सायं श्वसुरमन्दिरम्

अपने यशस्वी जामाता रावण की अभ्यर्थना के लिए मय ने सब दैत्य-दानव और असुर सम्बन्धियों को बुलाकर विराट भोज का आयोजन किया। सम्पूर्ण दैत्यलोकों तथा पातालों से दैत्य-दानव आने लगे। उसके साथ अनेक दैत्य-पार्षद और सैनिक थे। सुभाय, तन्तुकक्ष, विकटाक्ष, प्रकम्पन, नमुचि, धूम्रकेतु, मायाकाम तथा अन्य सगे-सम्बन्धी दैत्य-दानव, राजा और भूमिपति एकत्रित हुए। सभा भरी। परस्पर यथायोग्य वन्दना कर सब बैठे। मय ने सबका यथायोग्य सम्मान किया। अब भोजन की पंक्ति बैठी तो दस योजन विस्तृत भूमि में भोज हुआ। विविधा प्रकार के भुने-तले मांस, समूचे मृग, शूकर, लाव, तीतर, बत्तख, हंस, चक्रवाक, कपोत, कुक्कुट आदि के स्वादिष्ट मांस के साथ सुवासित मदिरा का खूब पान हुआ। दानवेन्द्र मय ने नाना प्रकार के भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आदि षड्रस-युक्त दिव्य अन्न-भोजन प्रस्तुत किए। भोजन से निवृत्त हो दानव-दैत्य-रत्न सभा में जा बैठे, जहां अनेक दैत्य-बालाएं नृत्य कर रही थीं। सभी दैत्य-दानव वहां बैठे रत्न-मणि की प्यालियों में भर-भर मद्य पीने तथा दैत्य-बालाओं का नृत्य देखने लगे। नमुचि दानव की कन्या विलासिका का नृत्य देख सभी जन विभोर हो गए। विलासिका की कान्ति से दिशाएं प्रकाशित हो उठीं। अपनी दृष्टि से अमृत की वर्षा करती हुई वह दानव-बाला ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे चन्द्रमा की मूर्ति ही पृथ्वी पर अवतरित हुई हो। ललाट में तिलक, पैरों में नूपुर, मनोहर दृष्टि, नृत्य करने में वह मूर्त कला-सी हो उठी। उसके घुंघराले बाल, उज्ज्वल और सम दन्त-पंक्ति, उत्तम पीन स्तन उस नृत्य में विलास-वाहक हुए। उस दानवी के नृत्य को देख रावण कामविमोहित हो गया। थक जाने पर नृत्य बन्द कर वह दानव-बाला जब तिरछी नजर से उस जगज्जयी रावण को देखती हुई, पिता की आज्ञा से उसे ऋजु प्रणाम निवेदन कर चली गई, तब रावण भी मन्त्रियों सहित उठकर अपने शयन-मन्दिर में आया। विलासिका की याद कर वह लम्बी-लम्बी सांसें खींचने लगा। अर्धरात्रि व्यतीत होने पर विलासिका अपनी दो सखियों-सहित वहां आई और रावण के शयन-कक्ष में जाने लगी। तब पहरे पर जागते हुए मन्त्री प्रहस्त ने कहा—“हे राजपुत्री, तनिक ठहर। मैं तेरे आगमन की सूचना रक्षेन्द्र को दे दूं।”

दानव राजकन्या ने कहा—“भद्र, तू मुझे भीतर जाने से किसलिए रोकता है?” “महाभागे, सोते हुए पुरुष के पास सहसा नहीं जाना चाहिए। फिर हमारा स्वामी व्रती है।” “अच्छा तो भद्र, तू उसे सूचित कर।”

रावण ने विलासिका का आना सुना तो वह बाहर आकर उसकी अभ्यर्थना करता हुआ बोला—“सुन्दरी, तूने अपने आगमन से इस अभ्यागत को कृतार्थ किया है। अब आसन ग्रहण कर इस स्थान को भी कृतार्थ कर!”

राजपुत्री सखियों-सहित बैठ गई। तब रावण ने कहा—“हे चपलनेत्र, यद्यपि तेरे दर्शन-मात्र से ही मेरे नेत्र सफल हो गए, पर सभा में नृत्य करते समय तूने सभी के समान मुझे भी समझ मेरा अपमान ही किया।” बाला ने मन्द मुस्काकर और अपनी भारी-भारी पलकें उठाकर कहा—“यह अपराध तो उसका है जिसने सभा में मेरा नृत्य बिगाड़कर मुझे लज्जित किया।”

इस पर हंसकर रावण ने विलासिका का हाथ पकड़ लिया। इसी समय कुंजरकुमार दैत्य की पुत्री प्रहृष्टरोमा भी वहां आ पहुंची। वहां विलासिका को देख वह ईर्ष्या से जलकर बोली—“हे सखी, कुशल तो है, आज इस समय रात्रि में तू यहां कैसे आई?” विलासिका ने कहा—“यह तो मेरे ही पितृव्य का घर है। रक्षेन्द्र मेरा अतिथि है। इसी तरह तुम भी मेरी अतिथि हो। मैं तुम्हारा भी सत्कार करती हूं।” “यह तो बहुत अच्छी बात है। मैंने सुना था, यहां जो भी आता है उसका तुम इसी भांति सत्कार करती हो।” विलासिका ने रुष्ट होकर कहा—“परन्तु मैं तुम्हारे समान, बिना बन्धुओं की आज्ञा के अकेली पराये स्थान में नहीं जाती।”

