हैहय कार्तवीर्य सहस्रार्जुन
नहुष-पौत्र और ययाति-पुत्र यदु के दूसरे पुत्र सहस्रजित् की शाखा में पच्चीसवीं पीढ़ी में हैहय नाम का राजा हुआ। इसके वंश में तैंतीसवां राजा कृतवीर्य और चौंतीसवां राजा अर्जुन था, जिसे उसके बल-प्रताप के कारण सहस्रार्जुन के नाम से पुकारा गया। हैहयों का यह वंश बड़ा विक्रमशाली हुआ। वैवस्वत मनु के पुत्र शर्याति ने खम्भात की खाड़ी में एक आनर्त राज्य स्थापित किया था। शर्याति बड़े सम्राट् थे। इनका ऐन्द्राभिषेक हुआ था। पाठक यह भी जानते हैं कि इनकी पुत्री सुकन्या का विवाह भृगु-पुत्र एवं शुक्र के सौतेले भाई च्यवन से हुआ था। यद्यपि च्यवन दैत्य-याजकों के वंश में थे, परन्तु मानवों की कन्या से विवाह करके आर्य ऋषि हो गए थे, किन्तु रहते थे ससुराल में, राजसी ठाट-बाट से। वे योद्धा भी बड़े बांके थे। एक बार तो उन्होंने देवराट् इन्द्र से विकट युद्ध किया था। वह काल ही ऐसा था जब प्रत्येक को शस्त्र ग्रहण करना पड़ता था। ऋषि लोग भी तब सीधे-सादे तो नहीं होते थे। वे युद्ध में राजाओं के साथ-साथ भाग लेते थे।
कालान्तर में पुण्यजन असुरों ने शर्यातियों से अनार्त का राज्य छीन लिया और उनसे हैहयों ने वह राज्य छीन लिया। आनर्त-राज्य के स्वामी होकर हैहयों ने च्यवन के वंशज भार्गवों को अपना कुलगुरु मान लिया। च्यवन के वंशधरों में दधीचि, ऊर्व, ऋचीक, जमदग्नि और परशुराम उत्पन्न हुए। अतः हैहयवंश का भार्गवों के इस वंश से न केवल घनिष्ठ सम्बन्ध ही रहा, अपितु वे हैहयों के ही राज्य में बसे रहे। परन्तु राजपुरोहित और राजसम्बन्धी होने के कारण भार्गव खूब सम्पन्न जागीरदार की भांति रहते थे। हैहयों ने भी उन्हें खूब धन दिया था। पीछे हैहयों ने उनसे प्रजा की भांति कर ग्रहण करना चाहा। इस पर भार्गवों ने आपत्ति की। राज्य के दायाद और गुरु होने के नाते वे इस कर से अपने को बरी करना चाहते थे। परन्तु इस पर झगड़ा बढ़कर भारी विद्रोह का रूप धारण कर गया। अन्त में भार्गवों को माहिष्मती का राज्य छोड़कर सरस्वती-तीर पर बस जाना पड़ा जहां उनका सम्बन्ध कान्यकुब्जपति गाधि से हो गया और वे इससे फिर प्रतिष्ठित और सम्पन्न हो गए। और्व-पुत्र ऋचीक का पुत्र जमदग्नि और गाधि-पुत्र विश्वामित्र-मामा-भान्जे-सरस्वती-तट पर ऋचीक ऋषि के आश्रम में वेद पढ़ने लगे और शीघ्र ही दोनों विख्यात वेदर्षि हो गए। यह बात पाठक जानते ही हैं।
इस समय हैहयों का प्रताप मथुरा से नर्मदा-तट तक के प्रदेशों में फैल गया था और उधर काशी से खम्भात की खाड़ी तक उनका विस्तार था। अब कोई भी आर्य राजा अकेला हैहयों को पदाक्रान्त न कर सकता था। कार्तवीर्य अर्जुन समूचे मध्यभारत का स्वामी था। उसकी विपुल पोतवाहिनी और अजेय हय-दल थे।
