माहिष्मती का युद्ध

माहिष्मती का युद्ध

सब बातों पर भलीभांति विचार-परामर्श करके, लंका का सारा राज्य-भार विभीषण को सौंप, राक्षसों की चतुरंग चमू ले; महाबली और विचक्षण महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक्र, सारण और धूम्राक्ष इन छह: महामात्यों को साथ ले रावण ने लंका से दिकप्रस्थान किया। वह समुद्र-पार उतर धनुष्कोटि की राह भारत में घुसा। भारत के सम्पूर्ण समुद्र-तट को उसने सुरक्षित-सुव्यवस्थित किया। फिर भाई खर को उसका सचिव और दूषण को सेनापति बनाया। सब कालिकेयों सहित, जो राक्षस होने की शपथ ले चुके थे, चौदह सहस्र राक्षस भट दण्डकारण्य की रक्षा को नियत किए, दण्डकारण्य में ठौर-ठौर सूर्पनखा ने सैनिक-सन्निवेश स्थापित किए। वहां आर्यों का प्राबल्य न होने पाए, इस सम्बन्ध में उसे बहुत-से महत्त्वपूर्ण आदेश दे वह नदी, नगर, पर्वत, वन, उपवन पार करता हुआ माहिष्मती नगरी के निकट आ पहुंचा।

नर्मदा-तट पर उसने अपना सैनिक-सन्निवेश स्थापित कर, निर्द्वन्द्व जल-विहार और मृगया का आनन्द लाभ किया। दैवयोग से जहां रावण ने अपना सन्निवेश स्थापित किया था, वहीं दुर्मद हैहय अर्जुन चक्रवर्ती अपने अवरोध के साथ जल-विहार कर रहा था। उसके अवरोध में सहस्रों स्त्रियां थीं, जो देश-देशान्तरों से एकत्र की गई थीं। रावण को पता चल गया कि निकट ही चक्रवर्ती जल-विहार कर रहा है। उसने अपने मन्त्रियों से सम्मति ली कि इस अवसर पर क्या करना उचित है। मन्त्रियों ने कहा— "यह चक्रवर्ती माहिष्मती-नरेश अर्जुन महातेजस्वी है। इससे यह यहीं घेरकर बन्दी बना लिया जाए तो उत्तम है। इससे द्वन्द्व युद्ध किया जाए या इसे मार ही डाला जाए। इस समय यह अरक्षित है।" परन्तु रावण को यह मत न रुचा। उसने कहा— "यह तो मेरी प्रतिष्ठा के सर्वथा विरुद्ध बात होगी। फिर, हमें तो धर्म-विजय भी करनी है। यदि चक्रवर्ती हमारी रक्ष-संस्कृति स्वीकार कर लेता है, तो विग्रह का प्रयोजन क्या है? हम उसके मित्र हैं।" मन्त्रियों से बहुत आलाप-प्रलाप हुआ। अन्त में रावण ने कहा— "मैं ऋषि-कुमार हूं, वेदर्षि हूं। रक्ष-संस्कृति का संस्थापक महिदेव और दिकपति पौलस्त्य कुबेर का भाई हूं। यह अवसर अच्छा है, विग्रह के स्थान पर मैं चक्रवर्ती से सन्धि-वार्ता करना अधिक पसन्द करूंगा। चक्रवर्ती सम्पूर्ण मध्यदेश का स्वामी है, उसके रक्ष-धर्म स्वीकार करने पर सारा मध्यदेश, फिर आर्यावर्त भी राक्षस हो जाएंगे।"

उसने ऋषि-कुमार का वेश धारण किया। कमर में रक्त कौशेय पर व्याघ्र-चर्म बांधा, वक्ष पर स्वर्ण-वर्म धारण किया और कन्धे पर अपना परशु धर वह एकाकी ही वहां जा पहुंचा जहां चक्रवर्ती अपने अवरोध के साथ जल-विहार कर रहा था। नर्मदा-तीर पहुंचकर उसने चक्रवर्ती को सूचित किया कि मैं पौलस्त्य रावण, धनपति दिकपति कुबेर का अनुज, रक्ष-संस्कृति का संस्थापक हूं। चक्रवर्ती से मैत्री-लाभ चाहता हूं। चक्रवर्ती उस समय स्नानोत्तर यजन कर रहा था, उसने उसी समय रावण को सम्मुख बुलाकर उसका अभिनन्दन करते हुए कहा—

"स्वस्ति पौलस्त्य, माहिष्मती में तेरा स्वागत है मित्र, मैं तेरा क्या प्रिय करूं?"

"मेरी रक्ष-संस्कृति को स्वीकार करें।"

"किसलिए?"

"जिससे आर्य-अनार्य का भेद नष्ट हो, नृवंश एक सांस्कृतिक सूत्र में बंध जाए, वेद ही हमारा सांस्कृतिक केन्द्रबिन्दु हो।"

"सो तो अच्छा है। पर आर्यावर्त से तो मेरा ही विग्रह है, आर्य तो हमें ही बहिष्कृत समझते हैं।"

"पर मैं तो पृथ्वी पर धर्म-जय करने को निकला हूं।"

"यह तो कुछ युद्ध-घोषणा-सी है।"

"जो मेरी रक्ष-संस्कृति स्वीकार नहीं करता, उस पर मेरा यह परशु है।"

चक्रवर्ती ने हंसकर कहा— "तेरी बातों से तो तेरे परशु ही पर मेरा अधिक लोभ है। मैं तेरी तरह ऋषि-कुमार नहीं हूं, क्षत्र हूं।"

"तब तो मैं चक्रवर्ती का याजक भी हूं।"

"तो परशु को दूर फेंक, मैं अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क निवेदन करूं।"

"यह मेरा वेद है, इसे अंगीकार कर!"

