मातृवध

सरमा ने कहा—“एक भाण्ड मद्य और दूं?”
“नहीं,” विद्युज्जिह्व ने लापरवाही से कहा और पीठ पर तरकस बांधा।
“तो विश्राम कर, मैंने व्याघ्र-चर्म शिलाफलक पर बिछा दिया है।”
“नहीं, अभी मुझे जाना होगा, तू सो रह। अब रात को मेरा आना सम्भव नहीं है।”
बालिका ने आकुल नेत्रों से तरुण को देखा। वह उदास हो गई। पर विद्युज्जिह्व ने इस पर ध्यान नहीं दिया। वह अपना शूल हाथों में तौल रहा था। बालिका ने कुछ भयभीत होकर कहा—
“क्या कोई विग्रह है? शूल तू क्यों तौल रहा है?”
“तो तुझे क्या भय है? तू सो।”
“नहीं सोऊंगा। रातभर जागती रहूंगी, जब तक तू न आएगा।”
“मैं तो रात-भर न आ सकूं—यह भी संभव है, कल तक भी न आ सकूं—यह भी संभव है।”
“तो तू रुष्ट होकर जा रहा है?”
“किससे?”
“मुझसे और किससे?”
“तुझसे क्यों?”
“मैंने तुझे दूसरा मद्य-भाण्ड नहीं दिया, इससे!”
“नहीं रुष्ट नहीं हूं।”
“तो मत जा, विश्राम कर।”
“जाना होगा!”
“कहां?”
“द्वीप के दक्षिणांचल में। पितृचरण बहुत दिन बाद घर आए हैं। अभिनन्दन करूंगा।”
“तो अभिनन्दन करके रात को आ, न हो प्रभात में जा।”
“बहुत दूर है, रात में लौट न सकूंगा। प्रभात तक ठहर नहीं सकता—पितृचरण पर संकट आ सकता है।”
“कैसा संकट?”
“वह राक्षसों का पुर है, जहां मातृचरण का निवास है। वह पुरुष भी राक्षस है, जिसे मातृचरण ने घर में डाल लिया है। संवादवाहक ने कहा है कि पितृचरण पर संकट आ सकता है।”
“तो मैं तेरे साथ चलती हूं।”

विद्युज्जिह्व हंस दिया। उसने कहा—“तू क्या मुझसे अधिक लक्ष्यवेध करती है? जा, सो रह। परन्तु ठहर, मुर की स्त्री और बालक को तूने खिलाया-पिलाया कुछ?”
“एक शूकर उसे दे दिया है और एक मद्य-भाण्ड।”
“तो ये स्वर्ण मुद्राएं भी उसे दे दे, कदाचित् उसे इनकी आवश्यकता है।”
उसने मुट्ठी-भर स्वर्ण मुद्राएं अपने चर्मबन्ध से निकाल बालिका की हथेली पर रख दीं। इसी समय एक वृद्ध-दानव हांफता हुआ आया। उसका सारा शरीर कांप रहा था। वह कोयले के समान काला और बहुत लम्बा था। वह अत्यन्त दुर्बल था। उसके बड़े-बड़े दांत भयंकर थे, उसके सारे अंग चर्बी से तर थे और सिर पर स्वर्ण से मढ़े दो सींग बंधे थे। उसकी कमर में भैंसे का चर्मबन्ध बंधा था और हाथ में एक विकराल खाण्डा था। वह दूर से दौड़ा चला आ रहा था, इसलिए हांफ रहा था और उसका अंग चर्बी और पसीने से गीला हो रहा था। वह दौड़कर विद्युज्जिह्व के पैरों में गिर गया। उसने कहा—“विद्युज्जिह्व, उसने तेरे पिता का वध कर दिया।”
“किसने?”
“तेरी माता ने।”
“तूने देखा?”
