शूर्पणखा
54. शूर्पणखा
खूब घने काले बाल, चमकती हुई काली आंखें, एक निराला-सा व्यक्तित्व, गहन अहम्मन्यता से भरपूर। रानी के समान गरिमा, पिघलते हुए स्वर्ण-सा रंग, आदर्श सुन्दरी न होने पर भी भव्य आकर्षण से ओतप्रोत। आंखों में झांकती हुई स्थिर दृढ़ संकल्प-प्रतिमा, कटाक्ष में तैरती हुई तीखी प्रतिभा और उत्फुल्ल होठों में विलास करती हुई अदम्य लालसा—यह शूर्पणखा का व्यक्तित्व था। प्रतिक्रिया के लिए सदैव उद्यत और अपने ही पर निर्भर। लम्बी, तन्वंगी, सतर और अचंचल।
उसका असली नाम था ‘वज्रमणि’, परन्तु नाखून उसके बड़े और चौड़े—सूर्प की भांति थे, इससे बचपन ही में विनोद और प्यार से भाई उसे चिढ़ाते हुए शूर्पणखा कहते थे और अब उसका यही नाम प्रसिद्ध था। इस नाम से वह बचपन में चिढ़ती थी, परन्तु अब नहीं। वह परन्तप रावण और दुर्धर्ष कुम्भकर्ण की अकेली बहन थी, प्यार और दुलार के वातावरण में पली हुई। प्रथम रक्षकुल, दूसरे राजकुल, तीसरे प्रतापी भाइयों की प्रिय इकलौती बहन, चौथे निराला अहं-स्वभाव, पांचवें स्वच्छन्द जीवन, सबने मिलकर उसे एक असाधारण—कहना चाहिए, लोकोत्तर—बालिका बना दिया था।
राक्षसेन्द्र रावण के सामने आकर उसने शालीनता से कहा—“ जयतु देव:! जयत्वार्य:!”
“अये स्वसा! अपि कुशलं ते?”
“प्रीतास्मि। किम् रक्षेन्द्र!”
“भद्रं ते पश्यामि भगिनि!”
“मेरे लिए रक्षेन्द्र का कुछ आदेश है?”
“तेरे ही कल्याण के लिए। तू रक्षेन्द्र की प्राणाधिका इकलौती बहन है।”
“कुछ विशेष बात है?”
“हां बहन, तुझसे महिषी मन्दोदरी ने कुछ कहा है?”
“यही कि रक्षेन्द्र मुझे देखना चाहते हैं।”
“तो बैठ बहन, तुझसे मैं कुछ बात करूंगा।”
“कैसी?”
“प्यार की?”
“कैसा प्यार?”
“जीवन से प्यार।”
“वह क्या होता है?”
“क्या तू नहीं जानती?”
“कदाचित्।”
“तू क्या जीवन को प्यार करती है?”
“क्यों नहीं!”
“क्या बहुत अधिक?”
“हां!”
“अच्छा, तो बता, विद्युज्जिह्व कौन है?”
“वह एक प्रियदर्शी तरुण दानव कुमार है।”
“तू उसे प्यार करती है?”
“करती हूं।”
“तो लजाती क्यों है? तेरा चरित्र निर्मल है। प्यार न अपराध है, न पाप। जो सत्य है, वह कह। क्या वह तुझसे बहुधा मिलता रहता है?”
“नहीं, कभी-कभी।”
“क्या वह कभी-कभी आता है?”
“बहुधा आता है, पर मुझसे कभी-कभी मिलना होता है।”
“ऐसा क्यों?”
“महिषी और मातामह को यह रुचिकर नहीं है।”
“क्यों भला?”
“महिषी प्यार को स्वप्न कहती हैं और सदैव मुझे डराती हैं। उनका कहना है कि किसी पुरुष को प्यार करने से जीवन का प्यार नष्ट हो सकता है।”
“किन्तु तू क्या समझती है?”
“मैं तो कुछ नहीं समझती, परन्तु मातामह की बात कुछ और है।”
“वह क्या है?”
“उनकी विवाह करने की आयु बीत चुकी है, वे कहते हैं—प्रेम एक धोखा है।”
“मातामह की यह धारणा तुझे कैसी लगती है?”
