रंग में भंग
अभी लंका में विजयोत्सव, पान-गोष्ठियां, नृत्य-विलास, दीपावलियां हो ही रही थीं कि अकस्मात् रंग में भंग हो गया, जिससे सारी लंका में विषाद और क्रोध की भावना फैल गई। नाच-रंग, पान गोष्ठियां तुरन्त रोक दी गईं। नगर और मणिमहल, सर्वत्र ही शोक छा गया।
कोई एक तपस्वी-बहिष्कृत-राज्यच्युत आर्य राजकुमार दण्डकारण्य में आए हैं, जो धनुष-बाण धारण करते हैं। उससे दण्डकारण्य की रानी सूर्पनखा का विग्रह हो गया है। उन्होंने धृष्टतापूर्वक राक्षस-राजनन्दिनी सूर्पनखा का अंग-भंग कर दिया है, उसकी नाक काट ली है और जनस्थान के रक्षक चौदह हजार राक्षसों को खर-दूषण सहित मार डाला है। अब सूर्पनखा रोती-कलपती, विलाप करती लंका में रक्षेन्द्र रावण की शरणापन्न हुई है। त्रिलोकीपति विश्वविजयी रावण प्रिय बहन का यह भयानक अभियोग सुन क्रोध और शोक से जड़ हो गया है। इस भयानक अपमान का वह उन तपस्वी राजकुमारों को क्या दण्ड दे, यही वह निर्णय नहीं कर पा रहा है। वह अपने मणिमहालय में पड़ा लम्बी उसासें ले रहा है।
जगज्जयी महातेज रावण अपने मणिमहालय के सतखण्डे की छत पर स्वर्ण-सिंहासन पर अति उद्विग्न बैठा था। देवों के युद्ध में उसके अंग पर जो वज्र-प्रहार हुए थे, उसकी चोटें अभी उसके शरीर पर ताजा थीं।
इन्द्र के ऐरावत ने अपने जो दांत उसकी छाती में गड़ा दिए थे, उनके चिह्न अभी भी उसके वक्ष पर थे। वह राजोचित वस्त्राभरणों से सज्जित, सुन्दरी ताम्बूल-वाहिनियों, चंवरधारिणियों, प्रसाधिकाओं से परिवृत मूर्त हिमशैल-जैसा दीख रहा था। बन्दीजन उसका स्तुतिगान कर रहे थे और सब मन्त्री और राजवर्गी पुरुष हाथ बांध अधोमुख दीन भाव से उसके सम्मुख बैठे थे।
अब उसकी बहन सूर्पनखा उसके सम्मुख खड़ी हो कहने लगी—
“भाई, मेरी इस दुर्दशा को देख। तू अमिताभ यदि इसे सहन करेगा तो तू भी उस निष्कासित के हाथों अछूता न बचा रहेगा।”
रावण ने विपन्न बहन को खिन्न नेत्रों से देखा, फिर कहा—
“बहन, धैर्य रख, रावण को क्रुद्ध करके यमराज भी सुख से नहीं जी सकता। तू विस्तार से उस आर्य राजपुत्र का बखान कर। क्या वह सम्पूर्ण देवताओं और यम, कुबेर, दिक्पालों-सहित जनस्थान में आया है?”
“वह दाशरथि राम कहाता है। उसके साथ उसकी पत्नी सीता और एक भाई है। उसने मुनि का वेश धारण किया है, परन्तु है वह धनुर्धारी और प्रचण्ड योद्धा। उसने अकेले ही बात की बात में खर-दूषण-सहित हमारे चौदह हजार राक्षसों को मार डाला है।”
“दाशरथि राम! श्याम गात, सघन कृष्ण काकपक्ष, विशाल वक्ष, प्रलम्ब-बाहु?”
“वही है, वही है, उसके कंधे बैल के समान पुष्ट हैं। भुजाएं गोल और घुटनों तक लम्बी हैं, सुदर्शना कमनीय कान्ति है। उसे दिव्यास्त्रों का महाज्ञान है।”
“तो उसके साथ सीता भी वहीं है—सीरध्वज की अयोनिजा वीर्यशुल्का?” रावण के नेत्रों में जनकपुरी के यज्ञ के धनुर्भंग का चित्र घूम गया। उसने कहा—“वह स्त्री चम्पकवर्णी, भीरु और अति कोमलकान्त-प्रभा है न!”
“ऐसा ही है। क्या तूने उसे देखा है?”
“ऐसा ही मैं समझता हूं, दाशरथि राम ही है वह, परन्तु वह राज्यभ्रष्ट-राजबहिष्कृत हो, दण्डकारण्य में कैसे घूम रहा है?”