“मैंने उसे घर के द्वार पर आते देखा। द्वार पर तेरी माता ने उसकी अभ्यर्थना की और वह उसे भीतर ले गई। ज्यों ही उसने शस्त्र खोलकर रखे, उसने उसका वध कर डाला और शव खींचकर चतुष्पथ पर डाल दिया।”
“क्या वह उसका राक्षस पति भी वहीं था।”
“नहीं।”
“तो अकेले उसी ने पितृचरण का वध किया?”
“ऐसा ही मैं समझता हूं।”
“तू क्या बहुत श्रमित है?”
“श्रमित हूं, पर तू करणीय कह।”
“तो द्वीप में जाकर सब कालिकेयों को शस्त्र-बद्ध कर ले आ।”
“कहां?”
“जहां मृत पितृचरण हैं।”
यह कहकर विद्युज्जिह्व ने शूल उठाकर चरण बढ़ाया। बूढ़े दानव ने बाधा देकर कहा—“हमारे आने तक तू ठहर। एकाकी वहां जाना विपज्जनक हो सकता है। उस राक्षस के वहां बहुत परिजन हैं। वह रक्षपति का गुल्म-नायक है। वह तुझे मार डालेगा।”
“मेरी चिन्ता न कर। तू अपनी राह जा।”
यह कहकर विद्युज्जिह्व तीर की भांति वहां से चल दिया। इस समय चारों दिशाओं में अंधकार फैल गया था। विद्युज्जिह्व अंधेरी और सूनी गलियों को पार करता हुआ सीधा समुद्र-तीर की ओर जा रहा था। उसकी चाल तेज थी और उसका मस्तिष्क विभिन्न विचारों से गरम हो रहा था। नगर का प्रान्त-भाग आ गया और अब वह विजन वन में प्रविष्ट हुआ। यहां भी कहीं-कहीं समुद्र पर मछली मारनेवालों की झोंपड़ियां थीं। झोंपड़ियां धरती में गड्ढे खोदकर और वृक्ष की मजबूत टहनियां उनके चारों ओर गाड़कर बनाई गई थीं। इन टहनियों के चारों ओर दरियाई जंगल की घास का जाल पुरा हुआ था, जिन पर गारे का लेप था। छत भी उनकी वैसी ही बनी थी। इन झोंपड़ों में केवल एक छोटा-सा द्वार तथा धुआं निकलने को छत में एक छोटा-सा सूराख था। कुछ झोंपड़े बड़े थे तथा चटाइयों से बनाए गए थे। कुछ झोंपड़े झीलों में पानी पर बने थे, जो उन जंगली जानवरों से सुरक्षित रहने को बनाए गए थे, जो उनके चारों ओर रात-दिन घूमते रहते थे। उनके डर से उन्होंने झीलों में लम्बे-लम्बे लकड़ी के लट्ठे गाड़कर पानी की सतह से ऊंचा एक चबूतरा बनाया और ऐसे ही चबूतरो पर झोंपड़ियां बना ली थीं। कहीं-कहीं तो पूरे गांव के गांव ही इस प्रकार झीलों में बने हुए थे। जगह-जगह बहुत-से लोग बकरी की खाल के ढेरों में रह रहे थे, जहां सारा कुनबा एक ही जगह सिमटकर रहता था। यहां तक कि खराब मौसम में पालतू पशु भी उन्हीं में आश्रय लेते थे। सोने को घास के ढेर, बैठने को कुछ चपटे पत्थर के ढोके, खाना पकाने को मिट्टी के बर्तन और शिकार के लिए शूल, धनुष, परशु और गोफन। कहीं-कहीं नगर के प्रान्त में चपटी ईंटों के घर थे। ये घर बहुत छोटे-छोटे और एकमंजिले थे, पर इनमें सहन था और छतें लकड़ी की थीं, जिन पर गारे का पलस्तर किया हुआ था।

