रावण की मुक्ति
दुर्जय परंतप रावण को बांधकर बन्दी बनाने से चक्रवर्ती हैहय कार्तवीर्य अर्जुन का यश दिग्दिगन्त में फैल गया। आर्यावर्त और भरतखण्ड-भर में उसका आतंक छा गया। राक्षसों के सेनापति और मन्त्री प्रहस्त, शुक्र, सारण, महोदर, धूम्राक्ष आदि भारी बहुमूल्य उपानय साथ ले चक्रवर्ती की सेवा में उपस्थित हुए। उपानय सम्मुख धर उन्होंने कहा— "हे तेजस्वी हैहय, आपकी जय हो। आपने महापराक्रमी रक्ष-राज रावण को जय करके अपना सुयश पृथ्वी पर विस्तीर्ण कर दिया। आपका पराक्रम अतुलित है और आप पृथ्वी के सब वीरों में श्रेष्ठ हैं। जिस रावण के भय से समुद्र और वायु भी स्तम्भित हो जाते हैं, सूर्य भी तेजहीन हो जाता है, उसी दुर्जय रक्षपति रावण को आपने युद्ध में जय कर बन्दी बना लिया। किन्तु हे यशस्वी महाराज, अब आप उसे छोड़ दीजिए। आपका यह कार्य बन्दी बनाने से भी अधिक यशस्वी होगा। यह धन-रत्न-राशि उपानय की भांति तथा दण्डस्वरूप हम आपकी भेंट में उपस्थित कर रहे हैं।"
राक्षस-मन्त्रियों के ये वचन सुन, प्रसन्न हो चक्रवर्ती ने हंसकर रावण को तुरन्त सभा-भवन में ले आने की आज्ञा दी। सभा में आने पर उसने उठकर स्वयं उसे बन्धनमुक्त किया, उसे दिव्यालंकार धारण कराए, और अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क देकर कहा— "हे राक्षसराज, मैंने तो तेरा पहले भी माहिष्मती में मित्र की भांति स्वागत करना चाहा था, परन्तु तूने सन्धि नहीं, विग्रह मांगा, मैत्री नहीं, युद्ध-याचना की। सो मुझे समरांगण में तेरा शस्त्र से सत्कार करना पड़ा। पर इससे मैंने तेरा समर-कौशल और तेरी अजेय शक्ति देख ली। मैं तेरे शौर्य से सन्तुष्ट हूं। सो, हे प्रतापी पौलस्त्य, यदि तेरी इच्छा हो तो हम-तुम दोनों आज से अग्नि की साक्षी में समान मित्र होने की शपथ ले लें।"
रावण ने दोनों हाथ फैलाकर कहा— "चक्रवर्ती ने तो मुझे युद्ध-भिक्षा देकर पहले ही यथेष्ट गौरव प्रदान कर दिया था। अब मैत्री से सम्पन्न करके मुझे कृतकृत्य कर दिया। अग्न्याधान कर चक्रवर्ती! आज से हम जीवन में, मरण में, सुख में, दुःख में एक हैं।"
चक्रवर्ती हैहय ने तुरन्त अग्नि की साक्षी में मैत्री-स्थापना की और रावण को हृदय से लगाकर कहा— "हे पौलस्त्य, तू ऋषिकुमार तथा वेदों का उद्गाता है। संस्कृति का संस्थापक है। राक्षसों का स्वामी और सप्त द्वीपों का अधिपति है। तूने मुझसे अपनी रक्ष-संस्कृति की बात कही थी। उस समय तू परशु-हस्त था। इससे शस्त्र ने शास्त्र नहीं सुनने दिया। अब तू स्नेहसिक्त है, हमारा अभिन्न मित्र है, अपनी संस्कृति का बखान कर। उसे सुनकर मैं प्रसन्न होऊंगा।"