“पिता की आज्ञा से।”
“क्या एकाकी ही?”
“बस, वह, स्त्री और भाई, तीन ही हैं।”
“तीनों ही ने मेरी प्रबल राक्षस-सेना को मार डाला—खर को भी, दूषण को भी! बड़े आश्चर्य की बात है!”
“चमत्कार ही कहना चाहिए।”
“कदाचित्। उसका एक चमत्कार मैंने देखा है—ऐसा मुझे स्मरण होता है। परन्तु यह विग्रह हुआ क्यों?”
“अकारण ही भाई, मुझे सूचना मिली—वहां जनस्थान में एक नया तरुण तपस्वी आया है और एक नया आश्रम बनाकर रहने लगा है। तेरा आदेश था कि ऐसा न होने दिया जाए। सो मैं स्वयं ही उसे देखने गई। वहां मैंने उसे देवताओं के समान रूपवान पाया। उसका मुख तेजस्वी, भुजाएं विशाल और नेत्र कमल के समान थे।”
“ठीक है, वही है!”
“उसे देख मैं सकामा हो गई। मैंने उससे पूछा—हे सुन्दर पुरुष तपस्वी के वेश में सिर पर जटा धारण किए और संग में स्त्री लिए, धनुष-बाण से सुशोभित, तू कौन है और यहां मेरे इस जनस्थान में किस प्रयोजन से आ बसा है?”
“इस कथन में तो कोई दोष नहीं था।”
“तब उस पुरुष ने कहा—सुन्दरी, मैं पराक्रमी महात्मा दशरथ का पुत्र राम हूं, मेरे साथ मेरी पतिव्रता पत्नी सीता और आज्ञाकारी भाई लक्ष्मण है। हम लोग माता-पिता की आज्ञा से प्रेरित हो धर्म-पालनार्थ यहां दण्डक वन में निवास करने आए हैं। अब तुम भी अपना परिचय दो।”
उस पुरुष के वचन सुनकर मैंने कहा—“मैं विश्रवा मुनि के पुत्र रावण त्रिलोकपति की बहन सूर्पनखा हूं। प्रबल कुम्भकर्ण और धर्मात्मा विभीषण मेरे भाई हैं। इस दण्डकारण्य की स्वामिनी मैं ही हूं।”
“ठीक कहा।”
“तब उस पुरुष ने कहा—जानकर प्रसन्न हुआ। अब यहां आने का कारण कहो!”
“तब मैंने अपना अभिप्राय उससे कहा कि मैं प्रतिष्ठित रक्षवंश की राजपुत्री हूं; तुझ पर मेरा काम-भाव है, तू मुझे पत्नी-भाव से ग्रहण कर। मेरा बल अप्रमेय है, मेरा भाई त्रिलोकपति है, मुझसे संबंध करके तू सुप्रतिष्ठ होगा।”
“ठीक कहा, ठीक कहा!”
“परन्तु उस पुरुष ने कहा—मेरी पत्नी मेरे साथ मौजूद है और तुझ जैसी सुलक्षण और स्वाधीनभर्तृका के लिए सौत का होना दुःख का कारण हो सकता है।”
“उस पुरुष ने ठीक ही कहा।”
“परन्तु मैंने कहा—इस मानुषी स्त्री का क्या? इसे तो मैं अभी मारकर खा जाऊंगी, फिर तू और मैं साथ-साथ वन, पर्वत-शिखरों में स्वच्छन्द विचरण करेंगे।”
“इसमें अनुचित क्या था?”
“पर उस पुरुष ने कहा—इससे अच्छा तो यह होगा कि यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। इसके साथ स्त्री नहीं है, तू इसी से विवाह कर ले। इसके साथ तुझे सौत का डर भी नहीं है।…मैंने देखा कि वह पुरुष भी कमनीय है। मैंने उसके निकट जाकर उससे कहा—अरे पुरुष, तू भी मेरे ही समान रूपवान है, गुणवान् है, मुझे तेरी भार्या बनना स्वीकार है।”
“तूने उस पर अनुग्रह ही किया।”
“परन्तु उसने कहा—मैं तो दास हूं। मेरी भार्या बनकर तो तुझे दासी ही बनना पड़ेगा।”
“तेरा अनुग्रह उसने अस्वीकार किया?”
