अमरावती में
अमरावती में
उरपुर में श्वसुर तथा सास से सुपूजित होकर रावण अपनी चतुरंगिणी सेना ले अमरावती की ओर बढ़ा। अब तक रावण ने मेघनाद को युद्ध से विरत कर रखा था। उसने कहा था—“पुत्र, तू केवल देखता रह, युद्ध न कर। मैं देवराट् इन्द्र के साथ तेरा प्रथम युद्ध देखना चाहता हूं।” सो अब जब अमरावती के स्वर्ण-कलश रावण ने देखे, तो पुत्र मेघनाद को छाती से लगाकर उसने कहा—“पुत्र, यह अमरावती है, यहां हमारे राक्षस धर्म के परम विरोधी देव आदित्य रहते हैं। अब तेरा यह कार्य है कि इस देवराट् को रस्सियों से बांध ला। आज तू ही इस देवाभियान का नेतृत्व कर, पुत्र! हम सब तेरे अनुगत रहकर तेरी पृष्ठ-रक्षा करेंगे।”
पिता के वचन सुन मेघनाद ने रावण की परिक्रमा कर प्रणाम किया और कहा—“तात आप मेरा कौतुक देखें कि किस प्रकार देवराट् को बांधकर आपके चरणों में ला डालता हूं।”
इतना कहकर मेघनाद ने वर्म पहना, शस्त्र धारण किए और श्यामकर्ण सोलह घोड़ों के रथ में बैठे समूचे रक्षबल का वज्र-व्यूह रच, धौंसा बजाता हुआ अमरावती की ओर अग्रसर हुआ। राक्षसों की इस महती वीरवाहिनी को देखकर देवतागण घबरा गए। देवराट् ने अपने पुत्र जयन्त को मेघनाद से लोहा लेने को भेजा और पुर के सब राह-घाट पर अपने धनुर्धर देवों को सन्नद्ध किया।
दोनों ओर से रणवाद्य बजते ही दोनों सेनाएं भिड़ गईं। जयन्त के संरक्षण में देव-सैन्य ने मेघनाद पर भीषण प्रहार करने आरम्भ किए। मेघनाद ने अनायास ही जयन्त के सभी बाणों को काट डाला तथा एकबारगी ही बाणों के जाल से उसे ढांप दिया। यह एक अभूतपूर्व धनुर्युद्ध था, जिसमें एक ओर एकाकी मेघनाद—रुद्र-किंकर, विद्युत्-प्रवाह की भांति बाण-वर्षा कर रहा था, दूसरी ओर जयन्त देवराट्-सुत दिव्य रथ पर सवार, जिसमें स्वर्णाभरण पहने सोलह श्वेत अश्व जुते थे, अपना अमोघ लाघव दिखा रहा था। देखते-ही-देखते मेघनाद ने देव-सारथि मातलि को बाणों से छेद दिया। उत्तर में जयन्त ने मेघनाद के सारथि वीर चूड़ामणि सारण को अग्निबाणों से दग्ध कर दिया। इस पर अति आवेशित हो मेघनाद ने मायाचक्र रच युद्धभूमि में घोर अन्धकार फैला दिया और फिर चारों ओर से प्रास, मुशल, शतघ्नियों के प्रहार से देवकुल को आतंकित कर दिया। ऐसा अद्भुत और भयानक युद्ध देख देव हाहाकार कर भागने लगे। किसी को भी अपने-पराये का ज्ञान न रहा। युद्ध का सारा क्रम भंग हो गया।
अब मायावी मेघनाद जयन्त पर अन्तक के समान प्रहार करने लगा। जयन्त पर घोर विपत्ति आई देख, उसके नाना भीम-विक्रम दानवेन्द्र पुलोमा ने व्यूह में बलात् घुसकर रथ पर से जयन्त को उठा लिया और उसे कांख में दबा, जल-स्तम्भनी विद्या द्वारा समुद्र-जल में घुसा। जब देवों ने जयन्त के रथ को खाली तथा मातलि को मूर्च्छित देखा तो जयन्त को मरा समझ रणस्थली से भाग निकले।
