मन्थरा का कूट तर्क

देखते-ही-देखते यह समाचार अयोध्या में व्याप गया। नगर-जन हर्षोन्मत्त हो गए। अयोध्या में मंगल-वाद्य बजने लगे। राजमार्ग सज गए। नगर-भवनों पर वंदनवार-कलश-पताकाएं सुशोभित हो गईं, पुष्प-मालाओं-तोरणों से समस्त गृह सम्पन्न हो गए। मंगल-गान, वेणुवाद्य, शंख आदि बजने लगे। राजमार्ग दर्शकों से भर गया। वारांगनाएं नृत्य करने लगीं। विविध होम-पूजा और मंगल-अनुष्ठान होने लगे। सुरभित-सुगन्धित पदार्थों की गन्ध से दिशाएं महक उठीं। हर मुंह में राम के राज्याभिषेक की चर्चा थी। नगर-नागर राम की धीरता-वीरता, धर्म-भीरुता, उत्साह, उदारता, सहृदयता, पितृभक्ति, विद्या-निपुणता आदि की चर्चा करने लगे।

भोर में राज्याभिषेक की तैयारी और उत्सव की शोभा को कैकेयी के सत-खण्डे हर्म्य की छत से दासी मन्थरा ने देखा। उसने देखा—पुरवासी आनन्द-कोलाहल कर रहे हैं। द्वार-द्वार पर ध्वजा-पताकाएं, पुष्प-मालाएं सुशोभित हैं, दर्शकों की भीड़ और चहल-पहल राजद्वार तक बढ़ गई है। राजद्वार पर विविध वाद्य बज रहे हैं। उसने नीचे आ राम की धाय से, जो पीले वस्त्रों से सुशोभित थी, पूछा, “अरी, आज अयोध्या में यह कैसा उत्सव है? बड़ी रानी कौशल्या आज क्यों अन्न, वस्त्र, स्वर्ण, रत्न लुटा रही हैं? राजद्वार पर यह भीड़-भभ्भड़ कैसा है?” तब राम की धाय ने बताया, “अरी मूर्खा, तू इतना भी नहीं जानती? सुना नहीं तूने, आज राम का राज्याभिषेक हो रहा है!”

दासी से यह सूचना पा विकलांगी दासी मन्थरा क्रोध से थर-थर कांपने लगी। वह कैकेयी के पित्रालय की पुरानी दासी थी। कैकेयी को उसने गोद खिलाया था, दूध पिलाया था। शुल्क की बात वह जानती थी। आनव जाति की स्त्री-स्वाधीनता से वह परिचित थी। मानवों की कुल-मर्यादा, पुरुष-प्रधानता, स्त्री-दासत्व, इन सबसे उसे घृणा थी। वह बड़ी बुद्धिमती और तीखे स्वभाव की वृद्धा थी। रानी के मुंहलगी थी। वह दशरथ के विश्वासघात और वचन-भंग को देख अग्नि के समान भभक गई। उसने मन में कहा—भरत-शत्रुघ्न को ननिहाल भेजकर राजा ने यह अच्छी युक्ति निकाली है। वह अब अपने वचन को पूरा निबाहना नहीं चाहता। वह तीव्र गति से रानी कैकेयी के शयनागार में पहुंची, रानी कैकेयी अभी सो रही थी। वहां जाकर उसने रानी से कहा—“अरी रानी, क्या आज तेरी निद्रा भंग न होगी? क्या तू नहीं जानती कि तेरा भविष्य आज अन्धकार में डूब रहा है? तेरे ऊपर घोर संकट आनेवाला है। तेरे पाप का उदय हुआ है। उसका फल तुझे शीघ्र ही मिलने वाला है। राजा मीठी-मीठी बातें बना जाता है, तुझे पुष्पहार, आभूषण, रत्न मिल जाते हैं, तो तू समझती है—राजा तेरा ही है। पर मैं कहती हूं, अरी अजान, तेरे साथ छल हो रहा है। कोरी प्रवंचना। धोखा—अरी रानी, तू धोखा खाएगी।”

मन्थरा दासी की ऐसी कटु व्यंग्योक्ति सुनकर रानी कैकेयी हंस दी। उसने हंसकर कहा—“अम्ब, आज क्या बात है, भोर ही में तू बक-झक कर रही है, किसने तुझे क्रुद्ध किया है, बोल? तेरा मुंह क्यों सूख रहा है? क्या कोई अमंगल हुआ है?”