“ओह, यदि उसे सत्य मान लिया जाए, तो हमें अपने ही जीवन पर अधिकार न रहे।”
“ऐसा तू क्यों सोचती है भला?”
“इसलिए कि हम जीवन में एकाकी नहीं हैं।”
“निस्सन्देह, परन्तु हमें दूसरों के साथ जीवित रहने के लिए उनके प्रति सच्चे रहना आवश्यक है। यदि दूसरों के साथ जीवन का लय करने में इतना-सा भी असत्य रह जाएगा, तो जीवन का आनन्द समाप्त हो जाएगा।”
“ऐसा समझती हूं, रक्षपति।”
“तो बहन, यह हमारे लिए आवश्यक है कि जो लोग हमारे जीवन के निकट आएं, उन्हें और अपने-आपको भी हम खूब सावधानी से देखें। निस्सन्देह, हमें अपने जीवन पर अधिकार है। उसी प्रकार तुझे उस व्यक्ति को प्यार करने का अधिकार है, जिसे तू प्रियदर्शी कहती है। तू सचेष्ट रह और यदि कहीं भूल हो तो गुप्त न रख। जीवन की निष्ठा इसी में है।”
“मैं समझ गई।”
“अच्छा तो सुन, क्या विद्युज्जिह्व से विवाह करना चाहती है?”
“निस्सन्देह।”
“तब तो मुझे भय है कि तू जीवन को प्यार नहीं करती।”
“ऐसा क्यों!”
“हमें जैसे अपना सत्य देखना है दूसरों के प्रति, उसी भांति दूसरों का अपने प्रति भी तो!”
“किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को अपने संबंध में निर्णय करने का अधिकार है।”
“अवश्य ही है।”
“तो मैं चाहती हूं कि मैंने जो निर्णय किया है, उसमें रक्षेन्द्र बाधा न डालें।”
“बाधा नहीं डालना चाहता। मैं यह देखना चाहता हूं कि तू अपने जीवन को क्या वास्तव में प्यार करती भी है? तू विद्युज्जिह्व को प्यार करती है तो तू उससे विवाह कर; किन्तु वह उपयुक्त पुरुष है—यह अवश्य देख।”
“रक्षेन्द्र क्या कहना चाहते हैं?”
“सुन, क्या तू किसी पुरुष के साथ भाग जाना पसन्द करेगी?” “किसी के साथ मैं क्यों भागूंगी? मैं विद्युज्जिह्व के साथ विवाह करूंगी।”
“विवाह के लिए जल्दी क्या है? अभी तू किसी पुरुष के साथ भाग जा।”
“क्यों भला?”
“स्त्रियां प्राय: किसी प्रेमी के साथ भाग जाया करती हैं। कोई विवाह के पहले भागती है, कोई पीछे। मेरा विचार है, पीछे भागने की अपेक्षा पहले ही भाग जाना अच्छा है।”
“वाह!”
“प्रजंघ को देखा है तूने?”
“कौन है वह?”
“मेरी सेना का एक तरुण गुल्मपति है। तेजस्वी और मेधावी—चीते की भांति चंचल। वह उर नगर के अभिजात दैत्यकुल का है।”
“तो उससे मुझे क्या?”
“तू उसके साथ कुछ दिन के लिए भाग जा। इससे तुझे लाभ होगा। दुनिया की ऊंच-नीच का ज्ञान हो जाएगा। तेरा मस्तिष्क और हृदय विस्तृत हो जाएगा। यह भी सम्भव है कि तू उसे ही प्यार करने लगे और उसी से विवाह कर ले।”
“परन्तु मैं तो विद्युज्जिह्व को प्यार करती हूं।”
“ठीक है, तो तू अभी प्रजंघ के साथ भाग जा। प्रेम-संबंधी अपने अनुभव पुष्ट कर—फिर लौटकर विद्युज्जिह्व से ब्याह कर।”
“अच्छी दिल्लगी है!”
“कदाचित् तूने इसकी उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया। विद्युज्जिह्व से पहले तो तेरा किसी पुरुष से सम्पर्क ही नहीं हुआ। विद्युज्जिह्व को भी तू सर्वतोभावेन नहीं जानती। बहुत कम तेरा उससे मिलना हुआ है। फिर तू उसके व्यक्तित्व को किसी अन्य पुरुष से कैसे तौल सकती है? प्यार का पात्र कौन है—इसका चुनाव कैसे कर सकती है? इसी से दूसरे पुरुष का भी तो अनुभव प्राप्त कर। फिर उससे विद्युज्जिह्व के सौष्ठव को तौल।”
“इससे क्या होगा?”
