विद्युज्जिह्व

राक्षसपुरी लंका अपने ढंग की बिल्कुल निराली नगरी थी। उसमें कितनी सुषमा थी और कितनी कुत्सा—यह कहना कठिन था। वहां के वन-उपवन बड़े विशाल और रमणीय थे। वे वन-उपवन चम्पा, चमेली, अशोक, मौलसिरी, साखू, ताल, तमाल, हिन्ताल, कटहल, नागकेशर, अर्जुन, कदम्ब, तिलक, कर्णिकार आदि पुष्पित वृक्ष-लताओं से आच्छादित थे। कुबेर का चैत्ररथ नामक विहार-वन ऐसा मनोहारी और अनुपम था, जिसका वर्णन हो ही नहीं सकता। उसमें सभी ऋतुओं के पुष्प पुष्पित थे। पपीहा, कोकिल और नाचते हुए मोर अपने मधुर रवों से उस उद्यान को गुंजायमान कर रहे थे। भांति-भांति के विहंगों के Colorav और भ्रमरावली से गुंजायमान उस उपवन का पुष्पवासित शीतल, मन्द सुगन्ध समीर प्राणों में आनन्द का संचार करता था.

लंका के त्रिकूट शिखर का विस्तार सौ योजन था। उसी के एक शिखर पर स्वर्णलंका बसी थी, जिसकी लम्बाई बीस योजन और चौड़ाई दस योजन थी। इस नगर के प्राचीर के गगनस्पर्शी चार द्वार श्वेतवर्ण मेघों के समान प्रतीत होते थे। जैसे वर्षा ऋतु के सघन घन विविध आकृति के होते हैं, वैसे ही लंका के भवन, प्रासाद और मन्दिर थे। कुबेर का राजप्रासाद एक सहस्र खम्भों पर आधारित था, जिसकी धवल सुषमा कैलास के समान थी। इसी को रावण ने अपनी रुचि और विलास-भावना से, मणि-मुक्ता से सुसज्जित किया था। दस सहस्र धनुर्धर राक्षस दिन-रात उसकी रखवाली करते थे। धन, धान्य, रत्न, मणि, स्वर्ण और योद्धाओं से भरपूर, यन्त्रयुक्त कपाटों से सुरक्षित वह लंकापुरी सब पुरियों से विचित्र और शोभासम्पन्न थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि यह लंका दैत्यों की थी। यहां हम संक्षेप में फिर उस इतिहास को दोहराते हैं। जिस समय का उपाख्यान इस उपन्यास में वर्णित है, उसके कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले दैत्यों का साम्राज्य पृथ्वी में सर्वोपरि था। इस साम्राज्य के प्रतिष्ठाता हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, वज्रांग, अन्धक और वज्रनाभि आदि थे। इनमें हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का प्रताप सर्वोपरि था। हिरण्याक्ष की सहायता से हिरण्यकशिपु ने अपना राज्य बहुत बढ़ा लिया था, जिसका बड़ा आतंक पृथ्वी-भर के राज्यों पर था। हिरण्याक्ष ने जो अपना दूसरा साम्राज्य स्थापित किया था, वही आगे चलकर विश्रुत बेबीलोन साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ था। इन दोनों भाइयों ने अनेक देवराजों को पदच्युत कर दिया था तथा वे त्रिलोकपति विख्यात थे। इन दोनों भाइयों का साम्राज्य वर्तमान एशियाई रूस, सफेद कोह, काकेशिया, पामीर से तुर्किस्तान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। उन दिनों देवगण, जो आदित्य भी कहाते थे, सुमेरु-पामीर तक ही सीमित थे। उनका वहां एक छोटा-सा गणतन्त्र था। पीछे गन्धर्व अप्सराओं की एक नई मिश्रित जाति हेमकूट कराकुरम पर और नागों की निस्सा पहाड़ पर आ बसी थी। ऋषि नीलाचल में और पितृ शृंगवान् पर्वत के आंचल में रहते थे, जो सुमेरु से पश्चिम काश्यप सागर के तट पर था। वाराहों का एक छोटा-सा राज्य केतुमाल द्वीप में था, जो देवों के मित्र थे। वरुण ने प्रलय के बाद उनसे पृथ्वी के संस्कार-उद्धार में भारी मदद ली थी। तब से वाराहपति भी देवों की पंक्ति में गिने जाने लगे थे। वाराहों ने घात लगाकर एक दिन वन में मृगया को गए हुए हिरण्याक्ष को मार डाला। तब से हिरण्यकशिपु का राज्य डगमगा गया। फिर भी किसी प्रतापी देव ने उस पर चढ़ाई करने का साहस नहीं किया। अन्त में विष्णु के प्रयास से उनके भाई नृसिंह ने, जो हिरण्याक्ष के मरने पर बेबीलोनिया साम्राज्य के स्वामी बन गए थे, हिरण्यकशिपु को भी मल्लयुद्ध में मार डाला। लाचार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद को विष्णु से सन्धि करनी पड़ी। देवों की ओर से विष्णु ने वचन दिया कि अब दैत्यों का रक्त पृथ्वी पर नहीं गिरेगा। इसके बाद प्रहलाद और उसके पुत्र विरोचन ने कोई राजनीतिक महत्ता नहीं प्राप्त की। आदित्यों से इनके युद्ध हुए अवश्य और उनके दबाव से दैत्यों ने पूर्व की ओर अपना प्रसार प्रारम्भ किया। उत्तर-पश्चिम के राज्य-समूह उनसे छिन गए और वहां देवों तथा आदित्यों के अनेक खण्ड-राज्य स्थापित हो गए।

