आर्यावर्त में प्रवेश
क्षिप्र गति से रावण की राक्षस सैन्य ने आर्यावर्त में प्रवेश किया और वह नैमिषारण्य में जा पहुंची। पाठक जानते हैं कि नैमिषारण्य में रावण का एक सैनिक-सन्निवेश स्थापित था जिसकी रक्षार्थ ताड़का राक्षसी तथा उसके दो पुत्र सुबाहु और मारीच बहुत-सी राक्षस-सैन्य सहित वहां रहते थे। उसे आशा थी कि नैमिषारण्य में उसका ताड़का और उसके पुत्रों द्वारा अच्छा सत्कार होगा। परन्तु यहां आने पर जब उसने अपने सन्निवेश को उजड़ा हुआ और नष्ट-भ्रष्ट देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने मन्त्रियों से कहा— “यह तो बड़ी अद्भुत बात है, भला मेरे सेनापति मारीच, सुबाहु और सब राक्षस-सेना कहां गई? ताड़का तो बड़ी विकट स्त्री थी, किसने उसका पराभव किया?”
मन्त्रियों ने दूतों के द्वारा बड़ी खोज के बाद मारीच को किसी गिरि-कन्दरा से खोज निकाला, जहां वह प्राण-भय से छिपा बैठा था। वह बहुत दुर्बल, बूढ़ा-सा हो रहा था तथा घावों से उसका शरीर भरा था। वह बहुत दुःखी और निराश था। रावण ने उसे बहुत-बहुत तसल्ली दी और उससे इस दुर्दशा का कारण पूछा। मारीच ने कहा— “हे स्वामी, अपनी विपत्ति कैसे कहूं। बस, संक्षेप में यही सुन लीजिए कि राक्षसों में केवल मैं ही अकेला जीवित बचा हूं। अन्य सब तो काल-कवलित हुए।”
“किन्तु यह विपत्ति राक्षसों पर आई कैसे?”
“कोई राम-लक्ष्मण नामक दो मानव-कुमार हैं। उन्हीं ने हम सब राक्षसों को मार गिराया।”
“कौन हैं वे मानव-कुमार?”
“सुना है, कोसलराज्य के राजकुमार हैं।”
“यहां नैमिषारण्य में क्या उनकी भूमि है?”
“नहीं, विश्वामित्र उन्हें अपनी सहायता के लिए ले आए थे।”
“वही ऋचीक के पुत्र?”
“पुत्र नहीं, साले—पर वेद उन्होंने ऋचीक ही से पढ़ा है।”
“मैंने सुना है। पर वे तो मानवों के मित्र नहीं। मानवों के मित्र तो मुनि वशिष्ठ हैं।”
“वशिष्ठ और विश्वामित्र बहुत लड़े हैं। जीवन में प्रतिस्पर्द्धी रहे हैं। पर इस बार वे वशिष्ठ की सहमति ही से इन मानव-कुमारों को ले आए थे।”
“किसके पुत्र हैं वे?”
“अयोध्यापति दशरथ के।”
“ओह, शम्बर के युद्ध में दशरथ के पराक्रम की बात मैंने सुनी थी। परन्तु वे बालक मानव क्या बहुत सेना अयोध्या से लाए थे?”
“नहीं एकाकी ही थे। विश्वामित्र उनके साथ थे।”
“विश्वामित्र बड़े धनुर्धर हैं। वे ऋचीक के शिष्य हैं। ऋचीक की गरिमा मैं जानता हूं, परन्तु विश्वामित्र और इन बालकों ने क्या समूची राक्षस-सेना का विध्वंस कर दिया।”
“ऐसा ही लज्जाजनक कांड हो गया, रक्षपति?”
“विश्वामित्र क्या यहीं कहीं रहते हैं?”
“निकट ही काम्यवन में उनका आश्रम है। हमने उन्हें टिकने नहीं दिया। निरन्तर हमने उन पर आक्रमण किए। उनकी यज्ञ-विधि भंग की। बलात् मद्य और बलि-पशुओं की आहुति उनके यज्ञ-कुण्डों में दी।”
“विश्वामित्र ने विरोध नहीं किया, शस्त्र ग्रहण नहीं किया।”
“नहीं, वे शस्त्र ग्रहण नहीं करते। दक्षिण कोसल के पराभव के बाद जब से उन्होंने ऋषिपद ग्रहण किया, तभी से वे शस्त्र ग्रहण नहीं करते हैं।”
“इसी से वे इन मानव-कुमारों को ले आए।”
“इसी से।”
“क्या नाम बताया, उनका?”