"मैं तो अथर्वण का अनुगत हूं।"

"तब तो फिर परशु ही है। युद्धं देहि!"

"मैं तेरे आह्वान पर प्रसन्न हूं। परन्तु अभी तू मेरा अतिथि होकर माहिष्मती में विश्राम कर। फिर मैं तेरी अभिलाषा-पूर्ति करूंगा।"

रावण अपने शिविर में लौट आया।

दोनों ओर सैन्य की तैयारियां होने लगीं। राक्षसों की सेना दुर्जेय थी तथा रावण का तेज असह्य था, परन्तु चक्रवर्ती कार्तवीर्य भी अप्रतिहत था। उसकी सेना में तुण्डिकेरा, शर्यात, हैहय और अवन्तिपति वीतिहव्य की चतुरंगिणी चमू थी। चक्रवर्ती का सेनापति रुरु एक विलक्षण और साहसी सेनानी था। नर्मदा-तट पर यह प्रागैतिहासिक युद्ध हुआ। इस युद्ध में व्यक्ति-विशेष का महत्त्व था। चक्रवर्ती बाज की भांति राक्षसों पर टूट पड़ा। राक्षस बड़े विकट योद्धा थे, परन्तु चक्रवर्ती का भीम विक्रम असह्य था। चक्रवर्ती स्वयं अपनी भीमकाय गदा लेकर, सचमुच जैसे सहस्रबाहुओं से ही उसे घुमाता हुआ काल-रूप हो, राक्षस-सैन्य में घुस गया। उसके उस भीम प्रहार से त्रस्त हो राक्षस इधर-उधर भागने लगे। यह देख प्रहस्त अपना लौहमुद्गर ले उसके सामने आया। मुहूर्त-भर दोनों वीर उलझे रहे। अवसर पाकर प्रहस्त ने अपने मुद्गर का चक्रवर्ती के सिर पर प्रहार किया, पर चक्रवर्ती ने उछलकर उसके प्रहार को निष्फल करके अपनी गदा का करारा वार किया। गदा की चोट से घूमकर प्रहस्त मूर्च्छित हो भूमि पर गिरा। यह देख शुक्र, सारण, महोदर और धूम्राक्ष महासेनानियों ने चक्रवर्ती को चारों ओर से घेरकर उस पर सैकड़ों बाणों की वर्षा की। परन्तु चक्रवर्ती ने उनकी तनिक भी आन न मान अकेले ही बाणों की वर्षा कर इन सब राक्षस महासेनानियों को बींध डाला। चक्रवर्ती के दुर्धर्ष तेज से घबराकर सब राक्षस सेनानायक भाग चले। यह देख रावण स्वयं ललकारकर अपना परशु घुमाता हुआ आगे बढ़ा। इन दोनों वीरों का डेढ़ प्रहर विकट युद्ध हुआ, जिसे देखने को दोनों ओर की सेनाएं हाथ रोक खड़ी हो गईं। दोनों एक-दूसरे को पराजित करने की इच्छा से एक-दूसरे पर चोट कर रहे थे। रावण के हाथ में विकराल परशु था और चक्रवर्ती के हाथ में विकट गदा थी। चक्रवर्ती ने उछल-उछलकर रावण के वक्ष में गदा की चोट की। उधर रावण अपने परशु के करारे वार करता रहा। बहुधा दोनों वीरों के शस्त्र परस्पर टकरा जाते, उनमें वज्र-गर्जन होता, अग्नि-स्फुलिंग निकलते। इसी प्रकार युद्ध करते-करते डेढ़ प्रहर काल बीत गया। दोनों वीर लहू और पसीने से तर हो गए। अब अकस्मात् चक्रवर्ती ने अपनी गदा घुमाकर दूर से रावण के वक्ष पर फेंक मारी। रावण ने भी परशु पर उसे झेल लिया। दोनों वीरों के अस्त्र टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गए। फिर भी रावण उस प्रहार से तिलमिलाकर एक धनुष पीछे हट गया। वह दर्द से कराह उठा। पर तुरन्त ही उछलकर उसने चक्रवर्ती के वक्ष में मुष्टि-प्रहार किया। उस वज्र-मुष्टि का प्रहार खाकर चक्रवर्ती मुंह से खून वमन करने लगा। फिर क्रोध से अधीर होकर उसने रावण की कमर पकड़ उसे अधर हवा में उठाकर भूमि पर पछाड़ दिया। रावण मूर्च्छित हो गया। चक्रवर्ती ने उसे कांख में दाब अपना मुंह मोड़ा।

यह देख राक्षस-दल में हाहाकार मच गया। सब राक्षस गुल्मपति, नायक, सेनापति, सुभट अपने-अपने अस्त्र ले 'मारो-मारो' कहते चक्रवर्ती के पीछे दौड़े। परन्तु इसी समय रुद्र, शर्यात और अवन्तिराज की विकट चतुरंग चमू ने शक्ति, शूल, खड्ग, धनुष ले चारों ओर से राक्षसों को घेरकर मार करनी शुरू कर दी। राक्षस भाग खड़े हुए और चक्रवर्ती ने रावण को रस्सी से बांध अपने रथ पर डाल लिया तथा विजय-दुन्दुभि बजाता हुआ माहिष्मती में घुसा, जहां पौर वधुओं ने उस पर लाजा-वर्षा की तथा ऋषिजनों ने पुष्प बरसाए। चक्रवर्ती ने रावण को बांधकर कारागार में डाल दिया।