अन्तःपुर

अन्तःपुर में रक्षमहिषी मन्दोदरी ने रावण का भव्य स्वागत किया। सब मंगलोपचार किए। प्यार, विरह, उपालम्भ और मान-मनौव्वल हुआ, रति-विलास हुआ। मिलन-यामिनी मधुयामिनी की भांति व्यतीत हुई। सुप्रभात हुआ। नित्य नैमित्तिक कार्यों से निवृत्त हो, रावण ने अब अपने रक्ष महासाम्राज्य के विस्तार पर ध्यान दिया। इसी महत् कार्य के लिए उसने सारी पृथ्वी की यात्रा की थी। वह धर्म और राजनीति, दोनों में सार्वभौमता की स्थापना करने का स्वप्न देख रहा था। जिस महदुद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने अपने प्राणाधिक पुत्र मेघनाद को मृत्युञ्जय रुद्र के सान्निध्य में भेज दिया था, उसकी पूर्ति के लिए उसे अब अपने महावीर भाई कुम्भकर्ण, महाकूटनीतिज्ञ सुमाली तथा अपने मन्त्रियों से सत्परामर्श लेने थे। उसे पृथ्वी के सब दिक्पालों और लोकपालों को जय करना था। सर्वत्र अपनी रक्ष-संस्कृति का डंका पीटना था। वह अभी तक ऋषिकुमार और सप्त-द्वीपाधिपति ही था। किन्तु अब वह पृथ्वी भर के नृवंश का महिदेव बनना चाह रहा था।

रात्रि ही में उसने अपने सब प्रमुख राजपुरुषों और राक्षस महज्जनों को भोर में सभा करने की आज्ञा दे दी थी। अब वह प्रातः कृत्यों से निवृत्त हो ज्यों ही सभा-भवन की ओर जाने को प्रस्तुत हुआ, तभी मन्दोदरी ने आगे बढ़कर कहा—
“मुझे रक्षेन्द्र से कुछ निवेदन करना है।”
“किन्तु मैं तो अभी बहुत व्यस्त हूं, क्या अगत्य की बात है?”
“है तो।”
“किसके सम्बन्ध में?”
“रक्ष-राजकुमारी शूर्पणखा के सम्बन्ध में।”
“हमारी प्रिय बहन के सम्बन्ध में तुम्हें क्या कहना है? क्या कुछ चिन्तनीय बात है?”
“चिन्तनीय नहीं, परन्तु विचारणीय तो है। मैं उसके भावी जीवन—उसके विवाह के सम्बन्ध में कहना चाह रही थी। अभी तक हमने इस सम्बन्ध में विचार ही नहीं किया है, परन्तु अब वह वयस्क भी तो हो गई है।”
“निस्सन्देह वह हम तीन भाइयों की बहन है। उसकी कल्याण-कामना से मैं कैसे विमुख हो सकता हूं?”
“यही तो मैं भी चाहती हूं। अब हम इस प्रश्न को टाल भी तो नहीं सकते!”
“क्या कहीं हम लोगों से असावधानी हुई है?”
“नहीं, परन्तु अब हमें असावधान रहना उचित नहीं है। परन्तु रक्षेन्द्र क्या आज बहुत व्यस्त हैं?”
“ऐसा ही है।”
“परन्तु बात बहुत आगे बढ़ने से पूर्व हमें कुछ करना होगा।”
“अच्छा, विद्युज्जिह्व की ओर तो तुम्हारा संकेत नहीं है, प्रिये?”
“निस्सन्देह, शूर्पणखा उससे प्रेम करती है।”
“बुरा क्या है, विद्युज्जिह्व एक उच्चवंशीय तरुण दानवकुमार है। सुन्दर और सभ्य है। यदि वह उससे प्रेम करती है तो मैं उसे अनुमति दूंगा।”
“पर मैं समझती हूं कि वह लड़की अभी प्रेम के तत्त्व से नितान्त अनभिज्ञ है। वह तो उससे विवाह करने को आतुर हो रही है।”
“तो मैं उसका अभिनन्दन करता हूं। क्यों न वे परस्पर दम्पति बन जाएं?”
“आह, पर मुझे आपत्ति है, स्वामिन्!”
“क्यों प्रिये, यदि हमारी बहन शूर्पणखा विद्युज्जिह्व को प्यार करती है, तो हमें क्यों इस संबंध में आपत्ति होनी चाहिए?”
“क्या रक्षेन्द्र ने उसे देखा है?”
“नहीं, तुमने?”
“मैंने भी नहीं, वह सदैव छिपकर गुप्त रूप से मिलता है।”
“तो न सही हम उससे परिचित। शूर्पणखा तो उससे भलीभांति परिचित है। और यह उसी का विषय भी है।”
“यही तो बात है।”
“क्या शूर्पणखा से तुम्हारी इस संबंध में कुछ बात हुई है”
“बस इतनी ही कि वह उसे प्यार करती है।”
“बस, तो ठीक है।”
“परन्तु हमें अपना दायित्व देखना है, राक्षसेन्द्र, हमारे रक्ष-कुल की एक मर्यादा है।”
“निस्सन्देह, पर तुम्हारा अभिप्राय क्या है?”
