अश्मपुरी का युद्ध
59. अश्मपुरी का युद्ध
लंका-द्वीप के पूर्वी अंचल में कुछ अश्म-द्वीप-पुंज थे। ये द्वीप बहुत छोटे-छोटे थे और इनमें से अनेक में मनुष्यों की आबादी नहीं थी। कुछ द्वीप तो ऐसे थे, जिनका पता ही नाविकों को न था। पर कुछ, ऐसे भी थे, जहां जाते हुए अच्छे साहसी नाविक भी डरते थे। क्योंकि ये सभी द्वीप-पुंज चुम्बक पत्थर के द्वीप थे, इसी से ये सब अश्म-द्वीप-पुंज के नाम से प्रसिद्ध थे। बहुत कम नाविक वहां जाने का साहस कर पाते थे। द्वीपों के पास जाते ही नौकाओं के अंशफलक बिखर जाते थे। इन्हीं द्वीप-पुंजों में से एक में अश्मपुरी बसी थी। पहले यह पुरी राक्षसों ही की थी, परन्तु प्राचीन काल से उसमें दैत्य-दानव ही रहते थे। विद्युज्जिह्व जब कालिकेयों का नेता बना, तो उसने पुरी को कुछ समृद्ध बनाया। इस समय अश्मपुरी में बीस सहस्र कालिकेय बस रहे थे और इन सबका नेता विद्युज्जिह्व था। अश्मपुरी समुद्र के जिस अंचल में बसी थी, उसके आसपास का समुद्र बहुत गहरा था और वहां समुद्र में जल-दानव बहुत थे। उनके भय से भी बहुत कम नाविक वहां आने का साहस करते थे। यह जल-दानव बड़ा शक्तिशाली प्राणी था। इसकी आकृति विलक्षण और भयानक होती थी। इस जीव के आठ पैर उसके सिर पर होते थे। इन आठ विशाल पैरों के साथ दो रस्सीनुमा मूंछें भी होती थीं। इसकी आंखें बड़ी ही भयानक होती थीं। इन जल-दैत्यों के आठों पैर बड़े ही मजबूत और भयानक होते थे। वे इन्हीं से अपना शिकार पकड़ते थे। इनका आकार छः-सात गज का होता था। इस जल-दैत्य की सभी बातें निराली थीं। यह आगे को न चलकर पीछे की ओर चलता था। यह जन्तु उस काल में, जब जहाज, बिना यन्त्र के चलते थे, उनके लिए काल ही माना जाता था। यह जल-दानव अपने मजबूत पांवों से तरणी को जकड़ लेता था और बात-की-बात में उसका मस्तूल तोड़ डालता था। एक विचित्र बात यह थी कि उसके शरीर में से कस्तूरी के समान सुगन्ध निकलती थी। यह दैत्य अपनी लम्बी भुजाओं में कई-कई मनुष्यों को एकबारगी ही लपेट तथा तोते के समान विराट चोंच खोलकर उन सबको एकबारगी निगल जाता था।
दूसरी विशेषता इस द्वीप की, वन-मनुष्यों की थी। ये एक जाति के गुरिल्ले ही थे। इन वनमानुषों का आकार दो गज से भी अधिक होता था और इनका शरीर इतना सुगठित और मोटा-ताजा होता था कि देखने पर ये बिल्कुल भयानक दैत्य लगते थे। इनके अंग और जबड़े अत्यन्त मजबूत होते थे और छोटे-से-छोटे वनमानुष में दस आदमियों का बल होता था। इनका देह-भार साठ मन तक होता था। इनके सर्वांग पर बड़े-बड़े काले बाल उगे होते थे। सिर पर कुछ लालिमा लिए लाल बाल होते थे। उनका भरा हुआ मुंह, चपटी नाक और बेढंगी आंखें होती थीं। जब ये अपना मुंह खोलते थे, तो उनकी विकराल दाढ़ें स्पष्ट दीख पड़ती थीं। ये जीव दो-चार एकत्र होकर जब बस्ती की ओर आते तो कृषि चौपट कर डालते थे। यह पशु दस-दस की संख्या में पारिवारिक ढंग पर रहता था। वह बड़ा ही विकट, साहसी और अपनी रक्षा में समर्थ होता था। जब यह क्रोध करता था तो इस प्रकार गरजता था कि वन-पर्वत प्रतिध्वनित हो जाते थे।
विद्युज्जिह्व ने कौशलपूर्वक तरणी को अश्म-द्वीप के तट पर लगाया। वह प्रथम स्वयं उछलकर उतरा और फिर उसने दोनों हाथों में शूर्पणखा को उठाकर तट पर रख दिया। धीरे-धीरे दोनों ही द्वीप की ऊबड़-खाबड़ पथरीली राह पर बढ़ने लगे।
शूर्पणखा ने पूछा—“अब क्या हम सुरक्षित हैं?”