“इस पर मुझे क्रोध आ गया और मैंने कहा—इस मानुषी स्त्री के ऊपर तुम लोग मेरा तिरस्कार करते हो! मुझसे ठट्ठा करते हो! ठहरो, मैं अभी इसे खा डालती हूं। जब मैं उस स्त्री पर झपटी तो उस दाशरथि के संकेत से उसके दुष्ट भाई ने पकड़कर निर्लज्जतापूर्वक मेरा अंग-भंग कर दिया—मेरी नाक काट डाली।”
“अक्षम्य है, किन्तु तू शेष कथा कह।”
“अंग-भंग हो मुख से रक्त बहाती मैं खर के पास पहुंची और तुरन्त ही मूर्च्छित हो गई।”
“असह्य है, मैं इसका प्रतिकार करूंगा।”
“मेरी यह दुर्दशा देख, खर ने कहा—अरे, यह क्या हुआ? किस दुष्ट ने तेरी यह दुर्दशा कर डाली? कह, किस मूर्ख को अपने प्राण भारी हैं? देवताओं का स्वामी देवराट् इन्द्र जिस रक्षेन्द्र रावण का बन्दी है, उसकी बहन के साथ यह धृष्ट अनाचार किसने कर डाला? देवों, गन्धर्वों और तपस्वियों में ऐसा कौन पराक्रमी आ गया, जिसने तेरी यह दुर्दशा कर दी? आज मेरे प्राणान्तक बाण उस अपराधी का प्राण हरण करेंगे। कह-कह, बहन, आज पृथ्वी किसका रुधिर पान करेगी? आज मेरे हाथ से उस अपराधी को देवता, गन्धर्व और राक्षस कोई नहीं बचा सकता। हमारी ही इस भूमि में किसने तुझे पराभूत किया? होश में आ और उस पापिष्ठ का नाम मुझे बता।”
“समीचीन कहा खर ने।”
“तब मैंने रोते-कलपते उसे सब घटना आद्योपान्त बता दी। यह भी कह दिया कि मैं नहीं जानती कि वे मनुष्य हैं कि देव या गन्धर्व, परन्तु मेरी आकांक्षा है कि जिस पुरुष ने मेरी यह दुर्दशा की है मैं उसका हृदय-भक्षण करूंगी। सो वीर, तुम अभी मेरी यह इच्छा पूर्ण करो।
मेरी यह बात सुनकर खर ने अपने महाबली चौदह भटों को आदेश दिया कि जाओ, देखो, इस दण्डक वन में कृष्ण मृग-चर्म धारण किए शस्त्र-सज्जित दो पुरुष आए हैं, उनके साथ एक स्त्री भी है। तुम जाकर उन दोनों पुरुषों को मार डालो और उनका हृदय निकाल लाओ। हमारी बहन सूर्पनखा उसका भक्षण करेगी। उस स्त्री को जीता पकड़ लो, हम उसे रक्षराज को भेंट करेंगे।
सो भाई, चौदह राक्षस-भट शस्त्रसज्जित हो जब पंचवटी पहुंचे, तो शूल, कृपाण, शक्ति लेकर राम पर टूट पड़े, परन्तु उस मायावी पुरुष ने बात की बात में उन भटों को मार गिराया। यह सुनकर खर क्रुद्ध हो चौदह सहस्र राक्षसों की सम्पूर्ण सेना लेकर चला और स्त्री-सहित उन तीनों को घेर लिया। पर भाई, वे तो इस भयानक सैन्य से भी विचलित नहीं हुए। हे भाई, जब महावीर, खर अपने धनुष और बाणों का भार अपने देदीप्यमान रथ पर रख, उत्तम गधों को उसमें जोत, राक्षसवाहिनी को लेकर चला, तो दिशाओं में अंधकार छा गया। राक्षसों की गर्जना से वन-पर्वत कम्पायमान हो गए, धूल के बादलों ने सूर्य को छिपा लिया। परन्तु उस समय बड़े-बडे अपशकुन हुए। राक्षसों पर अमंगलसूचक रक्त-मिश्रित जल की वर्षा हुई। खर के रथ में जुते गधे दौड़ते-दौड़ते अकस्मात् गिर पड़े। रथ की स्वर्ण-ध्वजा पर एक गिद्ध आ बैठा। सेना के सामने मांसाहारी पशु, पक्षी अनेकविध डरावने शब्द करने लगे। प्राची दिशा में शृगाल रोने लगे, सूर्य-मण्डल के चारों ओर गोलाकार घेरा दिखाई पड़ने लगा। ऐसा प्रतीत होता था, मानो बिना अमावस्या के आज सूर्य को केतु ने ग्रस लिया है। परन्तु इन उत्पातों को देखकर भी खर डरा