इसी समय मातलि की मूर्च्छा भंग हुई और वह रथ दौड़ाकर व्याकुल भाव से देवराट् इन्द्र के पास पहुंचा। अपने पुत्र को रणक्षेत्र से इस प्रकार गायब सुन देवराट् इन्द्र वज्रहस्त हो स्वयं रथ में बैठ युद्धस्थली में पहुंचा। शत-सहस्र मेघों की गर्जना के समान ध्वनित उस रथ को हेम-पर्वत की भांति अबाध गति से आता देख राक्षस भय से चीखने-चिल्लाने लगे। अब रुद्र, वसु, आदित्य और मरुद्गण इन्द्र की रक्षा करते हुए उसे चारों ओर से घेरकर चले। यह देख रावण ने मेघनाद को युद्ध से विरत करके कहा—“तू तनिक विश्राम कर पुत्र, तब तक मैं इस ब्रह्मा देवराट् को देखूं।” कुम्भकर्ण रथ के आगे तथा शुक, सारण दायें-बायें और भीम-पराक्रम सुमाली दैत्य रावण की पृष्ठ-रक्षा पर सन्नद्ध हो चले। चारों ओर राक्षसों का कटक। क्षण-भर ही में घमासान मच गया। कुम्भकर्ण को अपना-पराया कुछ न सूझ पड़ता था। वह जिसको भी सामने पाता, अपने दांतों, भुजाओं और लातों से मसल डालता। शस्त्र ग्रहण करने का उसे विचार ही न आता था। वह देवों को बीच से चीर-चीरकर इधर-उधर फेंकने लगा। उसका यह बीभत्स कार्य देख देव ‘त्राहि माम्—त्राहि माम्’ करने और इधर-उधर भागने लगे। अब पराक्रमी मेघनाद रुद्रों से भिड़ गया। रुद्रों ने उसके चारों ओर से लिपटकर उसके अंग विदीर्ण कर डाले। उनमें से रक्त झरने लगा। उधर मरुद्गणों ने राक्षसों को मार-मारकर बिछा दिया। युद्ध-भूमि मरों और अधमरों से पट गई। अनेक राक्षस अपने वाहनों पर गिरकर मर गए। वहां रक्त की नदी बह चली। उसमें तैरती हुई लोथें जलचर-सी दिखाई देने लगीं। आकाश में चील, गिद्ध और कौए उड़ने लगे। बड़ा ही बीभत्स दृश्य उपस्थित हो गया। रावण ने जब यह दशा देखी तो वह अपना रथ बढ़ाकर इन्द्र को ललकारता तथा बाणों की वर्षा करता आगे बढ़ा। इन्द्र ने भी धनुष को टंकारकर शरसंधान किया। अब रावण और इन्द्र का ऐसा घनघोर युद्ध हुआ कि जैसा किसी ने न देखा, न सुना होगा।
इसी समय मेघनाद ने माया रची। रणक्षेत्र में अन्धकार छा गया। इन्द्र, रावण और मेघनाद को छोड़ समस्त वीर अन्धों के समान आचरण करने लगे।
अब रावण ने ललकारकर सारथि से कहा—“अरे, मेरा रथ मध्य युद्ध-भूमि में ले चल, आज मैं इस आर्यवीर्यान् की देव-भूमि से देवों का बीज नाश करूंगा। देवों का वध करने से मेरे कुल की कीर्ति बढ़ेगी। चल-चल—उदय पर्वत की ओर चल!”
रावण की इस आज्ञा को सुन सारथि रथ को युक्ति से वक्रगति से चलाकर देवों की सेना को चीरता हुआ उसके मध्य भाग में जा पहुंचा। इस प्रकार रावण को आते देख इन्द्र ने चिल्लाकर कहा—“इसे जीता पकड़ना चाहिए। जिस प्रकार हमने बलि को बांधकर त्रिलोकी का राज्य पाया है, उसी प्रकार इस दुष्ट वैश्रवण को भी बांध लो।” यह कहकर इन्द्र वहां से हट गया। आदित्य, रुद्र, वसु और मरुद्गणों ने अब रावण को चारों ओर से घेर लिया और बाणों से उसे ढांप दिया। इस पर सब राक्षस जोर-जोर से चिल्लाने लगे और कहने लगे—“हाय-हाय, रक्षेन्द्र को इन्द्र ने बन्दी बना लिया। अब कौन हमारी रक्षा करेगा?”