“पता चल जाएगा कि क्या वह दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ गुणों का स्वामी है? क्या वह दूसरों की अपेक्षा तेरे जीवन को अधिक सुखी कर सकेगा? तू यदि अपने जीवन को प्यार करती है, तो विद्युज्जिह्व या और किसी को अपना अन्धा प्यार मत दे। उसी को अपना समर्पण कर, जो तुझे तेरा सबसे अधिक मूल्य चुकाए—सबसे अधिक प्यार करे। मैं नहीं चाहता कि तू विद्युज्जिह्व को अन्धा प्यार देकर अपने जीवन को कष्ट में डाल दे। मेरा कहना यही है कि प्राथमिकता तू अपने ही जीवन के प्यार को दे—विद्युज्जिह्व के प्यार को नहीं। जो तेरे जीवन को प्यार दे, उसे ही तू प्यार कर, पर अपने जीवन से अधिक नहीं।”
“यह सब सोचकर ही तो मैंने विद्युज्जिह्व को प्यार किया है।”
“अच्छा कह, वह कैसा पुरुष है?”
“दर्शनीय, स्फूर्तिमय और छरहरा शरीर—उदग्र और साहसिक। देखोगे तो पसन्द करोगे।”
“यह हुआ आकर्षक व्यक्तित्व। किन्तु गुण, विशेषताएं, आचरण?”
“वह एक मेधावी और दूरदर्शी तरुण है। अपनी आयु से अधिक वह गम्भीर है। अपने कर्तव्य का ज्ञान है। उसका सहवास मुझे सुखकर है, उसके सान्निध्य से मैं निश्चिन्त हूं।”
“यहीं मैं सन्दिग्ध हूं। अच्छा, क्या उसमें कुछ दोष भी हैं?”
“एक भी नहीं, वह एक आदर्श तरुण दानव है।”
“उसके पारिवारिक जीवन के संबंध में तू कुछ नहीं जानती है?”
“इतना ही जानती हूं कि उसका पिता चिरप्रवासी है। घर नहीं लौटा है—और उसकी माता ने एक दुश्चरित्र और जुआरी दैत्य को घर में डाल लिया है। अब वे दोनों उसके वैरी हैं। उन्हें भय है कि अब वह समर्थ होकर उनसे अपने पिता की सम्पत्ति न छीन ले। वे उसे खपा डालने पर तुले हैं। इसी से वह भागकर लंका में आ छिपा है। वह एक उपेक्षित और अनादृत पुत्र और निराश्रय तरुण है।”
“इसी से तेरी उसके प्रति इतनी आसक्ति है?”
“प्रथम सहानुभूति हुई, फिर प्रेम और अब आसक्ति।”
“क्या उसका कोई प्रिय बन्धु-बान्धव नहीं है?”
“मैं हूं और मैं रक्षेन्द्र से अनुनय करती हूं कि उसे अपनी शरण में ले लें।”
“वह किस वंश का है?”
“कालिकेयों के वंश का।”
“अरे, वे तो हमारे शत्रु हैं।”
“परन्तु वह तुम्हारा बान्धव है, चिर अनुगत।”
“कब से तू उसे जानती है।”
“अब यह वर्ष समाप्त होता है।”
“मातामह को तो वह भाया ही नहीं।”
“कैसे भा सकता था! तरुणों के हृदय को ये वृद्ध थोड़े ही समझते हैं!”
