बड़ा लाभ है? प्रिय-सहवास के समान तो सकल वसुन्धरा का भी मूल्य नहीं है, फिर राजकुमार ने तो सब गणिकाओं में मुझे ही वार-मुख्या बना दिया है। मातः, तू भोली है, इसी से तेरा यह उपदेश व्यर्थ है। अब तो भला हो या बुरा, सुगति हो या दुर्गति, महल में रहूं या वन में, स्वर्ग में या नरक में, उसी के साथ मेरा रहना, मरना, जीना है। व्यर्थ बकवाद से क्या प्रयोजन! और तू जो अपने आभूषणों की बात कहती है, सो यह ले-मैं तो अपने राजपुत्र ही से सुभूषित हूं। मैं तेरे समान लोभ के वशभूत नहीं हूं। मैं तेरे इस घर में भी न रहूंगी।”
इतना कहकर उसने सब गहने उतारकर कुटनी के ऊपर फेंक दिए और गुस्से में ऐंठती हुई वहां से चली गई।
परोक्ष में मूर्ख राजकुमार ने जो यह कपट-कलह सुना तो वह रागान्ध हो सोचने लगा—“अहा, धन्य है, यह वारवनिता प्रिया मदालसा, जो मेरे लिए जननी जन्मस्थान, बान्धव, वस्त्रालंकार सभी को तृण के समान समझती है। सच है- ‘मरणमपि तृण समर्थयन्ते मनसिजपौरुषवासितास्तरुण्यः।’ अब जब इस मदालसा ने माता का मोह त्याग घर में रहना भी स्वीकार कर लिया है तो फिर इससे अधिक प्रिय मेरे लिए क्या है! मैं भी अपना सर्वस्व देकर इसे ही तृप्त करूंगा। घर-बार, बन्धु-परिवार, संसार-मेरा जो कुछ भी है, वह मदालसा ही है। अहा, यह मदालसा चन्द्रमा की किरणों की भांति स्पर्श ही से मन को शीतल कर देती है। यह कितनी सुन्दर, कितनी कोमल, मृदुल और प्राणों को आनन्द देने वाली है! इसका ललित अंगहार कितना मनोहर है! मृदु मुस्कान कितनी आकर्षक है! इसका यह सविलास तरलाक्षिविक्षेप पुष्प-बाण का दोहद-दान ही समझना चाहिए, न तो इसे धन का ही लोभ है, न किसी पर नेत्रासक्ति है। यह मुग्धा सीधी भी है और शिष्ट भी। कभी किसी पुरुष की ओर यह नजर उठाकर भी नहीं देखती। न मेरे अतिरिक्त किसी की प्रशंसा करती है। कालोचित इसका वेश-विन्यास होता है। यह गजगामिनी मेरी प्रिया इस पृथ्वी पर अद्वितीय है। इसमें चक्रवाक, हंस, नकुल, पारावत-सभी के गुणों का समावेश है। इसका हास्य मनोहर है, ऐसी दुर्लभ, अनुकूल, मनोहारी और सुन्दर स्त्री संसार में और कौन है भला? भार्या तो केवल अन्न-वस्त्र द्वारा भरणीय ही होती है, स्नेह-समागम के योग्य तो यह वार-वनिता ही है। अजी, परिणीता में अनेक दुर्गुण हैं। वह भाइयों से अलग कर देती है, कटु भाषण करती है, सदा घर के दुखड़े रोती रहती है और सदैव मातृकुल की ही प्रशंसा करती है। पति के सदा दोष निकालती है। फिर भी मूर्ख जन उसी पत्नी के वश में रहते हैं। पर इस मदालसा को देखो-जैसा मृदुल इसका तन है, वैसा ही मन है।”
और वह दिन भी आ गया-जब मदालसा मां को छोड़ राजकुमार के नव-निर्मित आवास में आ रहने लगी। उसे बहुमूल्य अलंकार राजकुमार ने भेंट किए, परन्तु एक दिन राजकुमार के पास से जाती हुई मदालसा को चोरों ने लूट लिया। इसके दो-चार दिन बाद ऋणदाता ने मदालसा की देहरी पर धरना दिया। राजकुमार को ऋण चुकाना पड़ा। दो-चार दिन बाद राजकुमार की स्वस्ति-कामना के लिए बलि-पूजन का आयोजन हुआ। इस प्रकार विविध भांत से धन-हरण करने पर राजकुमार का भली-भांति तिरस्कार कर अन्त में यह समझा-बुझाकर कि माता बहुत गुस्से में है, अतः कुछ दिन आना-जाना बन्द रखो-उसे दूर कर, दूसरे ग्राहक से व्यापार आरम्भ किया।