“मैं समझता हूं, अश्मपुरी में हम सुरक्षित हैं।”
“किन्तु रक्षेन्द्र से कह आई हूं कि अश्मपुरी में हम उसका स्वागत करेंगे।”
“सो तो ठीक ही कहा।”
“क्या हमारा बल इतना है?”
“बीस सहस्र कालिकेय मेरे अधीन हैं।”
“वह तो तूने पहले कभी नहीं कहा!”
“तो तूने रक्षेन्द्र को कैसे निमन्त्रण दे दिया?”
“केवल तुझी पर निर्भर होकर।”
“क्या मैं एकाकी दुर्जय रक्षेन्द्र से पार पा सकता हूं?”
“क्यों नहीं, तुझमें रक्षेन्द्र से अधिक शौर्य भी है, दर्प भी है।”
“यह तू मानती है?”
“मानती हूं।”
“अच्छा ही है, उसमें बीस सहस्र कालिकेयों को भी जोड़ दे जिसकी तू आज से स्वामिनी है।”
“पर मैं तो तेरी किंकरी हूं।”
“और मैं तेरा।”
“हमें कितना चलना होगा?”
“डेढ़ योजन।”
“चल फिर, सूरज का प्रखर तेज बढ़ रहा है।”
दोनों आगे बढ़ चले। अश्मपुरी की पौर पर कालिकेयों ने दम्पति का भव्य अभिनन्दन किया। नगर-भर में नृत्योत्सव हुआ। दीपावली हुई। रात्रि को मद्यभोज हुआ, जहां विद्युज्जिह्व ने शूर्पणखा-सहित स्वर्ण-सिंहासन पर बैठ सबकी अभ्यर्थना स्वीकार की।
अश्मनगर साफ-सुथरा और कलापूर्ण गवाक्षों से सम्पन्न था। कालिकेय सम्पन्न और श्रीमन्त न थे। कृषक और आखेटक-मात्र ही थे, फिर भी वे चतुर और सुरुचिपूर्ण थे। विद्युज्जिह्व से उन्हें प्रेम था। पितृहत्यारिणी माता का वध करने के कारण कालिकेयों ने उसका अभिनन्दन ही किया था।
लंका में विद्युज्जिह्व छद्मवेश में एक शिकारी के रूप में रहता था। उसने एक प्रकार से अपने वैभव और सामर्थ्य का ठीक-ठीक अनुमान शूर्पणखा को भी न दिया था। वह उसे एक विपद्ग्रस्त तरुण दानव-कुमार समझती थी। उसकी शालीनता और उसका साहसिक जीवन उसे बहुत पसन्द था। इसी से वह उस पर इतनी मोहित थी। उसकी विपन्नावस्था, पारिवारिक कलंक और स्वयं विद्युज्जिह्व के हाथों माता का वध होने पर भी वह उसे त्याग न सकी। इतने बड़े इस साम्राज्य के अधिपति की इकलौती प्यारी बहन, भाइयों और भाभी के परम अनुरोध को भी न मानकर एकाकी उसके साथ चल दी। परन्तु जब उसने यहां आकर अश्मपुर में उसकी सामर्थ्य और वैभव देखा, तो उसने जाना कि उसका पति एक छोटा-सा राजा ही नहीं है, वह अपने कुल का अधिपति और द्वीप का स्वामी है।
चलते समय रावण ने प्रिय बहन को कहा था कि संकटग्रस्त होने पर वह उसकी शरण आ सकती है, परन्तु उसने अपने घमण्ड और आत्मसम्मान के आवेश में रावण का दिया उपानय भी स्वीकार नहीं किया था। अतः अब भला वह कैसे उसकी शरणापन्न हो सकती थी! उसने उसका एक भी अनुरोध नहीं माना था, तो अब वह कैसे अनुरोध कर सकती थी!