“राम, लक्ष्मण।”
“इतना शौर्य है उन बालकों में?”
“उन्होंने बात की बात में एक ही बाण से माता ताड़का को सौ धनुष दूर फेंक दिया और वह रक्त-वमन करके मर गई। इस पर जब मैंने और सुबाहु ने राक्षसों की सेना लेकर उन पर आक्रमण किया तो उन्होंने बड़े ही हस्त-लाघव से सारे राक्षसों को काट डाला। सुबाहु भी उसी युद्ध में खेत रहा। मेरे ये अधम प्राण किसी भांति बच रहे। सो मैं असहाय पर्वत-कन्दराओं में वन्य पशु की भांति छिपकर दिन काटता रहा और आपके आगमन की राह ताकता रहा।”
“अद्भुत है, अकल्पित है, श्लाघनीय है! अभिनन्दन करता हूं उन मानव-बालकों का? अब कहां हैं वे किशोर?”
“मिथिला के सीरध्वज ने जनकपुर में अपनी पुत्री का स्वयंवर रचा है। विश्वामित्र के साथ दोनों कुमार वहीं गए हैं। ”
“यह सीरध्वज क्या कोई बड़ा आर्य है?”
“मानवों ही के वंश में हैं।”
“और उसकी वह पुत्री?”
“त्रैलोक्यसुन्दरी है, सीता उसका नाम है। सीरध्वज ने कृषि-यज्ञ द्वारा उसे प्राप्त किया था।”
“तेरे वचनों से मेरी अभिलाषा उन दोनों मानव-बालकों तथा उस त्रैलोक्य-सुन्दरी सीता को भी देखने को उग्र हो उठी है।”
“आकर्षण का एक विषय भी है।”
“वह क्या?”
“वहां एक पिनाक धनुष है। सीरध्वज का प्रण है कि जो कोई उसे चढ़ाकर बाणसंयुक्त कर सकेगा, उसी को वह त्रैलोक्यसुन्दरी पुत्री देगा।”
“वहां क्या बहुत राजा आए हैं?”
“आर्यावर्त और भरतखण्ड के प्रायः सभी राजा गए हैं। पिनाकपाणि के विशेष अनुरोध से दैत्येन्द्र बाण महाकाल भी आया है, ऐसा सुना है।”
“बाण आया है?”
“ऐसा ही सुना है।”
“ठीक है, अच्छा संयोग है। मैं भी जाता हूं।”
“क्या सैन्य-सहित?”
“नहीं, एकाकी। एक बार उस पिनाक धनुष को देखूंगा। उन मानव-बालकों को भी और उस त्रैलोक्यसुन्दरी को भी। परन्तु मैं छद्मवेश में जाऊंगा।”
“क्या यह चिन्त्य नहीं है?”
“मेरे इस परशु के रहते?”
“मेरा कहना है, सुरक्षा के लिए कुछ भट अवश्य साथ लेने चाहिए।”
“नहीं, किन्तु राह कितने योजन है?”
“ग्यारह योजन सुना है, परन्तु देखा नहीं है। यहां से तीन योजन पर शोण नदी पार करके जाना पड़ता है।”
“राह में कुछ राज्य-सीमाएं भी हैं?”
“नहीं, कोसल राज्य से विदेह राज्य मिला हुआ है।”
“ठीक है, तो तू मारीच मातुल, शीघ्र आरोग्य-लाभ कर और अपने बिखरे हुए बल को एकत्र कर, फिर राक्षस-सैन्य को साथ ले गन्धमादन पर पहुंच, जहां मेरा वीर पुत्र मेघनाद और मातामह सुमाली तथा भाई कुम्भकर्ण कुबेर की अलका को आक्रान्त करने छद्मवेश में पहुंच चुके हैं। सब ज्ञातव्य बातों को जान और देवाधिदेव रुद्र से परामर्श कर अलका को आक्रान्त करने को तैयार रह। तब तक मैं आता हूं।”
उसने अपने मन्त्रियों और सेनापतियों को भी आवश्यक आदेश दिए और कुछ सेना वहां नैमिषारण्य में रख, शेष को आगे बढ़ने का आदेश दे, उसने जनकपुरी की ओर एकाकी ही कन्धे पर परशु रखकर प्रस्थान किया।