“ठीक है। परन्तु बहन, मैं वृद्ध नहीं हूं—फिर भी ज्येष्ठ हूं।”
“और मैं रक्षेन्द्र की प्रजा और छोटी बहन हूं।”
“प्रजा नहीं, बहन, प्राणाधिक बहन, परन्तु मेरे दायित्व को भी तो तू देख। विद्युज्जिह्व तेरे ही कथनानुसार सुन्दर और बुद्धिमान तरुण होने पर भी विपन्न, निराश्रित है। वह तेरे लिए अनुपयुक्त पति भी प्रमाणित हो सकता है। अभी कैसे हम निर्णय कर लें? कैसे मैं तुझे उससे विवाह करने की अनुमति दे दूं? ठीक यही है कि विवाह की बात अभी रहने दे। तू प्यार करती है तो कर। पर जल्दी न कर। मुझे भी उस पुरुष से कुछ प्रभावित होने दे।”
“किन्तु रक्षेन्द्र कैसे मुझे विवाह से वंचित रखना चाहते हैं? हम दोनों परस्पर सख्य रखते हैं। हम एक-दूसरे के पूरक हैं, ऐसा मेरा विश्वास है। इसमें बाधा उपस्थित करके रक्षेन्द्र मेरे साथ न्याय नहीं कर रहे हैं।”
“मैं स्वीकार करता हूं कि तू उस आयु को पहुंच चुकी है कि दाम्पत्य सुख को ग्रहण करे। मैं अवश्य तेरा विवाह करके प्रसन्न होऊंगा। विद्युज्जिह्व के विरुद्ध भी मुझे कुछ कहना नहीं है, पर मैं यह अवश्य चाहता हूं कि तू एक निरापद और आनन्दमय जीवन का आश्रय ले।”
“यह सब व्यर्थ है। मैंने विद्युज्जिह्व से ही विवाह करने का निश्चय कर लिया है।”
“किन्तु मैंने तुझसे प्रजंघ के संबंध में जो बात कही?”
“मैं तो उस पुरुष को जानती भी नहीं।”
“क्या तू उससे मिलना चाहती है?”
“बिल्कुल नहीं।”
“तू उसके साथ भाग क्यों नहीं जाती?”
“मैं क्यों भागूं? मैं तो विद्युज्जिह्व के साथ विवाह करूंगी।”
“सो उसमें क्या बाधा है? पुरुषों के गुण-दोषों का कुछ ज्ञान तो तुझे हो जाएगा।”
“मैं समझती हूं, मैं उतनी मूढ़ नहीं हूं, भाई!”
“विद्युज्जिह्व के साथ तो तेरा बहुत ही अल्प सम्पर्क रहा है।”
“किन्तु आत्मा की गहराई तक। हम लोगों ने कभी भी प्रेम के संबंध में बातचीत नहीं की। केवल प्रेम किया है। किन्तु मैं उससे कितनी प्रभावित हूं, यह रक्षेन्द्र सोच भी नहीं सकते।”
“बहन, मैं तेरे प्रेम का अभिनन्दन करता हूं।”
“तो भाभी से कह दिया जाए, वे क्यों विद्युज्जिह्व को शंकालु होकर देखती हैं?”
“बहन, वह केवल तेरी भाभी ही नहीं, राजमहिषी हैं—तेरी अभिभावक भी हैं।”
“आप भी तो राक्षसेन्द्र हैं, सारी ही रक्ष-जाति के अभिभावक, सो आप क्या मेरे जीवन पर अपना अनुशासन रखेंगे?”
“नहीं बहन, नहीं।”
“तो महिषी से भी कह दीजिए। वे आ रही हैं, अभी कह दीजिए।”
मन्दोदरी ने आकर पूछा—“क्या मुझसे तुम्हें कुछ कहना है?”
“मैं महिषी और रक्षेन्द्र से यही निवेदन करना चाहती हूं कि मेरे जीवन पर किसी का अनुशासन नहीं है।”
“राक्षसों की संस्कृति ही स्वतन्त्र भावनामूलक है। राक्षसों का प्रत्येक जन अपने जीवन में स्वतन्त्र है।”
“तो मैं विद्युज्जिह्व को प्यार करती हूं। उससे मैं विवाह करना चाहती हूं।”
“और मेरा यह कहना है कि प्यार-प्रीति के अनुभव लेने के लिए क्यों न शूर्पणखा किसी तरुण के साथ भाग जाए, पीछे विद्युज्जिह्व या उस तरुण से, जो उसे रुचे, ब्याह कर ले।” रावण ने मन्दोदरी को लक्ष्य करके कहा।
“बुरा क्या है? परन्तु ऐसा कोई पुरुष रक्षेन्द्र ने सोचा है क्या?”