इसके बाद विरोचन-पुत्र बलि बड़ा प्रतापी हुआ। उसने अपने पिता विरोचन और पितामह प्रहलाद के जीवन-काल में ही अपनी राजनीतिक महत्ता बढ़ा ली थी और अपना नया साम्राज्य संगठित कर लिया था। उसने दैत्यों और दानवों को सन्धि द्वारा एक सूत्र में बांधा। उसने राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक संबंध भी स्थापित कर लिए। धीरे-धीरे उसके शौर्य, राजनीतिज्ञता, पुरुषार्थ, न्यायपटुता, धर्म, दान आदि गुणों के कारण उसका यश दूर-दूर तक फैल गया। एक बार दैत्यों का फिर बोलबाला हो गया। परन्तु देवों को यह कैसे सहन हो सकता था? उन्होंने नागों से मित्रता के सम्बन्ध स्थापित किए और अंततः बलि से उनका विकट समर हुआ।

इस महत्संग्राम में बलि का दोष न था। उसने अपने पितामह के निधन का वैर छोड़कर देवों से सन्धि की, उनके साथ मिलकर समुद्र-मंथन किया और पूरा परिश्रम करने पर भी दैत्य खाली हाथ रह गए। सो देवों की धींगाधींगी और अपमान से खीझकर बलि ने युद्ध-दान दिया, जिसमें प्रहलाद तक ने वृद्धावस्था में योग दिया। इस युद्ध में दैत्यों की कटक में महापद्मिनी, पद्म, कुम्भ, कुम्भकर्ण, कांचनाक्ष, कपिकन्ध, क्षिति, कम्पन, मैनाक, ऊर्ध्ववक्त्र, शितकेश, विकच, सुबाहु, सहस्रबाहु, व्याघ्राक्ष, वज्रनाभि, एकाक्ष, गजस्कन्ध, गजशीर्ष, कालजिह्व, कपि, हयग्रीव, प्रहलाद, शम्बर, अनुह्लाद, नमुचि, यम, पुलोमा, विरोचन, धेनुक, युवराज बाण, अनायुषा-पुत्र बलि, वृषपर्वा, वृत्र, कनकबिंदु, कुजंभ, एकचक्र, राहु, विप्रचित्ति, केशी, हेममाली, मय आदि अनेक दैत्य-दानव छत्रपति और माण्डलिक सरदार लड़े। देवों की ओर विद्याधर, गन्धर्व, नाग, यक्ष, डम्बर, तुम्बर, किन्नर आदि थे। युद्ध में पहले देवों को पराजित होकर अफगानिस्तान की ओर भागना पड़ा। उन्हें अपना देव-लोक भी खो देना पड़ा। बाद में उन्होंने बृहस्पति और वामन द्वारा सन्धि कर तथा बलि को यज्ञ में फंसाकर, उसका बल हरण कर अन्त में बलि को पराजित किया।