अब प्रहस्त, महोदर, मारीच, महापाश्र्व, महादंष्ट्र, यज्ञकोप, दूषण, खर, त्रिशिरा, दुर्मुख, अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक आदि रण-पण्डित महारथी राक्षस भट सुमाली को आगे कर दैव-सैन्य में धंस गए।
सुमाली ने यहां ऐसा समर किया कि देव-सेना की सारी व्यवस्था भंग हो गई। यह देख त्वष्टा और पूषा दो आदित्य सेना-सहित सुमाली पर टूट पड़े। इसी समय आठवें वसु सावित्र ने भी वसुओं को ले सुमाली को घेर लिया। अब चहुंमुखी युद्ध होने लगा और राक्षसों की सेना कट-कटकर गिरने लगी। सुमाली और सावित्र में अब घनघोर युद्ध होने लगा। दोनों ही वीर परम पराक्रमी थे। त्वष्टा और पूषा धकेलकर राक्षसों के प्रहस्त, महोदर आदि महारथियों को युद्ध में फंसाकर सुमाली से दूर ले गए। दो मुहूर्त के तुमुल संग्राम में वसु सावित्र ने सुमाली का रथ तोड़ दिया, घोड़ों को मार डाला। यह देख ज्यों ही सुमाली रथ से कूदा, त्यों ही सावित्र वसु ने उछलकर कालदण्ड के समान भयंकर गदा कई बार घुमाकर उसके मस्तक पर दे मारी। उसकी चोट से सुमाली का मस्तक चूर-चूर हो गया और सुमाली चुरमुर हो भूमि पर गिर गया। यह देख राक्षसों में हाहाकार मच गया। राक्षस रोते और बाल नोचते इधर-उधर भागने लगे।
सुमाली के वध से क्रुद्ध अग्नि के समान जलता हुआ मेघनाद रथ पर बैठ बिजली की भांति इन्द्र पर टूट पड़ा। छूटते ही उसने शक्ति का इन्द्र के वक्ष में प्रहार किया। साथ ही दस बाणों से सारथि मातलि और दस बाणों से उसके घोड़ों को बींध डाला। फिर उसने माया-विस्तार करके अन्धकार कर दिया। सब देव व्याकुल हो गए। तब मेघनाद निश्शंक इन्द्र के रथ पर चढ़ गया और उसे जकड़कर रस्सियों से बांध, पीठ पर उठा, गर्जना करता हुआ राक्षसों की सेना में लौट आया।
जब प्रकाश हुआ और देवों ने इन्द्र को रथ पर नहीं देखा, तो वे बड़े घबराए। न उन्हें मेघनाद ही दिखाई दिया, न इन्द्र। उन्होंने खीझकर रावण पर प्रचण्ड आक्रमण किया। आदित्यों और वसुओं ने उस पर अविरत प्रहार कर उसे जर्जर कर दिया। इसी समय अदृष्ट रह मेघनाद ने आकाशवाणी से पुकारा—“हे पिता, अब युद्ध का क्या प्रयोजन है, हम विजयी हो गए हैं। त्रिलोकी के स्वामी इन्द्र को हमने बंदी बना लिया है। अब इन क्षुद्र देवताओं को मारने से क्या लाभ है? चलिए, लंका को लौट चलिए और त्रिलोक का राज्य भोगिए।”
मेघनाद की यह सारगर्भित आकाशवाणी सुन रावण संप्रहर्षित हो गया। आकाशवाणी सुन देवता भी घबरा गए। इसी समय प्रहस्त ने शंख फूंककर संकेत किया और सारण वक्र गति से रथ को चलाकर रावण को युद्ध-भूमि से बाहर ले चला। रावण के रथ की ध्वजा देखते ही राक्षसों ने हर्ष-नाद किया। राक्षसों की सैन्य में विजय-दुन्दुभि बज उठी।
अपनी विजय से गर्वित रावण ने हर्षित हो इन्द्रजयी पुत्र को छाती से लगाकर कहा—“अरे पुत्र, तू आज से त्रैलोक्य में इन्द्रजित् के नाम से विख्यात हो! तूने आज इन्द्र को बन्दी बनाकर हमारे कुल ऐश्वर्य को बढ़ाया है। अब इन्द्र को लेकर अभी लंका को प्रस्थान कर। पीछे मैं भी आता हूं। ” इतना कह रावण ने उसी क्षण सुरक्षा के लिए बहुत-सी सैन्य दे, बन्दी इन्द्र के साथ इन्द्रजयी मेघनाद को लंका भेज दिया।