राम
75. राम
जब सूर्यपुत्र मनु और उसके दामाद बुध ने अपने पैतृक राजवंशों की स्थापना कर ली और सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डल दोनों का भलीभांति विस्तार हो गया, तब उत्तर भारत आर्यावर्त के नाम से विख्यात हो गया तथा इस आर्यावर्त की समृद्धि सम्पूर्ण भारत से बढ़-चढ़कर हो गई। इन आर्यों में अनेक सांस्कृतिक नवीन-स्थापनाएं हुईं। प्रथम तो यह कि इन दोनों ही कुलों ने अब तक चली आती हुई मातृसंज्ञक वंश-परम्परा को त्याग पितृमूलक वंश-परम्परा स्थापित की। कुल-परम्परा को पितृमूलक निश्चित करने में एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तन यह हुआ कि आर्यों में विवाह-मर्यादा दृढ़बद्धमूल हो गई और स्त्रियों के लिए पुरुष ‘पति’ या ‘स्वामी’ हो गए। उनके शरीर और जीवन की सम्पूर्ण सत्ता पर उसका अखण्ड एवं सर्वतन्त्र अधिकार हो गया। यहां तक इस मर्यादा का रूप बना कि यदि वीर्य किसी अन्य पुरुष का भी अनुदान लिया हो तो भी संतति का पिता उस स्त्री का वह ‘पति’ ही माना जाएगा, जिससे उसका विवाह हो चुका है। अविवाहित स्त्रियों का पिता भी वही पति होगा। बहुत-से ऋषियों ने तो वीर्यदान अपना एक पेशा ही बना लिया, जिसमें उल्लेखनीय वेदर्षि दीर्घतपा थे। वशिष्ठ और दूसरे वरिष्ठ ऋषियों ने भी अन्य राजाओं की पत्नियों को वीर्यदान दिया। ऐसी सभी सन्तानें न माता की मानी गईं, न वीर्यदाता पुरुष की। प्रत्युत वे उस पुरुष की सन्तानें और उसी कुल-गोत्र को चलाने वाली प्रसिद्ध हुईं, जो उसकी माता का विवाहित पति एवं स्वामी था। इससे आर्य जाति को यह लाभ तो अवश्य हुआ कि वह एक संगठित जाति हो गई, परन्तु इससे एक नई और महत्त्वपूर्ण बात यह उत्पन्न हो गई कि उनकी राज्य-सम्पत्ति आदि सब वैयक्तिक होती गई और देखते-ही-देखते मानवों और एलों के महाराज्यों का विस्तार हो गया।
परन्तु इससे स्त्रियों के अधिकारों का खात्मा हो गया। पत्नी का अपना कुल-गोत्र कुछ भी न रहा। पितृमूलक वंश-परम्परा में पिता का कुल-गोत्र केवल पुत्र को ही मिलता था—पुत्री को नहीं। इसका अभिप्राय यह कि पुत्री को पिता की सन्तान ही नहीं गिना गया। वह पिता के कुल-गोत्र से बहिर्गत एक विच्छिन्न वस्तु मान ली गई, जो वयस्क होने पर किसी पुरुष को उसकी पत्नी बनने के लिए दे दी जाती थी। उसे न पिता का कुल-गोत्र मिलता था, न पति का। इस प्रकार से आर्यों की वंश-परम्परा में स्त्री मात्र पति के लिए सन्तान उत्पन्न करने की एक जीवित क्षेत्र थी। इस विवाह-मर्यादा में दाम्पत्य प्रेम, समानता आदि के कुछ भी भाव न थे। न विवाह का उद्देश्य नर-नारी की नैसर्गिक कामेषणा की पूर्ति था, न वह अन्य शारीरिक और भौतिक एषणाओं पर आधारित था, उसका उद्देश्य अपने ‘पति’ के लिए—जो वास्तव में उसका स्वामी था—साथी, मित्र या जीवन-संगी बनना नहीं—सन्तान उत्पन्न करना था।