इस युद्ध में दैत्य-दानवों का बल भंग हो गया और उनका साम्राज्य भी छिन्न-भिन्न हो गया। लंकाधिपति दैत्य-बन्धु माली, सुमाली और माल्यवान् के इस युद्ध में सब परिजन खेत रहे। परन्तु बलि-पुत्र बाण ने फिर उत्कर्ष दिखाया। उसने रुद्र से मित्रता की, जिससे उसकी शक्ति अमोघ हो गई। बाण अपने काल का महान् दैत्य-सम्राट् था। उसकी शक्ति असीम थी। उसी के समय में कालिकेयों की एक नई जाति दानवों में से विकसित हुई। कश्यप की तृतीय पत्नी दनु की दो कन्याएं भी थीं जिनमें एक पुलोमा थी, दूसरी कालिका। इन दोनों की संतानों से दो नई शाखाएं चलीं—पौलौम और कालिकेय। इस समय बीस सहस्र कालिकेयों ने बाण की अधीनता स्वीकार कर उसका बल बढ़ाया, परन्तु काल पाकर बाण का भी बल-क्षय हुआ और कालिकेयों को कश्यप-तट छोड़कर लंका की ओर भागना पड़ा। इनमें से बहुतों ने लंका के आसपास के द्वीप-समूहों पर अधिकार कर लिया। ये सारे ही द्वीप उस समय रावण के रक्ष-साम्राज्य में आ चुके थे। अतः रावण को कालिकेयों पर बहुत बार सेना भेजनी पड़ी। परन्तु हर बार कालिकेयों ने राक्षस-सैन्य को प्रताड़ित किया। कालिकेयों के आतंक का सिक्का राक्षसों पर बैठ गया, पर महत्त्वाकांक्षी रावण ने अभी कालिकेयों की गतिविधि पर विशेष ध्यान नहीं दिया था। वह अपने भारत प्रवास में चला गया था। इसी बीच विद्युज्जिह्व लंका में छद्मवेश में आने-जाने लगा। वही वास्तव में कालिकेयों का सरदार था। राक्षसों के भय से वह छिपकर लंका में आता था, पर दैवयोग से उसका परिचय हो गया शूर्पणखा-राज-कन्या से इसलिए अब लंका में उसका आना-जाना और ही प्रकार का हो गया। वह शूर्पणखा से भी छिपकर मिलता था, इसलिए बहुधा कई-कई दिन तक उसे घात में लंका में छिपे रहना पड़ता था।

विद्युज्जिह्व एक प्रतिभासम्पन्न और वीर तरुण था। उसमें साहस की भी कमी न थी। अपने अदम्य साहस और उत्साह के कारण ही वह कालिकेयों का सरदार बन गया था। अपने असाधारण विक्रम से उसने वह द्वीप जय किया था और हर बार राक्षसों को उससे हार खाकर भागना पड़ता था। परन्तु उसने अभी लंका में यह प्रकट नहीं किया था कि वही कालिकेयों का सरदार है। शूर्पणखा उसे एक कुलीन दानव-तरुण ही समझती थी। उसकी उठान बड़ी सुन्दर थी, घुंघराले काले बाल तथा भरी हुई गर्दन। रंग काला था, परन्तु दांत हीरे के समान उज्ज्वल और चमकदार थे। उसका हास्य बड़ा निर्मल था। उसका विशाल वक्ष, प्रचंड बाहु, पुष्ट जघन और तीखी दृष्टि उसके व्यक्तित्व को आकर्षक बना देते थे। वह शब्दबेधी था। धनुष भी उसका खूब बड़ा था। बाणों का तूणीर सदैव ही उसके कन्धे पर पड़ा रहता था। इसके अतिरिक्त एक विशाल शूल भी वह हाथ में रखता था। शूर्पणखा से तथा अन्यत्र भी मित्रों से उसने यही कहा था कि वह आखेट के लिए लंका के वनों में शौक से घूम रहा है। शूर्पणखा के अतिरिक्त यह कोई नहीं जानता था कि वह कालिकेय दानव है।

संध्या का अंधकार गहरा होता जा रहा था। इसी समय विद्युज्जिह्व लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ लंका की वीथियों में तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था। वीथिका में अंधकार था। वह नगर का बूचड़ मुहल्ला था, जहां नर-मांस से लेकर सब पशुओं का मांस मिलता था। यहां व्याघ्र का मांस भी बिक रहा था, जिसे लोग शौर्य-वृद्धि के लिए खाना रुचिकर समझते थे।

विद्युज्जिह्व के कन्धे पर एक भारी हरिण का भार था। जो बाण उसके हृदय में पार हो गया था, वह अभी उसके शरीर में अटका हुआ था। उसमें से अभी तक रक्त टपक रहा था। उसके झोले में और भी कुछ पक्षी थे, जिनका उसने शिकार किया था। परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसका स्नायुजाल लोहे का बना हो। वह दूर से आ रहा था और उसके पास काफी बोझा था, परन्तु वह बिल्कुल तरोताजा था।