नहीं। उसने कहा—चाहे जो हो, मैं अपनी प्रिय बहन सूर्पनखा को इन शत्रुओं का हृत्पिण्ड अवश्य खाने को दूंगा। इस प्रकार खर-दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों ने राम का आश्रम घेर लिया। जब उन तपस्वियों ने राक्षसों के इस दल-बादल को आते देखा, तो उन्होंने रक्षा और युद्ध की तत्काल व्यवस्था कर ली। छोटा तपस्वी तो उस स्त्री को गिरि-गुहा में बैठाकर, गुहा-द्वार पर धनुष-संधान करके बैठ गया और बड़ा राक्षसों के सम्मुख आ धनुष टंकारने लगा। खर ने जब यह देखा तो उसने सारथि से कहा—हमारा रथ इस हतायु पुरुष के सम्मुख ले चल। जब उस पुरुष ने खर के रथ को अपनी ओर आते देखा, तो पैने बाण छोड़कर रथ के गधों को तुरन्त मार गिराया। अब तो खर दूसरे रथ पर चढ़कर बाणवर्षा करने लगा। राक्षसों की सैन्य ने भी उसे चारों ओर से घेरकर बाणों से पाट दिया, परन्तु वह तो अद्भुत कौशल और फुर्ती से चारों ओर घूम-घूमकर दिव्यास्त्रों से राक्षसों का हनन करने लगा। सेना के साथ मैंने स्वयं रहकर उसका यह चमत्कार देखा। अब मैं तुमसे क्या कहूं—भाई, राक्षसों के छोड़े हुए शस्त्र उस पुरुष में इस प्रकार लय हो जाते थे, जिस प्रकार नदियां समुद्र में लय हो जाते हैं। उसके शरीर से रक्त की धारा बह रही थी, परन्तु उसने कालपाश की भांति जिन बाणों की वर्षा की, वे सब अग्नि के समान ज्वलन्त थे। उनसे बिंध-बिंधकर राक्षस रक्त में लथ-पथ हो भूमि पर लोटते चले गए। इस प्रकार दो प्रहर के युद्ध में उस एकाकी पुरुष ने सब राक्षसों को काट डाला। बहुत-से राक्षस चिल्लाते हुए भाग खड़े हुए। बहुत-से पाश, पत्थर, गोफ, मुद्गर ले उस पर पिल पड़े। पर जब उस पुरुष ने तेजस्वी गन्धर्व-अस्त्र का प्रयोग किया, तो चारों ओर आग ही आग फैल गई। उस समय युद्ध-क्षेत्र में चारों ओर लोथें ही लोथें दीख रही थीं। खर का रथ भंग हो गया, ध्वजा टूट गई, गधे मर गए। तब खर-दूषण बचे हुए राक्षस-भटों को समेट, दल बांध, फिर युद्ध करने लगे। इस समय परिघ उठा, दूषण ने विकट पराक्रम दिखाया।
वह परिघ बड़ा विकराल था। उससे उसने अनेक शत्रुओं के नगरों के फाटक तोड़े थे। वह उस भयंकर लोहे की कीलों वाले परिघ को लेकर ज्यों ही झपटा, उस पुरुष ने दस बाण उसके मुख में मारे, जो उसके हलक को चीरकर ब्रह्माण्ड के पार हो गए। फिर फुर्ती से उसने उसके दोनों हाथ काट लिए तथा नेत्र भी फोड़ दिए। दूषण वहीं भूमि पर गिरकर छटपटाने लगा। इसके बाद महाकाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथी आदि महारथी भटों को लेकर खर आगे बढ़ा। किसी ने पट्टिश उठाया, किसी ने परशु, किसी ने गदा। खर ने धनुष लिया। पर उस तेजस्वी ने कर्णिक बाणों से सभी को बींध डाला। वे सभी भट झूम-झूमकर प्राण त्यागने लगे। इस प्रकार देखते-ही-देखते राक्षसों की सारी सेना कट गई। जो शेष बचे, वे भाग खड़े हुए। केवल दो ही वीर मुर्दों से पटे रण-क्षेत्र में रह गए—त्रिशिरा और खर। परन्तु इन दोनों वीरों को भी राम ने देखते-ही-देखते धराशायी कर दिया। उस पराक्रमी राजकुमार ने उनके हाथ-पैर काट डाले।
