प्रतिगमन

“विद्युज्जिह्व ने अपनी मां को मार डाला है।”—रावण ने उत्तेजित स्वर में कहा।

“नहीं, यह सम्भव नहीं है।”—शूर्पणखा ने और भी उत्तेजित होकर उत्तर दिया।

“उसने उसे मार डाला है।”

“अपनी सगी मां को? नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हुआ।”

“उसने उसे मार डाला।”

“विद्युज्जिह्व ने?”

“बहन, यह अच्छा नहीं हुआ। बड़ी भयानक बात है।”

“किन्तु...?”

“उसने सुकेतु को भी मार डाला है और उसके सब राक्षसों को भी।”

“किन्तु रक्षेन्द्र...”

“उसे न देवता क्षमा कर सकते हैं, न मैं।”

“तो मैं रक्षेन्द्र को दोष न दूंगी, परन्तु मैं विद्युज्जिह्व के साथ हूं, यह न भूलना।”

“किन्तु मातृवध? कितना जघन्य है!”

“पुरुष पर कर्तव्य का भी कुछ भार है।”

“परन्तु मैं उसे अब सम्बन्धी स्वीकार नहीं कर सकता। सुकेतु हमारा वीर सेनापति ही न था, परिजन भी था।” रावण ने महिषी मन्दोदरी की ओर देखा। मन्दोदरी ने भग्न मन से कहा—

“मैं भी। विज्जला मेरी मौसेरी बहन थी।”

“अपने सम्बन्धी और परिजन के हत्यारे का हम कैसे स्वागत कर सकते हैं?”

“यह तो बड़ी ही खराब बात हो गई, शूर्पणखा! उसने अपनी सगी मां को मार डाला। हम उसका मणिमहालय में स्वागत नहीं कर सकते।”

“मां, मैं नहीं चाहती कि वह यहां आए, मुझे ही उसके पास जाना होगा।”

“परन्तु तू निश्चय ही अब उसे पति-रूप में वरण करना न चाहेगी!”

“निस्सन्देह वह मेरा पति है।”

“शूर्पणखा, रक्षाधिपति की कुलकन्या, राक्षसबाला होकर तू मातृहन्ता से विवाह करना चाहती है?”

“मैं उसी से विवाह करूंगी।”

“ओह, यह तो अत्यन्त अपमानजनक और त्रासदायक है। मातृहन्ता से विवाह करके फिर क्या तू राक्षसों की प्रतिष्ठित जाति में रह सकती है?”

“रक्षेन्द्र ने मुझे मेरा भविष्य बता दिया। पर मैं उसी की हूं—उसके सब अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य की संगिनी। उसके कार्य को रक्षेन्द्र ने देखा है, मैं उसकी मनोव्यथा देख रही हूं। इस मनोव्यथा के कष्ट को अकेला ही भोगने देने को मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकती। यदि मैं ऐसा करूं तो मैं अपनी दृष्टि में छोटी हो जाऊं।”

“उस आदमी के प्रेम के लिए तू यह दुस्साहस कर रही है!”

“भाई, तू रक्षेन्द्र है, साहसिक योद्धा—और मैं तेरी बहन हूं, साहसिक प्रेमिका।”

“साहसिक प्रेमिका?” मन्दोदरी ने त्योरियों में बल डालकर कहा।

“महिषी, गुस्सा करने से क्या होगा? कुछ लोग साहसिक कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। वे परिणाम की चिन्ता नहीं करते, न वे लाभ-हानि का विचार करते हैं। वे केवल वही करते हैं, जो ठीक है।”

“तो तू क्या समझती है, यह मातृवध ठीक है?”

“सम्भव है। परन्तु मैं तो विद्युज्जिह्व के प्रति अपने कर्तव्य ही की बात सोचती हूं।”

मन्दोदरी ने कहा—“तो उसे बुलाकर कारण पूछ।”

“वह नहीं आएगा।”

“मेरी आज्ञा से भी नहीं?”—रावण ने क्रोध से कहा।

“और मैं भी तेरी आज्ञा से यहां रुकूंगी नहीं। उसके पास जाऊंगी।” शूर्पणखा ने शान्त मुद्रा से कहा।

“तुझे प्रजंघ से ब्याह करना होगा।”

“कदापि नहीं, मुझे दुःख है, मेरे कारण रक्षेन्द्र को दुःख हुआ—महिषी को भी अब चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है, अब मैं चली।”

“कहां?”