परन्तु मधुयामिनी सम्पन्न हुई ही नहीं और संकट का काल आ पहुंचा। रावण के सोलह सौ युद्धपोतों ने अश्मद्वीप को घेर लिया। क्षुद्रा, मध्यमा, भीमा, चपला, पटला, मया, दीर्घा, पत्रपुटा, गर्भरा, मन्थरा, तरणी, प्लाविनी, धारिणी, वेगिनी, ऊर्ध्वा, अनूर्ध्वा, स्वर्णमुखी आदि अनेकविध जल-नौकाओं ने अश्मद्वीप का तट घेर लिया। उन पर से शूल-खड्ग-मुद्गर-धनुष-बाणधारी योद्धा राक्षस तीर पर उतरने लगे।
विद्युज्जिह्व सूचना पा तुरन्त ही युद्ध को सन्नद्ध हो गया। पाठक उस क्रीता दासी राक्षस-बालिका को न भूले होंगे, जो लंका में विद्युज्जिह्व के लिए जागरण किया करती थी। यहां वह शूर्पणखा की प्रिय सखी बन गई थी। अभी यद्यपि कुछ ही मुहूर्त का सम्मिलन था, पर दोनों ही प्रिय सखियां बन गई थीं। जब विद्युज्जिह्व युद्ध-सज्जा से सज्जित हो शूर्पणखा से मिलने आया तो उसने देखा कि शूर्पणखा और सरमा परस्पर एक-दूसरे को युद्ध-सज्जा से अलंकृत कर रही हैं। विद्युज्जिह्व ने हंसकर कहा—“प्रिये, यह क्या?”
उसी प्रकार हंसकर शूर्पणखा ने कहा—“रक्षेन्द्र के स्वागत की तैयारी तो मुझे ही करनी है। मैंने ही तो उसे अश्मपुरी में निमन्त्रण दिया है। मैं अपने भाई के प्रताप-स्वभाव से परिचित हूं, अतः उसका समुचित सत्कार तो मैं ही करूंगी।”
“तो प्रतिष्ठिते, तू सरमा के साथ पुर की रक्षा कर! कह, कितने योद्धा तुझे चाहिए?”
“एक भी नहीं, हमें पुरुष योद्धा न चाहिए। हम दानव-बालाएं ही अपने नगर की रक्षा कर लेंगी। हां, हमें शस्त्र चाहिए।”
“वे शस्त्रागार में यथेष्ट हैं। क्या मैं तेरी सहायता के लिए कुछ सेनापति और मन्त्री नियुक्त कर दूं?”