दूसरी महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक बात, जो आर्य कुलों में उत्पन्न हुई, वह उत्तराधिकार थी। पिता की सारी राज्य-सम्पत्ति का निश्चित रूप से पुत्रों को ही उत्तराधिकार मिलता था—पुत्रियों को नहीं। इस प्रकार जहां पुत्रियां पिता के कुल-गोत्र से वंचित कर दी गईं वहां सम्पत्ति से भी वंचित कर दी गईं। सम्पत्ति का सर्वार्थ में उत्तराधिकारी पुत्र था। इस प्रकार आर्यों का संगठन एक प्रकार से अस्त्रीक संगठन था। अर्थात् आर्यों की जाति में स्त्री की कहीं भी गणना न थी। वह केवल पुरुष की पूरक थी। पति के लिए उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी को उत्पन्न करने के लिए वह ब्याही जाती थी। इसलिए विवाह में अब स्त्रियां पति को स्वेच्छा से वरण नहीं करती थीं, वे पिता के द्वारा दी जाती थीं। इस सम्बन्ध में उनकी सम्मति नहीं ली जाती थीं, न उनकी रुचि और पसन्द का विचार किया जाता था। जिस प्रकार पति को विवाहोपरान्त पत्नी पर पूर्णाधिकार प्राप्त था, उसी प्रकार विवाह से पूर्व कन्या पर पिता को। परन्तु मजेदार बात यह थी कि पिता की सम्पत्ति में और पति की सम्पत्ति में उनका कुछ भी भाग न होता था। वह कुल-गोत्र-सम्पत्ति के सब अधिकारों से वंचित थीं। ज्यों-त्यों आर्यों की राज्य-श्री बढ़ती गई, त्यों-त्यों विवाह के नियम रूढ़िबद्ध होते गए, जिनसे स्त्रियों की दशा एक प्रकार से दासता की सीमा को पहुंच गई। विवाह के समय उसे पति की आज्ञाकारिणी और अधीन रहने का वचन भरना पड़ता था। वह ‘दत्ता’ थी। स्वयंवरों की प्रथा बड़े-बड़े आर्यकुलों में प्रचलित थी, परन्तु उसमें भी कन्या को अपनी पसन्द का पुरुष चुनने का अधिकार न था। पिता ही उस चुनाव की कोई शर्त रख देता था और उस शर्त को पूरा करने पर वह कन्या उसी को दे दी जाती थी। ऐसे स्वयंवरों में कन्या को ‘वीर्यशुल्का’ कहा जाता था। इसका अर्थ था—पराक्रम के मूल्य पर कन्या की खरीद। अर्थात् पराक्रम ही कन्या का मूल्य है। कुछ कुल कन्या के मूल्य में भी धन लेते थे। सीता ‘वीर्यशुल्का’ थी। परन्तु गाधि राजा ने एक हजार घोड़े लेकर ऋचीक को अपनी पुत्री ब्याह दी थी। और इतना ही क्यों, राजा लोग अपनी कन्याएं पुरोहितों को यज्ञ-दक्षिणा की भांति भी दे देते थे। जैसे दशरथ ने ऋष्यशृंग को अपनी कन्या शान्ता दे दी थी।
बहुपत्नीत्व की प्रथा भी इसी कारण चली। पति को अनेक स्त्रियों से ब्याह करने के अधिकार प्राप्त हो गए, पर पत्नी को नहीं। विवाह के अतिरिक्त आर्य लोग दासियां भी रखते थे। इस समय आर्य राजाओं के अन्तःपुर में चार प्रकार की पत्नियां रहती थीं, एक महिषी—मुख्य महारानी—जिसे राजा के साथ यज्ञ में सम्मिलित होने का अधिकार था। दूसरी पतिव्रता—जिस पर पति का प्रेम कम हो जाता था या जो बूढ़ी हो जाती है। तीसरी वाग्वृता—जो मुख्य प्रेमिका होती है। चौथी—पालावली—जो प्राय: मन्त्री की कन्या होती है। अपना अधिकार बनाए रखने तथा राजा के भीतरी भेद लेने के लिए प्राय: मन्त्रिगण अपनी कन्या राजा ही को देते थे। इसी प्रकार राज्यों की भी पांच श्रेणियां थीं। एक साम्राज्य—जिसमें अनेक अधीन, विजित तथा करद राज्य सम्मिलित होते थे। दूसरा भोज्य—जो सम्राट द्वारा किसी भी नियुक्ति के रूप में प्रदान किया जाता था तथा शासक को केवल उसकी आय पर ही अधिकार रहता था। तीसरा स्वराज्य—जो स्वतन्त्र था। चौथा वैराज्य—जो शत्रु का जय किया हुआ होता था। पांचवां राज्य—जो साम्राज्य के अन्तर्गत होता था।