“वह अभी निपट बच्ची है, नहीं जानती, प्रेम का जीवन पर कितना भार पड़ता है। यह बात तो हमारे ही सोचने की है।”
“परन्तु उसका ठौर-ठिकाना कहां है? वह चोर की भांति आता है तथा दस्यु की भांति जंगलों में भटकता रहता है।”
“उसे आखेट में अभिरुचि है, साहसिक भी है वह।”
“ऐसे तो दस्यु होते ही हैं।”
“इसमें कदाचित् राज-परिवार की ओर से अविनय हुआ है।”
“कैसे?”
“मातामह सुमाली ने मुझे बताया था।”
“कि हमने उसका महालय में स्वागत नहीं किया!”
“तो प्रिये, तुम भी मातामह से सहमत रहीं?”
“क्यों नहीं, मधु का अविनय क्या हमारी शिक्षा के लिए यथेष्ट नहीं? हम कैसे किसी अपरिचित अज्ञात कुल का अभिनन्दन कर सकते थे, जबकि हमने देखा कि वह राजकुमारी पर दृष्टि रखता है?”
“परन्तु वह वीर सुरुचिसम्पन्न है। शूर्पणखा उसे चाहती है, वह अभिजात दानव-कुल का है, फिर उसकी आयु भी तो ऐसी ही है।”
“हां, यौवन का प्रारम्भ प्रेम ही से होता है। प्रेमी समझते हैं, प्रेम ही जीवन का सार है, परन्तु रक्ष-महिदेव भी क्या यही समझते हैं?”
“कदापि नहीं।”
“मैं भी इसी से इस प्रेम-भावना को प्राथमिकता नहीं दे सकती।”
“तो प्रिये, तुम क्या चाहती हो?”
“केवल यही कि रक्षेन्द्र इस विषय पर ध्यान दें। इस विषय को अल्पवयस्क तरुणों के ऊपर छोड़ देना खेदजनक हो सकता है। मेरा मन कहता है, हमें यह संबंध रोकना चाहिए। यह मुझे श्रेयस्कर नहीं दीख रहा है। असंभव नहीं, एक दिन योग्य पात्र हम उसके लिए पा जाएं।”
“परन्तु उसका प्रेम?”
“बचपन का अज्ञान है।”
“प्रेम और जीवन के तथ्य का उसे अनुभव होना चाहिए। इसके लिए एक युक्ति यह हो सकती है कि एक ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति हमें ढूंढना चाहिए, जिसके साथ, बिना ही विवाह किए, वह भाग जाए। प्रेम और जीवन का जब उसे अनुभव हो जाएगा, वह स्वयं अपना पति चुन सकने में समर्थ होगी। ऐसे किसी एक पुरुष पर दृष्टि करो प्रिये, मैं भी देखूंगा।”
“इससे क्या लाभ होगा? जब तक उसका मनोनीत पुरुष न होगा, वह उसके साथ भागेगी ही क्यों? फिर, मैं तो किसी ऐसे पुरुष को जानती नहीं।”
“विद्युज्जिह्व ही क्या बुरा है? विवाह की बात छोड़ दी जाए। प्रेम ही को आगे चलने दो, उसे तुम ढील दे दो। वह तो आज ही विद्युज्जिह्व के साथ भाग जाएगी।”
“यह रक्षेन्द्र अपनी ही बहन का परिहास कर रहे हैं!”
“नहीं प्रिये, तुम्हें इसी बात का तो भय है। तुम्हारी बात से तो मैंने यही समझा। देखो, शूर्पणखा मूर्ख नहीं है, सच्ची, भावुक और स्थिरमति लड़की है। मैं उसकी ओर से निश्चिन्त हूं। उसे तुम उसी के पसन्द के जीवन को चुनने दो। हम राक्षस स्त्रियों पर अपना अंकुश रखना नहीं चाहते।”
“मैं भी चाहती हूं कि वह अपने जीवन को स्वयं चुने। पर वह भूल नहीं कर सकती, यह तुम नहीं कह सकते। वह दुनिया के संबंध में कितना जानती है? अपने ही संबंध में उसका ज्ञान सीमित है। उसके सारे ही आदर्श भावुकता पर आधारित हैं। वह समझती है कि वह सब कुछ जानती है, परन्तु उसका हृदय सो रहा है। वह जब जागेगा, तब तक तो सम्भवतः सब कुछ समाप्त हो जाएगा। वह बड़ी तुनकमिजाज लड़की है। ऐसी लड़कियां प्रेम के मामले में सदा धोखा खाती हैं।”
“प्रिये, प्रेम के तत्त्व को मैं सम्भवतः तुमसे अधिक नहीं समझता।” रावण ने हंसते हुए मन्दोदरी का आलिंगन किया और कहा—“तुम जैसा ठीक समझो करो। पर यह न भूलो कि मैं अपनी शूर्पणखा को बहुत प्यार करता हूं और उसे सुखी देखना चाहता हूं।”
और वह एक बार फिर मन्दोदरी का आलिंगन कर तेजी से चला गया।