“नहीं, उन सबको तू ले जाकर रणस्थली में अपना शौर्य प्रकट कर, यहां हम सब यथेष्ट हैं। हमारे रहते नगर में राक्षस प्रविष्ट न हो सकेंगे।”
“तो प्रिये, कुल-पुरुष तेरी रक्षा करें। मैं चला।”
“समुद्र के दैत्य तेरी सहायता करें। जा, शत्रु-रक्त से ललाट-तिलक दे।”
समुद्र-तट के दक्षिण दिशा में विराट समतल मैदान था। वहीं रावण ने महासूची-व्यूह बनाकर अपनी सेना को अवस्थित किया था। व्यूह के प्रान्त-भाग से उसने सभी मामाओं को नियुक्त कर मध्य में कुम्भकर्ण को रखा तथा सेना के पृष्ठ भाग की रक्षा स्वयं अपने अधीन की। विद्युज्जिह्व ने अर्धचक्र-व्यूह रचा। मध्य में वह स्वयं रहा तथा प्रान्त में कुंजर और सनीथ कालिकेय सेना-नायकों को नियुक्त किया।
दोनों ओर से रण-वाद्य बजे तथा सेनाएं जय-जयकार का तुमुलनाद करतीं, शस्त्र चमकातीं परस्पर गुंथ गईं। देखते-ही-देखते बाणों से दिशाएं व्याप्त हो गईं। शीघ्र योद्धा कट-कटकर भूमि पर गिरने लगे। लोथों के ढेर लग गए। योद्धा परचार-परचार कर भटों से जूझने लगे। शस्त्रों की मारकाट, योद्धाओं की ललकार और घायलों के चीत्कार से दिशाएं व्याप्त हो गईं। मध्याह्न तक तुमुल युद्ध हुआ। धीरे-धीरे भटों के कट जाने पर अपनी-पराई सेना का भेद मालूम हुआ और लड़ते हुए प्रतिपक्षियों के नाम रावण अपने मन्त्रियों से पूछने लगा। इस समय कुम्भकर्ण ने विकट पराक्रम ठान रखा था। उसके सम्मुख कोई भट ठहर भी न सकता था। यह देखकर विद्युज्जिह्व आगे बढ़कर कुम्भकर्ण के सम्मुख आया। उसने खड्ग मस्तक पर लगाकर कुम्भकर्ण का अभिवादन किया और कहा—“हे राक्षसों के ज्येष्ठ, मेरा तुझसे एक अनुरोध है।”
“तो पहले अपना नाम कह, गोत्र बता और फिर प्रयोजन कह।”
विद्युज्जिह्व ने कहा—“रक्षपति, तेरी बहन का स्वामी विद्युज्जिह्व कालिकेय हूं।”
“तो क्या तू शरणागत है?”
“नहीं रक्षेन्द्र, मैं रक्ष-कुलपति के साथ द्वन्द्व युद्ध करने की प्रतिष्ठा चाहता हूं।”
“तो वीर, मैं भी प्रतिष्ठित सम्बन्धी हूं, तू मेरा भगिनीपति है, तू मुझसे से द्वन्द्व-युद्ध कर।”
“यह क्रम-भंग होगा। ऐसी कालिकेयों की रीति नहीं। यह सम्मान ज्येष्ठ को ही मिलता है। भाग्य से रक्ष-कुल का अपराधी भी मैं हूं, अपने कुल का ज्येष्ठ भी मैं हूं। इसी से मैं प्रथम राक्षसेन्द्र रावण से द्वन्द्व-युद्ध करूंगा। फिर उसके बाद तेरी अभ्यर्थना करूंगा।”
“मैं तुझ पर प्रसन्न हुआ। तेरी बात युक्तियुक्त, संगत और दोनों कुलों की मर्यादा के अनुकूल है। मैं रावण को तेरा अनुरोध निवेदन करता हूं।”
अनुरोध सुनकर रावण वहां आया। विद्युज्जिह्व ने शस्त्र भूमि पर रखकर निरस्त हो रावण का अभिवादन किया। फिर कहा—“सातों द्वीपों के स्वामी राक्षसेन्द्र का मैं अश्मद्वीप में स्वागत करता हूं।”
“स्वस्ति, तेरी विनय भी तेरे शौर्य के समान ही श्लाध्य है, किन्तु तू क्या मेरा शरणापन्न है?”
“रक्षेन्द्र, मेरी पत्नी और तेरी भगिनी शूर्पणखा ने मुझसे अश्मपुरी में तेरा स्वागत करने को कहा था।”
“वह मुझे याद है।”
“तो मैं अश्मद्वीप में तेरा स्वागत करता हूं।”
“शरणापन्न होकर?”
“नहीं, अश्मपुरी का अधिपति और तेरा भगिनीपति होने के नाते।”
“तू किस भांति स्वागत करना चाहता है, भगिनीपति?”