एक जीर्ण किन्तु विशाल घर के फाटक पर आकर वह तनिक ठिठका। फिर वह भीतर घुस गया। उस समय घर के विशाल प्रांगण में अंधेरा छाया था। कोई पुरुष भी वहां न था। वह दालान पारकर भीतर चला गया, जहां बहुत-से राक्षस, दैत्य, दानव, नर, नारी, बालक बैठे खा-पी रहे थे। सबके हाथों में बड़े-बड़े भुने हुए मांस-खण्ड थे और मद्य के भरे भाण्ड उनके आगे धरे थे। वह उन पर भेड़ियों की भांति जल्दी-जल्दी तीखे दांतों का प्रहार कर रहे थे तथा मद्य पी रहे थे। विद्युज्जिह्व ने कन्धे का भार एक ओर सहन में पटक दिया, फिर उसने इधर-उधर देख एक राक्षस-लड़की को संकेत से निकट बुलाकर कहा—“अरी सरमा, इन पक्षियों को मेरे लिए झटपट अभी भून ला। जल्दी कर और नमक भी संग ही ले आ।” राक्षसबाला मृत पक्षियों से भरा चमड़े का झोला लेकर भीतर चली गई। उसने उलटकर देखा तो उसमें एक सांप भी था। सांप बहुत मोटा था और अभी तक उसके फन से विष और झाग निकल रहे थे।

वह उसे हाथ में लिए आई। विद्युज्जिह्व एक शिलाखण्ड पर बैठकर समूचे सूअर में दांत गड़ा रहा था। सरमा ने कहा—“यह सांप क्यों लाया है?”
“फनियर है, खूब चर्बी है इसमें। मेरे लिए भून ला। मजेदार रहेगा। मुझे इसका शौक है।”
“और यदि दूषीविष हो गया तो क्या होगा?”
“विद्युज्जिह्व मर जाएगा, और क्या होगा! तेरा बहुत झंझट छूट जाएगा। जा भाग!”—इतना कहकर उसने सूअर की उरोगुहा में हाथ घुसेड़कर उसका कलेजा खींचकर बाहर निकाल लिया और चाव से खाने और हंसने लगा।

सरमा चली गई। थोड़ी ही देर में वह उस सांप को और पक्षियों को समूचा भून-भानकर ले आई। विद्युज्जिह्व ने प्रसन्न मुद्रा से उसकी ओर देखा और सांप के खण्ड करके रुच-रुचकर खाना आरम्भ किया। सरमा खड़ी देखती रही। कहा—
“क्या मद्य लाऊं?”
“ले आ, दो भाण्ड।”

परन्तु सरमा ने एक भाण्ड लाकर उसके आगे धर दिया। विद्युज्जिह्व ने क्रुद्ध होकर कहा—
“अरी कृत्या, मैंने दो कहा था।”
“दो ज्यादा हैं। तू संयत नहीं रह सकता।”
“तो तुझे क्या! तू भाण्ड ला।”
“यह है तो।”
“एक और ला।”
“एक ही यथेष्ट है।”
“तू मुझ पर अंकुश रखती है?” उसने लाल-लाल आंखों से राक्षस-बालिका को देखा। परन्तु राक्षस-बाला फिर भी नहीं गई। खड़ी रही। यह देखकर विद्युज्जिह्व हंस दिया। उसने खाते-खाते सर्प का एक टुकड़ा उठाकर कहा—“ले, तू भी खा।”

“ऊहुंकू, मैं सर्प नहीं खाती।”
“खा ले कृत्या, नेत्र-दोष दूर हो जाएगा। यह नेत्र की अच्छी ओषधि है।”
“मेरे नेत्रों में दोष नहीं है।”
“तो यह ले।” उसने एक समूचा भूना हुआ तीतर उसे दे दिया। पक्षी को लेकर भी वह खड़ी ही रही। विद्युज्जिह्व ने कहा—“जा भाग, अब क्यों खड़ी है?”
“मुझे कुछ कहना है।” उसके नेत्रों में भय और वाणी में करुणा थी।
“कह।”
“वे मुर, उसकी स्त्री और बालक पुत्र को पकड़ लाए हैं।”
“कौन?”
“व्याघ्राक्ष और विकटोदरी।”
“क्यों?”
“ऋण के लिए।”
“फिर?”
“मुर ऋण नहीं चुका सका, अब ये उसे सपरिवार मारकर खा जाना चाहते हैं।”
“किन्तु मुर तो हमारा मित्र है। उसका बालक मुझे बहुत प्रिय है। उसकी स्त्री भी मृदुभाषिणी है।”
“उसकी मुझ पर भी मातृदृष्टि है। कृपा कर उसे बचा लें।”
“ऋण कितना है?”
“केवल तीन स्वर्ण।”
“इतना तो मैं अभी दे सकता हूं।”
“तब तो वे तीनों तेरे दास बन जाएंगे।”
“तो जाकर देख, वहां क्या हो रहा है और मेरे आने तक उन्हें ठहरने को कहा।”