रावण ने कहा— "चक्रवर्ती राजन्, यह मेरी लोकैषणा है। इसमें लोक हित निहित है। सुन, इस समय पृथ्वी पर देव, दैत्य, दानव, असुर, आर्य, व्रात्य, नाग, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, रक्ष आदि अनेक नृवंश विस्तार पा रहे हैं जो सब परस्पर दायाद-बान्धव हैं, किन्तु परस्पर विग्रह करते हैं। बारह दारुण देवासुर-संग्राम हो चुके। ये संग्राम आर्थिक कम और सांस्कृतिक अधिक थे। आचारों की भिन्नता ही नृवंश की इस विग्रह-भावना का मूल कारण है। पृथ्वी तो बहुत विस्तृत है और नृवंश अभी अधिक विस्तार नहीं पा सका है। फिर भी युद्ध होते हैं। जो भूमि स्वच्छन्द है वहां लोग नहीं बसते, दूसरों की अधिकृत भूमि छीनना चाहते हैं। इसका मूल कारण आचारों की भिन्नता ही है। नृवंश के आचारों का मूल उद्गम वेद हैं। परन्तु आर्यों ने वशिष्ठ के नेतृत्व में वैदिक विधि-परम्परा कुछ दूसरी ही स्थापित की है। उधर नारद की बाम-परम्परा देवों और दैत्यों में भी प्रचलित है। भृगु पृथक् ही आथर्वणी परम्परा प्रचलित कर रहे हैं। फिर आर्यों को बड़ा गर्व है, वे तनिक विधि-भंग होने पर ही आर्यजनों का बहिष्कार कर देते हैं। देखो, ऐसे कितने बहिष्कृत आर्य, व्रात्य दक्षिणारण्य तथा आसपास के द्वीप-समूहों में बस गए हैं। अब यदि इन सबको सांस्कृतिक रीति से एक वेद के अधीन नहीं किया जाता है तो नृवंश अपने ही विग्रहों में विनष्ट हो जाएगा। इसलिए महाराज कार्तवीर्य सहस्रबाहु, मैंने यह रक्ष-संस्कृति स्थापित की है। 'वयं रक्षामः'— हमारा मूल-मन्त्र है और समूचे नृवंश को समान वैदिक संस्कृति में दीक्षित करना ही हमारा धर्म है। इसी से मैंने वेदों में समूचे नृवंश के आधारों का समावेश किया है और अब मैंने घमण्डी आर्यों और देवों को जय करने की भावना से लंका त्यागी है। मैं केवल यही चाहता हूं कि वैदिक धर्म में समूचे नृवंश का समन्वय रहे।"
"साधु! साधु! अच्छा है पौलस्त्य रावण, तेरा उद्देश्य स्तुत्य है। जहां तक आर्यों के गर्व भंजन का प्रश्न है, मैं तेरे साथ हूं। अनुमति देता हूं, तू मेरी प्रजा में अपने समन्वयमूलक धर्म का प्रचार कर। परन्तु मैं तेरे धर्म में दीक्षित नहीं हो सकता! हां, मेरी सहानुभूति तुझी से है। स्वस्ति रक्षःपते! स्वस्ति पौलस्त्य! जब कभी तू परशु रहित निरस्त्र माहिष्मती में आएगा, तभी तेरा स्वागत होगा। अब तू जा, अपना अभीष्ट सिद्ध कर और कह— मैं तेरा और क्या प्रिय करूं? तुझे छुट्टी है, मित्र माहिष्मती में जो वस्तु तुझे प्रिय है— स्वेच्छा से ले जा।"
"बस मित्र तेरी मित्रता से मैं सम्पन्न हुआ। तेरी जय हो चक्रवर्ती, पौलस्त्य रावण तेरे लिए जब माहिष्मती में आएगा तो इस परशु के साथ और जब अपने लिए आएगा तो निरस्त्र।"
इतना कहकर रावण उठा। चक्रवर्ती ने उठाकर उसे हृदय से लगाया और तब पौलस्त्य रावण माहिष्मती के राजपथ पर रत्न बिखेरता हुआ तथा वहां की कुल-वधूटियों में कौतूहल बढ़ाता हुआ अपनी सेना में लौट आया।