इस प्रकार जनस्थान राक्षसों से रहित हो गया। हमारा साम्राज्य भंग हो गया। भाई, युद्ध-क्षेत्र ही में घावों और रक्त से भरे हुए उस तपस्वी राजकुमार का शरभंग, अगस्त्य आदि तपस्वियों ने अभिनन्दन किया। मैं तो खीझ के मारे मर गई। मेरा जीवन धिक्कार के योग्य हो गया। तूने जब मेरे पति का वध किया था, उस असह्य दुःख को न सहकर मैंने चितारोहण करना चाहा था। उस समय तूने मुझे उस काम से रोक दिया था। परन्तु भाई, अब यदि तू मेरा प्रिय न करेगा, अंग-भंग करने वाले उस राज्य-भ्रष्ट राजकुमार को मारकर उसका हृत्खण्ड मुझे लाकर खाने को न देगा तो मैं अब अपने प्राण नहीं रखूंगी। अग्नि में जलकर मर जाऊंगी।
अरे भाई, तू तो लोक में त्रिविक्रम प्रसिद्ध है। तूने तीनों लोकों को जय किया है। अरे, यम और कुबेर को तूने आक्रान्त किया, इन्द्र को बन्दी बनाया, पृथ्वी पर तेरा साम्मुख्य करने वाला वीर कौन है? फिर इस दुष्ट तपस्वी वनवासी पुरुष ने मेरा अंग-भंग किया है। मैं तो उससे विवाह कर उसे प्रतिष्ठित करना चाह रही थी। मैं त्रिलोकीपति रावण, अजेय कुम्भकर्ण की बहन, इन्द्रजित् मेघनाद की बुआ, आज ऐसी विपन्नावस्था को पहुंच गई! अरे भाई, जब तक तू उस तपस्वी कुकर्मी को मार उसका हृत्खण्ड मुझे खाने को नहीं देता और उसकी उस मानुषी स्त्री का हरण कर उसे अपनी दासी नहीं बनाता, तक तक तेरा त्रिलोकीपति होने का दम्भ केवल विडम्बना है—और यह तो ध्रुव समझ कि राक्षसों का अब अन्त ही आ गया है। आज नहीं तो कल, राक्षसों का अब पराभव ही होगा।”
मन्त्रियों के समक्ष बहन सूर्पनखा के ऐसे मर्मान्तक वचन सुनकर रक्षेन्द्र रावण वज्र-गर्जना कर उठा। उसने कहा—“मैं अग्नि को भी भस्म कर सकता हूं। सूर्य के प्रकाश को भी बुझा सकता हूं। मृत्यु मेरे भय से कांपती है। सो मेरे रहते उस क्षुद्र मनुष्य ने तेरी ऐसी दुर्दशा कर डाली! महाबली खर, दूषण और त्रिशिरा सहित मेरे चौदह सहस्र राक्षसों को उसने अकेले ही मार डाला! यह तो उस चमत्कार से भी बढ़कर है, जो मैंने जनकपुर में देखा था। परन्तु मैंने तो उसे निपट बालक ही समझकर छोड़ दिया था। मैं ऐसा जानता तो वहीं सब नृपतियों के सम्मुख उसे मारकर वह स्त्री छीन लाता।” कुछ ठहरकर फिर रावण ने कहा—“सूर्पनखा, तू विषाद न कर, मैं अभी जनस्थान जाता हूं। उस पुरुष का हृत्खण्ड तुझे खाने को और गर्म रक्त पीने को दूंगा, चिन्ता न कर!”
इस पर अकम्पन ने बद्धांजलि होकर कहा—
“रक्षेेंद्र प्रसन्न हों। आज्ञा पाऊं तो निवेदन करूं। उस बहिष्कृत राजकुमार के साथ जो स्त्री है, वह विश्व की अनिन्द्य सुन्दरी है। अभी उसने यौवन की देहरी में पैर ही रखा है। उसके सब अंग-प्रत्यंग सुघड़ और सलोने हैं। वह संसार की सब स्त्रियों में अमूल्य रत्न है। हे महाराज, उस शीलवती की सुषमा का मैं कहां तक बखान करूं? सो मुझ दास का तो निवेदन है कि आप छल-बल से उस रमणीय रमणी को हरण कर लाइए। इससे बहन सूर्पनखा का बदला भी चुक जाएगा और वह हतभाग्य तपस्वी मानव-कुमार उसके वियोग में रो-रोकर आप ही मर-खप जाएगा।”
मन्त्री अकम्पन की यह युक्ति रावण को जंच गई। धनुर्यज्ञ में रावण ने सीता की जो लज्जाविनम्र कमनीय कान्ति देखी थी, वह उसके मन में बसी ही थी। उसने संतुष्ट होकर कहा—“ऐसा ही होगा। मेरा रथ तैयार करो। प्रभात होते ही मैं जनस्थान को जाऊंगा।”