विद्युज्जिह्व को जैसे इन झोंपड़ों, झीलों और वहां रहने वालों से कुछ सरोकार ही न था; वह तेजी से अपने गन्तव्य पर बढ़ा जा रहा था। सामने ही एक पर्वत की उपत्यका थी, वह उसी ओर बढ़ रहा था। अन्ततः वह अपने गन्तव्य पर पहुंच गया। यहां आकर उसने अपनी गति धीमी कर ली। यहां से पर्वत-शृंखला शुरू होती थी। शीघ्र ही वह पर्वत के नीचे जा खड़ा हुआ। सामने समुद्र गरज रहा था। हवा तेज चल रही थी और जब वह पहाड़ से टकराती थी तो मेघ-गर्जन के समान शब्द होता था। अब उसने सावधानी से चारों ओर देखा और बिल्ली की भांति नि:शब्द पर्वत की तंग राह पर चढ़ने लगा। थोड़ी ही दूर पर उसे कुछ गुफाएं नजर आने लगीं। छोटी-बड़ी अनेक गुफाएं थीं। उन सबमें राक्षसों और दैत्यों के परिवार रहते थे। किसी-किसी गुफा में से शोर आ रहा था। किसी में से मांस भूनने की गन्ध आ रही थी। वह पार्श्व में घूमकर उस बड़ी गुफा के द्वार के सामने पहुंचा, जिसके डेढ़ सौ फीट नीचे नदी बह रही थी। इसके दोनों ओर आठ सौ गज के विस्तार में और अनेक छोटी-बड़ी गुफाएं थीं। द्वार के सामने आकर वह कुछ ठिठका। उसने देखा, सामने ही काली-काली कोई वस्तु बीच राह में पड़ी है। वही उसके पिता का मृत शरीर था। बहुत दिन से उसने अपने पिता को देखा नहीं था, परन्तु उसने कल्पनाओं और अनुमान से समझ लिया कि यही उसके पिता का शरीर है। उसने झुककर उसे देखा और घुटनों के बल उसके पास बैठ गया। फिर उसने एक लम्बी सांस ली और सिर उठाकर गुफा की ओर देखा।

वह गुफा के भीतर प्रविष्ट हुआ। द्वार के भीतरी दालान में एक बूढ़ा राक्षस ऊंघ रहा था। वह बिना उसे जगाए आगे बढ़ गया। यहां प्रकाश था। चर्बी का दीप जल रहा था। सामने छोटी-बड़ी अनेक कोठरियां थीं। बीच में बड़ा हॉल था, जो अष्टभुज स्तम्भों पर आधारित था। उसके सामने स्तम्भों वाला एक लम्बा दालान था, वह उसी दालान में अग्रसर हुआ। स्तम्भों पर हाथी और सिंह के चित्र बने थे तथा उन पर उभरी हुई नक्काशी हो रही थी। अन्त में वह उस प्रमुख गुफा के द्वार पर पहुंच गया जिसके सामने खम्भोंवाला बहुत बड़ा ओसारा था। यहां उसे एक राक्षस ने टोका। राक्षस एक अधेड़ वय का था। उसके हाथ में धनुष-बाण था। परन्तु अभी उसके मुंह से स्वर फूटा भी न था कि विद्युज्जिह्व का शूल उसकी पसलियों को पारकर कलेजे को चीर गया। वह घूर्णित हो वहीं गिर गया। इसके बाद वह रंगमहल में प्रविष्ट हुआ। द्वार पर महीन पर्दे पड़े थे। भीतर सुगन्धित द्रव्य जल रहे थे और वहीं उसकी माता बहुत-सी राक्षसी दासियों के बीच पलंग पर सो रही थी। विद्युज्जिह्व की माता का