बालिका की उम्र तेरह-चौदह साल की थी। उसके अंग पर केवल अधो-वस्त्र था। वह सूअर के दांतों का कण्ठ-भूषण पहने थी जो स्वर्ण में मढ़ा था। कछुए की खोपड़ी के चूड़ उसकी भुजाओं में भरे थे। मनुष्यों के दांतों की एक स्वर्ण-सूत्र ग्रथित करधनी वह कटि में पहने थी। वह बड़ी चपल और तीव्रबुद्धि लड़की थी। गत वर्ष उसे किसी क्षुद्र द्वीप में बांधकर बलि के लिए ले जाया जा रहा था। विद्युज्जिह्व उधर आखेट को गया था। उसका आर्तनाद सुन उसने उसे पांच स्वर्ण में खरीद लिया। अब वह उसकी सेवा बड़ी लगन से कर रही थी। विद्युज्जिह्व उस पर बहुत सदय था। बालिका विद्युज्जिह्व का आदेश पा भाग गई। विद्युज्जिह्व जल्दी-जल्दी उस शूकर और पक्षियों को तथा उस मद्यभाण्ड को उदरस्थ करने लगा, परन्तु बालिका तुरन्त ही बदहवास-सी दौड़ी आई। उसने विद्युज्जिह्व के कन्धे झकझोरकर कहा—“चल-चल, जल्द!”
“क्या हुआ? अभी मेरा भोजन पूरा कहां हुआ?”
“पर उन्होंने मुर को मार डाला। वे उसे खा रहे हैं। वे उसकी स्त्री और पुत्र को भी मार डालेंगे।”
“अरे,” कहकर विद्युज्जिह्व उठा। अपना भारी शूल उसने हाथ में ले लिया। बालिका उसे एक प्रकार से घसीटती हुई-सी अंधेरी और तंग वीथी में ले चली। व्याघ्राक्ष के घर जाकर उसने देखा कि मुर का मुण्ड कटा पड़ा है और विकटोदरी उसका वक्ष चीरकर उसका हृदय निकाल रही है। हाथ में रक्तसना खड्ग लेकर व्याघ्राक्ष मुर की स्त्री और बालक को वध-यूप से बांध रहा है, दोनों चीख-चिल्ला रहे हैं।” विद्युज्जिह्व ने ललकारकर कहा—
“यह क्या किया रे, व्याघ्राक्ष?”
“तो मैं अपना ऋण छोड़ दूं?”
“छोड़ उन्हें! अभी बन्धनमुक्त कर!”
“तो ला तीन स्वर्ण मुद्राएं तू ही दे दे।”
“पर तूने मुर को मार ही डाला।”
“उस सूखे बूढ़े में मांस ही कितना है, एक स्वर्ण भी तो नहीं उठेगा उसका। आज युद्ध में उस द्वीप के बहुत तरुणों का वध हुआ है। वे सब बिकने हाट में आए हैं। आज नर-मांस का भाव बहुत सस्ता हो गया है। फिर यह बूढ़ा, वह बालक। ऊहुंकू—मैं बहुत घाटे में रहूंगा। सोच भला तीन स्वर्ण और ब्याज!”
“यह ले तीन स्वर्ण मुद्राएं, खोल उनका बन्धन।” उसने स्वर्ण मुद्राएं उसकी ओर फेंक दीं।

व्याघ्राक्ष ने हंसकर स्वर्ण उठा लिया। फिर कहा—“तनिक पहले आता तो यह बूढ़ा भी तेरे काम आता।” वह बालक और स्त्री को बन्धनमुक्त करने लगा। परन्तु विकटोदरी ने क्रुद्ध मुद्रा से कहा—“यह हृदय-खण्ड और इसका मांस मैं नहीं दूंगी, कहे देती हूं—सूद कितना हुआ, यह क्यों नहीं कहते?” उसने रोषभरी आंखों से पति की और देखा।

परन्तु विद्युज्जिह्व उससे विवाद करने को वहां रुका नहीं। सिसकते और बदहवास स्त्री और बालक को लिए, हाथ का शूल हवा में हिलाता हुआ, तेजी से वहां से चल दिया—उसके पीछे खुशी से ताली बजाती वह राक्षस-बालिका भी।