“यदि तू शस्त्र भूमि पर रख दे, जैसे मैंने रख दिया है, तो तेरा चिर किंकर होकर, नहीं तो तू मुझे अपने साथ द्वन्द्व-युद्ध की प्रतिष्ठा दे।”
“दूसरी ही बात ठीक है भगिनीपति, तेरा द्वन्द्व मुझे स्वीकार है। शस्त्र उठा ले। परन्तु युद्ध-पूर्व कह, तेरा मैं और क्या प्रिय करूं?”
“यही यथेष्ट है रक्षपति, तुझे कौन-सा शस्त्र सिद्ध है?”
“तू स्वच्छन्द प्रहार कर। सुना है तू शक्ति का अमोघ प्रहार करता है।”
“यों ही कुछ अभ्यस्त हूं। तो रक्षेन्द्र, तू प्रहार कर।”
विद्युज्जिह्व ने उछलकर शक्ति उठा ली। रावण ने प्रचण्ड वेग से शक्ति फेंकी। विद्युज्जिह्व एक ओर झुक गया, शक्ति भूमि में जा धंसी। अब विद्युज्जिह्व ने शक्ति फेंकी। वह रावण के कुण्डल को छूती हुई चली गई। बड़ी देर तक दोनों योद्धा शक्ति, शूल, खड्ग और मुद्गर से युद्ध करते रहे। रक्षेन्द्र रावण थककर हांफने लगा। उसके घावों से रक्त झर-झर बह रहा था, परन्तु विद्युज्जिह्व अभी भी ताजा-दम था।
रावण ने हंसकर कहा—“तेरा पराक्रम श्लाध्य है, वीर!”
“रक्षेन्द्र प्रसन्न हों। मुहूर्त-भर विश्राम कर लें। इसके बाद युद्ध हो।”
“जैसे तुझे प्रिय हो।” रावण ने अपने हाथ का शस्त्र रख दिया। दोनों पक्ष स्तम्भित हो वह युद्ध देख रहे थे। दोनों अप्रतिहत योद्धा आस-पास खड़े श्रम दूर कर रहे थे। रावण ने कहा—“विद्युज्जिह्व तू क्या शूर्पणखा के लिए कुछ सन्देश देना चाहता है?”
“केवल यही कि मैं उसे प्यार करता हूं।”
“क्या उसकी कोई अभिलाषा भी है?”
“यदि रक्षेन्द्र का अकेले ही उसे अश्मपुरी में स्वागत करना पड़ा, तो उसकी अभिलाषा रक्षेन्द्र से अव्यक्त न रहेगी। फिर राक्षसराज रावण जिसका भाई और ज्येष्ठ है, उसके लिए मुझे क्या चिन्ता? परन्तु, अब तो हम सुस्ता चुके।”
“निस्सन्देह? तो वीर, धनुष ले।”
“रक्षेन्द्र, यदि दो शरीर-रक्षक साथ ले लें तो मुझे आपत्ति न होगी।”
“वाह वीर, ऐसा भी कहीं होता है?”