“ हमारा गुल्मनायक प्रजंघ ही है, उसी को मैं प्राथमिकता दूंगा।”
“शूर्पणखा के लिए यह उत्तम होगा।”
“पर मैं किसी के साथ भागूं क्यों? मैं जिसे प्यार करती हूं, उससे ब्याह करूंगी।”
“ब्याह करने पर उसने तेरे जीवन को संतप्त किया तो?”
“ऐसा क्यों होगा भला?”
“बहुत होता है बहन, तुम भोली हो, समझती नहीं हो। तुम जैसी बालिकाएं इसी प्रकार प्रथम प्रेम के ज्वर में ब्याह कर बैठती हैं। फिर एक पुरुष को छोड़कर दूसरे के साथ भाग खड़ी होती हैं।” मन्दोदरी ने प्रेम-मुद्रा से कहा।
“यही मैं कहता हूं—ब्याह के पीछे भागने से ब्याह से पहले भागना अच्छा है।”
“तो भागना ही है तो विद्युज्जिह्व ही क्या बुरा है?”
“हम कैसे कहें! हमने तो उसे देखा नहीं।”—रावण ने कहा।
मन्दोदरी ने गम्भीर होकर कहा—“यौवन का आरम्भ प्रेम ही से तो होता है, परन्तु युवक और युवतियां केवल जीवन को प्यार ही करना जानते हैं, उन्हें संसार का अनुभव कुछ नहीं होता, इससे उनका प्यार खोखला हो जाता है और जीवन निराश। विवाह एक दु:खद घटना हो जाती है। शूर्पणखा को मैं उससे बचाना चाहती हूं, उसने अभी किसी तरुण को प्यार की दृष्टि से देखा ही नहीं है।”
कुछ रुककर उसने फिर कहा—“उसे तरुणों के प्यार का अनुभव होना चाहिए, प्यार के घात-प्रतिघातों से भी उसे अपरिचित न रहना चाहिए। फिर वह भी तो भूल कर सकती है। यह कितना अपमानजनक होगा, सोचो तो! हमारा विश्व-विश्रुत प्रतिष्ठित रक्ष-कुल है और शूर्पणखा सप्तद्वीपपति रक्षराज की सगी बहन है। वह आत्मविश्वास से भरपूर है, परन्तु उसकी दृष्टि एकांगी है। अभी वह दुनिया के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानती। उसके विचार भावुकता से ओत-प्रोत हैं। उसने अपने निकटतम वातावरण से एक योजना स्थिर कर ली है और वह समझती है कि वह सब कुछ ठीक-ठाक कर रही है। पर अभी वह बच्ची ही तो है। उसका हृदय तो अभी सो ही रहा है। एक दिन वह जगेगा तो वेदना के हाहाकार से भर जाएगा। इसी से मैं नहीं चाहती कि वह मूर्ख, भावुक लड़कियों की भांति उसी तरुण से ब्याह कर ले जिसे उसने प्रथम बार ही जरा-सा जाना हो और जरा-सा ही प्यार किया हो।”
इतना कहकर मन्दोदरी ने शूर्पणखा की ओर देखा। रावण ने उसका समर्थन करते हुए कहा—
“तभी तो मैंने कहा कि वह किसी तरुण के साथ कुछ दिन के लिए पहले भाग जाए। ऐसा एक तरुण मेरी नजर में है, प्रजंघ।”
“परन्तु प्रजंघ से मेरा क्या लेना-देना है? मैं उसके साथ क्यों भाग जाऊं?” शूर्पणखा ने गुस्से होकर कहा।
“मेरी प्यारी रक्षराज-नन्दिनी, तुम्हें वस्तु का यथार्थ ज्ञान होना ही चाहिए। तुम्हारा शरीर और आत्मा परिपूर्ण होगा, तब वह आह्लाद से एक दिन ओत-प्रोत हो जाएगा। तभी चैतन्य आत्माएं परस्पर मिलकर जीवन के सच्चे आनन्द को प्राप्त करेंगे। परन्तु तुमने यदि भावुकता और आवेश में आकर कुछ चूक की तो तुम्हारे इन नेत्रों में—जो आज प्रेम से उत्फुल्ल हैं—करुण विष भर जाएगा। ऐसा ही बहुधा होता है बहन, मैं जानती हूं। मैंने देखा है।”
“क्या यह महिषी ने जीवन के प्यार की व्याख्या की?”