दायभाग और उत्तराधिकार के सम्बन्ध में भी आर्यों में पहले यही विधि प्रचलित रही कि राज्य सब पुत्रों में बांट दिया जाता था। जैसे मनु ने अपने पुत्रों में समान राज्य बांट दिया था। परन्तु शशिबिन्दु के कुल में दायभाग का प्रचलन हुआ। शशिबिन्दु ययाति-पुत्र यदु के वंश में एक चक्रवर्ती राजा था। यह चित्ररथ का पुत्र था। शशिबिन्दु विदर्भ का राजा था। इसने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए और बहुत स्वर्ण बांटा। इसके पास स्वर्ण का अटूट भण्डार था। प्रसिद्ध चक्रवर्ती मानव मान्धाता शशिबिन्दु का दामाद था। कपियों ने शशिबिन्दु के पिता चित्ररथ का यज्ञ कराया। उसमें उस अकेले को ही अन्नादि का अध्यक्ष बनाया। इसके बाद उसी यज्ञ में चित्ररथ ने यह घोषणा कर दी कि मेरे वंश में एक ही छत्रपति होगा। शेष उनके अनुजीवी होंगे। अर्थात् जैसे मनु ने अपने सब पुत्रों में राज्य बांटा; उस प्रकार चित्ररथ की भावी सन्तानों में राज्य का बंटवारा नहीं होगा। राज्य केवल ज्येष्ठ भाई का रहेगा। वही राजा कहाएगा। शेष भाई उसके अनुजीवी रहेंगे। उन्हें गुजारा मिलेगा। आगे चलकर मानवों ने भी इस नियम को मान लिया और तब राज्यों के बंटवारे समाप्त हो गए। जो गद्दियां स्थापित हो चुकी थीं, वही संपुष्ट होती रहीं।
पीछे हम बता चुके हैं कि आर्यावर्त में इस समय सूर्यवंश की पांच शाखाएं स्थापित थीं। एक—उत्तरकोसल राजवंश, दूसरा—दक्षिण कोसल राजवंश, तीसरा—शर्याति आनर्त राजवंश, चौथा—मैथिल राजवंश और पांचवां—वैशाली राजवंश। उत्तर कोसल राजवंश की 39वीं पीढ़ी में राम का जन्म हुआ।
इस वंश में अब तक मनु, इक्ष्वाकु, युवनाश्व, बृहदश्व, मान्धाता, त्रसदस्यु, अम्बरीष, दिलीप, रघु और दशरथ विश्रुत पुरुष हो चुके थे। इस समय उत्तरकोसल राज्य के उत्तराधिकारी राम वनवास कर रहे थे। दशरथ की मृत्यु हो चुकी थी।
दशरथ महारथी योद्धा और प्रतिष्ठित राजा थे। देवराज इन्द्र से उनके मैत्री सम्बन्ध थे। वे नीतिमान् और सत्यप्रतिज्ञ थे। उनकी तीन महिषियां थीं—प्रथम कौशल्या—दक्षिण कोसलाधिपति भानुमान् की पुत्री, द्वितीय सुमित्रा—मगधराजपुत्री, तृतीय कैकेयी—उत्तर पश्चिमी आनवनरेश केकय की पुत्री। दशरथ ने सिन्धु, सौवीर, सौराष्ट्र, मत्स्य, काशी, दक्षिण कोसल, मगध, अंग, बंग, कलिंग और द्रविड़-नरेशों को जय किया था तथा अनेक अश्वमेध यज्ञ किए थे। गिरिव्रज के प्रसिद्ध युद्ध में उत्तर पांचाल दिवोदास की सहायता की थी तथा वैजयन्ती के कुलीतर के वंशधर तिमिध्वज शम्बर असुर को मारा था। अंग-नरेश लोमपाद इनके मित्र थे।