इसके बाद दोनों वीरों में धनुष-बाणों से युद्ध हुआ। अनेक प्रकार से मन्त्रपूत बाणों से आकाश छा गया। दोनों वीरों के शरीर में बिंध-बिंधकर बाण शरीर का अंगभूषण बनने लगे। उनमें से रक्त की धार बह चली। अन्त में रावण ने सात अर्धचन्द्र एकबारगी ही धनुष पर चढ़ाकर विद्युज्जिह्व के धनुष की डोरी को काट डाला। यह देख राक्षसों की सेना गरज उठी। परन्तु इस समय विद्युज्जिह्व ने विकट परशु उठा रावण के सिर पर आघात किया। रावण आघात खाकर नीचे गिर गया। फिर उसने उछलकर अपना परशु संभाला, अपने सिर के चारों ओर घुमाकर रावण ने विद्युज्जिह्व पर प्रहार किया। प्रहार खाकर विद्युज्जिह्व मूर्च्छित हो गया। इस पर सब कालिकेय सेनापतियों ने विद्युज्जिह्व को शस्त्रों की छांह में छिपा लिया। राक्षसों की सेना एक बार फिर कालिकेयों पर टूट पड़ी। विद्युज्जिह्व का तरुण सेनापति मित्रहर्ष कालिकेय विद्युज्जिह्व के चरणतल में खड़ा होकर परशु चलाने लगा। परन्तु कुम्भकर्ण ने उसका पैर पकड़कर उसे एक शिला-खण्ड पर धर पटका, जिससे उसका भेजा फट गया। अब विकृतदंष्ट्र और कुम्भकर्ण में घनघोर युद्ध हुआ। अन्त में कुम्भकर्ण ने शक्ति उसके हृदय के आरपार कर दी। तब चक्रवाल, अंकुरी, प्रचंड और निर्घात कालिकेय सेनानायक एक साथ ही कुम्भकर्ण पर टूट पड़े। शस्त्रों की प्रचंड मार ने कुम्भकर्ण को विकल कर दिया और वह चक्कर खाता हुआ भूमि पर गिर गया, यह देख कालिकेयों ने विकट हर्षनाद किया।
इसी समय विद्युज्जिह्व ने मूर्च्छा भंग होने पर खड्ग हाथ में ले रावण के सम्मुख आकर कहा—“रक्षेन्द्र, आ, हम अपना अवशिष्ट धर्म पूरा करें।”
और एक बार फिर ये दोनों अप्रतिम योद्धा संग्राम में भिड़ गए। उधर सोमिल और कालकम्पन दैत्यों से प्रहस्त और विलम्बक राक्षस घनघोर युद्ध कर रहे थे।
विद्युज्जिह्व पहले भी रावण के परशु का करारा घाव खा चुका था। अब वह बारम्बार रुधिर बहने से अशक्त हो सुस्त हो गया। कई नए घाव खा गया। रावण ने कहा—“विद्युज्जिह्व, शस्त्र रख दे और शरणापन्न हो।”
“रक्षेन्द्र, जब शस्त्र-धारण में मैं समर्थ न रहूं, तब तू ही मेरे शस्त्र को ग्रहण करके मुझे सम्मानित करना।” इतना कहकर उसने एक विकट वार रावण पर किया, पर रावण ने उछलकर खड्ग का एक जनेऊ हाथ दिया, जिससे विद्युज्जिह्व का सिर कटकर भूमि पर जा गिरा। विद्युज्जिह्व का कबंध ढाई घड़ी लड़ता रहा।
इस पर सब कालिकेय क्रुद्ध हो एकबारगी ही राक्षसों पर टूट पड़े। पर रावण ने युद्ध रोक दिया। उसने कहा—“अब युद्ध का कुछ प्रयोजन नहीं रहा।” विद्युज्जिह्व के सेनापति भयंकर ने कहा—“हम भद्र विद्युज्जिह्व का शरीर लेकर अश्मपुरी जाते हैं। रक्षेन्द्र अश्मपुरी के द्वार पर आएं। वहां कालिकेयों की रानी शूर्पणखा उनका स्वागत करेंगी।”
“कालिकेय अतिरथी विद्युज्जिह्व के शरीर को लेकर लौट गए। उनके पीछे रावण निरस्त्र हो मन्त्रियों-सहित अश्मपुरी को चला, उसके पीछे सब राक्षस सैन्य शस्त्र नीचे किए हुए। अश्मपुरी में विद्युज्जिह्व की चिता नगर के बाहर रची गई और शूर्पणखा ने चितारोहण की तैयारी की। सब कालिकेय निराहार रह, समुद्र-स्नान कर चिता की परिक्रमा कर नीरव खड़े हो गए। तभी कालिकेयों की रानी सद्य: विधवा शूर्पणखा शृंगारित हो, चितारोहण के लिए आई। पहले उसने पति-सहित चिता की परिक्रमा की। फिर उसने रावण के निकट आकर कहा—“स्वागत भाई, अश्मपुरी में तेरा स्वागत है। परन्तु तू मुझे क्षमाकर रक्षेन्द्र, मैं अधिक विलम्ब नहीं कर सकती, तेरा कल्याण हो!”