जमदग्नि का विवाह इक्ष्वाकु वंश की राजकुमारी रेणु के साथ हुआ था और रेणु की सगी बहन सहस्रार्जुन को ब्याही थी। इस प्रकार जमदग्नि और सहस्रार्जुन रिश्ते में साढ़ू थे। परन्तु जमदग्नि हैहयों का पिछला वैर नहीं भूले। ऋचीक ने बाल्यकाल ही से उनमें हैहय-विरोधी भावना भर दी थी। वे हैहयों को अपना चिर शत्रु समझते थे। ऋचीक अप्रतिहत धनुर्धर थे। विश्वामित्र ने उन्हीं से धनुर्विद्या सीखी थी।
प्रागैतिहासिक काल में नर्मदा निःसीम नदी थी। उसी के उत्तरी तट पर अर्जुन की नई राजधानी माहिष्मती थी। इस नगरी को, माहिष्मत ने कर्कोटक नाग से छीनकर सम्पन्न बनाया था। बाद में उसने शकों, यवनों, कम्बोजों, पारदों और पल्लवों की सहायता से नर्मदा से मथुरा तक का समूचा प्रदेश जीत लिया था। नगरी के पास नर्मदा का विस्तार समुद्र के समान था। उसमें सदैव ही सुमेरु पाताल, क्षीर-सागर, त्रिपुरी और सप्त महासागरों के द्वीप-समूहों के यान लंगर डाले पड़े रहते थे। सहस्रार्जुन का नौ-बल अजेय था। वह लहरों का स्वामी प्रसिद्ध था। उन दिनों माहिष्मती समूचे आर्यावर्त, भरतखण्ड, इलावर्त और दैत्य-राज्यों के व्यापारियों से परिपूर्ण रहती थी। पण्यों में आर्य, अनार्य, असुर, व्रात्य, नाग आदि सभी जातियों के वणिक् क्रय-विक्रय करते रहते थे। मथुरा से नर्मदा-तट तक समूची पृथ्वी का स्वामी उस समय सहस्रार्जुन हैहय था।
हैहयों का जैसा राज्य-प्रताप था, वैसा ही भृगुओं का धर्म-प्रताप था। अनूप देश इन दोनों प्रतापी प्रतिद्वन्द्वियों का क्षेत्र था। यहां भृगुवंशी अधिक रहते थे। अनूप देश की सीमा पूर्व में चर्मण्वती, पश्चिम में समुद्र, दक्षिण में नर्मदा और उत्तर में आनर्त तक थी। भृगुवंशी यहां के हैहयों से भी पुराने निवासी थे। उनकी बहुत जमीन, जायदाद, जागीर और धन-सम्पत्ति यहां थी। इसी से जब भृगुओं से सहस्रार्जुन का विग्रह हुआ तो वह बहुत उग्र रूप धारण कर गया। सहस्रार्जुन गर्वीली प्रकृति का था। वह भृगुओं का दो पीढ़ी पुराना वैर भूला नहीं-जमदग्नि के साथ रिश्ते के सूत्र में बंधकर भी नहीं। परन्तु भृगुवंशी अब उससे दूर सरस्वती-तट पर रहते थे। यह विग्रह नाम ही को रह गया था कि एक घटना आ घटी। जमदग्नि ने अपनी स्त्री रेणु को चित्ररथ गन्धर्व के साथ व्यभिचार-रत पा उसका सिर अपने छोटे पुत्र परशुराम के हाथों कटवा लिया। इस पर क्रुद्ध होकर उसके साढ़ू सहस्रार्जुन ने अपनी स्त्री के अनुरोध से जमदग्नि के आश्रम को लूटकर उसे जला डाला।
मथुरा तक हैहयों की राज्य-सीमा थी। मथुरा से आर्यावर्त निकट ही था। मथुरा आर्यावर्त और भारतवर्ष की सीमा पर था। सहस्रार्जुन की इस कार्रवाई से आर्यावर्त में बहुत उत्तेजना फैल गई और जमदग्निपुत्र परशुराम सहस्रार्जुन से पिता के आश्रम जलाने का बदला लेने की सोचने लगे। पाठक जानते ही हैं कि किस प्रकार हैहयों से जामदग्नेय राम ने बदला ले उनके रक्त से समन्तक तीर्थ में पांच रक्त-कुण्ड भरे थे।