राम के जन्म से पूर्व इस उत्तर कोसल राज्य के भी कुछ शाखा-राज्य स्थापित हो चुके थे, जिनमें एक शाखा हरिश्चन्द्र-वंश की थी। इसकी राजधानी कान्यकुब्ज के पास थी। इस समय इस गद्दी पर सम्भवत: रोहिताश्व जीवित थे। मुख्य सूर्यवंश शाखा की तीसवीं पीढ़ी से—राम से कोई नौ पीढ़ी पूर्व सिन्धुद्वीप राजा के काल में अनरण्य ने यह गद्दी स्थापित की थी। इनकी पांचवीं पीढ़ी में त्रैयारुण हुए। उनके पुत्र सत्यव्रत (त्रिशंकु) और उनके पुत्र हरिश्चन्द्र, जो पीछे महासत्यवादी प्रसिद्ध हुए। राजा त्रैयारुण वेदज्ञ और प्रतापी था। उसका पुत्र सत्यव्रत दुराचारी तथा दुराग्रही था। उसने तीन बड़े अपराध किए—एक नव-विवाहिता ऋषि-पत्नी का हरणकर उससे बलात्कार किया, चाण्डालों के साथ खान-पान रखा, कुलगुरु वशिष्ठ की गाय को मारकर खा गया। इससे क्रुद्ध होकर पिता ने वशिष्ठ के कहने से उसे राज्यच्युत कर दिया और उसे त्रिशंकु का कुनाम दिया। यौवराज्य से च्युत होकर वह वन में रहने लगा। पिता के मरने पर भी वशिष्ठ ने उसे गद्दी नहीं सौंपी—स्वयं ही राज्यभार संभाला। इसी समय कान्यकुब्जपति विश्वामित्र ने राज्य पर चढ़ाई की और वशिष्ठ ने उन्हें शबरों और म्लेच्छों की मदद से पराजित किया। राज्यभ्रष्ट विश्वामित्र वन में जा छिपे, जहां त्रिशंकु ने उनकी बहुत सहायता की और उनके कुटुम्ब का पालन किया। अवसर पाकर विश्वामित्र ने त्रिशंकु को सिंहासन पर बैठाया और उसके यज्ञ में पुरोहित बने। त्रिशंकु के पुत्र महादानी और महाबली हरिश्चन्द्र हुए। इन्होंने दिग्विजय करके अश्वमेध किया और सोमपुर बसाया। उनके चिरकाल तक पुत्र नहीं हुआ तो उन्होंने वरुण की उपासना की और कहा कि मैं पुत्र की बलि दूंगा। पर जब रोहिताश्व का जन्म हो गया तो मोहवश राजा ने पुत्र की बलि नहीं दी। वशिष्ठ की सलाह से वह सात बार वन को भाग गया और लौट आया। बाईस वर्ष बाद हरिश्चन्द्र को जलोदर का रोग हुआ और समझा गया कि वह वचनभंग का दंड है। अन्त में राजपुत्र के स्थान पर भार्गववंशी वेदर्षि अजीगर्त के पुत्र शुन:शेप को हजार गाय देकर मोल लिया गया और उसकी बलि देकर यज्ञ करने का आयोजन हुआ। बदनामी से बचने के लिए वशिष्ठ इस यज्ञ के पुरोहित नहीं बने—अयास्य आंगिरस को पुरोहित बनाया गया। बालक शुन:शेप को लाल वस्त्र पहनाकर बलियूप से बांध दिया गया। परन्तु कोई यज्ञकर्ता उसके वध को राजी न हुआ। तब अजीगर्त ही सौ गाय लेकर वध करने को राजी हो गया। पीछे जब विश्वामित्र को यह सूचना मिली तो वे आए। वास्तव में यह बालक उनका भांजा था और उन्होंने बड़े झंझटों के बाद उसे बलिदान से बचाया। अब इस समय इस गद्दी पर रोहिताश्व राज्य कर रहे थे।
सूर्यवंश की दूसरी शाखा—सगर-वंश ने दशरथ-काल से कुछ ही पूर्व मध्य-भारत में अपनी गद्दी स्थापित की थी। इसी वंश का प्रथम राजा बाहु था, जिसे हैहय तालजांघ ने परास्त किया था। बाहु राज्यच्युत हो अग्नि और्व के आश्रम चला गया था। वहीं सगर का जन्म हुआ। बाहु तो वहीं स्वर्गगत हुए और सगर ने अपने प्रयत्न से राज्य प्राप्त किया तथा न केवल हैहय को जीता अपितु अपना राज्य भी बहुत बढ़ा लिया। हैहयों के परम्परागत शत्रु अग्नि और्व ने इन्हें भारी सहायता दी। सगर ने हैहयों की सारी ही शंकाओं का मूलोच्छेद कर दिया तथा अपना महासाम्राज्य-विस्तार किया। इनकी कमान में साठ सहस्र योद्धा थे। इन्हीं के तीन पीढ़ी के नरेश—अंशुमान्, दिलीप और भगीरथ चार नदियों को खोदकर और मिलाकर गंगा को मैदान में लाए थे। अंशुमान राजर्षि थे, उन्होंने अश्वमेध और राजसूय यज्ञ किया। इस समय गद्दी पर भगीरथ या उसका पुत्र आसीन था।
