जटायु का आत्मयज्ञ

इसी समय किसी ने वज्र-गर्जना की भांति कहा—
"ठहर रे पापिष्ठ, तू पराई स्त्री को चुराकर कहां भाग रहा है?"
रावण ने देखा—जटायु क्रोध से भरा दौड़ा चला आ रहा है। आकर उसने रावण के रथ की अश्वतरी की वल्गा एक झटके के साथ पकड़ ली। अश्वतरी हठात् रुक गई।
रावण ने क्रोध करके कहा—
"तू कौन है रे हतायु, जो मेरे बीच आता है?"
"मैं गरुड़ानुज जटायु हूं। यह निन्दित कर्म करने वाले चोर, तू कौन है?"
"इस बात से तेरा क्या प्रयोजन है? तू यदि प्राणों से मोह रखता है तो मेरी राह से दूर हो जा!"
"यह कैसे? अरे मैं वृद्ध हूं इसी से कहता हूं! पर क्या मेरे देखते तू चोर, पराई स्त्री का यों अपहरण कर ले जाएगा?"
"तू निश्चय ही मरना चाहता है।"
"मैं अभी तुझे रथ से नीचे पटकता हूं, ले संभल!"

इतना कहकर जटायु ने टांग पकड़ रावण को रथ से नीचे खींच लिया। रथ से नीचे गिरकर क्रोध से लाल होकर रावण धनुष ले जटायु पर बाणों की वर्षा करने लगा। बाणों से घायल होने पर भी जटायु ने साहस नहीं छोड़ा। उसने निहत्था होने पर भी रावण को पकड़कर भूमि पर धर पटका। बहुत देर तक दोनों में घोर युद्ध होता रहा। वीरवर जटायु ने रावण का कवच फाड़ डाला, धनुष टुकड़े-टुकड़े कर दिया, रथ का छत्र भंग कर दिया और लात-घूसों से रावण को व्याकुल कर दिया। इस समय अनेक तपस्वी भी वहां एकत्र हो गए थे, वे सब कहने लगे—"अरे कायर चोर, यह भगवती सीता दाशरथि राम की पत्नी हैं। क्या तू उस तेजस्वी राम को नहीं जानता, जिसने जनस्थान को राक्षसों से रहित कर दिया है? अरे पण्डित, यह भी कोई पराक्रम का कार्य है? तुझे अपने पराक्रम का गर्व है तो तनिक ठहर, वे दोनों भाई अब आते ही होंगे।"

इसी समय पराक्रमी जटायु उछलकर रावण की पीठ पर चढ़कर बैठ गया और जैसे महावत हाथी की गर्दन पर अंकुश छेदता है, उस तरह उसकी गर्दन का मंथन करने लगा। इससे तिलमिलाकर रावण ने बड़े वेग से जटायु को भूमि पर पटक दिया और वीरों को अशोभनीय रीति से खड्ग निकालकर निःशस्त्र जटायु पर आघात करने लगा। ऐसे करारे आघात खाकर जटायु लहू-लुहान हो भूमि पर गिरकर छटपटाने और 'हा राम, हा राम' कहने लगा। अपने श्वसुर के मित्र जटायु की यह दुर्दशा देख सीता रथ से कूदकर जटायु से लिपटकर 'हा तात, हा तात' कहकर विलाप करने लगी। उस विलाप करती हुई सीता के बाल पकड़ घसीटता हुआ रावण फिर उसे रथ की ओर ले गया तथा जबरदस्ती रथ पर डाल फिर वहां से भाग चला। सभी ऋषि कुमार, बटुक, तापसी स्त्रियां, सभी भीत-चकित हो 'हा राम! हा राम!' कहते इधर से उधर दौड़ चले।