रावण की आंखों में आंसू भर आए। उसने कहा—“बहन, यह तू क्या कहती है! मैं तुझे लंका ले जाने के लिए यहां आया हूं!”
“परन्तु वीर, मेरा पथ तुझे मालूम है। तूने अपनी मर्यादा रखी—कुल-मर्यादा, राज-मर्यादा। मैंने अपनी मर्यादा रखी—स्त्री मर्यादा के लिए वहां जा रही हूं, अज्ञात लोक में। भाई, रक्षेन्द्र तू महाप्रतापी सत्त्व है, तेरे अनुग्रह से मैंने केवल एक रात का सुहाग भोग लिया। मैंने दोनों कुलों को धन्य कर दिया। तेरे रक्ष-कुल को भी और अपने कालिकेय-कुल को भी। अब तेरी मेरी राहें दो हैं। तू अपनी राह जा और मैं अपनी।”
“यह न होगा बहन, तुझे हम सभी भाइयों ने अपनी नेत्र-ज्योति समझा। कुल-मर्यादा का पालन न करने से कुल-क्षय होता है। इसी से मुझे यहां आना पड़ा। पर विद्युज्जिह्व सुप्रतिष्ठ है। उसके साथ विवाह करके तूने रक्ष-कुल कलंकित नहीं किया। मैं सन्तुष्ट हूं, पर खेद है विद्युज्जिह्व ने मुझसे तुझे नहीं मांगा। अब तो बहन, जो होना था सो हो गया। अब तू यह भयंकर इरादा त्याग, शोक को भी मन से निकाल बाहर कर- भस्मान्तम् शरीरम्।”
“परन्तु चितारोहण राक्षसों की भी कुल-मर्यादा है और दानवों की भी। फिर मैं तो प्रिय के बिना नहीं रह सकती। जब मैंने उसके लिए तुम रक्षेन्द्र को और लंका के वैभव को भी त्याग दिया, तब तूने क्या यह नहीं जाना कि मैंने उसकी अपेक्षा विश्व को भी तुच्छ मान लिया है?”
“मैंने जान लिया बहन, इसी से तुझे रोका नहीं। पर तूने भी तो जान लिया था कि मुझे आना होगा। तूने मुझे अश्मपुरी में आमन्त्रित किया था। अब जिसका मुझे भय था, वही हो गया। अब तू भी धर्म का अनुसरण कर—
“उदीष्व्र नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि?”
“परन्तु—अजं ददातो न वियोषत:।”
“नहि, नहि, जीवन्तप्राणसमूह मभिलक्ष्य आगच्छ!”
रावण ने आगे बढ़कर प्रिय बहन का हाथ पकड़ लिया, कुम्भकर्ण ने उसे अपनी प्रलम्ब बाहुओं में उठा लिया। शूर्पणखा ने रोते हुए कहा—“तो भाई, मैं कालिकेयों को नहीं छोड़ सकती।”
“ठीक है। जा तू अपने सब कालिकेयों के साथ दण्डकारण्य में रह। दण्डकारण्य मैंने तुझे दिया बहन, तू वहां रह चुकी है, वह प्रदेश तुझे प्रिय है। अब से तू ही वहां की स्वामिनी है, पर कालिकेय भी सब राक्षस-धर्म ग्रहण करें।”
“कालिकेय राक्षस-धर्म स्वीकार करेंगे।”
“मैं खर को आदेश दे दूंगा कि दण्डकारण्य की स्वामिनी शूर्पणखा है, वह शूर्पणखा का अनुगत होकर रहे।”
शूर्पणखा ने स्वीकार किया। विद्युज्जिह्व की चिता में अग्नि दी गई। रावण ने मन्त्र पढ़ा—सूर्य चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा। आपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रतितिष्ठा शरीरै:। ये एतस्य पथो गोप्तारस्तेभ्य: स्वाहा। ये एतस्य पथो अभिरक्षितारस्तेभय: स्वाहा।
रावण ने प्रथम घृत की, फिर दूध की धार से चिता को सींचा। पीछे सब राक्षसों ने, कालिकेयों ने भांति-भांति से पशुओं का आखेट करके चिता को बलि दी.