अशोक वन में

सीता के केश बिखर गए। वस्त्र फट गए। उसके जूड़े में लगे फूल झड़-झड़कर पृथ्वी पर बिखर गए। सीता—‘हा सौमित्र, हा आर्यपुत्र’ कहती जा रही थी। वह अपने अंग के आभूषण उतार-उतारकर पृथ्वी पर फेंकती जाती थी, जिससे कदाचित् राम उन्हें देख उसके हरण की दशा को पहचान लें। जब सीता का नूपुर उनके पैर से खिसककर गिरा, तो ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे आकाश से पृथ्वी पर बिजली गिरी। जब आभूषण गिरते थे, तो ऐसा प्रतीत होता था कि आकाश से तारे टूट-टूटकर गिर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि सीता के दुःख से सूर्य भी निश्चल हो गए, वन देवता भी जैसे थर-थर कांपने लगे। वन के मृग, सिंह, बाघ भी शोकद्रवित हो गए। पर्वत शोकमग्न हो झरने के बहाने अपने आंसू बहाने लगे। सीता—राम और लक्ष्मण कहीं आते दीख जाएं, इस आशा से बार-बार चारों ओर देखती जाती थी। वह रावण से विलाप के बीच-बीच कह रही थी—“अरे अधम, तस्कर, दुरात्मा, तुझे यह नीच कार्य करने में लज्जा नहीं आती? अरे छली, कायर, तेरे इस कुत्सित कर्म को तो संसार के मनुष्य क्रूर और अधर्म ही कहेंगे, तेरे पराक्रम को धिक्कारेंगे। अरे, तुझ पापी पर धिक्कार है। तूने तो अपने इस आचरण से अपने कुल को भी कलंकित किया। अरे, तू तो अपने को वीर बताता था। अरे, जो कहीं वे दोनों महात्मा दशरथकुमार राह में मिल गए, तो तू अपनी मृत्यु हुई जान। मुझे हरण करके तेरा कुछ भी उद्देश्य पूरा न होगा। मैं तो तत्काल प्राण दे दूंगी।”

इस प्रकार विलाप करती हुई सीता ने जाते-जाते राह में एक पर्वतकूट पर पांच वानरों को बैठे देख अपना पीत उत्तरीय उतारकर फेंक दिया। उसमें कुछ गहने भी बांध दिए। वे वानर उस विलाप करती हुई सीता को एकटक देखते रहे।

अन्ततः वह दुर्धर्ष रावण सीता को लेकर निर्विघ्न लंका में जा पहुंचा। वह सीता को अन्तःपुर के द्वार के भीतर ले गया। वह द्वार स्वर्ण का था। उसकी खिड़कियां हाथी दांत की थीं तथा गवाक्ष चांदी के थे। वहां दिव्य दुन्दुभि बज रही थी। राक्षसराज रावण बलपूर्वक सीता का हाथ पकड़े महल की स्वर्णमयी सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। हाथी दांत और चांदी की खिड़कियों में सोने की जालियां लगी थीं। रावण अपना महल सीता को दिखाने लगा। अनेक भवन, तालाब और बारहदरियां दिखाई, फिर कहा—“हे सीते, मेरे अधीन असंख्य राक्षस हैं। अब मैं और मेरा यह सारा राज-पाट और वैभव तेरे अधीन है। तू मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। मेरे मणिमहल में हजारों सुन्दरियां हैं, उन सबके ऊपर मैं तुझे महारानी बनाना चाहता हूं। समुद्र से घिरी इस लंका का विस्तार सौ योजन का है, इसे इन्द्र सहित सब देवता भी विनष्ट नहीं कर सकते। वह देख, उस गगनस्पर्शी महल में देवराट् इन्द्र बन्दी है। अब तू उस भिक्षुक राम के साथ रहकर भला क्या करेगी? सो तू उसका ध्यान छोड़ दे। यह देख, मेरा पुष्पक विमान सूर्य के समान देदीप्यमान है, जिसे मैंने अपने भाई कुबेर से छीना है। यह अति रमणीय विमान मन के समान गतिमान् है। इस पर बैठकर तू मेरे साथ स्वच्छन्द विहार कर। मैं तेरी आज्ञा के अधीन रहने वाला, रावण तेरा दास हूं।”

सीता ने तब तिनके की ओट करके कहा—“हे रक्षेन्द्र, आपका यह सब कथन और कार्य आपके लिए शोभनीय नहीं है। कैसे आश्चर्य की बात है कि आप प्रजापति के वंश के पुरुष तथा महावीर होकर ऐसा कायरतापूर्ण कुकर्म कर बैठे। मेरे पति रघुकुल-तिलक श्रीराम हैं, वे सत्यप्रतिज्ञ जगत् में विख्यात हैं, यदि जनस्थान में उनके सामने पड़ जाते तो अवश्य ही मारे जाते। आप चाहे मेरे इस अवश शरीर को बांधें या नष्ट कर दें, पर मैं आर्यपुत्र दाशरथि को छोड़ किसी अन्य पुरुष को नहीं छू सकती।”

तब रावण ने कहा—“मैथिली, मैं आज से बारह मास की अवधि तक तेरी स्वीकृति की प्रतीक्षा करूंगा, यदि इतने दिनों में भी तू मुझे स्वीकार न करेगी, तो मैं तेरा वध करके भक्षण करूंगा, यह तू भली-भांति सोच ले।”

इतना कहकर उसने सीता को अशोक-वन में जाकर रहने की व्यवस्था कर दी, जहां उसके लिए सब सुख-साधन उपस्थित कर दिए गए।