दक्षिण कोसल राजवंश की गद्दी पर ऋतुपर्ण के प्रपौत्र कल्माषपाद थे, जिन्होंने राक्षस धर्म स्वीकार कर नर-मांस खाना आरम्भ कर दिया था। इन्होंने अपने राजगुरु वशिष्ठ के पुत्र शक्ति तथा निन्यानवे परिजनों को विश्वामित्र के भड़काने से खा डाला था। इन्हीं कल्माषपाद की पत्नी में वीर्यदान कर वशिष्ठ ने पुत्र उत्पन्न किया था। कल्माषपाद के बाद इस राजवंश की दो शाखाएं हो गई थीं। निषध-विदर्भ, दक्षिण कोसल और दशार्ण, दोनों राज्यों की सीमाएं परस्पर मिलती थीं। सूर्यवंश की अन्य शाखाओं का उल्लेख अन्यत्र आ चुका है। अयोध्या, श्रावस्ती और साकेत सूर्यवंश की प्रधान राजधानियां थीं। संक्षेप में इस समय उत्तर कोसल राज्य पर राम के स्थानापन्न भरत, हरिश्चन्द्र-शाखा पर रोहिताश्व, सगर-शाखा पर भगीरथ, दक्षिण कोसल गद्दी पर कल्माषपाद, विदेह मैथिल में सीरध्वज, मैथिल संकाश्य-शाखा पर धर्मध्वज, वैशाली में प्रमति और शर्याति राज्य पर मधु राक्षस राज्य करता था। सूर्यवंश की इन गद्दियों के अतिरिक्त जो राजवंश थे उनमें चन्द्रवंश प्रमुख था। इसकी मुख्य गद्दी प्रतिष्ठान में सारभौम, विदर्भ में धृतिमान्त, उत्तर पांचाल—सुदासवंश में सोमक, दक्षिण पांचाल में रुचिराश्व, मगध में सुधन्वा, कान्यकुब्ज में ऋतुराज, मालव में दुर्जय, विदर्भ में सुबाहु और उत्तरी बिहार में मरुत् के वंशधर राज्य करते थे। अंग में लोमपाद और उत्तर-पश्चिम में केकय थे।
दैत्यों, राक्षसों और असुरों में—रावण और मधु; ऋषियों में वशिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव—नारद, ऋष्यशृंग, मित्रयु काश्यप, सायकाश्व, देवराट् मधुच्छन्दस, प्रतिदर्श, गृत्समद, अगसा, अलर्क, भरद्वाज आदि प्रमुख थे।
दशरथ को वृद्धावस्था तक कोई सन्तान नहीं हुई, वार्धक्य में चार पुत्र हुए। दशरथ की तीनों पत्नियों में बड़ी कौशल्या तो कोसल-वंश की ही कन्या थी। वह दक्षिण कोसलाधिपति भानुमान् की पुत्री थी। इसलिए यह वंश आर्य भी था, मानव भी था, सूर्यवंश भी था। इनके सब आचार-विचार अनुकूल थे। दूसरी मगध के राजा की पुत्री थी, जो कदाचित् दशरथ का करद राजा था। परन्तु कैकेयी की बात इन सबसे पृथक् थी। वह उत्तर-पश्चिमी आनवनरेश की लड़की थी। पाठकों को स्मरण होगा कि सम्राट ययाति के बंटवारे में अनु को गंगा-यमुना-द्वाबे का उत्तरी भाग मिला था। इस वंश की इक्कीसवीं पीढ़ी में महामानस चक्रवर्ती हुए और उन्होंने सारे पंजाब को जीत लिया। उन्हें सप्तद्वीपपति तथा सप्तसागरों का स्वामी कहते थे। इनके पिता जनमेजया को मान्धाता ने हराया था। उस समय यह वंश दो खण्डों में होकर कुछ पश्चिम को और कुछ पूर्व को चला गया था। महामानस पश्चिम की ओर जानेवालों में से थे। इनके वंश ने सिन्धु सौवीर, केकय, भद्रवाहलीक, शिवि और अम्बष्ठ राज्य स्थापित किए। इनमें केकय प्रमुख थे। महासागर के पुत्र उशीनर और तितिक्षु थे। उशीनर ने पहले अवनीरस अपनी राजधानी बनाई थी। इनके