“अपने प्रियतम के पास।”

“तो मुझे उससे युद्ध करना होगा।”

“रक्षेन्द्र, उसके पास भी शस्त्र है।”

“तो तू रक्षेन्द्र को चुनौती देती है?”

“चुनौती रक्षेन्द्र अपनी बहन को देता है, जो उसका व्यापार नहीं है।”

“किन्तु!” मन्दोदरी ने कहा—“मैं एक बार विद्युज्जिह्व से बात करूंगी।”

“मैं उसे मणिमहालय की ड्योढ़ी न लांघने दूंगा।”

“जब तक रक्षेन्द्र को आपत्ति है, मैं भी उसका यहां आना ठीक नहीं समझती।”

“हम यह कैसे कहें कि वह प्रकृत मातृहन्ता है या कि कर्तव्यनिष्ठ पुत्र?”

“वह कर्तव्यनिष्ठ पुत्र है।”

“क्या माता का?”

“नहीं, पिता का।”

“परन्तु हम राक्षसों में, दैत्यों में और दानवों में मातृसत्ता ही वरिष्ठ है, पितृसत्ता नहीं।”

“तो इसी से एक पत्नी अपने पति का वध कर सकती है? उसकी सब सम्पत्ति को उसके जीते-जी लेकर दूसरे पुरुष के साथ रह सकती है?”

“यह दोषपूर्ण है।”

“तो उसे कर्तव्यनिष्ठ पुत्र ही कहा जाएगा। सम्भव है, उसने कर्तव्यवश जो कुछ किया, उससे वह दुःखी भी हो।”

“बहन, प्रेम के आवेश में मनुष्य बहुत-सी बातें नहीं देख सकता।”

“परन्तु स्त्री को पति की अविश्वासिनी होने पर क्या दण्ड दिया ही न जाए?”

“यह तो उसके व्यक्तित्व और चरित्र पर निर्भर है।”

“तो रक्षेन्द्र समझते हैं कि उसने अपराध किया है?”

“हो सकता है; पर तू क्या समझती है कि तुम दोनों एक-दूसरे के पूरक हो?”

“हम दोनों जीवन-साथी हैं, मैं उसे वरण करके प्रसन्न हूं।”

“दुर्भाग्य है, दुःखद है!”

“तो अब मैं चली, अभिवादन करती हूं भाई!”

“आह, यह दुस्सह है, बहन!”

“अभिवादन करती हूं, भाभी!”

“किन्तु तू हमें छोड़कर जा रही है?”

“तुम्हारा आशीर्वाद लेकर।”

“फिर कब आएगी, शूर्पणखा?”

“कभी नहीं।”

“अस्तु! जो मणि, रत्न, स्वर्ण तुझे चाहिए, मणिमहालय से ले जा और कुछ सैनिक भी।”

“नहीं ले जा सकती।”

“क्यों?”

“विद्युज्जिह्व मेरे लिए यथेष्ट है।”

“वह तो स्वयं विपन्न है।”

“फिर भी मैं रक्षेन्द्र का दहेज नहीं स्वीकार कर सकती।”

“क्या मेरे अनुरोध से भी नहीं, शूर्पणखा?”

“नहीं, जब तक रक्षेन्द्र मेरे पति को अपना बहनोई स्वीकार कर मणिमहालय में उसका स्वागत न करे।”

“यह तो कभी नहीं होने का।”

“तो भाई, विदा!”

“बहन, क्या यह यथेष्ट नहीं कि तू उससे ब्याह कर रही है? मुझे भी उसे स्नेह करना होगा?”

“और आदर भी। तुम जब तक उसे बहनोई और निरपराध कर्तव्यनिष्ठ पुत्र नहीं समझते, हमारी राह जुदा है—तुम्हारी जुदा।”

“ओह शूर्पणखा, मुझे उससे युद्ध करना ही पड़ेगा, यह मेरी कुलप्रतिष्ठा का प्रश्न है।”

“तो भाई हम सब कालिकेय लोग अश्मपुरी में तेरा स्वागत करेंगे।”