कैकेयी की ऐसी मीठी वाणी सुनकर उसने कहा—“अमंगल और कैसा होता है भला! आज राम का यौवराज्य-अभिषेक हो रहा है और तू बेखबर सो रही है; तू समझती है, राजा तुझे बहुत प्यार करता है, पर आज तो वह कौशल्या को राज्यलक्ष्मी प्रदान कर रहा है। अब समझी मैं, इसलिए उसने भरत को ननिहाल भेज दिया था। सोच तो, यदि राम राजा बन गया तो तेरा क्या हाल होगा? हाय, हाय, मैं तो इसी सोच में मरी जाती हूं। पर तू भी तो कुछ अपना बुरा-भला सोच, अपने पुत्र के हित के लिए अब भी सचेत हो—समय रहते सचेत हो!”

धात्री के ये वचन सुनकर कैकेयी ने कहा—“अम्ब, राम को यौवराज्य मिल रहा है, तो तू दुःख क्यों करती है? इसमें दुःख और शोक की क्या बात है भला? मैं तो राम और भरत में भेद नहीं समझती। राम और भरत मेरे दो नेत्र हैं। राम का राज्याभिषेक हो रहा है तो मैं प्रसन्न हूं। यह तो शुभ समाचार है। ले, यह रत्नहार, ये सब आभूषण, मैं तुझे पुरस्कार में देती हूं।” यह कहकर उसने प्रसन्नता से अपने सब रत्नाभरण उतारकर मन्थरा पर फेंक दिए। परन्तु कैकेयी के इस व्यवहार से मन्थरा और भी जल-भुन गई। उसने वे गहने पटक दिए और तमक-कर बोली—“अरी मूढ़ तेरी यह कुबुद्धि मुझे तनिक भी नहीं सुहाती। तू दुःख के स्थान पर सुख मना रही है, सौत का पुत्र राजा बने और तेरा पुत्र दास! इसकी तू खुशी मनाए, ऐसी तेरी बुद्धि है! अरी, यह राम-राज्य की सूचना नहीं है, हम लोगों की मृत्यु की सूचना है। आज राम राजा बनेगा और कौशल्या राजमाता बनेगी। तब तुम दासी की भांति हाथ बांध उसके सम्मुख जाओगी। भरत राम का दास होगा। सीता रानी बनेगी और भरत की स्त्री माण्डवी उसकी दासी। यह सब तू अपनी आंखों से देख सकेगी? तुझे छोड़ और कौन बुद्धिमती स्त्री ऐसे अवसर पर प्रसन्न हो सकती है?”

वास्तव में कैकेयी राम को पुत्रवत् प्यार करती थी, उसके मन में तुच्छता का भान भी न था। वह अपने शुल्क की बात भी भूल गई थी। राजा का प्यार तथा अयोध्या का वैभव उसे प्रिय था। उसने बूढ़ी धाय मन्थरा से ऐसे वचन सुन नरमी से कहा—“धातुमातः, तू स्नेह से ऐसा कहती है। परन्तु राम तो यौवराज्य के सर्वथा योग्य है। वह धर्मात्मा है, उदार, सत्यवादी और प्रजापालक है। वह तो मुझे ही अपनी माता समझता है, फिर भला भरत और राम में अन्तर क्या है? राम को राज्य मिलना भरत ही को राज्य मिलने जैसा है।”

रानी के ये वचन सुनकर मन्थरा ने कहा—“ठीक ही है। अभी तू नहीं समझेगी। पर जब राम का पुत्र गद्दी का अधिकारी होगा और भरत और उसके पुत्रों को कोई स्थान न मिलेगा तब सब कुछ तेरी समझ में आ जाएगा। अभी तो तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं और सौत की उन्नति देखकर तू मुझे पुरस्कार दे रही है, पर तू यह भी तो सोच कि भरत को क्यों मामा के यहां भेज दिया गया। देश-देश के राजाओं को न्योता गया, पर तेरा पिता, भाई और पुत्रों को नहीं बुलाया गया। पर जब अपने और अपने पुत्र के सर्वनाश का यह सब षड्यन्त्र देखकर भी तेरी आंखें नहीं खुलतीं तो मुझे क्या? जब राम राजा हो जाएगा और तू भरत को ले एक कोने में दासी की भांति पड़ी रहेगी अथवा जब सौत कौशल्या के सम्मुख तुझे हाथ बांधकर खड़ा होना पड़ेगा, तब तुझे पता लगेगा कि मैंने तेरे हित की ही बात कही थी।”