राज्य-मण्डल में यौधेय, अम्बष्ठ, नवराष्ट्र और कुमिला की रियासतें भी सम्मिलित थीं। उशीनर के पुत्र शिव थे जिन्होंने कपोतों को शरण दी थी। इनके चार पुत्रों ने फिर पश्चिम की ओर बढ़कर वृषदर्भ, केकय, मद्र और सौवीर राज्यों की स्थापना की थी। इस समय सम्पूर्ण पंजाब इन्हीं के अधिकार में था। केकय-नरेश आनव दशरथ की टक्कर के प्रबल स्वतन्त्र नरेश थे। इनकी पुत्री कैकेयी तथा पुत्र युधाजित् थे। कैकेयी मानवती, सुन्दरी, गरिमावती और ठसकदार रानी थी। बड़े राजा की बेटी होने के कारण उसका मान भी बहुत था। सबसे छोटी, सुन्दरी और गुणवती होने के कारण वार्धक्य में राजा उसे प्यार भी बहुत करते थे। उसका अपना अलग महल, नौकर-चाकर, दास-दासी थे। वह स्वतन्त्र प्रकृति की स्त्री थी। युद्ध और आखेट में राजा के साथ जाती थी। यह वास्तव में कुछ तो पितृकुल का प्रभाव था और कुछ ‘वृद्धस्य तरुणी भार्या’ का मामला था।
परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण और कठिनाई की एक बात थी। जब वृद्धावस्था होने पर भी दोनों रानियों से कोई सन्तान नहीं हुई, तब उन्होंने केकय राजा की पुत्री मांगी। केकय राजा ने इस शर्त पर पुत्री देना स्वीकार किया कि दशरथ के उत्पन्न कैकेयी का पुत्र कोसल राज्य का उत्तराधिकारी होगा। हम बता चुके हैं कि आर्यों की परिपाटी पितृकुल की थी तथा वहां स्त्री का कोई महत्त्व न था। पति ही पुत्र का स्वामी होता था, परन्तु सम्भवत: आनव-कुल आर्यों की इस मर्यादा को नहीं मानता था। इससे उसने यह प्रण रखा कि यदि दशरथ उसकी पुत्री के पुत्र को ही उत्तराधिकारी दें तभी वह अपनी पुत्री दशरथ को देगा; नहीं तो नहीं। दशरथ ने उस समय केकय महाराज की बात स्वीकार कर ली। कुछ इस विचार से भी कि पूर्व पत्नियों से सन्तान न होने ही से तो वह विवाह किया जा रहा है। इसलिए यह तो होगा ही कि उसी का पुत्र उत्तराधिकारी होगा। कुछ कैकेयी का रूप-वैभव, उसके पिता का वरिष्ठ कुल भी काम कर गया। दशरथ ऐसी ही प्रतिज्ञा करके कैकेयी को ब्याह लाए।
परन्तु दैव-प्रभाव से जब सन्तान हुई तो तीनों रानियों को हुई और ज्येष्ठ राम थे—जो ज्येष्ठ रानी के पेट से पैदा हुए थे। बड़े होने पर राम रूप-गुण-शील और शौर्य में भी सब भाइयों में श्रेष्ठ रहे। धीरे-धीरे दशरथ का सबसे अधिक मोह राम पर ही रहा और अब दशरथ को कैकेयी से की हुई वह प्रतिज्ञा खलने लगी। वे मन-ही-मन राम ही को राज्य का उत्तराधिकार देने की सोचने लगे। राम के ऊपर विशेष प्रीति तो इसका कारण थी ही—और भी बातें थीं। राजा बाहरी वंश की लड़की के लड़के को कोसल का राज्य नहीं देना चाहते थे। राम का मातृ-कुल भी कोसल ही था, मानव था, आर्य था, इससे उन्हें राम ही यौवराज्य के योग्य जंचे। यद्यपि राम जन्मत: भी सब भाइयों में बड़े थे, ज्येष्ठा महिषी के पुत्र थे। ये भी बात राम के पक्ष में आती थी, परन्तु कदाचित् उस काल तक ज्येष्ठ पुत्र को ही राज्य मिले—यह नियम दृढ़ बद्धमूल नहीं हुआ था। कोई भी पुत्र राज्य का अधिकार योग्यता के आधार पर पा सकता था। यदि आप पुराणों में वर्णित वंशावलि को ध्यान से देखें तो आपको ज्ञात होगा कि वंशावलियों के सम्बन्ध में पुराणों में सर्वत्र ही पिता के बाद पुत्र का स्थान नहीं है, किन्तु वह नाम दिया है जो पिछले व्यक्ति के बाद उत्तराधिकारी होता था। वह व्यक्ति भी सदैव पिछले व्यक्ति का पुत्र नहीं होता था, अपितु भाई, भतीजा, पौत्र अथवा अन्य सम्बन्धी भी हो सकता था।