नाम विज्वला था। उसकी आयु चालीस को पार कर गई थी, परन्तु अभी उसका अंग-सौष्ठव और यौवन वैसा ही भव्य और आकर्षक था कि कोई भी तरुण उस पर मोहित हो सकता है। वह सोने के पलंग पर सो रही थी। गुफा में सुगन्धित चर्बी के द्वीप का मन्द प्रकाश था। पास में खड्ग और धनुष-बाण रखे अनेक तरुणी दैत्य और राक्षसबालाएं उसके चारों ओर भूमि पर सो रही थीं। विज्वला की उठान बड़ी आकर्षक थी। वह लम्बे कद की और छरहरे बदन की कमनीय स्त्री मूर्ति थी। उसके नेत्रों में मादकता थी और होठों में रस का भण्डार। वह किसी भी तरुणी सुन्दरी से अधिक आकर्षक थी। शान भी उसकी रानियों जैसी थी। वह कण्ठ में सिंहल के बड़े-बड़े मोती पहने थी तथा उसका कटिबन्ध और वलय स्वर्ण का था।

कुछ देर विद्युज्जिह्व चुपचाप खड़ा अपनी माता के इस भव्य रूप को देखता रहा। फिर उसने उसका पैर पकड़कर खींचा। एकाएक नींद से चौंककर उसने यमदूत के समान विद्युज्जिह्व को सामने हाथ में विकराल शूल लिए देखा। यद्यपि उसने बहुत दिन बाद पुत्र को देखा था, पर उसने उसे तुरन्त ही पहचान लिया। वह हड़बड़ाकर पलंग से उठ खड़ी हुई। उसने धड़कते हुए हृदय पर हाथ रखकर कहा—“जात, तू इस असमय में किस अभिप्राय से आया है?”
“मात:, मैं पितृचरण के दर्शन करने आया हूं।”
“तेरे पिता दो हैं।”
“मुझे एक ही चाहिए।”
“यदि तेरा अभिप्राय हतभाग्य मुचुकुन्द दानव से है तो उसका शव उस चतुष्पथ पर पड़ा है।”
“उसी से अभिप्राय है मात:?”
“तो वहीं जा, यहां क्यों आया?”
“तुझे वहीं ले जाने के लिए।”
“मेरा उससे क्या सम्बन्ध रहा?”
“इस पर मैं विवाद नहीं करता।”
“तो कह, तेरा मैं क्या प्रिय करूं?”
“केवल वह शस्त्र हाथ में ले, जिससे तूने उसका वध किया है।”
“किस लिए?”
“उसी से मेरा भी वध कर।”
“तुझसे मेरा क्या विग्रह है, जात?”
“पर मेरा तुझ पर विग्रह है।”
“किस लिए?”
“तूने पति-वध किया।

“मेरा पति सुकेतु राक्षस है।”
“और मेरा पिता?”
“कभी था, अब नहीं।”
“परन्तु यह सब भूमि, सम्पत्ति, पशु, स्वर्ण रत्न, घर, भण्डार तो उसी के हैं।”
“वह मृत हैं, अब मैं उसकी स्वामिनी हूं।”
“और मैं?”
“तू यदि मेरा अनुगत है तो मेरा तुझ पर अनुग्रह है।”
“अनुग्रह है तो शस्त्र ले।”
“कैसा शस्त्र?”
“जिससे तूने पितृचरण का वध किया।”
“किन्तु क्यों?”
“मेरा वध करने के लिए।”
“मैं तेरा वध नहीं करना चाहती, जात!”
“पर मैं तेरा वध करने आया हूं, मात:!”
“तेरा ऐसा धृष्ट आचरण?”
“क्रोध करने से लाभ न होगा मात:, शस्त्र ले और तनिक उधर खुले स्थान में चला।”
“क्यों?”
“यहां शस्त्र-प्रयोग के योग्य स्थान नहीं है।”
“तू क्या मुझसे युद्ध करना चाहता है?”