मन्थरा के इस विष-वमन से कैकेयी का मन फट गया। धीरे-धीरे उसे उसकी सभी बातें ठीक प्रतीत होने लगीं। उसने धीरे-से कहा—“तो अम्ब, तू क्या कहती है कि भरत का हित किस बात में है? मैं क्या करूं?”

“बस, राम वन को जाए और भरत सिंहासन पर बैठे, यही तू कर। इसी में तेरा और भरत तथा उसकी संतान का हित है। अरी, इन आर्यों के परिवारों में माताओं की क्या मर्यादा है? ये तो पितृमूलक परिवार हैं। राम के राजा होते ही तेरा और तेरे पुत्र भरत के वंश का तो कहीं पता भी नहीं लगेगा। क्या इसीलिए तेरे पिता ने इस बूढ़े कामुक राजा को दो सौतों पर तुझे दिया था? क्या तेरे प्रतापी पिता की कुछ मर्यादा ही नहीं है? क्या तू नहीं जानती कि समूचे पश्चिमी-उत्तरी पंजाब और सुदूरपूर्व प्रदेशों में तेरे पिता और उसके सम्बन्धियों के राज्य फैले हैं? आर्यावर्त का यह कंटक ही तेरे पिता के सार्वभौम होने में बाधा है। ज्यों ही कोसल की मुख्य गद्दी पर तेरा पुत्र बैठेगा, आर्यावर्त में फिर तेरे ही पिता और पुत्र के वंश का डंका बजेगा। तेरे पुत्र का कुल कितना समृद्ध और लोकविश्रुत होगा, यह तो तनिक विचार!”

“तो अम्ब अब तू ही उपाय कर, जिससे मेरे पुत्र भरत को कोसल का राज्य मिले और राम वन को जाए। बता, अब कैसे हम सफल-मनोरथ होंगे।”

मन्थरा ने कहा—“इसमें क्या है! राजा ने यही वचन देकर तुझे ब्याहा था कि तेरा ही पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी होगा। सो यदि राजा को अपने वचन की चिन्ता नहीं है, तो तेरा भाई आनव-नरेश युधाजित् खड्गहस्त है। इन मानवों को हम समझ लेंगे। किसका सामर्थ्य है जो तेरे वीर भाई से लोहा ले सके? फिर अभी तो राजा का वचन और तेरा प्यार है। सो तू वस्त्राभरण, अलंकार त्याग, कोप-भवन में जा, मौन हो भूमि में पड़ी रह। इस बूढ़े कामुक राजा की क्या मजाल जो वह तेरे कोप को सहन करे! फिर तू खुल्लमखुल्ला उसके वचन-भंग का भण्डाफोड़ कर दे। राजा अपने को सत्यप्रतिज्ञ समझता है। वचन-भंग का लांछन सहन नहीं करेगा। यदि करेगा तो उसके सिर पर युधाजित् का खड्ग है ही। किसी को भी तेरा विरोध करने का साहस न होगा।

“राजा तेरी बहुत लल्लोपत्तो करेगा, रत्नाभरण देगा, तू सभी को ठुकरा देना। बस यही मांगना—भरत को राज्य और राम को वनवास। भरत के राज्य करने पर प्रजा भरत से प्रेम कर उठेगी और सबको भूल जाएगी। भरत निश्चल होकर राज्य करेंगे और तू भविष्य में कोसल-राजमाता कहाकर पूजित होगी। तेरी सौतें और उनके पुत्र तेरे सेवक होंगे, फिर तू उन पर चाहे जितना अनुग्रह करना।”

“ठीक है धातुमातः, अब मैं तेरी ही बात मानूंगी। कह, मैं क्या करूं?”

“बस, विलम्ब न कर। जैसे मैंने कहा, वैसे ही कर। पर सचेत रह, मतलब से मतलब रख। राजा की बातों में न भूल।”