जब जनकपुर में धनुष-यज्ञ के बाद चारों भाइयों के विवाह सम्पन्न हो गए, तब ताड़कावध, धनुर्भंग और भार्गव परशुराम के पराभव के वृत्तान्त ने राम के महत्त्व और गौरव को बहुत बढ़ा दिया। अब दशरथ ने यह दृढ़ धारणा बना ली कि जैसे बने, राम को उत्तराधिकार दिया जाए। विवाह के कुछ दिन बाद राम सीता-सहित अपनी ससुराल जनकपुर चले गए और कई वर्ष वहीं रहे। इसके बाद जब राम अयोध्या लौटे तो भरत के मामा युधाजित् भरत, शत्रुघ्न और उनकी वधुओं को लेकर उनके ननिहाल केकय ले गए तथा वे बहुत दिनों तक वहीं रहे। यही अवसर दशरथ ने अपनी मनोकामना पूरी करने को ठीक समझा। उन्होंने सभी अधीन राजाओं, रईसों, छत्रधारी नरपतियों को अयोध्या में निमन्त्रित किया। अनेक ऋषिगणों को बुलाया, केवल भरत के मामा-नाना को यह खबर नहीं भेजी, न जनक ही को सूचना दी। जब राजा और राजवर्गी पुरुष, ऋषि और विद्वान् एकत्र हो गए तो दशरथ ने उनके समक्ष अपना प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा—“रघु से लेकर हमारे सभी पूर्वजों ने प्रजा का पुत्रवत् पालन किया है, उन्होंने सदैव प्रजा के हित का ध्यान रखा। मैंने भी यथासामर्थ्य प्रजा को सब प्रकार की सुविधाएं दीं। उनके दुःख को अपना दुःख और उनके सुख को अपना सुख समझा। मेरी इच्छा है कि भविष्य में प्रजा इससे भी अधिक सुखी और समृद्ध हो। किन्तु मैं अब वृद्ध हो चला हूं। मेरे शरीर के अवयव शिथिल हो गए हैं, मुझे अब शान्ति चाहिए। अब मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को अपने स्थान पर नियुक्त कर विश्राम चाहता हूं। राम राजोचित सभी गुणों से परिपूर्ण है। वह धीर है, वीर है, उदार है और धर्मात्मा है। वह पराक्रमी, साहसी, बलवान्, तेजस्वी और प्रभावशाली है। अब यदि आप ठीक समझें तो मैं कल प्रात:काल पुष्य नक्षत्र के शुभ योग में आपकी साक्षी में राम को यौवराज्य दूं! आप मेरे इस प्रस्ताव पर भली-भांति विचार कर लें तथा अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट करें।”
पाठक देख सकते हैं कि दशरथ ने अपना प्रस्ताव कैसे युक्ति और गम्भीरता से उपस्थित किया था। राम के श्रेष्ठ गुणों का बखान करने के साथ ही उनके ज्येष्ठ होने की ओर भी संकेत किया था। फिर इस सम्बन्ध में वशिष्ठ, वामदेव और विश्वामित्र जैसों की स्वीकृति तथा संकेत था। उस कारण सभी राजाओं ने राम-राज्याभिषेक का सोल्लास समर्थन किया। निस्सन्देह राम के विरोध का कोई कारण भी न था। दशरथ की प्रतिज्ञा तो सब पर विदित न थी। परन्तु राजनीति-विचक्षण दशरथ ने सबका समर्थन पाकर फिर पूछा—“आप लोग केवल मेरी प्रसन्नता के निमित्त ही यह प्रस्ताव स्वीकार करते हैं, या कि आपने भी राम के उदार गुणों पर विचार किया है?”