“तुझे वध करने से पूर्व मैं तुझे आत्मरक्षा का अवसर देता हूं।”
“अरे कालिकेय, तुझे क्या राक्षसों का भय नहीं है, जो तू यहां निर्भय चला आया? जा, अभी भाग जा।”
विज्जला भय और क्रोध से चीख उठी। चीख सुनकर सब प्रहरी राक्षसियां जाग उठीं। वे सब शस्त्र लेकर स्वामिनी की आज्ञा की बाट जोहने लगीं। विद्युज्जिह्व ने कहा—“अरी चेटियो, यह माता और पुत्र का विग्रह है। चली जाओ यहां से। यहां तुम्हारा कुछ काम नहीं है।”
इस समय विद्युज्जिह्व का विकराल मुख और भावभंगी देख वे सब राक्षसियां डर गईं। उनके मुख से बात न निकली। परन्तु विज्जला ने चीखकर कहा-‘तुम लोगों ने मेरा आदेश सुना नहीं?”
विद्युज्जिह्व ने कहा—“नाहक उनका प्राण संकट में डालती हैं, मात:! तू ही शस्त्र उठा।”

“मैं शस्त्र नहीं उठाऊंगी।”
“हन्त, तो मुझे शस्त्र के बिना ही तेरा वध करना पड़ेगा।” उसने हाथ का शूल दूर फेंक दिया और सिंह की भांति उछलकर विज्जला को कण्ठ से पकड़कर भूमि पर गिरा लिया। विज्जला ने छूटने की बहुत चेष्टा की, बहुत छटपटाई, पर विद्युज्जिह्व उसे उसी प्रकार घसीटकर अलिन्द के एक एकान्त स्थल में ले गया, जैसे बाघ अपने शिकार को ले जाता है। फिर उसने उसके सिर के सब बाल नोच डाले। उसके मुंह में हाथ डालकर मुंह चीर दिया। रक्त की धार बह चली। विज्जला छूटने को बहुत छटपटाई, पर विद्युज्जिह्व के लौहदण्ड से वह पार न पा सकी। अलिन्द में वह उसे कभी इधर से उधर घसीटता, कभी उठाकर पत्थर पर इस प्रकार पटकता जैसे धोबी कपड़ा पटकता है और कभी सिर से ऊपर उठाकर दूर फेंक देता। फिर भी विज्जला के कठिन प्राण नहीं निकले। वह आर्तनाद करती रही। अन्त में विद्युज्जिह्व ने अपना चरण उसके वक्ष पर रखकर जोर से दबा दिया। पसलियां चर्रकर टूट गईं और एक बार रक्त-वमन करके वह पति-हत्यारी सुन्दरी दानवी ठण्डी हो गई। परन्तु विद्युज्जिह्व का क्रोध तो अभी भी शान्त न हुआ। उसने मृत माता का एक चरण पैर से दाब, दूसरे को हाथों में उठा बलपूर्वक उसे दो खण्डों में चीरकर दोनों खण्ड द्वार के बाहर दोनों दिशाओं में बलि-मांस की भांति फेंक दिए।

चेटियां यह घोर कृत्य देख, भय से चीखती हुई भाग खड़ी हुईं, परन्तु इसी समय बहुत-से सशस्त्र राक्षसों के साथ सुकेतु राक्षस ने उसे घेर लिया। विद्युज्जिह्व ने उछलकर अपना शूल घुमाया। अब उस अकेले का अनेकों से तुमुल संग्राम होने लगा। राक्षसों की सेना कोलाहल करती बढ़ती ही चली गई, परन्तु विद्युज्जिह्व के विकराल शूल के सामने राक्षस ठहर न सके। इसी समय सहस्रों कालिकेयों ने राक्षसों को चारों ओर से घेरकर काटना आरम्भ कर दिया। देखते-ही-देखते सब राक्षस काट डाले गए। सुकेतु का विद्युज्जिह्व से तुमुल द्वन्द्व युद्ध हुआ। अन्त में विद्युज्जिह्व का शूल उसके वक्ष को पार कर गया। अब उसका सिर काट और अपने पिता का शव कन्धे पर रख विद्युज्जिह्व अपने कालिकेय योद्धाओं के साथ समुद्रतीर की ओर लौटा, जहां उनकी नौकाएं उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।