यह उत्तर सुन क्रुद्ध हो, कुछ भी जवाब दिए बिना, प्रहृष्टरोमा चली गई और खिन्नमन विलासिका भी सखियों समेत उठकर चल दी। विवश रावण भी विमन हो रात-भर करवटें बदलता रहा।

दूसरे दिन नमुचि दानव ने आकर मय से कहा—“मैं आज रक्षेन्द्र का अपने घर आतिथ्य करके अपनी कन्या विलासिका उसे दूंगा।” सबके सहमत होने पर उसने वेदी रच अग्नि-स्थापना की और अपनी कन्या अनेक रत्नों-सहित रावण को दे दी। दूसरे दिन कुंजरकुमार दैत्य ने आकर कहा—“आज आप सब लोग मेरे स्थान पर आइए, वहां मैं रक्षेन्द्र रावण का सत्कार करूंगा तथा अपनी पुत्री प्रहृष्टरोमा उसे दूंगा।” फलत: सभी दैत्य-दानवों ने वहां जा रक्षेन्द्र के साथ उसका आतिथ्य ग्रहण किया और उसने सबका विधिवत् सत्कार कर अपनी कन्या रावण को दे दी। तीसरे दिन दुरारोह ने अपनी त्रैलोक्यसुन्दरी कन्या कुमुदवती उसे दे दी। चौथे दिन तन्तुकच्छ ने निमन्त्रण दे तप्त कांचन की प्रभावाली कन्या प्रभावती उसे दी। पांचवें दिन मदनकेतु दैत्य ने पान-गोष्ठी रच दूर्वा के समान कान्तिवाली श्यामलांगी, मदनशर के समान अपनी सुभद्रा कन्या उसे दी। छठे दिन सुबाहु ने अपनी नवीन पल्लवों के समान कोमल अंगवाली माधुरी कन्या और सातवें दिन सुभाय ने कुसुम-कोमल सुमाया कन्या दी। आठवें दिन भद्रजंघ दानव ने आकर निवेदन किया—“हे रक्षेन्द्र, आज तुम्हारे आतिथ्य की मेरी बारी है। मैंने सुरपुर से बारह दिव्य देवांगनाओं का हरण किया था। वे सब रूप-किशोरी एक से एक बढ़कर हैं। उनमें अमृतप्रभा तथा केशिनी नाम की दो ऋषि-कन्याएं हैं। कालिन्दी, भद्रिका और दर्पकमला, देवलमुनि की कन्याएं हैं। सौदामिनी और उज्ज्वला हाहा गन्धर्व की पुत्रियां हैं। पीवरा हूहू गन्धर्व की बेटी है। अंजनिका काल दैत्य की पुत्री है, केशरावती पिंगल मरुत् की पुत्री है। ये बारहों दिव्यांगनाएं मेरी दुलारी पुत्री अनंगभद्रा की सखियां हैं। अब सब दैत्य-दानवों की पान-गोष्ठी में मैं ये तेरह कन्यारत्न तुम्हें दूंगा।” सब दैत्य-दानवों ने यह प्रस्ताव प्रसन्नता से स्वीकार किया। दानव भद्रजंघ ने बहुत-से दहेज के साथ तेरहों कन्याएं रक्षेन्द्र को दे दीं।

जिस समय उरपुर में इस प्रकार रावण के नित-नये ब्याह रचाए जा रहे थे और एक से बढ़कर एक नवोढ़ा बालाएं उसे भेंट दी जा रही थीं, तभी सम्पूर्ण दैत्यलोक, देवलोक तथा मृत्युलोक के उन राजाओं और सरदारों ने, जिनकी कन्याओं का रावण ने हरण किया था, उरपुर के समाचार जान तथा रावण का परिचय पा सन्देश पर सन्देश भेजने आरम्भ कर दिए। गन्धर्व नागभट ने अपनी कन्या मदनसेना, अपरान्त के स्वामी सुभट ने अपनी कन्या चन्द्रावती, कांची के मरुत् राजा कुम्भीरक ने अपनी कन्या वरुणसेना, लावाणक के राजा ने अपनी लावण्यवती कन्या विद्युन्माला और श्रीकण्ठ के राजा ने अपनी कान्तिमती कन्या के लिए भारी-भारी दहेज भेज रावण को अपना दामाद स्वीकार कर लिया। पृथ्वीजयी रक्षेन्द्र रावण को अपनी-अपनी कन्या देने की मानो समूचे दैत्यलोक और देवलोक में होड़-सी मच गई।

उस काल में कन्याओं का राजनीतिक मूल्य भी खूब था। आजकल की भांति कदाचित् उन दिनों विदेशों के राज-दरबारों में राजदूत नहीं रखे जाते थे। तब विजयी नरपति को कन्या देना ही लाभदायक होता था। वह कन्या पिता के शत्रु-हर्म्य में जाकर उसके हृदय तक का भेद जान लेती थी तथा सदैव अपने पिता पर पति को सदय रखती थी। वह युग ऐसा ही था।

उरपुर के क्रीड़ा-उद्यानों में नित-नई नववधुओं का प्रसाद पा रावण निर्द्वन्द्व कुछ दिन अपनी मधु-यामिनियां मनाता रहा। जब वह वहां से चला तो मय दानव ने अपने दामाद को एक सहस्र कुमारिकाएं, एक सहस्र हाथी, दस सहस्र अश्व, एक सहस्र स्वर्णजटित रथ तथा स्वर्ण, रत्न, वस्त्र, कर्पूर, अगर, कुंकुम आदि से भरे पांच हजार ऊंट दहेज में दिए तथा सब राक्षसों का विधिवत् सत्कार कर बहुत-सा स्वर्ण-रत्न दे उन्हें विदा किया।