तब राजाओं के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से कहा—“राम वास्तव में सत्यवादी, एक सफल व्यक्ति के सब गुणों से परिपूर्ण, धर्मात्मा, धीर, वीर, पराक्रमी, तेजस्वी, साहसी, शक्तिमान्, उत्साही, उदार, मृदुभाषी, बुद्धिमान्, सच्चरित्र, प्रजापालक और जनरक्षक हैं व सर्वगुणसम्पन्न हैं। वे संसार के सभी जीवों को प्रिय हैं। शत्रु का मानमर्दन करने तथा उसे विजय करने का उनमें अदम्य सामर्थ्य है। वे अद्भुत पराक्रमी हैं। उनके समान देव, नाग, गन्धर्व, किन्नर, दैत्य, दानव, आर्य आदि वंशों में कोई नहीं है। हम सभी हृदय से यही चाहते हैं कि राम का शीघ्रातिशीघ्र यौवराज अभिषेक कर दिया जाए। हमारे कल्याण के निमित्त आप राम को यौवराज्य पद शीघ्र दे दें।”
राजपुरुषों के ये वचन सुनकर दशरथ ने कहा—“आप धन्य हैं! आपके विचार स्तुत्य हैं। मैं आपसे सहमत हूं। आजकल चैत्र मास है, वसन्त का आगमन हो चुका है। चारों ओर वन-उपवन-वाटिका पूर्ण पल्लवित और पुष्पित हैं। वृक्ष-पादप-लताएं सभी हरी-भरी, फल-फूलों से लदी हुई हैं। खेत हरे-भरे और धान्यों से परिपूर्ण हैं। कल पुष्य नक्षत्र है। आपकी अनुमति से ही राज्याभिषेक की सामग्री प्रस्तुत की जाए।”
इसका सभी ने अनुमोदन किया। तब दशरथ ने अपने गुरु और मन्त्री वशिष्ठ से करबद्ध होकर कहा—“अब आप सब सामग्री प्रस्तुत कर यह अनुष्ठान कल ही पूरा कर दीजिए।” इसके बाद दशरथ ने सब मन्त्रियों को, नगर-निवासियों तथा समागतजनों का भव्य स्वागत और आतिथ्य करने का आदेश दिया। सुमन्त्र दशरथ के मित्र, मन्त्री और राज्य के परम हितैषी थे। अब तक सभी राजकुमारों की देख-रेख, शिक्षा-दीक्षा उन्हीं के अधीन थी। अब सुमन्त्र के द्वारा राम को बुलाकर महाराज दशरथ ने कहा—“रामचन्द्र, तुम मेरे तथा अपनी माता के प्रिय हो, समस्त प्रजा के प्राणाधार हो। कल पुष्य नक्षत्र में मैं तुम्हें यौवराज्य-विभूषित करना चाहता हूं। सभी राजा-राजवर्गी इसमें सहमत हैं। मैं तुम्हें तुम्हारे हित की सीख देता हूं। तुम सदैव जितेन्द्रिय रहना, बुरे व्यसनों से दूर रहना, समुचित रीति से प्रजा का न्याय करना, सेना को सन्तुष्ट रखना, कोष में सदैव स्वर्ण-रत्न भरपूर रखना, अपने कर्मचारियों, भृत्यों, दासों, सेवकों और दासियों को सुखी रखना।”
इतना कहकर राजा प्रेमाश्रयू बहाने लगे। फिर पुत्र को छाती से लगाकर बोले—“पुत्र, मैंने इस दीर्घायु से बहुत अनुभव पाया। संसार का मुझे यथावत् ज्ञान है। प्रत्येक बात का मुझे पूरा अनुभव है। मैं अब एक क्षण का भी विलम्ब इस कार्य में नहीं करूंगा। कल ही मैं यह शुभ कार्य पूरा करूंगा। मनुष्य के विचार सदैव एक-से नहीं रहते, उनमें परिवर्तन होता ही रहता है। इसमें मैं अब अधिक सोच-विचार में समय नष्ट करना नहीं चाहता। इसी से मैं निश्चय ही कल यह काम पूरा करूंगा। आज रात तुम और वधू सीता उपवास करो तथा शय्या पर कुश बिछाकर शयन करो। रक्षकगण पूर्णत: सतर्क और सचेत रहें तथा सुमन्त्र रात-भर जागकर स्वयं तुम्हारी रक्षा करें। मैं जानता हूं, शुभ कार्यों में बहुत विघ्न आते रहते हैं। तुम्हारे भाई ननसाल गए हैं। मेरी इच्छा है कि उनके आने से पूर्व ही तुम्हें युवराज बना दूं। यद्यपि भरत तुम्हारा अनुयायी है, फिर भी मनुष्य-स्वभाव चंचल है।”
पिता की यह सीख सिर धार, राम उनके चरणों में सिर झुका अपने आवास को चल दिए।