“नहीं, केवल प्यार की, जिसके फेर में तुम फंसी हो।”
“तो जो किसी को प्यार करते हैं, वे जीवन के प्यार से वंचित ही रह जाते हैं?”
“ऐसा ही मैं समझती हूं। जो किसी के प्यार में फंस जाते हैं, वे प्राय: जीवन को प्यार नहीं करते। जीवन का प्रेम अन्य प्रेम की भांति नहीं किया जाता। उसमें एक कलापूर्ण कौशल की आवश्यकता है—भावावेश की नहीं। कला-पूर्ण कौशल तो सीखना ही पड़ता है।”
“वह चिरसाध्य है। उसे सीखने को बहुत समय चाहिए। बहुधा जब लोग उसे जान पाते हैं, उनका यौवन ढल चुका होता है। वह तुरन्त ही प्यार करने जैसी कोई छोटी चीज नहीं है, रक्षराज-नन्दिनी!”
“तो क्या महिषी विद्युज्जिह्व में कोई दोष देख रही हैं?”
“अनेकों। वह अप्रत्याशित रूप से गम्भीर और अन्यमनस्क है। उसे न कोई अनुभव है, न उसके अधिकार में कोई सम्पदा है, न जीवन का सहारा। वह जीवन को नहीं, जीवन के प्रवाह को देख सकता है। वह भाग्यवादी है और जीवन के भय से छिपकर रहता है। निस्सन्देह वह भावुक है। दूसरों के प्रति अपने कर्तव्य को समझता है। वह सच्चा और स्पष्टवक्ता है, परन्तु वह पुरुष नहीं है, जो हमारी बहन को जीवन की राह दिखा सके। न वह ऐसा ही है जिसे कुछ सिखाया जा सकता है। ऐसे पुरुष को प्यार करके कौन स्त्री अपने जीवन को सुखी कर सकती है?”
शूर्पणखा रोने लगी। उसका कुछ भी विचार न कर मन्दोदरी कहती चली गई — “विद्युज्जिह्व को अपने जीवन से भी प्यार नहीं है। किसी स्त्री के प्रेम के प्रभाव में आने का अर्थ है, किसी पुरुष को प्रेम करना। परन्तु मैं नहीं चाहती कि कोई कुमारी किसी ऐसे तरुण को प्यार करे जो सब ओर से असहाय हो, अव्यवस्थित हो, अस्तव्यस्त हो।”
“तुमने तो विद्युज्जिह्व को देखा ही नहीं है!” रावण ने कहा।
“नहीं, जो सुना उसी पर मैंने शूर्पणखा को हितकर बात कही है।”
“क्यों न उसे बुलाकर उसे अपनी योग्यता प्रमाणित करने का अवसर दिया जाए।” रावण ने कहा—
“बहन, शूर्पणखा क्या तू उसे एक संदेश नहीं भेज सकती?”
“नहीं।”
“क्यों नहीं?”
“वह छिपकर रहता है। कहां रहता है, मैं नहीं जानती। वह अपनी सुविधानुसार आता है। वह जब तक आए—हमें प्रतीक्षा करनी होगी।”
“क्या वह तुझ पर विश्वास नहीं करता? अपने भेद छिपाता है?”
“उसने अपना गुप्त स्थान मुझे बताना चाहा था। पर मैंने ही उसे रोक दिया। उसे अपने सौतेले बाप का भय है, जो उसे मारकर अपनी राह का कंटक दूर करना चाहता है। फिर लंका में कालिकेयों का कौन मित्र है? कालिकेय तो राक्षसों के शत्रु हैं ही। उसने अपनी कुछ गुप्त बातें मुझे बताई हैं। एक प्रकार से उन्हीं पर उसका जीवन-मरण निर्भर है। मैंने ही उसका गुप्तवास नहीं जानना चाहा।”
“तब तो उसके आने तक हमें रुकना ही होगा।”
“किन्तु क्या रक्षेन्द्र उसका मणिमहालय में स्वागत करेंगे?”
“अवश्य बहन, क्यों नहीं!”
“और महिषी?”
“मैं भी बहन। हम दोनों ही रक्षराज-नन्दिनी के कल्याण-अभिलाषी हैं।”
“उपकृत हूं। आप्यायित हूं। आप दोनों मेरे माता-पिता हैं। मैं आपकी शरण हूं!”